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लाल किले से फिर हुईं बड़ी-बड़ी घोषणाएं, लेकिन नदारद रहा रोडमैप

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 74वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर देश को संबोधित करते हुए, हमेशा की तरह जनता का उत्साहवर्धन करने वाला भाषण दिया, कि जैसे स्थिति नियंत्रण में है सब व्यस्थित है, जबकि स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत है।

देश का 74वां स्वतंत्रता दिवस उस समय में आया है जब देश में चारों तरफ मायूसी, बेबसी और डर है। लोगों के अंदर अनिश्चितता का भाव लगातार बढ़ता जा रहा है। वर्तमान स्थिति में यह समझ से परे है कि देश किस ओर जा रहा है। लोगों के अंदर घोर निराशा बढ़ती जा रही है। रोजी-रोटी एक बड़ा सवाल बना हुआ है। लगातार लोगों की नौकरियां जा रही हैं।

आने वाले दो-तीन सालों में देश कहां जाएगा? देश का क्या होगा? कहां से नये रोजगार आएंगे? यह तमाम सवाल जनता के जेहन में हैं। ऐसे में फिर से उम्मीद थी कि शायद आज के इस महत्वपूर्ण दिन जनता के सवालों के जवाब मिल पाएंगे।

अपने पूरे भाषण में प्रधानमंत्री ने आत्मनिर्भर भारत अभियान पर ही जोर दिया। उन्होंने फिर से लोकल वोकल की बात की। उनका कहना है कि कब तक हम अपने देश का कच्चा माल विदेशों में भेजते रहेंगे और वहां से निर्मित माल अपने देश में उंची कीमतों पर लेते रहेंगे। सुनने में यह अच्छा लगाता है कि देश की तरक्की की बात कही जा रही है, पर दूसरी तरह हम एफडीआई को बढ़ावा दे रहे हैं तो यह दोनों चीजें एक साथ नहीं हो सकती हैं, इसलिए यह लोकल-वोकल की बात थोड़ा विरोधाभासी लगती है।

यदि लोकल वोकल को ही बढ़ावा देना है तो उसके लिए क्या नीतियां हैं, उस पर चर्चा होनी चाहिए। क्या छोटे और मझोले उद्योगों को लोन का प्रावधान कर देने से लोकल वोकल को मजबूती मिलेगी? प्रधानमंत्री ने कहीं पर इस बात का जिक्र नहीं किया कि इन छोटे और मंझोले उद्योगपतियों द्वारा निर्मित माल को लोग कैसे खरीद पाएंगे, क्योकि वर्तमान स्थिति में लोगों की खरीदने की क्षमता लगातार खत्म होती जा रही है। इसके चलते यह तमाम लोन संबंधी योजनाएं अपना मूर्त रूप लेने में असमर्थ रहेंगी।

प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में तकरीबन हर वर्ग का जिक्र किया, चाहे वह किसान हो, आदिवासी, दलित, मध्यमवर्ग और कामकाजी महिलाएं। पर क्या इस सभी तबकों को शामिल कर लेने भर से समस्याओं का हल निकल सकता है? एक तरफ हम बात करते हैं आत्म निर्भर भारत की, दूसरी तरफ देश की संपति का लगातार निजीकरण करते हुए केवल कुछ ही हाथों में  उसका अधिकार सौंप रहे हैं। इस निजीकरण के बाद देश की जनता अपने ही देश के कुछ पूंजीपतियों की गुलाम बन कर रह जाएगी, उनकी शर्तों पर काम करने पर मजबूर हो जाएगी। वो सम्मानजनक स्थिति में न तो काम कर पाएंगे और न ही जी पाएंगे। क्या यही आत्मनिर्भर भारत की तस्वीर है?

प्रधानमंत्री आदिवासियों की सुरक्षा की बात कर रहे हैं। जंगल, जल, जमीन को और बढ़ाने की बात कर हैं, और दूसरी तरफ इस तरह की नीतियां लाई जा रही हैं, जिससे जंगल लगातार खत्म होते जा रहे हैं, और जगलों को खत्म करने का स्पष्टीकरण दिया जाता है कि देश के विकास के लिए यह जरूरी है। आदिवासियों के विकास के लिए जरूरी है, आदिवासियों को मुख्य धारा के साथ जोड़ा जा सके इसके लिए यह सब प्रयास किए जा रहे हैं। क्या अपनी भाषा, रीति-रिवाजों को छोड़ना ही विकास की परिभाषा है।

प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में मुख्य घोषणा की, जिसमें उन्होंने कहा कि आने वाले तीन सालों में यानि 2023 तक देश के हर गांव को आपटिकल फाइबर नेटवर्क से जोड़ा जाएगा। यह आपिटकल फाइबर नेटवर्क चुनाव प्रचार के लिए तो ठीक है, परंतु वर्ततान स्थिति में इस घोषणा की क्या सार्थकता है यह समझ के परे है। हर जगह आनलाइन परीक्षा का विरोध हो रहा है, प्रधानमंत्री जी का कहना है कि लोग गांव में आनलाइन परीक्षा सफलता पूर्वक दे रहे हैं।

अभी हाल ही में एक निजी न्यूज चैनल ने कुछ विद्यार्थियों का साक्षत्कार किया। यह छात्र-छात्राएं देश के अलग-अलग हिस्सों से थे, जिनका कहना था कि आनलाइन परीक्षा में उन्हें अनेक दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा हैं। नेटवर्क नही आता है। फार्म नहीं भर पा रहे हैं। अगर जैसे-तैसे पेपर कर भी ले रहे हैं तो पेपर को आनलाइन जमा नहीं करवा पा रहे हैं। अलग-अलग तरह का ऐरर दिखा देता है। कुछ का कहना है कि पेपर जमा होने के बाद भी तीन दिन के बाद एक मेल आता है, कि आपका पेपर जमा नहीं हुआ। इस तरह की तमाम दिक्क्तों का विद्यार्थियों द्वारा सामना किया जा रहा है।

पिछले दिनों एक घटना सोशल मीडिया पर काफी प्रचारित हुई, जिसमें एक गांव के परिवार ने अपनी गाय बेच कर बच्चे को स्मार्ट फोन दिलवाया ताकि वह अपनी आन लाइन क्लास ले सके। अस्ल में यही स्थिति है वास्तिविक आत्म निर्भर भारत की। हमारे देश के प्रधानमंत्री इन सभी घटनाओं और स्थितियों को नजरअंदाज करते हुए आनलाइन परीक्षा को प्रोत्साहित कर रहे हैं।

प्रधानमंत्री ने नई शिक्षा नीति के सदंर्भ में भी कहा कि नई शिक्षा नीति तीन दशकों के बाद आई है। प्रधानमंत्री ने कहा कि हम रिसर्च को बढ़ावा देने पर जोर देंगे। उन्होंने यह भी कहा कि आने वाले समय में जीडीपी का छह प्रतिशत लगाया जाएगा। जबकि नई शिक्षा नीति में जिन प्रावधानों का डाला गया है उसके चलते शिक्षा पर भी केवल कुछ ही लोगों का अधिकार रह जाएगा। शिक्षा का उच्च स्तर पर व्यवसायीकरण हो यह नीति उसको पूरजोर बढ़ावा देती है।

पीएम ने महिला सशक्तिकरण की बात करते हुए कहा कि वर्तमान स्थिति में महिलाएं कोयले की खदानों में काम कर रही हैं। यह काबिले तारीफ है कि महिलाएं कोयले की खदान में काम कर रही हैं, पर किस स्थिति में कर रही हैं, उस पर चर्चा नहीं होती है। दूसरी तरफ जो महिलाएं, महिलाओं के खिलाफ हो रहे उत्पीड़न के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद कर रही हैं, उन्हीं को जेलों में डाला जा रहा है। इस तरह से महिला सशक्तिकरण करना कितना उचित है वह आप खुद ही तय करें।

प्रधानमंत्री ने एक और बड़ी घोषणा की, जिसमें उन्होंने इन्फ्रास्टकचर में सौ लाख करोड़ के निवेश की बात कही, जबकि यह सर्वविदित है कि दुनिया के स्तर पर आर्थिक मंदी छाई हुई है। कुछ दिन पहले ही ब्रिटेन जैसे शक्तिशाली देश ने घोषण कर दी कि हम पिछले ग्यारह सालों में पहली बार आर्थिक मंदी के दौर में चल रहे हैं। अगर वास्तव में प्रधानमंत्री द्वारा कि गई घोषणा अपना मूर्त रूप ले पाती है तो यह देश हित में एक सार्थक प्रयास होगा।

(लेखिका स्वतंत्र शोधार्थी हैं।)

This post was last modified on August 15, 2020 2:46 pm

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