आराध्य पर नियंत्रण चाहती भाजपा

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सामान्यतया निजीकरण किसी उद्यम, व्यवसाय या सार्वजनिक सेवा को निजी हाथों में सौपने की प्रक्रिया होती है लेकिन फ़िलहाल यह धर्म और उसके आराध्य पर नियंत्रण का दौर जान पड़ता है। राम मंदिर घटनाक्रम को भी हम उसी कड़ी में देख सकते हैं। धार्मिक संस्थाएं भी किसी गैर लाभकारी संस्था सोसाइटी, ट्रस्ट आदि माध्यमों से संचालित होती हैं- जिनके संरक्षण में मंदिर, मठ, धर्मशालाएं, मस्जिद, मदरसे, गुरुद्वारे, स्कूल, गौशालाएं, आश्रय गृह सहित अन्यान्य गतिविधियां संचालित होती हैं।

इन गैर लाभकारी संस्थाओं को समय-समय पर व्यक्तिगत और संस्थागत आर्थिक चंदे-दान के रूप में धन प्राप्त होते रहते हैं। इनमें से बहुतायत ऐसी संस्थाए हैं जिनको चंदा देने पर धारा 80सी के तहत आयकर में छूट मिल जाती है। बहुत सी संस्थाएं ईमानदारी और कर्तव्य परायणता के साथ अपने उद्देश्य के लिये काम करती हैं जबकि कुछ धार्मिक ट्रस्टों-संस्थाओं ने इसे एक धंधा बना लिया है।

मेरे निजी अनुभव में आत्महत्या कर चुके एक बहुत बड़े मठ-मंदिर के महंत यह काम खुलेआम करते थे और जितने मूल्य के चंदे अथवा दान की रसीद देते थे उसकी आधी राशि इसके एवज में लिया करते थे। इस प्रकार आयकर चुराने वाला और बाबा दोनों ही बराबर लाभान्वित होते थे।

हम जो इन बाबाओं को तरह-तरह का रूप धारण कर बड़ी-बड़ी लग्ज़री गाड़ियों में काफिले और लाव-लश्कर के साथ देखते हैं वह इन्हीं तरीकों से इनके पास आता है। आशय यह है कि इसकी आड़ में एक बहुत बड़ा तंत्र काम करता है। धनाढ्यों-पूंजीपतियों के काले धन को इन मठों के मठाधीशों के सहारे संरक्षित किया जाता है और उन्हें इसके एवज में बड़ी राशि का भुगतान होती है।

उपरोक्त बातें यहां सिर्फ इसलिए बताई जा रही हैं कि हम-आप ऐसे किसी बाबा को देख कर सहज श्रद्धा भाव से विह्वल हो जाते हैं जबकि बाबागिरी आज एक बहुत बड़ा संगठित पेशा बन चुका है जिसकी आड़ में बहुत कुछ ऐसा होता है जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते।

आशाराम, राम रहीम, चिन्मयानन्द, निर्मल बाबा, राधे मां, रामपाल, स्वामी परमानन्द, नित्यानन्द, ओम बाबा, जैसे बहुत से नाम हैं जिनको हम संतई की आड़ में तरह-तरह के अपराध में लिप्त देखते आये हैं। और अभी न जाने कितने बाबाओं के अवतरण और उनके कुकर्मों के अनावरण की प्रक्रिया हम आगे भविष्य में देखेंगे।

आश्चर्यजनक रूप से इन बाबाओं के साथ आरएसएस और भाजपा के गहरे रिश्ते हैं, जैसे वे एक दूसरे के पूरक हों। दरअसल संघ ने विहिप के साथ मिल कर इस मोर्चे पर बहुत काम किया है और अखाड़ों – मठों आदि में अपनी पकड़ बनाई है। संघ और विहिप के अनुकूल या समर्थन में जो बाबा-संत नहीं थे उन्हें उसने अलग-थलग करने, उनका फर्जी उत्तराधिकारी खड़ा करने और उनके मठ का छद्म दावेदार पेश कर उसे विवादित घोषित करने तथा अपने विभाजनकारी व साम्प्रदायिक उद्देश्यों में बाधक सन्तों को लांछित करने जैसी गतिविधियों को बखूबी अंजाम दिया।

आराधना और आराध्य मनुष्य की निजी आस्था और विचार का विषय हैं जिसे हम किसी पर आरोपित-प्रत्यारोपित नहीं कर सकते। जन-जन में हमारे महर्षियों ने आप्त दीपो भवः या अहम ब्रह्मष्मी के संदेश प्रसारित किए। संत कबीर दास ने कहा है कि-

कस्तूरी कुंडल बसै मृग ढूंढे बन मांहि

ऐसे घटि-घटि राम हैं दुनिया देखै नाहिं

हमारे शास्त्रों ने ईश्वर का वास कण-कण में बताया है और संतों ने कहा है कि ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’ अर्थात ईश्वर या पुण्य की प्राप्ति के लिए किसी मंदिर- मठ की जरूरत नहीं है और उसका लाभ शुद्ध मन, सहृदयता, करुणा, प्रेम और सद्मार्ग से प्राप्त किया जा सकता है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के जीवन संदेश भी यही है जिनके लिए वे अवतरित हुए थे।

क्या उनका संदेश मानवीय मूल्यों, मर्यादाओं का गला घोटना था? क्या उन्होंने अपने जीवन काल में निरीह और कमजोर के उत्पीड़न का कोई संदेश दिया था? जिस रावण का उन्हें किंचित वध करना पड़ा था क्या वे उसके बाद भी उन्होंने उसके प्रति घृणा और विरक्ति दर्शाई थी? क्या उन्होंने रावण के परिजनों, औरतों, बच्चों अथवा लंका की प्रजा का संहार किया था?

या क्या उन्होंने राज गद्दी के स्वार्थ में अपनी सौतेली मां और भाइयों से बदला लिया था? अथवा अगर जब वे नारायण अवतार थे तो क्या उन्होंने भगवान शिव या ब्राह्म आदि को अपने से निम्न घोषित किया था? या क्या वे सच्चाई का सामना करने से पलायन करते रहे और उसे कभी स्वीकार नहीं किया?

अगर उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया और उनका चरित्र भारतीय जन मानस में त्याग, प्रेम, सद्भाव, सम्मान, न्याय, विनम्रता और साहस का परिचायक है जिसके लिए हम उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम कहते हैं, तो सवाल उठता है कि आख़िर उन्हीं के भारत वर्ष में कैसे संघ-भाजपा हमारे आराध्य भरतवंशी भगवान श्री राम के मूल्यों का हंता बन कर भी कैसे उन पर अनाधिकार कब्जा कर सकती है?

जिस मर्यादा पुरुषोत्तम ने अपनी सौतेली मां की खुशी के लिए न केवल अयोध्या की राजगद्दी त्याग दी, वरन चौदह वर्ष का कष्टकारी बनवास भी स्वीकार किया। इस बीच वे हर तरीके के अन्याय के विरुद्ध न्याय के लिए संघर्षरत दिखे और अपनी अर्धांगिनी देवी सीता का वियोग बर्दास्त किया और साहस और धैर्य के साथ उन्हें लंका से सकुशल वापस लाये।

उन्होंने अपने राज्याभिषेक पर जनता के विश्वास को कायम रखने मात्र के लिए माता सीता की अग्निपरीक्षा होने दी और एक राजन के राज्यधर्म का पालन सिर्फ इसलिए सुनिश्चित किया कि उन पर लांछन न लग सके।

सवाल यह है कि भगवान राम का अपहर्ता बन संघ-भाजपा और उसके अनुषांगिक संगठन आखिर श्रीराम के किस मूल्य के उत्तराधिकारी है?

क्या उनका ऐसा कोई त्याग और बलिदान है जिसे वे उद्धरित कर सकते हैं या करने के लिए तैयार हैं? क्या अपने अनुयायी अंधभक्तों के कुकर्मों पर वे कभी कोई कार्यवाही करते दिखे? क्या इन्होंने हिंसा-आगजनी ग्रस्त क्षेत्रों की जनता को राहत देने के लिए कोई राज्यधर्म निभाया? या क्या इन्होंने लाचार- बेबस महिलाओं का उत्पीड़न करते अपने सिपहसालारों को जेल भेजने का साहस दिखाया?

क्या इन्होंने कमज़ोर और निरीह गरीबों की खुलेआम लिंचिंग करती अपनी तथाकथित जै श्रीराम सेना के खिलाफ कभी मुंह खोला? क्या इन्होंने सत्ता के दम्भ को छोड़ कर किसी उत्पीड़ित को गले लगा कर ढांढस बंधाने का कोई जतन किया? या अपनी गलतियों की स्वीकारोक्ति का कभी कोई साहस दिखाया?

नहीं! इन्होंने ऐसा कुछ भी इन्होंने नहीं किया, बल्कि इसके ठीक उलट ये सदैव ऐसी प्रवर्त्तियों के संरक्षक बन कर सामने आए। इन्होंने हिन्दू धर्म और भारतीय राजनीति दोनों को घृणास्पद स्तर तक पतन के गर्त तक पंहुचाया। भिन्न विचारों के प्रति असहिष्णुता और बदले की भावना का खुलेआम जिन्होंने प्रदर्शन कर मतभिन्नता को लंछित ही नहीं किया बल्कि उससे से एक कदम आगे जाकर सत्ता मद में दुराग्रहपूर्ण जघन्य कार्यवाहियां अंजाम दीं अथवा उनका प्रत्यक्ष समर्थन किया।

हम सब जानते हैं कि बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद दशकों चले न्यायायिक वाद के उपरान्त जब मंदिर बनाने का उच्चतम न्यायालय का फैसला आया तो इन्होंने उन्ही मठों-मंदिरों के विभाजन की राजनीति और सत्ता बल पर राम मंदिर ट्रस्ट से मुख्य पारंपरिक अखाड़े और संतों को बेदखल कर राम मन्दिर ट्रस्ट पर अपना अवैध आधिपत्य जमा लिया।

राम मंदिर ट्रस्ट में महसचिव बना कर केन्द्रक के रूप में बैठाए गए चम्पत राय जो विहिप के उपाध्यक्ष हैं को अब कौन नहीं जानता? शुरूआत में ही उन पर राम मंदिर ट्रस्ट के लिए अधिग्रहित की गई जमीनों की भाजपा के अयोध्या मेयर के साथ दलाली के गम्भीर आरोप लगे जिसकी इन्होंने फिलहाल लीपा-पोती कर डाली।

अब उन्होंने राम मंदिर को रामानंद सम्प्रदाय का घोषित कर शैव एवं शाक्त सम्प्रदाय वालों के प्रति खुलेआम उपेक्षा भरा वक्तव्य जारी कर हिन्दू धर्म के साम्प्रदायिक विभाजन की रेखा भी खींच दी है। शंकराचार्यों के राम मंदिर के 22 जनवरी को होने वाली प्राण प्रतिष्ठा को धर्मानुसार और शास्त्र सम्मत नहीं होने के वक्तव्य के बाद देश के संविधान-लोकतंत्र, संवैधानिक संस्थाओं और मीडिया का अपहरण कर चुके संघ-भाजपा ने अब उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।

अब तो लगता है कि शंकराचार्यों को भी इनसे हिन्दू होने की प्रामाणिकता प्राप्त करनी होगी? हिंदुओं की परंपराओं के शीर्षस्थ चार पीठों के पीठाधीश्वरों के खिलाफ उनकी ट्रोल आर्मी और इनके द्वारा खरीदी जा चुकी मीडिया के अखबार-पत्रकार हमलावर हो चुके हैं। यह इस बात का द्योतक है कि ये सत्ता मद और सत्ता लोभ में इतना पतित हो चुके हैं कि अब इनसे सहधर्मियों का भी बच पाना नामुमकिन हो चला है।

हम राजनीति के लिए धर्म के इस्तेमाल का सबसे घिनौना दौर देख रहे हैं जहां जनता से उसके ही आराध्य का अपहरण कर उन्हें अपनी निजी संपत्ति सा घोषित कर दिया गया है। भाजपा-संघ ने हाथों में कटार लिए, माथे पर टीका लगाए और सिर पर रामनामी पट्टा बांधे अतताइयों-गुंडों की जाहिल जमात के हाथों कानून सौंप दिया है जो जब और जैसे चाहें कानून की धज्जियां उड़ायें।

समाज-विज्ञान-तर्क-अध्यात्म और इतिहास-भूगोल आदि के ज्ञान से वंचित इनकी यह मंडली अफवाहों और व्हाट्सएप से संचालित होती है। इनके भक्त किस हद तक दुस्साहसी हैं इसकी बानगी हमें बीएचयू परिसर में विगत दिनों हुई बलात्कार की घटना में आरोपियों के साथ कानून के रवैये में देखने को मिली, जहां प्रशासन सब कुछ जानते हुए भी दो महीने तक उनके सामने कैसे पंगु बना रहा और ऊपर के आदेश के आने के इन्तजार में हाथ पर हाथ धरे बैठा रहा।

जिस देश का प्रधानमंत्री और उसके मंत्री ऐसे उन्मादी और हिंसक तत्वों को फ़ॉलो करते हों तो हम उस सत्ता से उम्मीद भी भला क्या कर सकते हैं। इससे हम आसानी से इनके स्तर और सोच का वास्तविक मूल्यांकन भी कर सकते हैं। इस समय का यही सच है कि पूरे कुंए में भांग पड़ी हुई जिसके नशे में युवा पीढ़ी को मदमस्त कर संघ-भाजपा अपनी हिंदुत्व की रोटियां सेंक रहा है।

यह वह दौर है जब अपने ही मूल्यों के हत्यारों द्वारा हमारे आराध्य अपहृत किये जा रहे हैं। भगवान राम को भाजपा-संघ मानो अपनी निजी संपत्ति बना चुके हैं। उनकी मंशा यही है कि इनकी अनुमति के बग़ैर कोई अन्य उनकी बात भी न कर सके और जब वो जै श्रीराम का उन्मादी उद्घोष करें तो उनके सुर में सुर न मिलने वालों को वे अधर्मी ठहरा सकें।

अपने राजनैतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए उन्होंने राम मंदिर ट्रस्ट के कार्यक्रम के आमंत्रण को भी हथियार बना डाला है जिसमें न जाने वाले राजनेताओं को राम विरोधी घोषित कर रहे हैं। उन्होंने ऐसे विकल्प वाले सवाल उठाए हैं जो राजनीतिक पार्टियों को बाध्य कर सकें। इस तरह इनका उद्देश्य मर्यादाहीन होकर भी ये दूसरों से मर्यादा का प्रश्न पूछने का अधिकार प्राप्त करना है ताकि ये भगवान राम के नाम पर चंदा और वोट देने हेतु मनोवैज्ञानिक रूप से जनता को बाध्य कर सकें।

राजनीतिक सत्ता और एकाधिकार कायम करने के लिए संघ-भाजपा ने जिस तरह से हिन्दू धर्म के आराध्य के अपहरण का अभियान चलाया है और इसके लिए समाज में घृणा-द्वेष का कार्य-व्यापार अंजाम दिया है, वह हमें यह सोचने को विवश करता है कि जरूर ये रामायण वर्णित रावणी शक्तियां है जो इस महादेश से भगवान श्री राम के आदर्शों और मूल्यों की हत्या करने और उनकी मर्यादा को भंग करने का व्रत ले कर अस्तित्वमान हुई हैं।

यह राष्ट्रवाद के आड़ में राष्ट्रद्रोहियों, राम भक्ति के नाम पर उनके मूल्यों के हत्यारों की टोली है। इनके खिलाफ समझौता विहीन निर्मम संघर्ष वक्त की जरूरत है। हमें अपने प्यारे देश, उसके लोकतंत्र और संवैधानिक और धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों के साथ-साथ इनसे अपने आराध्य को भी मुक्त करने का बिगुल भी फूंकना होगा।

इनके खिलाफ न्याय, सत्य और मर्यादा की लड़ाई जारी है। डरी-सहमी जनता अपने सच्चे राष्ट्रनायक के पीछे लामबंद होने को आतुर है जो इनकी गीदड भभकियों से निर्भय हो कर लोगों से खुलेआम ‘डरो मत’ और न्याय के लिए उठ खड़ा होने का आह्वान कर रहा है। वह इनके नफरत की राजनीति के खिलाफ मोहब्बत की दुकान खोल कर इनके द्वारा पेश की गई हर चुनौती से दो-दो हाथ करने को तैयार है।

(क्रांति शुक्ल का लेख।)

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