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Categories: बीच बहस

हितों के टकराव के मामले को लेकर पटना हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस शाही, जस्टिस राकेश कुमार का तबादला

हितों का टकराव पटना हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एपी शाही और उनके बाद सबसे वरिष्ठ जज जस्टिस राकेश कुमार को बहुत भारी पड़ा है। उच्चतम न्यायालय की कॉलेजियम ने न्यायपालिका में कथित भ्रष्टाचार के बारे में हाल ही में कठोर टिप्पणियों की वजह से विवादों का केंद्र बने पटना उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति राकेश कुमार का आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय में तबादला करने की सिफारिश की है। कॉलेजियम ने इसके साथ ही पटना उच्च न्यायालय के चीफ जस्टिस एपी साही को मद्रास उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के पद स्थानांतरित करने की भी सिफारिश की है। इस तबादले में पटना हाईकोर्ट की कॉलेजियम द्वारा अनुशंसित 15 में से 9 नाम अपनी ही जाति/समुदायों, यानी भूमिहार और कायस्थ समुदायों से चयनित किये जाने पर पटना हाईकोर्ट में दाखिल याचिका ने कोढ़ में खाज की भूमिका निभा दी है। हालांकि कॉलेजियम  ने तबादलों का कोई कारण नहीं बताया है।

स्थिति की गम्भीरता इस तथ्य से समझी जा सकती है कि उच्चतम न्यायालय के कॉलेजियम में शामिल एक वरिष्ठ जज और केन्द्रीय कानून मंत्री तक पर याचिका में आरोप लगाये गये हैं। अब एक बात तो पूरी तरह स्पष्ट है कि दोनों के पर उच्चतम न्यायालय ने काट दिए हैं क्योंकि आंध्र और तमिलनाडु में कोई स्वजातीय नहीं मिलेगा, जिसके नाम की सिफारिश हो सकेगी। कॉलेजियम की इस अधिसूचना पर केंद्र सरकार की मुहर लगनी अभी बाकी है।

चीफ जस्टिस एपी शाही का स्थानांतरण मद्रास हाइकोर्ट कर दिया गया है। वहीँ जस्टिस राकेश कुमार को स्थानांतरित कर आंध्र प्रदेश भेजा गया है, जबकि न्यायाधीश संजय करोल पटना हाइकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बनाए गए हैं। पटना हाइकोर्ट से स्थानांतरित होकर पंजाब एवं हरियाणा हाइकोर्ट गए न्यायाधीश डा. रवि रंजन को झारखण्ड हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया है। फिलहाल स्थानांतरण संबंधी अनुशंसा उच्चतम न्यायालय  के कॉलेजियम द्वारा की गई है।

पटना हाईकोर्ट से दोनों जजों के स्थानांतरण की चर्चा बहुत पहले से चल रही थी। गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर इसे प्रकाशित कर दिया गया। जस्टिस कुमार ने न्यायपालिका में कथित भ्रष्टाचार को लेकर तीखी टिप्पणियां की थीं और सीबीआई जांच का आदेश दिया था। उन्होंने एक पूर्व आईएएस अधिकारी को जमानत दिये जाने के मामले में पटना के जिला न्यायाधीश को भी जांच करने का आदेश दिया था। इस पूर्व आईएएस अधिकारी को न्यायमूर्ति कुमार ने पिछले साल भ्रष्टाचार के मामले में अग्रिम जमानत देने से इंकार कर दिया था लेकिन निचली अदालत ने उसे नियमित जमानत दे दी थी।

न्यायमूर्ति कुमार ने अपने 28 अगस्त के आदेश की प्रतियां चीफ जस्टिस रंजन गोगोई , उच्चतम न्यायालय की कॉलेजियम, कानून मंत्रालय और प्रधान मंत्री कार्यालय को भेजने का भी निर्देश दिया था। बाद में  उच्च न्यायालय के चीफ जस्टिस एपी साही की अध्यक्षता में न्यायाधीशों की पूर्ण पीठ ने जस्टिस कुमार के आदेश को न्यायिक और प्रशासनिक दायरे से बाहर करार दिया था। जस्टिस कुमार को उच्च न्यायालय के प्रशासन ने न्यायिक कार्य से वंचित कर दिया था लेकिन एक दिन बाद ही उनके न्यायिक कार्य बहाल कर दिये गये थे। यह भी कयास लगाए जा रहे हैं कि इसी विवाद को लेकर दोनों न्यायाधीशों का स्थानांतरण किया गया।

दरअसल जजों के आपसी टकराव के बीच पटना हाईकोर्ट के वकील दिनेश द्वारा दाखिल याचिका से कालेजियम के द्वारा सिफारिश किये गये कई नामों को लेकर विवाद सतह पर आ गया।
पटना उच्च न्यायालय की जस्टिस शिवाजी पांडे और पार्थ सारथी की खंडपीठ ने हाईकोर्ट कोलेजियम द्वारा पिछले जुलाई में 15 अधिवक्ताओं के नामों की सिफारिश को चुनौती देने वाली याचिका पर यूनियन ऑफ इंडिया और पटना उच्च न्यायालय को नोटिस जारी कर  दिया ।

पटना उच्च न्यायालय के एक वकील दिनेश सिंह द्वारा दायर याचिका में आरोप लगाया गया है कि  कॉलेजियम की सिफारिशों में जातिवाद, भाई भतीजावाद किया गया है। याचिका में नाम लेकर खुलासे किये गये हैं या आरोप लगाये गये हैं। याचिका में आरोप लगाया गया है कि पूरी प्रक्रिया में स्पष्ट रूप से हितों का टकराव था और बताया कि कोलेजियम ने 15 में से 9 नाम अपनी ही जाति / समुदायों, यानी भूमिहार और कायस्थ समुदायों से चयनित किये गये हैं, जबकि 50 फीसद बेंच स्ट्रेंथ सिफारिश की तारीख में इन्हीं समुदायों से थे। याचिका में कहा गया है कि 30 में से केवल 3 ओबीसी जज थे और कोई भी दलित जज नहीं था। कालेजियम द्वारा अनुशंसित कुल 15 नामों में से, कोई भी दलित, ईबीसी, ओबीसी या समाज के आदिवासी तबके से नहीं था। कॉलेजियम जाति के आधार पर इस हद तक अंधी हो गयी थी कि इसने उन संवैधानिक प्रावधानों की पूरी तरह अवहेलना की जो समान अवसर और सामाजिक न्याय को अनिवार्य करती है। याचिकाकर्ता ने प्रार्थना की है कि हाईकोर्ट केंद्र को निर्देश दे कि इन सिफारिशों को रद्द कर दिया जाए।

जस्टिस संजय करोल त्रिपुरा हाइकोर्ट से स्थानांतरित होकर पटना हाइकोर्ट आने वाले मूलतः हिमाचल प्रदेश के हैं। 25 अप्रैल 2017 को हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायलय में उन्हें न्यायाधीश नियुक्त किया गया था। वहां से पदोन्नति पाकर उन्हें त्रिपुरा हाइकोर्ट भेज दिया गया था। दूसरी ओर न्यायाधीश डा. रवि रंजन जो पटना हाईकोर्ट से स्थानांतरित होकर पंजाब एवं हरियाणा हाइकोर्ट गए थे। उन्हें कॉलेजियम ने पदोन्नति देते हुए झारखण्ड हाइकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया है। वे 19 दिसंबर 2022 को सेवानिवृत होंगे। 2008 में रवि रंजन पटना हाइकोर्ट में वकील से जज बने थे और पिछले साल 23 नवंबर को उनका स्थानांतरण पंजाब और हरियाणा  हाइकोर्ट कर दिया गया था।

उच्चतम न्यायालय के कॉलेजियम ने इसके आलावा जस्टिस एके मित्तल, मेघालय हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में स्थानांतरित किये जाने की सिफारिश की है। इससे पहले, कॉलेजियम ने जस्टिस अकील कुरैशी के नाम की मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के लिए सिफारिश की थी। न्याय विभाग से संचार के बाद न्यायमूर्ति कुरैशी की त्रिपुरा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में नियुक्त करने की सिफारिश की गई। जस्टिस मित्तल को पहले जस्टिस ताहिलरमानी की जगह मद्रास हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया जाना प्रस्तावित था। राजस्थान हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस मोहम्मद रफीक को मेघालय उच्च न्यायालय के चीफ जस्टिस के रूप में सिफारिश की गई है।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार होने के साथ कानूनी मामलों के जानकार भी हैं।)

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This post was last modified on October 18, 2019 12:45 pm

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