Wednesday, February 1, 2023

इतिहास के आइने में कांग्रेस के चिंतन शिविर 

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स्वतंत्र भारत का संविधान तैयार करने वाली संविधान सभा के अध्यक्ष और संप्रभुता-सम्पन्न भारत गणराज्य के प्रथम राष्ट्रपति डा.राजेन्द्र प्रसाद ( 3 दिसंबर 1884: 28 फरवरी 1963 ) ने लिखा था, “ अक्सर दुनिया में जो लड़ाइयाँ हुई हैं, उनमें शास्त्रार्थों और साज सरंजामों की उत्कृष्टता को ही सबसे ऊंचा महत्व प्राप्त हुआ है। हिंदुस्तान में हमने सामान्य स्तर से ऊपर उठकर सत्य और अहिंसा के लिए कष्ट सहन करते हुए लड़ाई जारी रखी और इस तरह हम सत्याग्रह की जिस ऊंचाई पर पहुंचे, उससे निःसंदेह इतिहास का रूप बदल गया। स्वाधीनता संग्राम के दिनों में हिंदुस्तान में घटनाओं ने जो रूप धारण किया, वह संसार में अद्वितीय है और सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों का प्रयोग- जिसे संक्षेप में सत्याग्रह कहते हैं– ऐसा है , जिसकी बहुत-सी मंजिलें और दर्जे हैं, जिनके द्वारा राष्ट्रीय क्षोभ विभिन्न रूपों द्वारा प्रकाशित किया गया है । इस ऐतिहासिक काल का वर्णन इस पुस्तक में किया गया है । बीसवीं सदी ने एक नया ही ध्येय प्राप्त कर लिया है और पा लिया है , एक नया झण्डा और नया नेता। और इन पृष्ठों में भारत की आजादी के पवित्र ध्येय के प्रति संसार की प्रतिक्रिया का वर्णन किया गया है। उसकी आजादी के राष्ट्र ध्वज के परिवर्तन और स्वाधीनता -प्राप्त करने के लिए भारत के राष्ट्र व्यापी संघर्ष का नेतृत्व करने वाले महात्मा गांधी के महान उपदेश और उनकी योजना का भी इसमें समावेश है। “

rajendra prasad

डा. राजेन्द्र प्रसाद ने ये बातें दिसंबर 1935 में मनाई गई कांग्रेस स्वर्ण जयंती पर कांग्रेस द्वारा प्रकाशित और स्वतंत्रता सेनानी गाँधीवादी पत्रकार डा. बी पट्टाभि सीतारमैया (1880:1959 ) की अंग्रेजी में लिखी किताब ‘हिस्ट्री ऑफ द कांग्रेस’ की प्रस्तावना में लिखी थी। तीन खंडों में छपी कुल करीब 1939 पन्नों की इस किताब का हिंदी अनुवाद साहित्य सेवक हरिभाऊ उपाध्याय (1882:1972) ने किया। हाल में इसके नए संस्करण को सस्ता साहित्य मण्डल प्रकाशन ने छापा है जिसकी स्थापना महात्मा गांधी की प्रेरणा और जमनालाल बजाज, घनश्यामदास बिड़ला आदि उद्योगपतियों  की आर्थिक मदद से 1925 में हुई थी।

 सौ बरस बाद

कांग्रेस की स्थापना के एक सौ वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में दिसम्बर 1985 में मुंबई में जब उसका शताब्दी अधिवेशन हुआ तब भारत के प्रधानमंत्री राजीव गांधी थे। वह अधिवेशन क्रिकेट क्लब ऑफ़ इंडिया के ब्रेबौर्न स्टेडियम में हुआ था। तब दिल्ली से छपने वाली हिंदी पत्रिका युवक धारा के लिए उसकी रिपोर्टिंग करने मैं गया था। उसके पास के ही अम्बेसडर होटल के एक कमरे में कांग्रेस के सौजन्य से हमारे ठहरने का इंतजाम था। मेरा ही नहीं लगभग सभी पत्रकारों का दिल्ली से राजधानी एक्सप्रेस से मुंबई जाने का इंतजाम भी कांग्रेस के सौजन्य से ही था। मैं और दिवंगत हिंदी कवि पंकज सिंह उस होटल के कमरे में साथ ठहरे थे। 

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वह बीबीसी हिंदी सेवा की नौकरी के लिए लन्दन जाने के कुछ माह पहले औपचारिक रूप से युवकधारा के सम्पादकीय सलाहकार बन चुके थे। वह 1970 के दशक में नई दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय ( जेएनयू ) के छात्र रहे थे। मेरे भी जेएनयू से होने से उनका मेरे प्रति स्नेह था। वह पत्रिका युवक कांग्रेस के तब के अध्यक्ष तारिक अनवर की थी। तीन मूर्ति से ग्यारह मूर्ति तक के 7 विल्लिंग्डन क्रेस्सेंट रोड पर उनको सांसद के बतौर आवंटित कोठी के पिछवाड़े में नौकरों के लिए बने हिस्से में हमारा सम्पादकीय विभाग था। सुरेश सलिल उसके संपादक थे। चर्चित हिंदी कवि अमिताभ और राजेश कुमार उसके उपसंपादक थे। 

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बहरहाल इस लेखमाला में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की एक बारीक बात का जिक्र करना प्रासंगिक होगा। वह कांग्रेस की अगुवाई वाले यूनाइटेड प्रोग्रेसिव अलायंस यानि यूपीए की अध्यक्ष भी हैं। उन्होंने 2004 के लोक सभा चुनाव के बाद केंद्र में कांग्रेस के डॉ मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्रित्व में साझा सरकार बन जाने के बाद महाराष्ट्र विधान सभा चुनाव की तैयारी के लिए मुंबई के बांद्रा कुर्ला कॉम्प्लेक्स (बीकेसी) मैदान में हुई रैली में कुछ दार्शनिक लहजे में कहा था “  एक जरूरी काम ख़त्म होता नहीं है कि दूसरा जरूरी काम शुरू करना पड़ जाता है।” श्रीमती गांधी की ये बात उनके पुत्र राहुल गांधी और पुत्री प्रियंका गांधी वढेरा समेत पार्टी के उन सब नेताओं पर लागू होती है जो आज से राजस्थान के उदयपुर में कांग्रेस के संकल्प शिविर में भाग लेने पहुंचे हैं।

(सीपी नाम से चर्चित पत्रकार,यूनाईटेड न्यूज ऑफ इंडिया के मुम्बई ब्यूरो के विशेष संवाददाता पद से दिसंबर 2017 में रिटायर होने के बाद बिहार के अपने गांव में खेतीबाड़ी करने और स्कूल चलाने के अलावा स्वतंत्र पत्रकारिता करते हैं।)

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