Wednesday, February 1, 2023

स्कूली पाठ्यक्रम में सांप्रदायिक एजेंडा

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युक्तियुक्तकरण के नाम पर सीबीएसई के पाठ्यक्रम से अप्रैल 2022 में कई हिस्से हटा दिए गए। जिन टॉपिक्स को दसवीं कक्षा के पाठ्यक्रम से हटाया गया है उनमें शामिल हैं प्रजातंत्र और बहुलता, अफ़्रीकी-एशियाई इस्लामिक राज्यों का उदय, मुग़ल दरबारों का इतिहास, गुटनिरपेक्ष आंदोलन, कृषि पर वैश्वीकरण का प्रभाव, प्रसिद्ध जनसंघर्ष, प्रजातन्त्र को चुनौतियाँ एवं साम्प्रदायिकता पर खंड में से फैज़ अहमद फैज़ की कविताएँ।

इस निर्णय की आलोचना करते हुए राहुल गांधी ने सीबीएसई को सेन्ट्रल बोर्ड ऑफ सप्रेसिंग एजूकेशन (केंद्रीय शिक्षा दमन बोर्ड) और इसके पीछे जो संगठन, अर्थात आरएसएस है, को राष्ट्रीय शिक्षा श्रेडर (राष्ट्रीय शिक्षा की कतरनी) बताया। ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक स्टूडेंटस आर्गनाईजेशन ने इस परिवर्तन के खिलाफ हस्ताक्षर अभियान चलाने की घोषणा की है।

भाजपा जब भी सत्ता में आती है वह शिक्षा नीति और पाठ्यक्रम में परिवर्तन करने को आतुर रहती है ताकि उन्हें संघ के साम्प्रदायिक राष्ट्रवाद के एजेंडे के अनुरूप बनाया जा सके। पार्टी का फोकस वैज्ञानिक समझ और तार्किक दृष्टिकोण की बजाए आस्था और विश्वास पर अधिक होता है। वह सामाजिक और ऐतिहासिक मुददों को वैज्ञानिक व तार्किक ढंग से देखना-समझना नहीं चाहती।

सन् 1998 में भाजपा के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सत्ता में आया। तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री मुरली मनोहर जोशी ने इतिहास के पाठ्यक्रम में इस तरह के परिवर्तन किए जिससे विद्यार्थी ऐतिहासिक घटनाक्रम को साम्प्रदायिक चश्मे से देखें। इसके अतिरिक्त, उन्होंने पौरोहित्य एवं कर्मकांड के पाठ्यक्रम भी शुरू करवाए। वैज्ञानिक खगोलशास्त्र के स्थान पर अवैज्ञानिक ज्योतिषशास्त्र पढ़ाया जाने लगा। अब विद्यार्थियों के सामने समस्या यह थी कि ज्योतिषशास्त्र के अनुरूप शनि को मुसीबतों का सबब मानें या खगोल विज्ञान के अनुसार सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाने वाला एक ग्रह। विद्यार्थी यह मानें कि गर्भस्थ शिशु के लिंग का निर्धारण पिता के एक्स या वाय क्रोमोजोम से होता है या फिर यह कि पुत्र कामेष्ठि यज्ञ से लड़के का जन्म सुनिश्चित किया जा सकता है।

यही स्थिति आज भी बनी हुई है। आरएसएस ने शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास का गठन किया है जिसका काम केन्द्रीय शिक्षा मंत्रालय के साथ तालमेल बनाए रखना है। यह न्यास एनसीईआरटी पर इस बात के लिए दबाव बना रहा है कि पाठ्यक्रम में से अंग्रेजी, उर्दू और अरबी भाषाओं के शब्द हटाए जाएं। वह यह भी चाहता है कि रवीन्द्रनाथ टैगोर के विचारों और एमएफ हुसैन की आत्मकथा के अंशों को भी पाठ्यक्रम से बाहर कर दिया जाए। न्यास नहीं चाहता कि पाठ्यपुस्तकों में मुगल बादशाहों को उदार बताया जाए और भाजपा को ‘हिन्दू पार्टी’ कहा जाये। वह 1984 के दंगों के लिए पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा देश से माफी मांगने संबंधी विवरण को भी किताबों से बाहर करना चाहता है। उसे यह वाक्य भी पसंद नहीं है कि “गुजरात में 2002 में करीब दो हजार मुसलमान मारे गए थे”। एनसीईआरटी की पुस्तकों में हालिया परिवर्तन, आरएसएस की सिफारिशों और उसके एजेंडा के अनुरूप हैं।

संघ और उसका अनुषांगिक संगठन शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, शिक्षा के ‘भारतीयकरण’ के अभियान में जुटा हुआ है। कई प्रकाशक उसके दबाव का प्रतिरोध नहीं कर पाए व उसकी मांगों के आगे झुक गए। जैसे पेंगुइन ने वेंडी डानिगर की किताब ‘द हिन्दूज’ को प्रकाशित न करने का निर्णय लिया। यह एक अकादमिक पुस्तक थी जो हिन्दुओं के धर्म और जीवन के विभिन्न पहलुओं के अध्ययन पर आधारित थी। इनमें हिन्दू धर्म में महिलाओें और दलितों की स्थिति शामिल है।

दीनानाथ बत्रा नामक आरएसएस नेता इस क्षेत्र में बहुत सक्रिय हैं और उन्होंने स्कूली बच्चों के लिए कई किताबें लिखी हैं। उनकी किताबों के गुजराती अनुवाद गुजरात के 42 हजार स्कूलों में पढ़ाये जा रहे हैं।

इन किताबों में जो अनेक नए तथ्य उद्घाटित किए गए हैं उनमें से एक यह है कि कुतुब मीनार दरअसल एक हिन्दू स्मारक है जिसका वास्तविक नाम विष्णु स्तंभ था और इसका निर्माण सम्राट समुद्रगुप्त ने करवाया था। इन पुस्तकों में भारत की साझा संस्कृति को पूरी तरह से नजरअंदाज किया गया है और राजाओं के शासनकाल को उनके धर्म के आधार पर विश्लेषित किया गया है। जोर यह बताने पर है कि मुस्लिम शासक विदेशी थे जो भारत के मूल निवासी हिन्दुओं पर तरह-तरह के अत्याचार करते थे। हालिया परिवर्तनों के बाद मुगल बादशाहों के दरबारों के बारे में विद्यार्थी नहीं पढ़ेंगे। वे यह नहीं जानेंगे कि मुगल शासनकाल में बादशाहों के सबसे विश्वस्त सिपहसालार हिन्दू थे जैसे अकबर के मामले में राजा मानसिंह और औरंगजेब के मामले में राजा जयसिंह।

इन पुस्तकों के मुख्य खलनायक हैं महमूद गजनवी और मुहम्मद गोरी। गजनी के कई जनरल हिन्दू थे (तिलक, सोंधी, हरजान, राय और हिन्द)। इन पुस्तकों के मुख्य नायक हैं शिवाजी और राणा प्रताप। यह महत्वपूर्ण है कि शिवाजी का गुप्तचर मामलों का सचिव मौलाना हैदर अली था और हाकिम खान सूर, राणा प्रताप के सेनापतियों में से एक थे। भाजपा द्वारा जो किया जा रहा है वह गंभीर चिंता का विषय है। पार्टी अपने राजनैतिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़-मरोड़ रही है। वह अपने हिन्दू राष्ट्रवाद के आख्यान के अनुरूप इतिहास का पुनर्लेखन करवाना चाहती है। गांधी (हिन्द स्वराज) और नेहरू (डिस्कवरी ऑफ इंडिया) के अनुसार भारत का इतिहास समावेशिता का इतिहास है। इतिहास पर गांधी और नेहरू का लेखन राष्ट्रीय आंदोलन और भारतीय राष्ट्रवाद के मूल्यों को प्रतिबिंबित करता है। भाजपा द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में जो परिवर्तन लाए जा रहे हैं उन्हें शुरूआत में पार्टी के आलोचकों द्वारा ‘शिक्षा का भगवाकरण’ कहा गया। पहले तो भाजपा ने इस आलोचना को नजरअंदाज किया परंतु हाल के कुछ वर्षों में उसने खुलकर यह कहना शुरू कर दिया है कि शिक्षा का भगवाकरण होना चाहिए। यहां तक कि उपराष्ट्रपति एम। वैंकया नायडू ने भी हाल में कहा कि शिक्षा का भगवाकरण होना चाहिए।    

पाठयक्रम में जो ताजा परिवर्तन किए गए हैं वे भाजपा और आरएसएस की राजनैतिक जरूरतों को पूरा करने वाले हैं। मुगल बादशाहों के दरबार हिन्दू-मुस्लिम एकता के जीवंत उदाहरण थे। जाहिर है कि यह बात भाजपा विद्यार्थियों को नहीं बताना चाहती। फैज़ अहमद फैज़, प्रजातंत्र और धर्मनिरपेक्षता में यकीन रखने वाले शायर थे जिन्हें साहित्य में नोबेल पुरस्कार हेतु नामांकित किया गया था। वे प्रगतिशील साहित्य के महान नायकों में से एक थे। परन्तु भाजपा उन्हें कैसे बर्दाश्त कर सकती है? आखिरकार वे पाकिस्तान के नागरिक थे।

वर्तमान सत्ताधारियों का एक लक्ष्य देश के प्रथम प्रधानमंत्री और आधुनिक भारत के निर्माता जवाहरलाल नेहरु के कद को छोटा करना है। नेहरु प्रजातान्त्रिक और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध थे। वैश्विक स्तर पर उन्होंने गुटनिरपेक्ष आन्दोलन की नींव रखी। इस आन्दोलन ने अंतर्राष्ट्रीय संबंधों का एक नया अध्याय रचा। इसके कारण शीत युद्ध के बावजूद भारत को अपने विकास में दोनों वैश्विक गुटों की मदद मिल सकी। ऐसे में शीत युद्ध और गुटनिरपेक्ष आन्दोलन के बारे में विद्यार्थियों को कैसे बताया जा सकता है?

वर्तमान सरकार और उसकी विचारधारा देश को अधिनायकवादी और सांप्रदायिक राज्य बनाना चाहती है, जिसमें बहुवाद के लिए कोई जगह नहीं होगी। बहुवाद और विविधता ही भारत की ताकत है। भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन और हमारा संविधान हमारी विविधता का सम्मान करता है। परन्तु यह सरकार भाषा, धार्मिक परंपराओं और संस्कृति में एकरूपता लाना चाहती है।

कुल मिलाकर, प्रस्तावित परिवर्तन, राष्ट्रवाद की संकीर्ण, सांप्रदायिक अवधारणा के अनुरूप हैं। इनका विरोध होना चाहिए और यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि हमारे स्कूली पाठ्यक्रम वैज्ञानिक सोच और तार्किकता पर आधारित हों और हमारे देश की बहुलता का सम्मान करने वाले हों।

(लेखक आईआईटी मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं। अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद अमरीश हरदेनिया ने किया है।)

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