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Categories: बीच बहस

ख़तरनाक चरण में पहुँच गया है कोरोना का फैलाव

हमारे प्रधानमंत्री की इस बार की 8 बजे रात की घोषणा का असर जनता के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग गया है। जाना स्वाभाविक भी था। नोटबंदी और जीएसटी में देश देख चुका है।मध्यवर्ग ने जहाँ अपने अपने घर और सोसाइटी में राशन पानी का पहाड़ खड़ा कर लिया और खुद को मोदी के आह्वान के लिए “मैं भी चौकीदार” बना डाला। वहीं घर में काम करने वाली बाइयों को कल से काम पर मत आना, ऑफिस में खुद के लिए ताला बंदी और घर से ही काम की सुविधा हथिया ली।

लेकिन 80% लोग तो ठेके पर काम कर रहे हैं, उनका क्या? काम नहीं तो वेतन नहीं देगा ठेकेदार, या कांट्रेक्टिंग एजेंसी। यही हाल कमोबेश देश के मरियल उद्योग धंधों का है। उनके पास कोई धन कुबेर तो बैठे नहीं कि मोदी जी ने कहा कि बेटा अपना ख्याल तो रखना ही साथ में अपने मजदूरों को भी महीना भर का वेतन घर पर भिजवा देना।

क्या दुनिया के देश यही कर रहे हैं?

लिहाजा दो दिन पहले तक भारतीय रेलवे जिसकी ट्रेन खाली जा रही थीं, अचानक से उसमें मार होने लगी है बिहार, बंगाल, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश जाने की। महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब सहित दक्षिण भारतीय राज्यों से सैलाब निकल पड़ा है। पंजाब ने तो राज्य परिवहन की बस तक बंद कर दी है। उस पर हमारे रेल मंत्रालय ने मोदी जी की बात को हनुमान चालीसा मान रविवार को देश भर में ट्रेन बंद कर दी है।

दिल्ली में मेट्रो भी इसका शिकार है।

सब एक से बढ़कर एक भक्त खुद को साबित करने की होड़ में लगे हैं। कल तक ये लोग शाहीन बाग़ बंद कराने के लिए अपनी मेजों के नीचे छुपकर अपील कर रहे थे। इन्हीं नामुरादों के कारण, आज करोड़ों लोग जिनके पास न तो शहरों में अपने जिन्दा रहने के कोई ठोस कारण हैं, नौकरी धंधा है बदहवास गाँवों की ओर भाग रहे हैं। लेकिन ट्रेन हो तब न।

चूहे बिल से भागें, और चौकीदार उसमें ताला मार दे।

वाह मोदी जी वाह, ये कारनाम आप ही कर सकते थे। दुनिया में अगर कोई भी पढ़ा लिखा इंसान होता तो जिस समय चीन में यह विपदा अपने चरम पर थी, कोई भी देख सकता था कि ट्रम्प सारी दुनिया में चीख-चीख कर क्या घोषणा कर रहा था?

“मोदी ने भारत में मेरे स्वागत के लिए कुछ नहीं तो 70 लाख लोगों की व्यवस्था कर रखी है।”

उस समय इक्का दुक्का को छोड़कर किसी ने आवाज उठाई कि ये क्या तमाशा हो रहा है? हमारे पड़ोस में आग लगी है और हम रासलीला रचा रहे हैं, आदमियों की मुंडी गिनी जा रही है?

और तो और जब यूरोप, अमेरिका में यह तबाही जोर पकड़ने लगी तो भी भारत में ठीक उसी दौरान सिंधिया जी ने बीजेपी में शामिल होने का फैसला लेकर बीजेपी समर्थकों के उत्साह में कई गुना वृद्धि कर दी। भोपाल एयरपोर्ट पर उनके स्वागत में हजारों की संख्या, और कल ही भोपाल में फिर से जश्न से खुद को नहीं रोक सके।

इसी तरह कनिका कपूर के लखनऊ में होली के बाद के रास लीला को तो अब तिहाड़ी पत्रकार से लेकर सभी चैनल प्रमुखता से दिखा ही रहे हैं। उसमें यही नेता, स्वास्थ्य मंत्री किस तरह उत्साह के साथ भाग ले रहे हैं, सब ने देख लिया। जब खुद की जान आफत में आई तो सारे पापों की माई हो गई कनिका कपूर?

इनसे पूछा जाना चाहिए कि तुम लोग क्या कर रहे थे उस रेव पार्टी में?

जल्द ही इसे भी भुला दिया जाएगा, और सारा दोष उस कनिका पर डाल के छुट्टी पा ली जायेगी, जैसे कि कल ही निर्भया के अत्याचारी रेपिस्ट को फाँसी देकर बता दिया जाएगा कि अब इस देश में सभी महिलाएं पूरी तरह से सुरक्षित हैं। न्यायपालिका और राज्य के सम्मान में ठोको ताली।

कोई भी इस ओर ध्यानपूर्वक देखने की हालत में नहीं है कि यह सारी अव्यवस्था, यह सारा दुश्चक्र ऊपर से नीचे किस प्रकार तिरोहित हो रहा है। यह लूट मार की व्यवस्था ऊपर से नीचे की ओर परनाले के रूप में बहती जा रही है। कई समझदार से दिखने वाले तोंदियल आपको आज से ही दिख जायेंगे कोसते हुए इन करोड़ों लोगों को, कि ये हमारे मुख्य दुश्मन हैं कोरोना वायरस की महामारी को फैलाने के लिए।

लेकिन एक बार भी उनके भेजे में ये बात नहीं आने वाली कि कोरोना वायरस का पहला मरीज जनवरी के अंतिम सप्ताह में केरल आया था। वो भी वुहान से। लेकिन हमारे पास एयरपोर्ट पर उसकी जांच के न तो पुख्ता इंतजाम थे, और न ही हमारे पास उन्हें एकांत में रखने और परीक्षण करने की सुविधा ही बनाई जा सकी।

एक बार फिर से याद दिला दूं, जो भी महामारी भारत में कदम रख रही है वह भारत से नहीं बल्कि हवाई यात्रा के जरिये देश के चुनिन्दा शहरों के एयरपोर्ट से आई है। इसके लिए दोषी अगर कोई है तो वह इस देश की सबसे गरीब बदहवास जनता नहीं, जो आज कहीं की नहीं रह जाने वाली है यदि एक बार गलती से भी वे इसकी चपेट में आ गए।

इसके लिए दोषी हमारे देश का शीर्षस्थ नेतृत्व है, जो बगल में चल रहे इस भीषण युद्ध के समय ट्रम्प के स्वागत में जुटा हुआ था। उसने तो अपनी राष्ट्रीय राजधानी तक में दंगों और हत्याओं को जारी रहते, एक भी कदम नहीं उठाया था। आप उससे आशा करते हैं कि उसके पास आपकी आपदा के लिए कोई ठोस उपाय मिल सकेगा? सिवाय थाली, चिमटा, मंजीरा बजाकर गो करोना, करोना गो के मंत्रोच्चार के? वाकई आप से यही उम्मीद की जा सकती है। आप हैं ही इसी लायक।

(रविंद्र सिंह पटवाल स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। आप आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

This post was last modified on March 21, 2020 1:34 pm

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