जलती चिताओं पर ‘सकारात्मकता’ का पाठ पढ़ाने वाले से मुक्ति चाहता है देश

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क्या कोई जिम्मेदार आदमी इतना संवेदनहीन और क्रूर हो सकता है कि कोरोना महामारी में आक्सीजन की कमी से मरने वाले लोगों को ‘मुक्ति’ मिलने की बात कहे। आरएसएस के कर्णधार तो अपने इस संगठन को सबसे बड़ा राष्ट्रवादी बताता रहा है। आरएसएस से जुड़े लोग तो संगठन को मानवता को समर्पित बताते-बताते थकते नहीं हैं। क्या आरएसएस इस सोच पर नाज करता है।


सकारात्मकता का संदेश देते घूम रहे मोहन भागवत की बातें तो देश की संस्कृति और सभ्यता को कलंकित करने वाली है। कोरोना महामारी आक्सीजन कमी पैदा कर लोगों की हत्या करने वाली मोदी सरकार के संरक्षक मोहन भागवत को यह कहते  हुए थोड़ी सी भी शर्म नहीं आई कि ‘कोरोना से जो लोग मरे हैं उन्हें एक तरह से मुक्ति मिल गई है।


मोहन भागवत को थोड़ा सा भी अंदाजा है कि कोरोना महामारी में ऐसे कितने लोग दम तोड़ गये जिनसे उनका परिवार पलता था। कितने परिवार के परिवार खत्म हो गये। जब इन लोगों को सांत्वना देनी चाहिए थी तो ऐसे में उनके अपनों के मुक्ति मिलने की बात कर मोहन भागवत सकारात्मकता का पाठ पढ़ा रहे हैं। मतलब आरएसएस का यही ‘घिनौना’ चेहरा है। ऐसा भी नहीं है कि विपदा के इस समय लोगों के घावों पर नमक छिड़कने के लिए बस मोहनत भागवत ही निकले हैं। उनके सिपहसालारों के साथ ही पूरी की पूरी भाजपा भी मैदान में उतरने वाली है।


खुद प्रधानमंत्री सकारात्मक अभियान के जश्न की तैयारी कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मीडिया को धमकी भी दे दी है कि लोगों में डर पैदा करने के बजाय सकारत्मक खबरें दिखाएं। उनका मतलब यह है मीडिया वह दिखाए जो वे चाहें।


दरअसल आरएसएस और भाजपा का सकारात्मकता का यह अभियान जनता को धमकाने वाला अभियान है। आरएसएस और मोदी सरकार के साथ ही भाजपा शासित सरकारें लोगों को यह धमकाने का दुस्साहस कर रही हैं कि यदि सरकारों के खिलाफ बोला तो उसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे। मतलब खाने को मिले या न मिले। रोजगार हो या न हो। परिवार में कितने लोग कोरोना की चपेट में आ जाएं। ठीक होकर भी ब्लैक फंगस से मर जाएं। कोरोना संक्रमित उनके परिजनों को मरने के बाद नदियों में बहा दिया जाए। उन्हें गिद्ध, कौवे और कुत्ते नोचें पर सरकारों के खिलाफ कुछ नहीं बोलना है। भाजपा और आरएसएस पर कोई टिप्पणी नहीं करनी है। बस आरएसएस और भाजपा द्वारा पढ़ा गया सकारात्मकता का पाठ याद रखना है। अरे बेशर्मों, तुम्हारे कुकर्मों से देश में हर तीसरा आदमी डिप्रेशन में घूम रहा है। लॉकडाउन में घरों में बंद हो रहे लोगों में अधिकतर मानसिक रोगी हो गये हैं। डेढ़ साल से स्कूल न जाने की वजह से घर में रह-रहकर बच्चे  बीमार पड़ रहे हैं। कहने से लोग सकारात्मक सोच बना लेंगे। जब देश में सकारात्मक माहौल होगा तो लोग खुद ही सकारात्मक सोचने लगेंगे।


हां आरएसएस और भाजपा के लिए माहौल सकारात्मक है। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के नाम पर बड़े स्तर पर उगाही की गई है। वैसे भी भाजपा सत्ता की हनक में उद्योगपतियों से मोटा चंदा वसूल रही है। पीएम केयर फंड में भी बहुत पैसा आया हुआ है। ये लोग जनता के पैसों पर खूब अय्याशी कर रहे हैं, ये लोग तो सकारात्मकता की बात कर सकते हैं।


मोहन भागवत और प्रधानमंत्री नरेंद्र ने कभी आम आदमी के चेहरे को पढऩे की कोशिश की है? वह क्या चाहता है? यदि मोहन भागवत को कोरोना महामारी में दम तोड़ने वाले लोग मुक्ति पाये हुए दिखाई दे रहे हैं, तो अब देश इस महामारी में सकारात्मकता का जश्न मनाने वालों से मुक्ति चाहता है।


यदि मोहन भागवत में थोड़ी सी भी शर्म ग़ैरत होती तो वह भाजपा के मातृ संगठन होने के नाते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इस महामारी को दावत देने के अपराध के लिए माफी मांगने के लिए कहते। उन्हें यदि कोई अभियान चलाना ही था तो भाजपा के लिए चलाते। कहते- ‘अब यह हिन्दू-मुस्लिम का राग छोड़ों मानवता पर काम करो। लोगों को बांटने के बजाय देश में भाईचारे की बात करो। जनता के पैसे को अपने ऐशोआराम पर खर्च मत करो, जनता पर खर्च करो। स्वास्थ्य सेवाओं को दुरुस्त करो’। पर कैसे कहते जनता को बरगलाने के ये सब दांव पेंच तो भाजपा के नेता आरएसएस से ही सीखकर आये हैं।  छल-कपट और लोगों की भावनाओं से खेलना तो आरएसएस में ही दिखाया जाता है। सकारात्मकता का संदेश देने के बजाय मोहन भागवत आरएसएस के स्कूलों में कोरोना काल की बच्चों की फीस माफ कर देते तो उससे ज्यादा अच्छा संदेश जाता।


मोहन भागवत का मुक्ति मिलना शब्द इसलिए भी आपत्तिजनक है क्योंकि आदमी मुक्ति तब चाहता है जब वह जिंदगी से परेशान हो जाता है। क्या ये जितने भी लोग कोरोना महामारी के काल में समा गये। ये सब जिंदगी से मुक्ति चाहते थे? भागवत जी कहीं ऐसा तो नहीं कि मोदी सरकार से मुक्ति चाहने वाले लोगों को मुक्ति दिलान के लिए आरएसएस और भाजपा यह सकारात्मकता का अभियान चला रहे हों। गत साल कोरोना का इतना कहर नहीं था तो लोगों ने प्रधानमंत्री के थाली-ताली बजाओ, टार्च दिखाओ कार्यक्रम को झेल लिया था। अब जिन लोगों के अपनों की चिताएं ठंडी भी नहीं पड़ी हैं उन्हें सकारात्मकता का पाठ पढ़ाओगे तो लोग दौड़ा भी देंगे। क्या इससे बड़ा क्रूर मजाक हो सकता है कि कोरोना से प्रभावित लोगों को सांत्वना की जगह सकारात्मक्ता का पाठ पढ़ाया जा रहा है। क्या लोग मूर्ख हैं जो आप लोगों के कहने पर सकारात्मक सोचेंगे? क्या उन्हें ज्ञान नहीं है कि सकारात्मक और नकारात्मक क्या होता है?


वैसे भी इन लोगों से उम्मीद भी क्या की जा सकती है। ये लोग तो आजादी की लड़ाई में भी अंग्रेजों को ठीक ठहरा रहे थे। उनके मुखबिर बने हुए थे। आज भी मजे लोकतंत्र के लूट रहे हैं पर लोगों को बरगलाते हैं राजतंत्र का हवाला देकर। तिरंगे का लगातार अपमान करने वाले आरएसएस से उम्मीद भी क्या की जा सकती है? ये लोग तो भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, चंद्रशेखर आजाद, खुदीराम बोस, लक्ष्मीबाई के साथ देश पर जान न्यौछावर करने वाले अनगिनत क्रांतिकारियों को भी ‘मुक्ति’ मिलने की बात कह सकते हैं।

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