Friday, December 9, 2022

विशेष: उत्तराखंड में दलित प्रतिरोध

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रोडवेज़ की एक ख़टारा बस में बरसों पहले किए मेरे एक दुनियावी क़िस्म के कठिन सफ़र की याद एक ख़ास वजह से मेरे ज़ेहन में रह गई। चिलचिलाती गर्मियों की भरी दोपहर में इस लंबी और बेहद असुविधाजनक यात्रा की गहरी ऊब को दूर करने के लिए मैंने पास बैठे एक सहयात्री से बातचीत का सिलसिला छेड़ा। 60 साल से कुछ ऊपर की उम्र के ये सज्जन पिथौरागढ़ ज़िले के बेरीनाग के पास किसी गांव से ताल्लुक रखते थे और पैतृक गांव में होने वाली किसी सालाना पूजा के सिलसिले में वहीं जा रहे थे। सालों पहले जब वे किशोर रहे होंगे, काम की तलाश में तब ही वे पहाड़ों को छोड़कर चले गए थे और अब सऊदी अरब में कहीं काम करते थे। हमने पहाड़ों की ज़िंदगी, यहां की संस्कृति, भाषा, जातीय असमानता और दूसरे कई मसलों पर बातें की। जब वे एक ऐसे अजनबी से बातचीत करने में सहज हो गए जो उन्हें जज नहीं करने वाला था, उन्होंने अपने परिवार का एक रहस्य मेरे सामने खोला: ‘हमारी बिरादरी में हम एक गुप्त भाषा का इस्तेमाल करते हैं। ये हम सिर्फ तब इस्तेमाल करते हैं जब हम नहीं चाहते कि दूसरा हमारी बातों को समझ पाए।’ 

भाषाओं में मेरी हमेशा दिलचस्पी रही है, इसलिए उनकी इस बात ने इस चर्चा में मेरी दिलचस्पी और बढ़ा दी। उन्होंने कहा, ‘इस गुप्त भाषा का इस्तेमाल हमारी बिरादरी के महज़ कुछ परिवार ही करते हैं जो कि हमारे गांव के आस पास के गांवों में बसे हुए हैं। इसकी बोली कुमाउंनी से अलग है।’ जब मैंने इस गुप्त भाषा के कुछ वाक्य बोलने की गुजारिश की तो उन्होंने मुस्कुराते हुए मना कर दिया। मैंने ज़ोर दिया तो वे अनचाहे मन से राजी तो हुए, पर उनके चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे वे इस बारे में मौन रहने की कोई अलिखित प्रतिज्ञा तोड़ रहे हों। उन्होंने कहा, ‘कई बार ऐसा होता है कि हमें अपने परिवार के सदस्यों से कोई ऐसी बात कहनी होती है जो कि हम गांव के दबंग (प्रभावशाली और हिंसक) लोगों के सामने नहीं कह सकते। ऐसे में हम कहेंगे— ‘यौ चुटुकाकि सामणी ना चुलाप्या, चुलप्या ता ऐत्कारी कराल, ठोगाल।’ यानी – ‘इस इंसान के सामने कुछ मत बोल, वरना ये क्रोधित हो जाएगा और हमें मारेगा।’ 

कुमाउंनी मेरी मातृभाषा है और काफ़ी हद तक में इसे आराम से बोल भी लेता हूं। लेकिन मेरे इस सहयात्री ने जो मुझे कहा वह उस कुमाउंनी से तो बिल्कुल ही अलग था जो कि में बोलता हूं। अगर कुमाउंनी में इसे कहा जाता तो कुछ यूं होता— ‘येक सामणि कै झन कैया, कौला ता यो रिसाई जाल और मारण हुं बटी जाल।’

फिर ये सज्जन मुझे इस ‘गुप्त भाषा’ का एक तुरत क्रैश कोर्स कराने लगे लेकिन एकाएक ही शायद यह सोचकर रुक गए कि वे पहले ही मेरे सामने काफ़ी रहस्य खोल चुके हैं, और उन्होंने बातचीत को बदल दिया। साफ़ तौर पर कहूं तो वे दलित समुदाय से ताल्लुक रखते ​थे और वे बात कर रहे थे अपने गांव के प्रभावशाली— और शायद हिंसक— ऊँची जाति के लोगों के बारे में। इस बातचीत का ब्यौरा मैंने यहाँ अपनी याददाश्त के आधार पर दिया है ताकि मैं उत्तराखंड के दलितों में यहां के ऊँची जाति के लोगों को लेकर बने हुए ख़ौफ़ और अविश्वास का एक खाका खींच सकूं। इस आलेख का मक़सद ऐतिहासिक संदर्भ में इन दो समुदायों के बीच असमानता की गहरी खाई को समझने की कोशिश है।

1990 के दशक की शुरुआत में उत्तर प्रदेश के 8 पहाड़ी ज़िले एक ​ऐतिहा​सिक उथल-पुथल में डूबे हुए थे। एक लो​कप्रिय जनांदोलन अपने उबाल पर था और इसी के गर्भ से नवंबर 2000 में उत्तर प्रदेश से अलग होकर उत्तराखंड (उत्तरांचल नाम से) राज्य का निर्माण हुआ। व्यापक तौर पर यह बात मानी जा रही थी कि इस आंदोलन को पूरे पहाड़ी लोगों का समर्थन था। यह बात एक हद तक सही भी थी क्योंकि इस क्षेत्र ने ऐसा पहले कभी नहीं देखा था कि जीवन के तक़रीबन हर क्षेत्र के लोग— सरकारी कर्मचारी, शिक्षक, छात्र, महिलाएं और एक्टिविस्ट जिनके राजनीतिक विचार वामपंथ से लेकर दक्षिणपंथ तक, चाहे कुछ भी थे, वे सभी एक पृथक पहाड़ी राज्य की मांग को लेकर सड़कों पर उतर आए थे।

लेकिन एक और तथ्य था जिसे मुख्यधारा के मीडिया और साथ ही साथ टिप्पणीकारों ने सिरे से अनदेखा कर दिया: दलितों का एक बड़ा हिस्सा जिसे उत्तराखंड में शिल्पकार के तौर पर भी जाना जाता है,  राज्य आंदोलन के इस उबाल को लेकर आशंका से भरा था और इससे दूर ही रहा। इस बात का विश्लेषण करने और इसे समझने की कोई ऐसी ख़ास कोशिश नज़र नहीं आती कि उत्तराखंड के सामाजिक हाशिए पर रहने वाले लोगों ने आख़िर उत्तराखंड के इतिहास के इस निर्णायक मौक़े पर ख़ुद को इससे अलग रखकर इसके ख़िलाफ़ जाने का फ़ैसला क्यों किया?  तो उत्तराखंड की कुल आबादी के लगभग 40 प्रतिशत हिस्से को रचने वाली, अनुसूचित जातियाँ, अनुसूचित जनजातियाँ और अन्य पिछड़ी जातियाँ (OBC), एक पृथक पर्वतीय राज्य के विचार को लेकर क्यों उत्साहित नहीं थीं?

इसका जवाब उन परिस्थितियों में मिल सकता है जिनके कारण लोगों का गुस्सा अचानक फूट पड़ा था। एक अलग प​र्वतीय राज्य की यह माँग नई नहीं थी, लेकिन पिछले 6 दशकों से गौण ही रही थी, और उत्तराखंड के अधिकांश लोगों की कल्पनाओं में भी इसका कोई असर नहीं था। कुमाऊं और गढ़वाल के पर्वतीय ज़िलों को मिलाकर एक अलग प्रशासनिक इकाई बना देने का विचार पहली बार 1929 में कुमाऊं के ब्रिटिश-राज समर्थक कुछ लोगों के एक समूह ने उछाला था। उन्होंने इस आशय का एक ज्ञापन संयुक्त प्रांत के लै​फ़्टिनेंट गवर्नर मैल्कम हैली को सौंपा था, जिसमें ब्रिटिश कुमाऊं (उत्तराखंड) के लिए स्वायत्ता की मांग की गई थी। तब से, यह मांग गाहे-बगाहे उभरती रही, लेकिन इसका कोई परिणाम नहीं निकला।

1994 में  तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश सरकार ने मंडल कमिशन की सिफ़ारिशों को लागू करते हुए सरकारी नौ​करियों में पिछड़ी जातियों के लिए 27% आरक्षण और राज्य के स्वामित्व वाले शिक्षण संस्थानों में भी ठीक इतने ही प्रतिशत आरक्षण को लागू करने का फ़ैसला लिया। इस निर्णय ने पहाड़ी ज़िलों की कथित ऊँची जातियों को नाराज़ कर दिया। उनका तर्क था कि आरक्षण की यह नीति मैदानी इलाक़ों के जातीय समीकरणों के लिए अनुकूल थी जहां ओबीसी की एक बड़ी आबादी मौजूद थी। लेकिन वही नीति ​यांत्रिक रूप से उन पहाड़ी इलाक़ों में नहीं लागू की जा सकती थी जहां ओबीसी की आबादी दो प्रतिशत से ज़्यादा नहीं थी। उत्तराखंड आंदोलन जब अपने शीर्ष पर था तो एक आम बात कही जाती थी – ‘आप हमें एक अलग राज्य दें और हम अपनी आरक्षण नीति ख़ुद तैयार करेंगे’। इसका असल में यही मतलब था कि एक नए राज्य में जहां ब्राह्मणों और ठाकुरों की आबादी तक़रीबन 60 प्रतिशत है, वहाँ मंडल आयोग की सिफ़ारिशों के ​मुताबिक़ मिलने वाले लाभों को बेहद सीमित कर दिया जाए। 

पृथक राज्य के इस जस्टिफ़िकेशन में छिपा अंतर्निहित संदेश, दलितों और ओबीसी से छिपा नहीं रहा। और इस ​आंदोलन का आरक्षण विरोधी (दलित विरोधी पढ़ें) स्वर इतना प्रभावी और स्पष्ट था कि उसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। हालांकि, सवर्ण जातियां खुद कोटा सिस्टम के तहत मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों में सीमावर्ती इलाक़ों के छात्रों के लिए आरक्षित सीटों से लाभान्वित हो रही थीं। 

काँग्रेस के दलित नेता और अल्मोड़ा से पूर्व लोकसभा और राज्यसभा सांसद रहे प्रदीप टम्टा उन लोगों में थे जिन्होंने उत्तराखंड आंदोलन के शुरुआती दौर में ही उसमें व्याप्त दलित विरोधी पूर्वाग्रह की पहचान कर ली थी। उस दौर में वामपंथी झुकाव वाले टम्टा ने कुछ दूसरे दलित नेताओं के साथ भारत के राष्ट्रपति को एक ज्ञापन सौंप कर अनुरोध किया था कि वे इस आंदोलन के लगातार तीव्र हाते, उग्र आरक्षण विरोधी स्वरों से दलित समुदाय के हितों की रक्षा करें।

टम्टा याद करते हैं कि कैसे उत्तराखंड आंदोलन से जुड़े लोगों के एक ​हिस्से ने आंदोलन के दौर में दलितों के खिलाफ़ अपने ज़ेहन में गहरे बैठे अपने पूर्वाग्रहों को ज़ाहिर किया, दलितों को जातिसूचक गालियां दीं और ज़बानी तौर पर अपमान किया। मुलायम सिंह यादव की ​आरक्षण नीति के ख़िलाफ़ अल्मोड़ा में आयोजित किए गए एक प्रदर्शन में यह पूर्वाग्रह साकार रूप में दिखाई दिया। हालांकि यह विरोध ओबीसी के लिए दिए जा रहे 27% आरक्षण के ख़िलाफ़ था, लेकिन चूँकि पहाड़ी क्षेत्र में ओबीसी की कुल आबादी 2% से कम है, इसलिए इन प्रदर्शनकारियों ने अपना गुस्सा आरक्षण के पूरे विचार के ही ख़िलाफ़ निकाला।

जब यह प्रदर्शन मार्च अल्मोड़ा की गलियों में से गुजर रहा था ​तो यह पास के एक दलित घर में रुका और प्रदर्शनकारियों ने इस घर के लोगों का जाति को लेकर अपमान किया और दलितों को उकसाने के लिए आरक्षण विरोधी नारे लगाए। ज़िलाधिकारी ने, जो कि ख़ुद एक दलित थे, भारी संख्या में पुलिस बल तैनात किया और वे एक बड़े जातिगत टकराव को टालने में क़ामयाब रहे। इस घटना ने दलितों के मन में कोई संदेह नहीं छोड़ा कि नया राज्य अस्तित्व में आने पर भी उनके साथ कोई बेहतर व्यवहार नहीं किया जाएगा। 

अल्मोड़ा रैली कोई एकमात्र ऐसा उदाहरण नहीं थी जब प्रदर्शनकारियों के एक वर्ग के बीच दलित विरोधी जातिगत पूर्वाग्रह खुलकर सामने आए। 2 अक्टूबर 1994 को दिल्ली में आयोजित एक उत्तराखंड समर्थक अनियंत्रित रैली के दौरान हवा में ‘मुलायम सिंह चू​**या है, मायावती कु**या है’ जैसे नारे गूंजते रहे। उस समय यूपी सरकार में गठबंधन सहयोगी इन दोनों नेताओं के ख़िलाफ़ गुस्से को एक वाक़ये ने हवा दी थी। इससे ठीक एक रात पहले इस रैली में भाग लेने पहाड़ों से आ रहे प्रदर्शनकारियों में से 6 लोगों की मुजफ़्फरनगर में पुलिस फ़ायरिंग में उस वक़्त मौत हो गई थी जब स्थानीय ज़िला प्रशासन ने इन प्रदर्शनकारियों को रोका और प्रताड़ित किया। पुलिस पर कुछ महिला प्रदर्शनकारियों के साथ बलात्कार और छेड़छाड़ के आरोप भी लगे। 

दलितों ने इन वाक़यों को सरकारी नौकरियों और शैक्षिक संस्थानों में क़ाफ़ी मशक्कतों के बाद मिले आरक्षण के संवैधानिक अधिकारों पर मंडराते ख़तरे के संकेतों के तौर पर देखा। आख़िरकार, ये अधिकार दलितों के लिए कुछ हद तक वित्तीय सुरक्षा और स्वाभिमान सुनिश्चित करने के अलावा, हिंदू धर्म की जातीय संरचना में उत्पीड़न और दमन के खिलाफ़ उनके लिए एक क़ानूनी कवच थे। टम्टा का मानना ​​है कि सरकारी योजनाओं और संविधान की ओर से दी गई सकारात्मक कार्रवाई की गारंटी ने कुछ हद तक उत्तराखंड के दलितों की आर्थिक स्थिति में सुधार किया है। ‘लेकिन पिछले कुछ दशकों में उनके सामाजिक हालात में मुश्किल से ही कोई बदलाव आया है।’  

दो वाक़ये जिनमें तक़रीबन एक शताब्दी का फ़र्क है, टम्टा के ये नज़रिए इस बात को साबित करते हैं कि ऊँची जाति के लोगों के दलितों को लेकर रवैये में कोई ख़ास बदलाव नहीं आया है। उदाहरण देखें: 1923 में गढ़वाल के खांदी से सेंधीखाल की ओर जा रही दलितों की एक बारात को ऊँची जाति से ताल्लुक रखने वाले कुछ लोगों ने इसलिए रोका और बारातियों के साथ मारपीट की क्योंकि वे दूल्हे को डोला-पालकी में लेकर जा रहे थे। जब चार दिनों बाद बाराती वापस लौटे तो उन पर फिर से हमला हुआ और उन्हें लूटा गया।

तक़रीबन एक शताब्दी बाद, 2 मई 2022 को, अल्मोड़ा ज़िले की सल्ट पट्टी के तोक मजबाखाली में कुछ ठाकुर महिलाओं ने एक दलित युवक विक्रम ​कुमार की बारात को रोका और उसे घोड़े से उतर जाने को कहा। आरोपों के मुताबिक़ उसे धमकाया गया कि अगर उसने ठाकुर महिलाओं की बात ना मानी तो कफल्टा दोहरा दिया जाएगा। यहां कफल्टा का ज़िक्र डराने के लिए किया गया था क्योंकि सल्ट पट्टी के ही कफल्टा में 42 साल पहले एक शादी में शामिल 14 दलितों की ऊंची जाति के ग्रामीणों ने हत्या कर दी थी।

कफल्टा हत्याकांड उत्तराखंड में अब तक का सबसे भीषण जातीय नरसंहार है। 9 मई 1980 को कफल्टा गांव से गुजर रही श्याम प्रसाद लोहार की बारात को कुछ ऊंची जाति के ग्रामीणों ने रोक लिया था। इन ग्रामीणों ने, ‘भगवान बद्रीनाथ के प्रति सम्मान जताने के लिए’ दूल्हे को डोला पालकी से नीचे उतरकर गांव में पैदल चलने के लिए कहा। लेकिन दलितों ने ज़िद की कि दूल्हा केवल मंदिर के सामने की पालकी से नीचे उतरेगा, उससे पहले नहीं। उनके इस रुख से ऊंची जाति के लोग भड़क गए और उनमें से एक ने – जो कि एक सैनिक था और छुट्टी पर घर आया था- जबरन उस पालकी को उलट दिया जिसमें दूल्हा बैठा हुआ था। इससे दोनों पक्षों के बीच झड़प हो गई और इस झड़प में ब्राह्मण सैनिक की मौत हो गई। 

इसके बाद ठाकुर दलितों पर बेतहाशा भड़क उठे। दलित वहां से भागे और उन्होंने ख़ुद को पास ही एक दलित व्यक्ति के घर में बंद कर लिया। ऊंची जाति के लोगों ने उस घर को घेर लिया और उसमें आग लगा दी। इस वाक़िये में घर में छिपे 6 दलित ज़िंदा जला दिए गए। बाक़ी बचे कुछ दलित खिड़िकियों से क़ूदकर भागे लेकिन उनका पीछा किया गया और एक-एक करके भीड़ ने उन्हें खेतों में पीट-पीट कर मार डाला। ऊंची जाति के 16 आरोपियों को निचली अदलतों और उच्च न्यायालय ने दोष मुक्त क़रार दिया। हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायलय के फ़ैसले को किनारे करते हुए, घटना के 17 सालों बाद इन सभी आरोपियों को उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई। आउटलुक मैग्ज़ीन ने तब इस पर ‘Justice was not denied, but it was definitely delayed’, यानी ‘न्याय ख़ारिज तो नहीं हुआ लेकिन निश्चय ही देर से हुआ’ शीर्षक के साथ एक रिपोर्ट की।

बारातों में डोला-पालकी का इस्तेमाल ऊँची जाति के लोगों के लिए एक विशेषाधिकार माना जाता था। एक दलित दूल्हे को घोड़े की सवारी करते हुए या डोला-पालकी का इस्तेमाल करते हुए देखना हमेशा ऊंची जातियों को परेशान करता था। वे इसे दलितों की ऐसी कोशिश के तौर पर देखते आए हैं कि दलित ऐसा करके बढ़िया से स्थापित एक के ऊपर एक खड़ी, सामाजिक व्यवस्था को बाधित करने की कोशिश करते हैं। इसे ब्राह्मणवाद द्वारा स्थापित ऊँच-नीच की व्यवस्था को ख़ारिज करने की कोशिश और समाज में खुद को समान मानने के एक दावे के तौर पर भी देखा जाता है। विडम्बना यह है कि सवर्ण हिंदुओं को ईसाइयों और मुसलमानों द्वारा अपनी बारातों में डोला-पालकी का इस्तेमाल करने से कोई समस्या नहीं थी।

दलित समुदाय के सामाजिक रूप से जागरूक वर्गों ने अपनी शादी के समारोहों में डोला-पालकी का उपयोग करने पर प्रतिबंध का विरोध करना शुरू कर दिया। दरअसल, 1923 में सेंधीखाल में बारात पर हुए हमले से तीन साल पहले दलित नेता खुशी राम आर्य ने सवर्णों के उस अलिखित फरमान को तोड़ने का साहस किया और पहली बार 16 जनवरी 1920 को रामगढ़ गांव की एक बारात में डोला-पालकी का इस्तेमाल करने के लिए ज़ोर लगाया। यह उत्तराखंड में कहीं भी अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे दलितों के लिए मनोबल बढ़ाने वाला साबित हुआ।

गढ़वाल के प्रभावशाली दलित नेता जयानंद भारती, ने 1923 में अपने समुदाय को डोला-पालकी के इस्तेमाल के अधिकार के लिए गोलबंद करना शुरू किया। हालाँकि, यह विडंबना ही है कि लगभग 20 साल बाद भी 1941 में गढ़वाल के मंडोली गाँव में एक दलित बारात पर हुए एक और हमले के बाद वो अब भी डोला पालकी के इस्तेमाल के इस अधिकार के लिए लड़ाई लड़ रहे थे। चाहे इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 1936 में शिल्पकारों के डोला पालकी के इस्तेमाल को रोकने की प्रथा को ग़ैरकानूनी घोषित ही क्यों न कर दिया हो।

बीसवीं सदी की शुरुआत में शिल्पकार अपने सामाजिक हालात को लेकर बेचैन होने लगे थे। हरि प्रसाद टम्टा शुरूआती ब्रिटिश समर्थक शिल्पकार नेताओं में से एक थे जिन्होंने 1905 में टम्टा सुधार सभा की स्थापना की, जिसे बाद में कुमाऊँ शिल्पकार सभा के रूप में जाना जाने लगा। हरि प्रसाद टम्टा और ख़ुशी राम आर्य कुमाऊं क्षेत्र में दलित जागृति के अग्रदूतों में से थे। ख़ुशी राम को 1923 में अल्मोड़ा के मझखाली में कूर्मांचली शिल्पकार सम्मेलन आयोजित करने के लिए याद किया जाता है, जहाँ शिल्पकारों ने दूसरी कई बातों के अलावा, मुफ़्त शिक्षा, पुलिस और सेना में नौकरियों तक पहुँच और सरकार में अपने हिस्से की माँग की। बहुत बाद में, 1935 में, शिल्पकारों को सशस्त्र बलों में शामिल होने की अनुमति दी गई थी। दिलचस्प बात यह है कि दलित और ब्राह्मण दोनों को शुरू में अंग्रेजों द्वारा ‘मार्शल रेस’ नहीं माना जाता था, इसलिए उन्हें सेना में शामिल होने से वंचित रखा गया था। 

ऊँची जातियों के गहरे नियंत्रण में एक कठोर सामाजिक व्यवस्था के बीच यह उल्लेखनीय है कि कैसे एक समुदाय धीरे-धीरे अपने अधिकारों का दावा करने और व्यवस्था को चुनौती देने के लिए साहस जुटाने के लिए जाग रहा था। यह जागृति काफ़ी हद तक महात्मा गांधी के नेतृत्व में औपनिवेशिक शासन के ख़िलाफ राष्ट्रीय जागरण से जुड़ी थी। अंत्यज सुधार सभा और शिल्पकार सुधार सभा जैसे कई दलित समर्थक संगठन 20वीं सदी के आरंभ में अस्तित्व में आए। इन सबके बावजूद, दलितों के विवाह समारोहों और बारातों पर हमले 1920 से 1940 के दशक तक होते रहे और वास्तव में वे आज तक भी पूरी तरह से बंद नहीं हुए हैं। 

यह भी बहुत दिलचस्प है कि जब दलित नेतृत्व औपनिवेशिक काल के दौरान अपने आसपास के जन आंदोलनों को बड़ी उत्सुकता से देख रहा था, तो वे किसी तरह से कुछ प्रगतिशील और उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलनों के उच्च जाति के नेतृत्व पर भरोसा करने के लिए तैयार नहीं था। इतिहासकार शेखर पाठक लिखते हैं, ‘बेगार प्रथा (जबरन और अवैतनिक श्रम) को ख़त्म करने के आंदोलन और वन आंदोलन के दौरान, शिल्पकार इसमें भाग लेने के लिए इन आंदोलनों के नेतृत्व से प्रेरित नहीं थे।’ 

बेगार प्रथा अंग्रेज़ों ने शुरू की थी जिसके तहत ब्रिटिश अधिकारियों को जब उत्तराखंड के दूरस्थ इलाकों में कैंप करने हाते थे तो एक गांव से दूसरे गांव में शिविर लगाने के लिए, तम्बू, कमोड और खाने पीने की सामग्री के कंटेनर जैसी भारी भरकम चीज़ों को अपनी पीठ पर ढोने के लिए यहां के ग्रामीणों को मजबूर किया जाता था। इसके लिए उन्हें कोई मेहनताना भी नहीं दिया जाता था। ग्रामीणों ने इस प्रथा का विरोध किया और आख़िरकार, 1921 में उन्होंनें ब्राह्मणों और ठाकुरों के साझे नेतृत्व में ऐतिहासिक बेगार विरोधी आंदोलन की शुरुआत की। लेकिन शिल्पकार इस आंदोलन से दूर रहे क्योंकि वे उच्च जातियों के अंतर्विरोध को साफ़ तौर पर देख पा रहे थे, जो कि एक तरफ तो बेगार व्यवस्था का विरोध कर रहे थे, जिसके वे खुद शिकार थे, लेकिन दूसरी तरफ वे दलितों को उनके खेतों में मुफ़्त में बेगार करने के लिए मज़बूर करते थे। उत्तराखंड आंदोलन में भी ठीक यही अंतर्विरोध था साफ़ तौर पर ज़ाहिर हो रहा था जिसे दलित देख सकते थे।

हालांकि शिल्पकारों को वर्णाश्रम व्यवस्था का हिस्सा माना जाता था, फिर भी उन्हें ऊँची जाति के हिंदू ‘बाहरी’ मानते थे। उन्हें जन्म, मृत्यु या विवाह के समय हिंदुओं के किसी भी अनुष्ठान और रीति-रिवाजों का पालन करने की अनुमति नहीं थी। ऊँची जाति के पुजारी उनके लिए कोई धार्मिक संस्कार नहीं करते थे। उन्हें उच्च जाति के हिंदुओं द्वारा पहना जाने वाला जनेऊ पहनने की मनाही थी। उन्हें मंदिर में प्रवेश करने या देवता को लंबे समय तक नज़दीक से देखने की अनुमति नहीं थी। न ही उन्हें अपने बच्चों को आधुनिक नाम देने की अनुमति थी। लेकिन शिल्पकारों ने सवर्ण हिंदुओं की ओर से पैदा की गई इस सामाजिक-धार्मिक घुटन के बीच एक रास्ता निकाला।

उन्होंने एक साहसिक क़दम उठाया और धीरे धीरे दलित समुदाय के भीतर ही एक पुजारी वर्ग विकसित किया। इस क़दम के पीछे सोच यह थी कि ब्राह्मण पुजारियों को ख़ारिज करते हुए उन्हें स्पष्ट रूप से बताया जाए कि ‘हमें आपसे धार्मिक संस्कार करने की ज़रूरत नहीं है, हम इसे ख़ुद से कर सकते हैं’। दलित पुरोहितों (पुजारियों) ने संस्कृत सीखी और शास्त्रों को कंठस्थ किया, और यहां तक कि कपड़े भी ब्राह्मण पुरोहितों की तरह पहनने शुरू किए। पहली बार बागेश्वर ज़िले के एक दलित ​बढ़ई जोगा राम 1962 में पुजारी बने और अब उनका बेटा भी उन्हीं की राह पर है। वे दलित परिवारों के लिए संस्कार करते हैं और उन्हें यह समुदाय ‘पंडित जी’ कहता है जो कि ब्राह्मणों के लिए आ​रक्षित सम्मानसूचक शब्द रहा है। 

समान धार्मिक अधिकारों के लिए शिल्पकार समुदाय का संघर्ष लोकतांत्रिक मूल्यों और बुनियादी मानवाधिकारों के लिए था जिनसे वे सदियों से वंचित रहे थे। बीसवीं सदी के शुरुआती दौर में आर्य समाज आंदोलन ने जनेऊ जैसे हिंदू धार्मिक प्रतीकों पर अपना दावा करने के लिए शिल्पकारों को गोलबंद करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। शिल्पकार पुरुषों को धार्मिक दीक्षा देने के लिए उत्तराखंड के अलग अलग हिस्सों में जनेऊ समारोह आयोजित किए गए। आर्य समाज परिवार में उनके शामिल होने की घोषणा करने के लिए उन्हें ‘आर्य’ जाति नाम दिया गया। काँग्रेस और आर्य समाज के नेता लाला लाजपत राय शिल्पकार नेता ख़ुशी राम आर्या द्वारा आयोजित इस तरह के एक समारोह में भाग लेने के लिए 1913 में नैनीताल जिले के सुनकिया गांव आए थे।

उनकी यात्रा ने निश्चित रूप से कुछ उच्च जाति के बुद्धिजीवियों की अंतरात्मा को झकझोर दिया था, जिन्होंने सवर्ण हिंदुओं द्वारा शिल्पकारों के साथ अमानवीय व्यवहार के बारे में अपनी चिंता व्यक्त करना शुरू कर दिया था। हालांकि, वे शिल्पकारों के ईसाई या इस्लाम में परिवर्तित होने के बारे में अधिक चिंतित थे। शेखर पाठक ने उस समय के दो महत्वपूर्ण समाचार पत्रों- अल्मोड़ा अखबार और गढ़वाली को कोट करते हैं। तारा दत्त गैरोला ने अल्मोड़ा अख़बार में लिखा, ”हमें शिल्पकारों के प्रति अपने रवैये को बदलना होगा।

सरकार को भी उनके उत्थान के लिए प्रयास करने होंगे। अन्यथा, वे ईसाई और मुसलमान बन जाएंगे और इससे हिंदू एकता टूट जाएगी।’ अप्रैल 1913 में ‘गढ़वाली’ में छपे एक सम्पादकीय में  लिखा गया था, ‘निचली जाति के लोगों से हमें अच्छा बर्ताव करना होगा और हमारे बीच की खाई को कम करना होगा। हमें उनसे नफ़रत नहीं करनी चाहिए और उन्हें अपने सामाजिक उत्थान के लिए प्रेरित करने की कोशिश करनी चाहिए.. अगर निचली जातियों से ताल्लुक रखने वाले लोगों की संख्या नीचे चली जाती है तो यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि भारत हाथों और पॉंवों से विहीन हो जाएगा।’ 

साफ़ तौर पर, शिल्पकारों को प्रभावशाली जातियों की सेवा के लिए औज़ार यानी हिंदू समाज के हाथों और पावों के तौर पर ही देखा जा रहा था न कि एक समान अधिकारों के वाले इंसानों के नज़रिए से।  

लेकिन अब तक शिल्पकार अपने साथ लगातार हो रहे भेदभाव को लेकर बेचैन होने लगे थे। हरि प्रसाद टम्टा ने 1923 में डिस्ट्रिक्ट ग़ज़ैट में एक तीखा लेख लिखा, जिसमें शिल्पकारों की दुर्दशा पर शोक व्यक्त किया गया था: ‘सदियाँ बीत चुकी हैं। हमने हिंदू धर्म के लिए अपना बलिदान दिया, लेकिन हमारे साथ कभी न्याय नहीं हुआ। हमें अभी भी “डोम” कहा जाता है, यहां तक ​​कि हमारी छाया भी अछूत मानी जाती है।’ 

एक शताब्दी के बाद भी, दलितों को लेकर प्रभावशाली जातियों का भेदभावपूर्ण रवैया नहीं बदला है – हो सकता है कि यह और अधिक सूक्ष्म हो गया हो। असल में जो बदला है वह ये है कि दलित अब अब उच्च जातियों द्वारा निर्धारित खेल के नियमों को सिर झुकाकर मानने को तैयार नहीं हैं-  ​बल्कि वे इसका प्रतिकार कर रहे हैं। 

दलितों के इस हस्तक्षेप का एक हालिया उदाहरण दिसंबर 2021 का है जिसने राष्ट्रीय मीडिया में सुर्खियां बनाईं। चंपावत ज़िले के एक सरकारी स्कूल में उच्च जाति के छात्रों ने एक दलित कर्मचारी सुनीता कुमारी द्वारा बनाया गया मिड-डे मील खाने से इनकार कर दिया। प्रभुत्वशाली जातियों के दबाव में स्कूल प्रबंधन ने सुनीता कुमारी को बर्ख़ास्त कर दिया और एक ब्राह्मण महिला को भोजनमाता (रसोइया) के रूप में नियुक्त किया। इसके बाद जो हुआ वह अभूतपूर्व था: दलित छात्रों ने ठीक उसी तरह नवनियुक्त ब्राह्मण महिला द्वारा बनाए गए मिड-डे मील का बहिष्कार करने का फैसला किया।

यह उलट छुआछूत (रिवर्स अनटचेबिलिटी) का एक उदाहरण हो सकता है, लेकिन संदेश स्पष्ट था: अगर प्रभुत्वशाली जातियां छुआछूत कर सकती हैं, तो दलित भी उन्हें उनकी ही भाषा में 

जवाब दे सकते हैं। दलितों की युवा पीढ़ी को अब उच्च जाति के प्रकोप से बचने के लिए आपस में बातचीत करने के लिए किसी कोड भाषा का आविष्कार करने की ज़रूरत नहीं है।

(यह लेख अंग्रेजी में सेमिनार और उसके बाद हिंदी अनुवादित लेख समयांतर में प्रकाशित हो चुका है। लेखक राजेश जोशी बीबीसी में काम कर चुके हैं। इसका हिंदी अनुवाद पत्रकार और अनुवादक रोहित जोशी ने किया है।)

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