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Categories: बीच बहस

संविधान दिवस पर विशेष: सामने आ गया डॉ. आंबेडकर का बताया खतरा

आज देश का संविधान 70 साल का हो गया। वैसे तो किसी मनुष्य के जीवन में यह उम्र बेहद नाजुक होती है और भविष्य के लिहाज से भी इसे बेहद खतरनाक पड़ाव का दर्जा दिया जाता है। लेकिन राष्ट्रों के जीवन में यह बचपन की श्रेणी में आएगा। क्योंकि उनकी उम्र बहुत लंबी होती है। और उसे दशकों नहीं बल्कि सदियों के पैमाने पर नापा जाता है। अंग्रेज जब भारत से जा रहे थे तो इंग्लैंड के प्रधानमंत्री रहे चर्चिल ने कहा था कि भारत एक नहीं रह सकता है। और वह चंद सालों के भीतर खंड-खंड हो जाएगा। लेकिन पश्चिमी देशों की इन तमाम आशंकाओं और भविष्यवाणियों को खारिज करते हुए देश न केवल एकजुट रहा बल्कि लगातार मजबूत होता गया। और इसने दुनिया में लोकतंत्र की एक ऐसी मिसाल पेश की जिसका कोई सानी नहीं है।

देश की इस एकता और भाईचारे के पीछे जिस एक चीज की सबसे बड़ी भूमिका रही है वह संविधान है। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी और अरुणाचल से लेकर कच्छ तक हर नागरिक इसी एक किताब पर भरोसा करता है। लेकिन दुखद बात यह है कि 70 सालों बाद आज इसी किताब पर ग्रहण लग गया है। आज देश का न केवल संविधान संकट में है बल्कि पूरा लोकतंत्र खतरे में है।

70 सालों के लोकतांत्रिक इतिहास में आज पहला मौका है जब संविधान दिवस के मौके पर संसद के भीतर सत्ता पक्ष और विपक्ष को अलग-अलग कार्यक्रम करना पड़ा। संसद के सेंट्रल हाल में आयोजित संयुक्त अधिवेशन में केवल सत्ता पक्ष के लोग शामिल हुए। पूरा विपक्ष लोकतंत्र की हत्या के बैनर के साथ संसद के बाहर स्थित डॉ. भीमराव आंबेडकर की प्रतिमा के सामने खड़ा रहा। वैसे भी तीन दिनों पहले जिस तरह से आधी रात में लोकतंत्र की हत्या की गयी उसके बाद सत्ता पक्ष द्वारा संविधान दिवस मनाने का कोई मतलब रह नहीं जाता है।

इस मौके पर सत्ता पक्ष की तरफ से हुए भाषण में भी राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री का सबसे ज्यादा जोर लोगों के कर्तव्यों के पर था। लोगों के अधिकारों की बात सिरे से नदारद थी। पूरा आयोजन इमरजेंसी के दौर की परिस्थितियों का अहसास दिला रहा था। जब अनुशासन और कर्तव्य पर सबसे ज्यादा जोर दिया गया था। किसी को नहीं भूलना चाहिए कि उस इमरजेंसी को जायज ठहराने के लिए विनोबा भावे ने उसे अनुशासन पर्व तक की संज्ञा दी थी। आज के सरकारी आयोजन में उसी पर्व की प्रतिध्वनि सुनायी दे रही थी।

डॉ. भीमराव आंबेडकर संविधान को अपनाए जाने से एक दिन पहले यानि 25 नवंबर 1949 को जब संविधान सभा में आखिरी भाषण दे रहे थे तो उसी दिन उन्होंने संविधान के रास्ते में आने वाले इन खतरों को बता दिया था।

उन्होंने कहा था कि “…लेकिन यह बात निश्चित है कि अगर पार्टियां अपने हितों को देश के ऊपर रखती हैं तो हमारी स्वतंत्रता दूसरी बार खतरे में पड़ जाएगी और शायद हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी। इस तरह की चीजें घटित न हों इसके लिए हमें संकल्पबद्ध होना होगा। हमें खून के आखिरी कतरे तक अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करने की शपथ लेनी होगी।”

उन्होंने आगे कहा कि “26 जनवरी 1950 को इस लिहाज से एक लोकतांत्रिक देश हो जाएगा कि भारत के पास उस दिन से एक ऐसी सरकार होगी जो लोगों के लिए, लोगों के द्वारा और लोगों के जरिये होगी। ठीक यही विचार मेरे दिमाग में आता है कि उसके लोकतांत्रिक संविधान का क्या होगा? क्या वह उसे बरकरार रखने में सफल रहेगा या फिर उसे खो देगा?”

फिर वो कहते हैं कि “…..यहां लोकतंत्र के लिए इस तरह का खतरा हो सकता है कि वह तानाशाही को जगह दे दे। इस नवजात लोकतंत्र के लिए यह बिल्कुल संभव है कि वह अपने ढांचे को बरकरार रखे और वास्तव में तनाशाही को अपना ले। अगर एक लैंडस्लाइड (चुनाव में अभूतपूर्व जीत) होती है तो दूसरे किस्म के खतरे की बड़ी आशंका है।”

अपने इसी भाषण में वह कहते हैं कि “भारत में भक्ति या फिर जिसे समर्पण का रास्ता या फिर हीरो की पूजा भारत की राजनीति में अपनी जो भूमिका निभाता है वह पूरी दुनिया के दूसरे मुल्कों की राजनीति में निभायी जाने वाली भूमिका से बहुत ज्यादा है। धर्म में भक्ति आत्मा के मोक्ष के लिहाज से एक रास्ता हो सकता है लेकिन राजनीति में भक्ति या फिर हीरो की पूजा पतन या फिर तानाशाही का बिल्कुल निश्चित रास्ता होती है।”

संविधान की सफलता-असफलता पर बोलते हुए वह कहते हैं कि “मैं संविधान की गुणवत्ता पर बात नहीं करना चाहूंगा। क्योंकि मैं महसूस करता हूं कि संविधान कितना भी अच्छा होगा यह निश्चित तौर पर बुरे में तब्दील हो जाएगा अगर उसके तहत काम करने वाले लोग बुरे निकल गए। और कितना भी बुरा संविधान हो अगर उसके तहत काम करने वाले लोग अच्छे हैं तो वह अच्छा हो जाएगा। संविधान का काम केवल उसके स्वभाव पर निर्भर नहीं करता है।”

आज मुल्क एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जब केंद्र में बैठी सत्ता को न तो संविधान का लिहाज है और न ही वह उसकी कोई जरूरत महसूस करती है। उसका उपयोग उसके लिए बस इतना ही है जो उसे सत्ता में बनाए रखने के लिए जरूरी है। यही वजह है कि सूबों में सरकारों के गठन के मामले में वह किसी भी हद को पार करने के लिए तैयार है। गोवा से लेकर मणिपुर और कर्नाटक से लेकर महाराष्ट्र तक यही कहानी है। सच्चाई यही है कि किसी भी सरकार के गठन का मामला कोर्ट के बगैर हल नहीं हो रहा है।

दरअसल बीजेपी सिर्फ एक मुखौटा है। इस देश में बीजेपी संविधान के साथ क्या करेगी यह सब कुछ संघ तय करता है। और संघ अपने लक्ष्य की राह में संविधान को सबसे बड़ा रोड़ा मानता है। चूंकि 70 सालों के इस संविधान को एकबारगी खत्म करना या फिर उसे मिटा देना किसी के लिए संभव नहीं है इसलिए उसे टुकड़ों-टुकड़ों में मारा जा रहा है। या फिर उसकी साख खत्म की जा रही है। कई बार उससे जुड़ी संस्थाओं को ध्वस्त कर इसे अंजाम दिया जा रहा है। यह बात किसी से छुपी नहीं है कि संविधान को चोट पहुंचाने का कोई भी मौका मोदी सरकार नहीं छोड़ती है। संघ जिस व्यवस्था का पक्षधर है उसमें संविधान का लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और समानता का स्वरूप सबसे बड़ी बाधा है। यह बात किसी को नहीं भूलनी चाहिए कि आखिर में उसे एक ऐसे हिंदू राष्ट्र की स्थापना करनी है जिसका बुनियादी आधार देश की जाति व्यवस्था होगी। यह चीज संविधान को सिर के बल खड़ा कर देने के जरिये ही हासिल की जा सकती है। लिहाजा बीजेपी उसी काम में लगी हुई है।

देश, संविधान, सत्ता और उसके प्रतीकों से जुड़ी चीजों को लेकर संघ के क्या विचार हैं उनकी कुछ झलकियां देना यहां बेहद मौजूं होगा:

जो लोग सत्ता में आ गये हैं वे हो सकता है कि हमें तिरंगा थमा दें लेकिन हिन्दू कभी उसे स्वीकार नहीं करेंगे। यह 3 का अंक अशुभ है, और 3 रंग का झंडा हो वह देश के लिये बुरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव उत्पन्न करेगा ।

(आर्गेनाइजर, 3 में भगवा ध्वज का रहस्य” से।)

हमारे देश के नेताओं ने देश के लिये एक नया ध्वज स्थापित किया है। यह सिर्फ़ नक़ल और भटकाव का उदाहरण है। हम एक प्राचीन और गौरवशाली देश हैं जिसका एक शानदार अतीत है। फिर, क्या हमारे पास अपना कोई ध्वज नहीं है?

(गोलवरकर,’बंच आफ़ थाट्स’ में, पेज 237-38)

संविधान बनाते समय हमारे हिन्दू होने को भुला दिया गया। हमें सरकार के एक ऐसे रूप को स्वीकार करना होगा जिसमें एक देश, एक राष्ट्र और एक राज्य हो जिसमें पूरे देश के लिये एक विधानसभा और एक ही मंत्रालय हो।

(श्री गुरुजी समग्र दर्शन’,(संपादित) खण्ड-1, पेज़-144)

इसके बावज़ूद कि पिछले दिनों डा अम्बेडकर के बम्बई में यह कहने की ख़बर है कि मनु के दिन अब लद गये, यह एक तथ्य है कि आज भी हिन्दुओं का दैनिक जीवन मनुस्मृति तथा अन्य स्मृतियों के सिद्धांतों और आदेशों से प्रभावित होता है।

यहां तक कि एक उदार हिन्दू भी कुछ मामलों में ख़ुद को मनु स्मृति में अन्तर्निहित नियमों से बंधा हुआ पाता है और उनसे अपने जुड़ाव को पूरी तरह त्याग देने पर शक्तिहीन महसूस करता है।’

( 6 फरवरी, 1950 के आर्गेनाइज़र में पेज़ 7 पर ‘मनु रूल्स आवर हर्ट्स’ से)

आरक्षण लागू करके शासक हिन्दू सामाजिक समरसता की जड़ खोद रहे हैं और उस अस्मिता की चेतना को नष्ट कर रहे हैं जिसने अतीत में इन विभिन्न संप्रदायों को एक सद्भावपूर्ण स्थिति में एक इकाई की तरह रखा था।

(गोलवलकर, एन एन गुप्ता,आर एस एस एन्ड डेमोक्रेसी, पेज –17 पर)

(नोट- संघ से जुड़े ऊपर के सभी कोट कवि अशोक पांडेय के हवाले से शमसुल इस्लाम की किताब “वी आर आवर नेशनहुड डिफाइन्ड- ए क्रिटिक” से लिए गए हैं।)

(लेखक जनचौक के संस्थापक संपादक हैं।)

This post was last modified on November 26, 2019 3:49 pm

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