Wednesday, December 1, 2021

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निरर्थक है कॉमन सिविल कोड के अनुच्छेद 44 पर बहस

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कुछ महत्वपूर्ण पदों या संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को पूरी वस्तु स्थिति (हकीकत) जानने के बाद भी बौद्धिक जुगाली करने की आदत होती है, भले ही उसके बाद कितना भी विवाद हो और अंतिम परिणाम शून्य हो। अब यह तो किसी को उम्मीद भी नहीं होगी कि दिल्ली हाईकोर्ट के किसी न्यायाधीश को यह न ज्ञात हो कि संविधान के अनुच्छेद 44 में क्या कहा गया है और भारतीय विधि आयोग ने अपनी रिपोर्ट में क्या कहा है। इसके बावजूद दिल्ली हाईकोर्ट ने अनुच्छेद 44 का जिक्र कर कॉमन सिविल कोड (समान नागरिक संहिता) लागू करने की वकालत की।   

गौरतलब है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 , नागरिकों के लिए एक समान सिविल संहिता, में कहा गया है कि ‘राज्य, भारत के समस्त राज्य क्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान सिविल संहिता प्राप्त कराने का प्रयास करेगा’।यहाँ शब्द ‘प्रयास” है न कि अनिवार्य है।

विधि आयोग के अध्यक्ष जस्टिस वीएस चौहान ने अपने कार्यकाल के अंतिम दिन परामर्श पत्र में कहा कि इस समय समान नागरिक संहिता की ‘न तो जरूरत है और ना ही वांछित’। समान नागरिक संहिता पर पूर्ण रिपोर्ट देने की बजाए विधि आयोग ने परामर्श पत्र को तरजीह दी क्योंकि समग्र रिपोर्ट पेश करने के लिहाज से उसके पास समय का अभाव था। परामर्श पत्र में कहा गया है कि समान नागरिक संहिता का मुद्दा व्यापक है और उसके संभावित नतीजे अभी भारत में परखे नहीं गए हैं। इसलिये दो वर्षों के दौरान किए गए विस्तृत शोध और तमाम परिचर्चाओं के बाद आयोग ने भारत में पारिवारिक कानून में सुधार को लेकर यह परामर्श पत्र प्रस्तुत किया है।

इसके बावजूद दिल्ली हाई कोर्ट ने एक केस की सुनवाई के दौरान देश भर में समान नागरिक संहिता लागू करने की वकालत की। उसने कहा कि अब समाज में धर्म, जाति और समुदाय की पारंपरिक रूढ़ियां टूट रही हैं, इसलिए समय आ गया है कि संविधान की धारा 44 के आलोक में समान नागरिक संहिता की तरफ कदम बढ़ाया जाए।

जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह की पीठ राजस्थान की मीणा जनजाति की महिला और उसके हिंदू पति की तलाक की याचिका पर सुनवाई कर रही हैं। इस दौरान पीठ ने कहा, आधुनिक भारतीय समाज में धीरे-धीरे जाति, धर्म और समुदाय का भेद मिट रहा है। इस बदलाव के कारण देश के युवाओं को शादी, तलाक और उत्तराधिकार आदि के मामलों में परेशानियों से बचाने के लिए समान नागरिक संहिता जरूरी है। नागरिकों को विभिन्न पर्सनल लॉ में विरोधाभास के कारण संघर्ष से बचाना है।

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को दरकिनार कर पति की याचिका को स्वीकार करते हुए कहा कि इस तरह के मामलों के लिए ही ऐसे कानून की जरूरत है, जो सभी के लिए समान हो। कोर्ट ने यह भी कहा, उसके सामने ऐसा कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया गया है, जिससे पता चले कि मीणा जनजाति समुदाय के ऐसे मामलों के लिए कोई विशेष अदालत है।

अदालत ने निर्देश दिया कि इस आदेश की जानकारी केंद्र सरकार के विधि एवं न्याय मंत्रालय के सचिव को दी जाए, ताकि वह आवश्यक कार्रवाई करें।अब यह जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह भी जानती हैं की उनका आदेश केंद्र सरकार के लिए बाध्यकारी नहीं है, न ही उनके सामने जो मामला विचाराधीन था उसमें यह सुझाव सुसंगत है।

दरअसल संविधान निर्माताओं ने समान नागरिक संहिता को भले ही तत्काल लागू नहीं किया था, लेकिन धारा 44 के जरिए इसकी कल्पना जरूर की थी। वो चाहते थे कि सभी धर्मों और संप्रदायों के लोगों के लिए एक जैसा पर्सनल लॉ हो। इसलिए, उन्होंने नीति निर्देशक सिद्धांत के तहत अपनी भावना का इजहार कर दिया। इस आर्टिकल के जरिए संविधान निर्माताओं ने साफ कहा कि राज्य इस बात का प्रयास करेगा कि सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता बने जिसे पूरे देश में लागू किया जाए।

इसी उम्मीद में उन्होंने उस वक्त अलग-अलग धर्मों के लिए अलग-अलग पर्सनल लॉ बनाने का समर्थन किया था। अब संबंधित धर्म के पर्सनल लॉ के मुताबिक ही उसके मानने वालों में शादी, तलाक, गुजारा भत्ता, गोद लेने की प्रक्रिया, विरासत से जुड़े अधिकार आदि तय होते हैं। जिस दिन से देश में समान नागरिक संहिता लागू हो जाएगी, उसी दिन से शादी से लेकर विरासत से जुड़े मामलों में भी सभी धर्मों और समुदायों के लिए एक ही कानून लागू होगा।

केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार बनने के बाद से ही यूनिफॉर्म सिविल कोड की चर्चा जोर पकड़ गई क्योंकि,भाजपा अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण करने, जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 को हटाने और देश में समान नागरिक संहिता लागू करने को दशकों से अपने एजेंडे में शामिल करती आई है। सरकार ने 2019 में जब जम्मू-कश्मीर के लिए विशेष प्रावधान करने वाली संविधान की धारा 370 को खत्म कर दिया तो समान नागरिक संहिता लागू किए जाने की उम्मीद भी बढ़ गई।

भारत में फिलहाल संपत्ति, शादी, तलाक और उत्तराधिकार जैसे मामलों के लिए हिंदू और मुसलमानों का अलग-अलग पर्सनल लॉ है। इस कारण एक जैसे मामले को निपटाने में पेचीदगियों का सामना करना पड़ता है। देश में लंबे अरसे से समान नागरिक संहिता लागू करने को लेकर बहस होती रही है। इसके सामाजिक और धार्मिक असर को लेकर इन दलों की अपनी-अपनी सोच है।

उच्चतम न्यायालय में अप्रैल 2021 में याचिका दाखिल करके याचिकाकर्ता ने कहा है कि अभी भी अन्य हाईकोर्ट में इनसे संबंधित मामले आ सकते हैं। लिहाजा हाईकोर्ट्स में पेंडिंग केस सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर किए जाएं और इन मामलों से संबंधित कोई नया मामला स्वीकार ना किया जाए। इस याचिका में दिल्ली हाई कोर्ट में पेंडिंग मुकदमे उच्चतम न्यायालय में ट्रांसफर करने की अपील की गई है।

दो साल पहले दिल्ली हाई कोर्ट ने 31 मई 2019 को यूनिफार्म (कॉमन) सिविल कोड के लिए ड्राफ्ट तैयार करने का निर्देश देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार और लॉ कमीशन से जवाब तलब किया था। याचिका में कहा गया कि केंद्र सरकार संविधान के अनुच्छेद-44 (समान नागरिक आचार संहिता) की भावना के अनुरुप ड्राफ्ट तैयार करे। याचिका में गुहार लगाई गई है कि समान नागरिक आचार संहिता को क्रियान्वित किया जाए। अदालत ने केंद्र सरकार के अलावा लॉ कमीशन को नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने को भी कहा था। मई 2019 से अब तक इस मामले की अगली सुनवाई ना होने से ये साफ नहीं हुआ है कि इन दोनों पक्षकारों ने जवाब दाखिल किया भी या नहीं। इसलिए माना जा सकता है कि अभी हाईकोर्ट में केंद्र सरकार को अपना स्टैंड स्पष्ट करना है।

संविधान के भाग चार में राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत का वर्णन है। संविधान के अनुच्छेद 36 से 51 के जरिए राज्य को विभिन्न महत्वपूर्ण मुद्दों पर सुझाव दिए गए हैं और उम्मीद की गई है कि राज्य अपनी नीतियां तय करते हुए इन नीति निर्देशक तत्वों को ध्यान में रखेगा। इन्हीं में आर्टिकल 44 राज्य को उचित समय आने पर सभी धर्मों लिए ‘समान नागरिक संहिता’ बनाने का प्रयास करने को कहता है।

संविधान सभा में प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. भीमराव आंबेडकर ने संविधान निर्माण के वक्त कहा था कि समान नागरिक संहिता अपेक्षित है, लेकिन फिलहाल इसे विभिन्न धर्मावलंबियों की इच्छा पर छोड़ देना चाहिए। इस तरह, संविधान के मसौदे में आर्टिकल 35 को अंगीकृत संविधान के आर्टिकल 44 के रूप में शामिल कर दिया गया और उम्मीद की गई कि जब राष्ट्र एकमत हो जाएगा तो समान नागरिक संहिता अस्तित्व में आ जाएगा।

डॉ. आंबेडकर ने संविधान सभा में दिए गए एक भाषण में कहा था कि किसी को यह नहीं मानना चाहिए कि अगर राज्य के पास शक्ति है तो वह इसे तुरंत ही लागू कर देगा।संभव है कि मुसलमान या इसाई या कोई अन्य समुदाय राज्य को इस संदर्भ में दी गई शक्ति को आपत्तिजनक मान सकता है। मुझे लगता है कि ऐसा करने वाली कोई पागल सरकार ही होगी।’

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह का लेख।)

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