Sunday, November 28, 2021

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विकास, जो जिंदगी पर पड़ रहा है भारी!

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लॉक डाउन ख़त्म होते ही प्रदूषण फिर से अपने मानक को पार करने लगा है। गाजियाबाद के जिस वसुंधरा इलाके में मैं जहां रहता हूं वहां आजकल विकास कार्यों की धूम है। दस किमी का एक फ्लाईओवर बन चुका है। उसमें चढ़ने व निकासी के लिए उसकी तमाम शाखाएं भी हैं और कुछ बन रही हैं। असंख्य सड़कें खोद डाली गई हैं क्योंकि कहीं अंडरग्राउंड केबल डाले जा रहे हैं तो कहीं सीवर के पाइप। नालों की सफाई का काम पिछले कई वर्षों से चलता है और उसकी जो गाद निकलती है उसे किनारे पर डाल दिया जाता है नतीजा वह रास्ता ब्लाक हो जाता है। रोज सुबह इतना धुआं और कोहरा छाया रहता है कि बाहर निकलना मुश्किल है।

धूल के कण ऊपर उठ नहीं पाते और वे नीचे छाये रहते हैं जिनकी वजह से सांस लेना दूभर है। मगर इस पर आपत्ति नहीं की जा सकती क्योंकि क्षेत्र के त्वरित विकास का कार्य सूबे की सरकार चला रही है। सरकार को जल्दी है इसलिए काम बड़ी तेजी से चालू किया गया बगैर यह देखे कि इस विकास कार्य का बुरा असर क्षेत्र के रहवासियों पर कितना पड़ेगा। इस पूरे इलाके में हरित पट्टी न के बराबर है और जो एकाध वृक्ष हैं भी उनमें वाहनों की निरंतर आवाजाही और निर्माण कार्यों के चलते गर्द जमी रहती है जिसके कारण वे धूसर हो चले हैं। पर आज तक उद्यान विभाग ने कभी उन पर पानी का छिड़काव ही नहीं करवाया। उद्यान विभाग के अभियंताओं को अपने आकाओं के बंगलों की सजाने की मंशा तो रहती है मगर आम जन के लिए हरियाली विकसित करने की जरूरत वे नहीं समझते।

यह विकास एक ऐसा विकास है जिसे जन कल्याणार्थ भले कहा जाए पर यह जनता के स्वास्थ्य से पूरा खिलवाड़ कर रहा है। मजे की बात कि इस विकास का लाभ तो उस इलाके के लोगों को मिलता नहीं उलटे उसके निर्माण के दौरान हारी-बीमारी यहां की जनता को झेलनी पड़ती है। सुबह का आलम यह होता है कि घर से बाहर निकलने की हिम्मत नहीं पड़ती। खासकर वे जो अस्थमा या ब्रोंकाइटिस के शिकार हैं उनके लिए तो सुबह एक दुखद और कष्टसाध्य प्रक्रिया होती है। तब ऐसे विकास का लाभ किसको? सरकारें विकास करती हैं और उससे होने वाले करों से अपना खजाना तो भर लेती हैं पर एक कल्याणकारी सरकार के लिए क्या यह सही है?

हम सरकार से अपेक्षा करते हैं कि उसके कार्यों से आम जन को लाभ पहुंचे पर आमतौर पर शहरों का जिस तरह से अनियोजित विकास हो रहा है उससे उसका लाभ कम नुकसान ज्यादा होता है। विकास का मतलब है सबको स्वास्थ्य व शिक्षा की सुविधा होना पर हम पाते हैं कि सरकारें शहरों के विस्तार के साथ-साथ अपना यही कार्य भूल जाती हैं। नतीजा यह होता है कि विकसित शहरों में भी हम स्कूल और अस्पताल नहीं पाते हैं। जो प्राइवेट स्कूल और अस्पताल होते हैं उनके कोई मानक नहीं होते और वे इतने व्यावसायिक हो जाते हैं कि आम जन उन स्कूलों में न तो अपने बच्चों को पढ़ा पाते हैं न इलाज करवा पाते हैं। तब कहां गई लोक कल्याण की शपथ।

सरकारें अगर शहर बनाने के पूर्व ही तय कर लें कि हम एक ऐसा आधुनिक और नियोजित शहर बसाएंगे जहां उसके रहवासियों को सारी मूलभूत सुविधाएं मिलें तब तो शायद हम ऐसे शहर विकसित कर पाएं। आखिर चंडीगढ़ आज भी अपना गौरव बनाए हुए है। वहां के हर सेक्टर की हर गली और हर मकान के आसपास इतनी हरियाली है कि वहां ब्रोंकाइटिस अथवा अस्थमा के रोगी शायद ही मिलें। जबकि शिवालिक पहाडिय़ों के नीचे चंडीगढ़ जिस समतल स्थान पर बसाया गया वहां कोई नदी नहीं है और यह पूरा शहर एक झील सुखना से ही पेय जल ग्रहण करता है। यहां मौसम कड़क और रूखा है मगर यह सरकारी नियोजन का कमाल है कि यह शहर पूरे देश में अकेला हरित शहर है। इसे इसी तरह विकसित किया गया है।

यहां प्रदूषण से अधिक हरियाली और सुखद वातावरण है। इसका साफ मतलब है कि सरकार यदि चाहे तो प्राकृतिक तौर पर कठोर धरती को नरम और हर तरह के मौसम के अनुकूल बना सकती है बशर्ते नियोजन और वातावरण के अनुकूल उसका ब्लूप्रिंट बनाया जाए। अब ऐसा नहीं है कि वहां पर निर्माण कार्य नहीं चलते बिल्कुल चलते रहते हैं मगर उनको क्रियान्वित करने के पूर्व यह भी सोचा जाता है कि निर्माण कार्य के दौरान वहां की रहवासी जनता को कम से कम तकलीफ हो। यही कारण है कि यहां पर विकास भी होता है और वहां के वातावरण से कोई छेड़छाड़ नहीं की जाती।

पूरे देश में ऐसे कई शहर हैं जहां की प्रकृति रूखी है पर सरकारों ने उन शहरों को रहने के अनुकूल बनाया। तब पूरे देश में हर प्रांत की सरकार यह क्यों नहीं सोचती कि विकास के जरिये हम विनाश को दूर भगाएं पर यहां तो उल्टा होता है कि विकास के नाम पर हम विनाश को न्योतते हैं। नियोजन का देश के विकास में बड़ा महत्त्व है और अकेले देश का विकास ही नहीं जीवन में भी जो नियोजन को अपना लेते हैं वे कभी फेल नहीं होते। नियोजन से ही लक्ष्य को आराम से पाया जा सकता है और बगैर किसी तरह का तहस-नहस किये। अगर शहरों का निर्माण कार्य उनके रूटीन को बाधित किए बिना चले तो भला किसे आपत्ति होगी मगर ऐसा विकास कार्य जिससे वहां रहने वालों को पग-पग पर बाधाएं झेलनी पड़ें तो उसका लाभ क्या!

लंबे-लंबे फ्लाईओवर, चौड़े-चौड़े हाई वे और शहरों को चमाचम किया जाए पर एक बात का ध्यान जरूर रखना चाहिए कि हम विकास के चलते विनाश को न बुलाएं। अगर धूल-धक्कड़ और प्रदूषण को नहीं रोका तो ऐसे चमाचम शहर बनाने का किसको लाभ होगा? आज दिल्ली और एनसीआर देश में सर्वाधिक प्रदूषित इलाके हो गए हैं। इसके अलावा कानपुर, लखनऊ, वाराणसी, पटना, मुबई, चेन्नई वगैरह शहर भी प्रदूषण की चपेट में हैं।

हालांकि समुद्र किनारे बसे शहरों का प्रदूषण और धुआं स्वयं समुद्र लीलता रहता है इसलिए वहां पर आर्द्रता भले बहुत ज्यादा हो और गर्मी में वहां रहना मुश्किल हो जाए मगर सर्दी वहां की सुखद होती है। वहां प्रदूषण वातावरण में नहीं घुलने पाता। मगर जो शहर समुद्र या पहाड़ से दूर हैं वहां पर वातावरण की वायु प्रदूषित नहीं हो उसके लिए कई उपाय बरतने पड़ते हैं। यह दायित्त्व सरकारों का है कि वहां पर वे विकास को बढ़ाते हुए किस तरह वहां के जनजीवन को डिस्टर्ब नहीं करेंगी।

(शंभूनाथ शुक्ल वरिष्ठ पत्रकार हैं और कई अखबारों में संपादक पद पर काम चुके हैं।)

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