Thursday, October 28, 2021

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बेहतर स्कूली शिक्षा हासिल करने की आम जनता की उम्मीदों से कोसों दूर है बजट: अंबरीश राय

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आरटीई फोरम के राष्ट्रीय संयोजक, अंबरीष राय ने वित्त मंत्री, निर्मला सीतारमण के केंद्रीय बजट 2020-21 पेश किए जाने के बाद निराशा प्रकट की है। उन्होंने कहा कि सरकार शिक्षा पर सकल घरेलू उत्पाद के कम से कम छह फीसदी बजट आवंटन की लंबे समय से लंबित मांग को पूरा करने में एक बार फिर विफल रही है।

संपूर्ण शिक्षा क्षेत्र के लिए केवल 99,300 करोड़ रुपये और स्कूली शिक्षा के लिए महज 59845 करोड़ रुपये (पिछले वर्ष के 56537 करोड़ में से केवल 3308 करोड़ रुपये की न्यूनतम वृद्धि) के बल पर शिक्षा के सर्वव्यापीकरण के लक्ष्य को हासिल करना कतई असंभव है।

उन्होंने कहा कि यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि कुल बजट में शिक्षा व्यय का हिस्सा 2018-19 (ए) में 3.5% से घटकर 2020-21 (बीई) में 3.3% रह गया है, जबकि राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान के बजट में भी भारी कटौती की गई है।

(2019-20 (BE) में आवंटित 2100 करोड़ रुपये की तुलना में 2020-21 (बीई) में महज 300 करोड़ आवंटित)। यहां तक कि अपने ढाई घंटे के लंबे भाषण के दौरान, वित्त मंत्री ने स्कूली शिक्षा का अलग से उल्लेख तक नहीं किया। इस तथ्य के बावजूद कि लाखों बच्चे अभी भी स्कूल से बाहर हैं।

श्री राय ने कहा कि मौजूदा बजट न केवल शिक्षा के मौलिक अधिकार कानून 2009 के जमीनी क्रियान्वयन और विस्तार के प्रति सरकार की गैरजवाबदेही एवं ढुलमुल रवैये का परिचायक है बल्कि यह स्कूली शिक्षा में सुधार के लिए सरकार द्वारा लगातार किए जा रहे सतही दावों और गरीब आम जनता की शिक्षा के क्षेत्र में भागीदारी के प्रति उदासीन नजरिए की पोल खोल देता है।

उन्होंने कहा कि अगर सरकार पूर्व प्राथमिक से उच्चतर माध्यमिक शिक्षा (3-18 वर्ष) तक शिक्षा अधिकार कानून 2009 के विस्तार करने का इरादा रखती है, जैसा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति के मसौदे में सिफारिश की गई है तो उसे पर्याप्त बजट मुहैया कराना ही होगा।

उन्होंने कहा कि अभी भी बच्चों की एक बड़ी संख्या (जनगणना 2011 के मुताबिक 8.6 करोड़), स्कूल के बाहर है। देश भर में 10.1 लाख शिक्षकों की कमी है। तकरीबन दो लाख सरकारी स्कूल बंद हो चुके हैं और विलय के नाम पर तमाम राज्यों में सरकारी स्कूलों के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। शिक्षा अधिकार कानून, 2009 के लागू होने के तकरीबन एक दशक होने को आए हैं, लेकिन 15 लाख सरकारी स्कूलों में से केवल 12.7 फीसदी में ही अभी आरटीई के प्रावधान लागू हो सके हैं।

ऐसे में शिक्षा को लेकर सरकार की प्राथमिकता और कोई ठोस रोडमैप बनाने के प्रति उदासीनता सहज ही समझी जा सकती है। बजट अभिभाषण में शिक्षा के डिजिटलाइजेशन और ऑनलाइन पाठ्यक्रम की बात कही जा रही है, लेकिन हकीकत ये है कि बजट के मोर्चे पर शिक्षा के प्रति लगातार उपेक्षा दलित-वंचित, अल्पसंख्यक समेत गरीब, हाशिए के समुदायों और लड़कियों की शिक्षा पर सर्वाधिक प्रतिकूल प्रभाव डालेगी।

“बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” का नारा देने वाली और 2014 में सत्ता में आने से पहले अपने घोषणा-पत्र में शिक्षा पर छह फीसदी खर्च का वायदा करने वाली सरकार जब इस तरह के बजट की घोषणा करती है तो 2030 तक उच्चतर माध्यमिक शिक्षा (एसडीजी लक्ष्य 4) को सार्वभौमिक बनाने के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता का अंदाज लगाया जा सकता है।

अंबरीश राय ने कहा कि सरकार शायद बजट बनाते वक्त भूल गई कि शिक्षा में निवेश न केवल आम जनता की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को बदलने में अहम भूमिका निभाता है, बल्कि आर्थिक विकास में इजाफा के साथ किसी भी देश के समावेशी विकास की मूल कुंजी है।

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