Wednesday, June 29, 2022

यूपी के ‘बुलडोज़र जस्टिस’ को ख़त्म करने के लिए पूर्व नौकरशाहों ने चीफ जस्टिस से हस्तक्षेप की मांग की

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कॉन्स्टीट्यूशनल कंडक्ट ग्रुप (सीसीजी) से जुड़े 90 सेवानिवृत नौकरशाहों ने मंगलवार को भारत के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना को पत्र लिखकर कहा है कि वे ‘बुलडोजर द्वारा किए जा रहे न्याय’ के मामले में हस्तक्षेप करें और इस कवायद को समाप्त करें। उन्होंने कहा कि यह चलन अब अपवाद के बजाय कई राज्यों में आम होता जा रहा है। उन्होंने कहा है कि हमने प्रयागराज (इलाहाबाद), कानपुर, सहारनपुर और अन्य शहरों, जहां बड़ी मुस्लिम आबादी है, में देखा है कि एक पैटर्न का पालन किया जाता है और वह राजनीतिक रूप से निर्देशित होता है ।

इस बीच उत्तर प्रदेश राज्य ने उच्चतम न्यायालय के समक्ष हलफनामा दाखिल करके कहा है कि बुलडोजर की कार्रवाई का पैगंबर मुहम्मद पर दिए गए बयान के बाद भड़के दंगों से कोई ताल्लुक नहीं है ,कानून की उचित प्रक्रिया का पालन किया गया है। दूसरी ओर प्रयागराज में हिंसा के आरोपी जावेद मोहम्मद की पत्नी ने 12 जून को जिला प्रशासन और प्रयागराज विकास प्राधिकरण (पीडीए) द्वारा उनके घर को गिराने के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की है और कहा है कि स्पष्ट रूप से एक अल्पसंख्यक समुदाय यानी मुस्लिमों को यह अवैध कार्य करके निशाना बनाया गया है।

पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में पूर्व केंद्रीय गृह सचिव जीके पिल्लई, पूर्व विदेश सचिव सुजाता सिंह, भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के पूर्व अधिकारी जूलियो रिबेरो, अविनाश मोहनाने, मैक्सवेल परेरा व एके सामंत और पूर्व सामाजिक न्याय सचिव अनीता अग्निहोत्री शामिल हैं। पूर्व लोकसेवकों ने 14 जून 2022 को चीफ जस्टिस रमना को भेजी उस याचिका का भी समर्थन किया जिसमें उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के पूर्व जजों और प्रमुख वकीलों के किसी समूह ने उनसे यूपी की हाल की कार्रवाईयों का स्वत:संज्ञान लेने का अनुरोध किया था।

90 पूर्व लोक सेवकों ने कहा है कि यह दंड से मुक्ति का भाव और बहुसंख्यक सत्ता का अहंकार है जो संवैधानिक मूल्यों और सिद्धांतों की इस अवहेलना के अभियान को चलाता प्रतीत होता है। पूर्व लोक सेवकों ने सीजेआई के नाम एक खुला पत्र लिखते हुए कहा है कि पैगंबर मोहम्मद पर भाजपा प्रवक्ताओं की टिप्पणियों के खिलाफ प्रदर्शनों के बाद उत्तर प्रदेश में ‘अवैध हिरासत, बुलडोजर से लोगों के मकान गिराने और प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की हिंसा’ का उच्चतम न्यायालय को स्वत: संज्ञान लेना चाहिए ।

उन्होंने पत्र में कहा है कि (उत्तर प्रदेश में) तोड़फोड़ अभियान और राजनीतिक उद्देश्यों के लिए म्युनिसिपल व नागरिक कानूनों का दुरुपयोग प्रशासन और पुलिस प्रणाली को क्रूर बहुसंख्यक दमन के साधन में तब्दील करने की एक बड़ी नीति का सिर्फ एक अंश है। पूर्व सरकारी अधिकारियों ने दावा किया कि किसी भी विरोध को बुरी तरह कुचलने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम 1980 और उत्तर प्रदेश गैंगस्टर्स व असामाजिक गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम-1986 लगाने के ‘स्पष्ट निर्देश’ हैं ।

पत्र में कहा गया है कि इस नीति को सरकार के शीर्ष स्तर से मंजूरी प्राप्त है और जबकि शक्तियों के निरंकुश व मनमाने इस्तेमाल के लिए स्थानीय स्तर के अधिकारी और पुलिसकर्मी निस्संदेह जवाबदेह होते हैं, इसलिए वास्तविक दोष राजनीतिक कार्यपालिका के शीर्षतम स्तर में निहित है। यह संवैधानिक शासन के ढांचे का वह भ्रष्टाचार है जिसके लिए जरूरत है कि उच्चतम न्यायालय  आगे आकर इसके और अधिक फैलने से पहले इसके खिलाफ कार्रवाई करे।

पत्र में कहा गया है कि इससे भी अधिक चिंताजनक बुलडोजर न्याय (बुलडोजर जस्टिस) का विचार है, जिसके तहत जो नागरिक कानूनी तरीके से विरोध करने या सरकार की आलोचना करने या कानूनी तरीके से असंतोष व्यक्त करने का साहस करते हैं उन्हें कठोर सजा दी जाती है। यह कई भारतीय राज्यों में अब अपवाद के बजाय आम होता जा रहा है। पत्र में कहा गया है कि हम मानते हैं कि जब तक उच्चतम स्तरीय न्यायपालिका हस्तक्षेप करने के लिए आगे नहीं आती है, तब तक पिछले बहत्तर सालों में इतनी सावधानी से निर्मित संवैधानिक शासन की पूरी इमारत ढहने की संभावनाएं हैं।

पूर्व नौकरशाहों का कहना है कि समस्या अब केवल स्थानीय स्तर पर पुलिस और प्रशासन की ‘ज्यादतियों’ की नहीं है बल्कि तथ्य यह है कि कानून के शासन, उचित प्रक्रिया, ‘दोषी न साबित होने तक निर्दोष माने जाने’ के विचार को बदला जा रहा है। उन्होंने कहा है कि हमने प्रयागराज (इलाहाबाद), कानपुर, सहारनपुर और अन्य शहरों- जहां बड़ी मुस्लिम आबादी है- में देखा गया है कि एक पैटर्न का पालन किया जाता है और वह राजनीतिक रूप से निर्देशित होता है। यह दंड से मुक्ति का भाव और बहुसंख्यक सत्ता का अहंकार है जो संवैधानिक मूल्यों और सिद्धांतों की इस अवहेलना के अभियान को चलाता प्रतीत होता है ।

कथित अवैध निर्माणों को गिराने के खिलाफ एक जनहित याचिका जमीयत उलेमा-ए-हिंद द्वारा जस्टिस बोपन्ना और विक्रम नाथ की पीठ के समक्ष दायर की गई है । प्रारंभिक सुनवाई के बाद उच्चतम न्यायालय ने कहा कि सब कुछ न्यायसंगत होना चाहिए और अधिकारियों को कानून के तहत उचित प्रक्रिया का सख्ती से पालन करना चाहिए।

इस बीच, उत्तर प्रदेश राज्य ने उच्चतम न्यायालय के समक्ष हलफनामा दाखिल करके कहा है कि बुलडोजर की कार्रवाई का पैगंबर मुहम्मद पर दिए गए बयान के बाद भड़के दंगों से कोई ताल्लुक नहीं है ,कानून की उचित प्रक्रिया का पालन किया गया है। हाल ही में कानपुर और प्रयागराज में स्थानीय विकास प्राधिकरणों द्वारा बुलडोजर की कार्रवाई उत्तर प्रदेश शहरी नियोजन और विकास अधिनियम, 1973 के अनुसार किए गए। जमीयत उलमा-ए-हिंद द्वारा दायर आवेदनों के जवाब में राज्य सरकार ने हलफनामा दाखिल किया। जमीयत उलमा-ए-हिंद की याचिका में आरोप लगाया गया था कि बुलडोजर की कार्रवाई पैगंबर मुहम्मद पर टिप्पणी के संबंध में विरोध के लिए अल्पसंख्यक समुदाय को टारगेट करने वाली चयनात्मक कार्रवाई थी।

प्रयागराज विध्वंस के संबंध में हलफनामें में कहा गया है कि यह अधिनियम की धारा 27 के तहत पर्याप्त अवसर प्रदान करने के बाद ही अवैध निर्माण को प्रयागराज विकास प्राधिकरण द्वारा कानून की उचित प्रक्रिया का पालन करने के बाद तोड़ा गया था और इसका दंगों की घटना से कोई संबंध नहीं है।

हलफनामे में कहा गया है कि कारण बताओ नोटिस संपत्ति के मालिकों को अनुलग्नक के रूप में दिया गया है। राज्य ने प्रस्तुत किया है कि कानपुर और प्रयागराज विकास प्राधिकरणों द्वारा विध्वंस किए गए हैं, जो कि वैधानिक स्वायत्त निकाय हैं, जो राज्य प्रशासन से स्वतंत्र हैं, और यूपी शहरी योजना और विकास अधिनियम, 1972 के तहत कानून के अनुसार अनधिकृत / अवैध निर्माण और अतिक्रमण के खिलाफ उनके नियमित प्रयास के तहत बुलडोजर की कार्रवाई की गई है।

हलफनामे में कहा गया है कि उक्त विकास प्राधिकरण उक्त अधिनियम के तहत स्थापित स्वायत्त वैधानिक निकाय हैं जो उक्त अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार प्रत्येक मामले के तथ्यों पर स्वतंत्र रूप से प्रवर्तन कार्यवाही करते हैं। राज्य ने तर्क दिया है कि याचिकाकर्ता ने स्थानीय विकास अधिकारियों द्वारा कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार कुछ घटनाओं की एक तरफा मीडिया रिपोर्टिंग और उसके खिलाफ व्यापक आरोपों को एक्सट्रपलेशन करके कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार एक दुर्भावनापूर्ण रंग देने का प्रयास किया है।

सरकार ने कहा है कि उसने याचिकाकर्ता द्वारा राज्य के सर्वोच्च संवैधानिक पदाधिकारियों का नाम लेने और स्थानीय विकास प्राधिकरण के वैध कार्यों को किसी विशेष धार्मिक समुदाय को लक्षित करने वाले आरोपी व्यक्तियों के खिलाफ अतिरिक्त कानूनी दंडात्मक उपाय का नाम देने, उत्तर प्रदेश शहरी नियोजन और विकास अधिनियम, 1973 का सख्ती से पालन करने के लिए गलत तरीके से रंग देने के प्रयास का कड़ा विरोध किया है।

इस तरह के सभी आरोपों को पूरी तरह से झूठा बताते हुए राज्य ने अदालत से आग्रह किया है कि याचिकाकर्ता को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष बिना आधार के उक्त झूठे आरोपों के लिए शर्तों पर रोक दिया जाए। राज्य के अनुसार, वर्तमान अंतरिम आवेदन एक सर्वव्यापी राहत चाहते हैं जहां रिट याचिका में ही अंतिम राहत का दावा किया गया है और इसलिए वर्तमान आवेदनों में सुप्रीम कोर्ट के असाधारण अधिकार क्षेत्र को लागू करने का कोई अवसर नहीं है।

दरअसल उच्चतम न्यायालय ने 16 जून को मौखिक रूप से उत्तर प्रदेश सरकार से कहा था कि वह कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही बुलडोजर की कार्रवाई को अंजाम न दे। अदालत ने राज्य को यह दिखाने के लिए तीन दिन का समय भी दिया कि हाल ही में किए गए बुलडोजर की कार्रवाई प्रक्रियात्मक और नगरपालिका कानूनों के अनुपालन में कैसे किया गया था।

दूसरी ओर प्रयागराज में हिंसा के आरोपी जावेद मोहम्मद की पत्नी ने 12 जून को जिला प्रशासन और प्रयागराज विकास प्राधिकरण (पीडीए) द्वारा उनके घर को गिराने के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की है और मांग की है कि याचिकाकर्ता और उसके परिवार के लिए उसके घर के पुनर्निर्माण तक एक सरकारी आवास की व्यवस्था करें, याचिकाकर्ता नंबर एक के अवैध रूप से ध्वस्त किए गए घर का पुनर्निर्माण करने के लिए, याचिकाकर्ताओं को विध्वंस और प्रतिष्ठा की हानि के माध्यम से संपत्ति के नुकसान के लिए मुआवजा दिया जाय और याचिकाकर्ता क्रमांक एक के मकान को अवैध रूप से गिराने के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों/अधिकारियों के विरुद्ध विभागीय एवं अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए ।

अपनी याचिका में आरोपी जावेद मोहम्मद की पत्नी फातिमा ने कहा है कि ध्वस्त घर उसके नाम पर था और उसे उसके पिता ने उपहार में दिया था और उसके पास ध्वस्त घर के संबंध में सभी वैध दस्तावेज थे, हालांकि बिना कोई नोटिस दिए मकान को गिरा दिया गया।

प्रयागराज स्थानीय अधिकारियों ने 12 जून को वेलफेयर पार्टी ऑफ इंडिया के नेता और कार्यकर्ता आफरीन फातिमा के पिता जावेद मोहम्मद के घर को ध्वस्त कर दिया था। जावेद मोहम्मद को उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा एक प्रमुख साजिशकर्ता के रूप में नामित किया गया था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि उन्होंने पैगंबर मोहम्मद पर भाजपा नेता के विवादास्पद बयानों के खिलाफ (प्रयागराज में) विरोध का आह्वान किया था। उन्हें 10 जून को गिरफ्तार किया गया था और उसके बाद उनकी पत्नी और बेटी को भी हिरासत में लिया गया था, हालांकि बाद में उन्हें छोड़ दिया गया था। इसके अलावा, 11 जून को नगर निगम के अधिकारियों द्वारा एक नोटिस दिया गया था जिसमें कहा गया था कि विचाराधीन घर को गिरा दिया जाएगा और उन्हें घर खाली कर देना चाहिए। नतीजतन, 12 जून को, घर को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया गया था।

फातिमा ने अपनी याचिका में कहा है कि प्रयागराज विकास प्राधिकरण का यह आरोप कि घर का नक्शा स्वीकृत नहीं किया गया था और इसलिए निर्माण अवैध था, सच नहीं है। वास्तव में, उसने तर्क दिया है कि उनके पास इस आरोप का जवाब देने का कोई अवसर नहीं था क्योंकि उन्हें कोई नोटिस नहीं मिला था। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि वह नियमित रूप से घर के सभी हाउस टैक्स, वाटर टैक्स और बिजली के बिलों का भुगतान कर रही हैं और किसी भी समय विभागों द्वारा कोई आपत्ति नहीं की गई है।

जिस तरह से उसके घर को तोड़ा गया, उस पर सवाल उठाते हुए उसने अपनी याचिका में कहा है: “याचिकाकर्ता नंबर एक के पति – जावेद मोहम्मद का एफआईआर में उल्लेख किया गया है, अधिकारी उसके नाम पर विध्वंस के लिए नोटिस जारी करते हैं, जबकि वह घर का मालिक नहीं हैं। अधिकारियों के इस कृत्य से पता चलता है कि उन्होंने स्वामित्व के बारे में भी पूछताछ नहीं की थी एफआईआर में जावेद मोहम्मद के नाम के कथित उल्लेख के कारण ही घर को ढहा दिया। यह तथ्य यह भी दर्शाता है कि वास्तविक कारण किसी कानून का उल्लंघन नहीं बल्कि तथाकथित पथराव था। याचिकाकर्ता ने यह भी कहा है कि स्पष्ट रूप से एक अल्पसंख्यक समुदाय यानी मुस्लिमों को यह गैरकानूनी कार्य करके निशाना बनाया गया है।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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