Tuesday, December 7, 2021

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भारत के 37 करोड़ उपभोक्ताओं पर फेसबुक थोप रहा है दक्षिणपंथी विचार

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हम फेसबुक और भाजपा सरकार से जानना चाहते हैं कि जब यह स्पष्ट तौर पर आपकी जानकारी में है कि फेसबुक RSS के बजरंग दल को ख़तरनाक संगठन मानता है फिर भी उस पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई? उपरोक्त सवाल कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने उठाये हैं।

उन्होंने प्रेस कांफ्रेंस में कहा है कि “फ्रांस की 37 साल की एक इंजीनियर ने खुलासा किया है कि कैसे हिंदी और बांगला भाषा के जानकार हिन्दुस्तान की फेसबुक टीम में नहीं हैं, जो फ़िल्टर कर सकें कि कौन सा सन्देश फेक है या नफ़रत पैदा कर रहा है”।

कांग्रेस प्रवक्ता ने आगे कहा कि बात सिर्फ़ हेट स्पीच की नहीं है, बात यह है कि हिन्दुस्तान फेसबुक का बड़ा मार्केट है; हिन्दुस्तान में फेसबुक के 37 करोड़ उपभोक्ता हैं; उन 37 करोड़ उपभोक्ताओं के साथ धोखा हो रहा है, एक विचारधारा को उन पर थोपा जा रहा है।

इससे पहले कल फेसबुक का नया नामकरण ‘फेकबुक’ करते हुये कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने कहा कि – “फेसबुक पर भारत में चुनावों को प्रभावित करने और लोकतंत्र को कमजोर करने का आरोप लगाते हुए कहा कि इसकी संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के जरिये जांच होनी चाहिए”।

पार्टी प्रवक्ता पवन खेड़ा ने न्यूयार्क टाइम्स की एक खबर का हवाला देते हुए कहा कि फेसबुक ने खुद को ‘फेकबुक’में तब्दील कर दिया है। खेड़ा ने संवाददाताओं से बातचीत में यह आरोप लगाया कि भारत में फेसबुक भाजपा की साझेदार के तौर पर काम कर रहा है और उसके एजेंडे को आगे बढ़ा रहा है।

उन्होंने फेसबुक की आंतरिक रिपोर्ट वाली खबर का उल्लेख करते हुए कहा, ‘‘हम भारत में चुनावों को प्रभावित करने में फेसबुक की भूमिका की जेपीसी जांच की मांग करते हैं।’’कांग्रेस प्रवक्ता ने यह दावा भी किया कि फेसबुक भारत में फर्जी पोस्ट के माध्यम से लोगों की राय बदलकर लोकतंत्र को कमजोर करने का प्रयास कर रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा और उससे जुड़े संगठनों की फेसबुक के कामकाज में घुसपैठ हो चुकी है।

खेड़ा ने सवाल किया, ‘‘क्या यह उचित है कि फेसबुक एक विचारधारा को फर्जी पोस्ट, तस्वीरों और विमर्श के जरिये आगे बढ़ाए?’’

उनके मुताबिक, भारत में सिर्फ नौ फीसदी फेसबुक उपयोगकर्ता अंग्रेजी भाषा के हैं और उनके पास भी क्षेत्रीय भाषाओं के पोस्ट की जांच-परख करने की कोई व्यवस्था नहीं है। खेड़ा ने दावा किया कि पिछले साल दिल्ली में हुए दंगों और फिर इस वर्ष पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान भी फेसबुक की भूमिका संदिग्ध रही है।

उन्होंने सवाल किया, ‘‘सब कुछ जानते हुए भी फेसबुक ने अपनी आंतरिक रिपोर्ट के आधार पर आरएसएस और बजरंग दल को ‘खतरनाक संगठन’क्यों नहीं माना? भारत सरकार ट्विटर को लेकर अतिसक्रिय रही है, लेकिन अब वह इसको लेकर कुछ बोल क्यों नहीं रही है?’’कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा कि यह सारे तथ्य सामने आने के बावजूद सरकार की ओर से अब तक कोई कदम नहीं उठाया गया है।

न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट

संयुक्त राज्य अमेरिका का प्रतिष्ठित अख़बार ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ में शनिवार को प्रकाशित खबर के मुताबिक, फेसबुक के शोधकर्ताओं ने फरवरी 2019 में नए उपयोगकर्ता अकाउंट बनाए, ताकि देखा जा सके कि केरल के निवासी के लिए सोशल मीडिया वेबसाइट कैसा दिखता है।

न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट में बताया गया है कि फेसबुक के आंतरिक दस्तावेज बताते हैं कि कंपनी अपने सबसे बड़े बाज़ार भारत में भ्रामक सूचना, नफ़रत वाले भाषण और हिंसा पर जश्न से जुड़ी सामग्री की समस्या से संघर्ष कर रही है। इसमें यह उल्लेख भी किया गया है कि सोशल मीडिया के शोधकर्ताओं ने रेखांकित किया है कि ऐसे समूह और पेज हैं जो ‘‘ भ्रामक, भड़काऊ और मुस्लिम विरोधी सामग्री से भरे हुए हैं।’’

फेसबुक की सफाई

वहीं फेसबुक के एक प्रवक्ता ने सफाई में कहा है कि कंपनी अपनी प्रवर्तन व्यवस्था को सुधार रही है। फेसबुक प्रवक्ता ने कहा कि – “आज, यह 0.05 प्रतिशत नीचे आ गया है। मुस्लिम समेत कमजोर तबकों के ख़िलाफ़ नरफत भरी बातें वैश्विक स्तर पर बढ़ी हुई हैं। हम अपनी प्रवर्तन व्यवस्था को सुधार रहे हैं और अपनी नीतियों को उन्नत बनाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।’’

प्रवक्ता ने आगे कहा, ‘‘हमने प्रौद्योगिकी में अच्छा खासा निवेश किया है ताकि हिंदी और बांग्ला समेत विभिन्न भाषाओं में नफ़रत भरी बातों का पता किया जा सके। इसके परिणामस्वरूप हमने इस साल नफ़रत भरे भाषणों (हेट स्पीच) को कम कर दिया है।’’

पूर्व फेसबुक कर्मी ने लीक किया फेसबुक पेपर्स

3 अक्टूबर को प्रसारित “60 मिनट्स” के एक साक्षात्कार के दौरान, मई में कंपनी छोड़ने वाले एक फेसबुक उत्पाद प्रबंधक फ्रांसेस हौगेन ने खुलासा किया कि वह उन आंतरिक दस्तावेजों के लीक के लिए जिम्मेदार थी। फेसबुक के एक पूर्व कर्मचारी द्वारा आंतरिक दस्तावेजों के लीक ने गुप्त सोशल मीडिया कंपनी के संचालन पर एक अंतरंग रूप प्रदान किया है और अपने उपयोगकर्ताओं के जीवन में कंपनी की व्यापक पहुंच के बेहतर नियमों के लिए नए सिरे से अपील किया है।
वहीं हाउगन ने प्रतिभूति और विनिमय आयोग में भी शिकायत दर्ज़ की और कांग्रेस को संशोधित रूप में दस्तावेज उपलब्ध कराए। कांग्रेस के एक कर्मचारी सदस्य ने द न्यू यॉर्क टाइम्स सहित कई समाचार संगठनों को दस्तावेज़ों की आपूर्ति की, जिन्हें फेसबुक पेपर्स के रूप में जाना जाता है।
सितंबर में, द वॉल स्ट्रीट जर्नल ने लीक हुए फेसबुक दस्तावेजों पर आधारित रिपोर्टों की एक श्रृंखला ‘द फेसबुक फाइल्स’ प्रकाशित की। श्रृंखला ने सबूतों को उजागर किया कि फेसबुक जानता था कि इंस्टाग्राम, उसके उत्पादों में से एक, किशोरों के बीच शरीर-छवि के मुद्दों को खराब कर रहा था।

फ़ेसबुक पेपर्स के दस्तावेज़ दिखाते हैं कि फ़ेसबुक को चुनाव से पहले अमेरिकी मतदाताओं का ध्रुवीकरण करने की कोशिश कर रहे चरमपंथी समूहों के बारे में पता था। वे यह भी बताते हैं कि आंतरिक शोधकर्ताओं ने बार-बार यह निर्धारित किया था कि कैसे फेसबुक की प्रमुख विशेषताओं ने मंच पर विषाक्त सामग्री को बढ़ाया।

फ्रांसेस हौगेन ने नीति निर्माताओं से कहा कि विनियमन फेसबुक की कॉर्पोरेट संस्कृति को ऑफसेट कर सकता है जो उन विचारों को पुरस्कृत करता है जो लोगों को अपने सोशल मीडिया फ़ीड्स को स्क्रॉल करने में अधिक समय व्यतीत करते हैं, लेकिन सुरक्षा मुद्दों को कम महत्वपूर्ण “लागत केंद्र” के रूप में देखते हैं।

5 अक्टूबर को, फ्रांसेस हाउगेन ने सीनेट की एक उपसमिति के सामने गवाही देते हुए कहा कि फेसबुक उपयोगकर्ताओं को वापस आने के लिए अपनी साइट पर घृणित और हानिकारक सामग्री का उपयोग करने के लिए तैयार था।

वहीं स्कॉटलैंड के एक सांसद जॉन निकोलसन ने सोमवार को सुनवाई के दौरान कहा-“फ्रांसेस हौगेन ने बताया कि फेसबुक बच्चों को होने वाले नुकसान को रोकने में विफल रहा है, यह दुष्प्रचार के प्रसार को रोकने में विफल रहा है, यह अभद्र भाषा के प्रसार को रोकने में विफल रहा है।”

कनेक्टिकट के एक डेमोक्रेट सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने कहा कि फेसबुक पेपर्स पर आधारित समाचार कवरेज “सुधार के लिए आह्वान , किशोरों की सुरक्षा के लिए नियमों, और फेसबुक और उसके बिग टेक साथियों से वास्तविक पारदर्शिता और जवाबदेही के लिए आह्वान के नशे में तेजी से जोड़ता है।

व्हिसिल ब्लोवर फ्रांसेस हौगेन का ब्रिटिश संसद में बयान

फेसबुक की एक पूर्व उत्पाद प्रबंधक, फ्रांसेस हौगेन ने सोमवार को ब्रिटिश सांसदों के सामने बताया कि उन्होंने समाज पर फेसबुक के हानिकारक प्रभावों के बारे में स्पष्ट रूप से जागरूक करते हुये कंपनी को सचेत किया लेकिन फेसबुक कोई कार्रवाई करने को तैयार नहीं था क्योंकि ऐसा करने से उसके लाभ और तरक्की को ख़तरा हो सकता था।

फेसबुक के ख़िलाफ़ बिग़ुल बजाने वाली फ्रांसेस हौगेन ने कहा है कि फेसबुक का प्रभाव अफ्रीका, एशिया और मध्य पूर्व के क्षेत्रों में विशेष रूप से मजबूत है जहां इसकी सेवाएं व्यापक रूप से लोकप्रिय हैं। लेकिन कंपनी के पास वहां की भाषा या सांस्कृतिक विशेषज्ञता नहीं है, सरकारी हस्तक्षेप के बिना, उसने सांसदों से कहा, इथियोपिया और म्यांमार जैसे देशों में होने वाली घटनाएं, जहां फेसबुक पर जातीय हिंसा में योगदान करने का आरोप लगाया गया है, “एक उपन्यास के शुरुआती अध्याय हैं जो पढ़ने के लिए भयानक होने जा रहे हैं।”

फ्रांसेस हौगेन ने ऐसी नीतियां सुझाईं जिनमें फेसबुक को उन क्षेत्रों की पहचान करने के लिए वार्षिक जोखिम आकलन करने की आवश्यकता होगी जहां उसके उत्पाद नुकसान पहुंचा रहे थे – जैसे कि कोरोनावायरस गलत सूचना का प्रसार, या किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाता है। उसने कहा कि फेसबुक को विशिष्ट समाधानों की रूपरेखा तैयार करने और बाहरी शोधकर्ताओं और लेखा परीक्षकों के साथ निष्कर्ष साझा करने की आवश्यकता हो सकती है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वे पर्याप्त हैं।

हौगेन ने कहा कि सरकार द्वारा अनिवार्य पारदर्शिता के बिना, फेसबुक अभद्र भाषा और अन्य चरम सामग्री को संबोधित करने के अपने प्रयासों की झूठी तस्वीर पेश कर सकता है। फेसबुक कंपनी का दावा है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सॉफ्टवेयर 90 प्रतिशत से अधिक अभद्र भाषा को पकड़ता है, हौगेन ने कहा कि यह संख्या 5 प्रतिशत से कम थी। हौगेन ने कहा कि फेसबुक डाटा के साथ खिलवाड़ करने में उस्ताद हैं।
(जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।)

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