बीच बहस

गोलवलीकरण से गोडसेकरण की ओर

पिछले सप्ताह भारत सरकार के संस्कृति मंत्री के गोलवलकर की महिमा का बखान करते हुए किये गए ट्वीट ने देश के राजनीतिक विमर्श को आधिकारिक रूप से एक नयी नीचाई तक पहुंचा दिया है। यह बखान इसलिए काबिले गौर है, क्योंकि यह मंत्री के पद पर बैठे किन्ही प्रह्लाद पटेल की निजी राय नहीं है – यह सम्‍पूर्ण प्रभुत्‍व-सम्‍पन्‍न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्‍मक गणराज्‍य भारत के मंत्रालय के सरकारी ट्विटर हैंडल से जारी उस शख्सियत की प्रशस्ति है, जो इन छहों की खिलाफत के प्रतीक व्यक्तित्व हैं।

गोलवलकर की जयन्ती पर उन्हें याद करते हुए संस्कृति मंत्रालय का ट्विटर हैंडल लिखता है कि “गोलवलकर एक महान विचारक, विद्वान और असाधारण नेता थे, जिनके विचार पीढ़ियों का मार्गदर्शन करेंगे।” क्या सचमुच? क्या हैं उनके महान विचार, विद्वत्ता और नेतृत्व के उदाहरण – जिन्हे पीढ़ियों तक मार्गदर्शन करना है। 

गोलवलकर – माधव सदाशिव गोलवलकर – को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपना परम पूज्य गुरु मानता है। डॉ. हेडगेवार के बाद वे संघ के दूसरे सरसंघचालक थे। वे आरएसएस के एकमात्र ऐसे सरसंघचालक हैं, जिन्होंने संघ की वैचारिक अवधारणाओं को सूत्रबध्द किया, उनके बारे में लिखा। ज्यादा विस्तार में जाए बिना उनकी कुछ प्रमुख बातों को ही देख लेने से उनका और संघ का दृष्टिकोण स्पष्ट हो जाता है।

जैसे वे लोकतंत्र के मुखर विरोधी थे, इसे उन्होंने मुंडगणना करार दिया और त्याज्य बताते हुए कहा कि : राज चलाने का शुध्द हिन्दुत्वी तरीका है, समाज के गणमान्य व्यक्तियों के हाथ में उसे सौंप देना। गणमान्य व्यक्तियों की उनकी परिभाषा मनुस्मृति पर आधारित थी। उन्होंने भारतवासी होने के आधार भी तय किये। जाति, वर्ण, लिंग आधारित ऊंच-नीच और श्रेणीक्रम को शास्त्रसम्मत ठहराया और उसे कड़ाई से लागू करना राष्ट्र का आधार बताया। आजादी के बाद बनाये जा रहे नए संविधान के निर्माण का पूरी ताकत से विरोध किया और मनुस्मृति के आधार पर देश चलाने की माँग उन्होंने बार-बार दोहराई और इसी के आधार पर सामाजिक राजनीतिक ढाँचे का पुनर्गठन करना आरएसएस का मुख्य लक्ष्य निर्धारित किया। स्त्रियों के बारे में भी उनकी राय का आधार यही किताब थी।

हिन्दुत्व शब्द का ईजाद भले ही सावरकर ने किया था – उसका विस्तार और आधार तय करने वाले गोलवलकर ही थे। उसकी कायमी के बारे में उनके आदर्श हिटलर थे, जिसके द्वारा किये गए यहूदियों के नरसंहार को आर्य नस्ल की शुद्धता और श्रेष्ठता की बहाली का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण मानते थे और उसे ही भारत नाम के आर्यावर्त में लागू करने के लिए कटिबद्ध थे। हिन्दुओं के बीच नस्ल शुद्धीकरण के अजीबोगरीब नुस्खे सुझाने के मामले में तो वे मनु से कहीं अधिक निर्मम और बेबाक थे।

उनके विचार, जिन्हे संस्कृति मंत्री ने “पीढ़ियों तक मार्गदर्शन” करने वाला बताया है, कितने वीभत्स और भयानक रहे होंगे कि खुद आरएसएस तक को, भले दिखावे के लिए ही सही, उनसे पल्ला झाड़ना पड़ा। उनकी 1939 की किताब “वी ऑर आवर नेशनहुड डिफाइंड” को स्वीकार करने का साहस आरएसएस ने कभी नहीं दिखाया। 2006 में इस किताब को सार्वजनिक रूप से अस्वीकार तक कर दिया। उनके इस तरह के आप्त-वचनों के संग्रह ‘विचार नवनीत’ (बंच ऑफ़ थॉट्स) को आधा दर्जन से ज्यादा बार पुनर्सम्पादित करना पड़ा। इसके बाद भी काम नहीं चला, तो हाल ही में संघ के वर्तमान सरसंघचालक मोहन भागवत को उनके कई कथनों से दूरी बनाने की सार्वजनिक घोषणा तक करनी पड़ी। संस्कृति मंत्री इनमें से किस विचार को अनुकरणीय और मार्गदर्शनीय मानते हैं?

संस्कृति मंत्री अपने ट्वीट में प.पू. गुरु गोलवलकर की, पीढ़ियों तक मार्गदर्शन करने वाली जिस “महान विद्वत्ता और नेतृत्व क्षमता” का जिक्र कर रहे हैं, उसका एक उदाहरण वे कहीं गांधी हत्याकांड को तो नहीं मानते? गोलवलकर गांधी हत्याकाण्ड के उन आरोपियों में शामिल थे, जिन्हें गिरफ्तार कर मुकदमा चलाया गया। सावरकर की तरह वे “सबूतों के अभाव” में सजा से इसलिए बच गए, क्योंकि कुछ साक्ष्य, जिन्होंने उनके खिलाफ गवाही दी थी, वे अदालत में सुनवाई के दौरान गायब रहे थे। बाद में आये इन गवाहों के बयानों, लेखों और इंटरव्यूज से यह साबित भी हो गया कि यदि वे अदालत पहुंचे होते, तो गोलवलकर पर अपराध साबित हो गया होता। 

आधिकारिक सरकारी ट्विटर हैंडल से इन गोलवलकर की मान प्रतिष्ठा और अभिषेक अनायास नहीं है। यह एक और नए चरण का आरम्भ है। ऐसा करके संघ-भाजपा अलोकतांत्रिकता और बर्बरता को सहज और सामान्य बना देने की उसी रणनीति पर चल रहे हैं, जिसमें वे पहले गंदले पानी में पत्थर फेंक कर तरंगों के उछाल कर नापते हैं, उसके बाद लोगों को उसकी आदत डालते हैं और बाद में पूरी की पूरी शिला धकेल देते हैं।

इसी अंदाज में है गोलवलकर जयन्ती पर भारत सरकार का यह ट्वीट। यह यहीं तक रुकने वाला नहीं है, देर-सबेर वह नाथूराम गोडसे की आधिकारिक प्रशस्ति तक भी जाएगा। अभी नीचे-नीचे गोडसे के महिमामंडन के कर्मकांडों से तरंगों को आदत में डाला जा रहा है – एक दिन सारी लाज-शरम खूँटी पर टाँग खुद सरकार उतर पड़ेगी। जैसा कि एक सांसद ने कहा है कि मौजूदा संस्कृति मंत्री स्वयं उनसे कह चुके हैं कि “गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे की पूजा करने में कुछ भी अनुचित या गलत नहीं है।”  

दो-जुबानों में बोलकर अलग-अलग हिस्सों को एक साथ संबोधित करने की फासिस्टी कला का उदाहरण इस ट्वीट के बाद आये संस्कृति मंत्री के मीडिया सलाहकार त्रिपाठी का ट्वीट है, जिसमें उन्होंने फ़रमाया है कि ‘भारत दुनिया में सांस्कृतिक रूप से विविध राष्ट्र है और बहुसंस्कृतिवाद का प्रतीक है। संस्कृति मंत्रालय समाज के हर वर्ग की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करता है और किसी भी विचारधारा या आवाज को चुप कराने में विश्वास नहीं करता।’’ और यह भी कि ‘विशिष्ट सामाजिक-सांस्कृतिक गुण, रीति-रिवाज, परंपरा और मूल्यों का हर कीमत पर सम्मान किया जाना चाहिए और यह सदियों से भारत जैसे लोकतंत्र के आवश्यक तत्वों में से एक है।’

तनिक देखिये तो यह हजार फूलों के खिलने, हजार विचारधाराओं के महकने की बात कौन कह रहा है? उस सरकार का नुमाईंदा कह रहा है, जिसने अनगिनत कवि, पत्रकार, बुद्धिजीवी, कलाकार, विद्यार्थी और सामाजिक कार्यकर्ताओं को सिर्फ इसलिए जेल में ठूँस रखा है/निशाना बनाया हुआ है, क्योंकि वे सरकार के फासिस्टी आचरण और उसके कुत्सित विभाजनकारी और दमनात्मक विचार से असहमत हैं। उन्हें चुन-चुनकर विश्वविद्यालयों और सांस्कृतिक साहित्यिक संस्थानों, फिल्मों और मीडिया से खदेड़ा जा रहा है, क्योंकि वे मनुष्य को श्रेष्ठ और उसकी आजादी को सभ्य समाज की बुनियाद मानते हैं। उन गोलवलकर से जुड़े ट्वीट की हिमायत में कह रहा है, जिनका समग्र दृष्टिकोण ही “एक राष्ट्र, एक नस्ल, एक धर्म, एक संस्कृति, एक भाषा” के पंचक पर टिका हुआ है।

गोलवलकर को महान बताने वाला ट्वीट अपवाद नहीं है। यह संस्कृति और समाज के गोलवलीकरण की प्रक्रिया का हिस्सा है। इसे रोकने का एक ही तरीका है : सांड़ को सींग से पकड़ना। लोगों के बीच यह लेकर जाना कि जिन्हें “पीढ़ियों तक मार्गदर्शन करने वाला विचार” बताया जा रहा है वे भारत और दुनिया की गुजरी हजारों पीढ़ियों के हासिल को मिटा देने वाले अभारतीय – अमानवीय विचार हैं। और यह जरूरी काम सिर्फ ट्वीट करके नहीं किया जा सकता – इसके लिए सायास तैयारी और व्यवहार में उतारने की जिद की दरकार होती है।

यह काम अलग-थलग किये जाने से नहीं हो सकता – इसे जीवन की सलामती और बेहतरी की हर जद्दोजहद से जोड़ने की जरूरत होती है। और यह भी कि ऐसा काम सिर्फ मुल्क की मेहनतकश और जागरूक जनता ही कर सकती है। 

(बादल सरोज पाक्षिक ‘लोकजतन’ के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं।)

This post was last modified on March 1, 2021 9:01 am

Share
%%footer%%