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Friday, September 24, 2021

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दमोह:अंधविश्वास के साये में करवाया गया बच्चियों का निर्वस्त्र प्रदर्शन सभ्य समाज पर कलंक

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पिछले दिनों दमोह से तकरीबन 65 किमी दूर जबेरा के ग्राम बनिया में कई सालों बाद एक भूली बिसरी रस्म को दोहराया गया जिसने यह साबित कर दिया कि जिले में अभी भी अंधविश्वास और प्राचीन रस्मों में भरोसा कायम है। ज्ञातव्य हो दमोह ज़िला इस साल अब तक हुई कम वर्षा की वजह से सूखे की चपेट में हैं खेतों में खड़ी धान और सोयाबीन की लहलहाती फसलें सूखने लगीं हैं। जिले का जबेरा क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित है।

कहते हैं जब आसमान बारिश के बादलों से ढका रहता है किन्तु पानी नहीं गिरता। इस अजीबोगरीब हालत में लोग कहते हैं कि किसी ने नमक गाढ़कर टोटका किया है ताकि पानी ना गिरे। यह इल्जाम व्यापारियों के नाम जाता है क्योंकि उसकी तमन्ना होती है पानी ना बरसेगा तो वह अपने यहां रखा अनाज ऊंचे दाम में बेच देगा। आदिवासी अंचलों में ओला पानी बांधने वाले भी मिलते हैं जो आकर मंत्र तंत्र से ज़मीन बांध देते हैं। वे कहते हैं बांधी हुई ज़मीन पर ओला नहीं गिरता। वे फसल कटने पर दक्षिणा अनाज के रुप में लेते हैं। ये प्रथाएं लोगों के विश्वास के कारण बराबर चल रही हैं।

मध्यप्रदेश के कई गांवों में ऐसा माना जाता है कि शिवलिंग को पूरी तरह से पानी में डूबोकर रखे जाने से अच्छी बारिश होती है। मालवा से छूते निमाड़ क्षेत्रों में अच्छी बारिश के लिए जीवित व्यक्ति की शवयात्रा निकाली जाती है। बारिश को बुलाने के लिए “बेड़” नाम का एक टोटका भी आजमाया जाता है। विदिशा के एक पठारी कस्बे की मान्यता के मुताबिक गाजे-बाजे के साथ ग्रामीण महिलाएं किसी खेत पर अचानक हमला बोल देती हैं। वो खेत पर काम कर रहे किसान को बंधक बना लेती हैं। किसान को गांव में ला कर दुल्हन की तरह सजाया जाता है और किसान की पैसे देकर विदाई की जाती है। मान्यता है कि ऐसा करने से इंद्र देव प्रसन्न होते है।

खंडवा जिले के बीड़ में गांव के लोग मंदिर के कैंपस में खाली  मटके जमीन में गाड़ देते हैं और अच्छे मानसून की कामना करते हैं। उज्जैन की बड़नगर तहसील में पंचदशनाम जूना अखाड़ा के श्री शांतिपुरी महाराज ने साल 2002 में बारिश के लिए जमीन के अंदर 75 घंटे की समाधि ली। जब समाधि पूरा होने के बाद उन्हें बाहर निकाला गया, तो वे मृत पाए गए। इंदौर में अच्छी बारिश के लिए विचित्र बारात निकाली जाती है। किसान और व्यापारी मिलकर ये बारात निकालते हैं। इस बारात में दूल्हे को घोड़े की बजाय गधे पर बैठाया जाता है। बारात में शामिल लोग मस्त होकर डांस भी करते चलते हैं। माना जाता है कि इस टोटके से बारिश की अच्छी संभावना होती है।

वहीं उत्तर प्रदेश, बिहार, उड़ीसा और उत्तरपूर्वी राज्यों में अच्छी बारिश के लिए पूरे हिंदू रीति-रिवाजों से मेढक-मेढकी की शादी करवाई जाती है। इतना ही नहीं उड़ीसा में तो मेढकों का नाच तक करवाया जाता है।

उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के कई गांवों में मान्यता है कि अगर महिलाएं रात के समय नग्न होकर खेतों में हल चलाएं तो बारिश होती है। इस टोटके में महिलाएं समूह बनाकर खेत को घेर लेती हैं जिससे कोई यह सब देख नहीं पाए। उत्तर प्रदेश के कई गांवों में औरतें रात में बग़ैर कपड़े पहने खेतों में हल चलाती रही हैं। माना जाता है कि ऐसा करने से देवता ख़ुश होकर धरती की प्यास बुझा देंगे।

पूर्वी उड़ीसा में किसानों ने मेढकों के नाच का आयोजन किया जिसे स्थानीय भाषा में ‘बेंगी नानी नाचा’ के नाम से जाना जाता है। गाजे-बाजे के बीच लोग एक मेढक को पकड़ कर आधे भरे मटके में रख देते है जिसे दो व्यक्ति उठा कर एक जुलूस के आगे-आगे चलते हैं। कुछ इलाक़ों में तो दो मेढकों की शादी कर उन्हें एक ही मटके से निकालकर स्थानीय तालाब में छोड़ दिया जाता है। वहीं कर्नाटक, पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों से वर्षा के लिए यज्ञ कराए जाने की ख़बर आती रहती हैं।

लेकिन आज जिस घटना के कारण दमोह की चर्चा का कोहराम मचा है वह भी एक प्राचीन आस्था से जुड़ी हुई है बहुत पहले तकरीबन दो दशक पूर्व एक मान्यता यहां भी थी कि यदि पानी नहीं बरसता है तो गांव की दो महिलाएं नग्न होकर रात्रि में हलबखर चलाएंगी तो पानी गिरेगा। बताते हैं चोरी-छिपे ये परम्परा दूरस्थ अंचलों में अब भी विद्यमान है। इसी से मिलती जुलती घटना जबेरा के बनिया ग्राम में हुई जब कुछ आदिवासी महिलाओं ने अपने घरों की चार बच्चियों को नंगा करके उनके कंधों पर मूसल रखा उस पर मेढकी को लटकाया और खेरमाई मंदिर तक भजन-कीर्तन करते उन्हें ले गए। जहां माई पर गोबर लेपन हुआ। मान्यता है ऐसा करने पर माता अपने गोबर को छुटाने के लिए भरपूर वर्षा करेंगी।

चूंकि यहां मामला चार बच्चियों की नग्नता से जुड़ा हुआ था तो जब यह बात बाल अधिकार संरक्षण आयोग के संज्ञान में आई। तो आयोग ने बच्चियों को इस हालत में घुमाए जाने पर आपत्ति दर्ज़ की और कलेक्टर को नोटिस जारी कर दिया। इधर कलेक्टर ने आनन-फानन में अपने अधीनस्थ अधिकारियों को गांव भेजा। वहां अधिकारियों की गाड़ियां और भीड़ देखकर गांव के लोग पहले तो घरों में दुबक गए। जब पंचायत सचिव जगदीश्वर राय ने आगे बढ़कर सम्बंधित महिलाओं से पूछताछ करवाई तो उन्होंने सहजता से बताया कि वे ये नहीं जानती थीं कि ये अपराध होता है। उन्होंने पानी बरसाने के लिए टोटका किया था। उन्होंने महिला बाल विकास अधिकारियो, टीआई पुलिस वगैरह से हाथ जोड़कर क्षमा मांगी और भविष्य में इस तरह किसी भी कुरीति को नहीं करने का आश्वासन भी दिया। उपस्थित अधिकारियों ने पंचनामा बनाकर कलेक्टर को भेज दिया है।

यह घटना वास्तव में एक अनजाने अपराध वाली सहज घटना थी। ‘मिंदो दाई पानी दे’ जो भजन महिलाएं गा रहीं थीं वह पूरे बुंदेलखंड में प्रचलित है। मेढक मेढ़की का ब्याह भी पानी बरसाने के लिए यहां आयोजित होता है। इस तरह की परिपाटी थोड़े थोड़े भिन्न स्वरुप में पूरे मध्यप्रदेश, बिहार, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा और बंगाल के ग्रामीण अंचलों में विद्यमान है। इसे दूर कैसे किया जा सकता है जब हमारे देश में कई चैनल इन अंधविश्वासों को फ़ैलाने में लगे हुए हों। जहां तक सवाल बच्चियों को नंगा घुमाने का है उस विषय पर महिला बाल विकास और बच्चों के अधिकारों को लेकर काम करने वालों को बच्चों बच्चियों के अधिकार और उनके हनन पर विशेष प्रशिक्षण अंदरूनी क्षेत्रों में देने की जरूरत है । यह जिम्मेदारी स्कूली शिक्षिकाओं, आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं सरपंच, पंचायत सचिव वगैरह को भी लेनी होगी।यदि बालिकाओं के अधिकारों की बात गांव तक पहुंची होती तो इस तरह की घटना रुक सकती थी।

(सुसंस्कृति परिहार स्वतंत्र लेखिका हैं। और मध्य प्रदेश में रहती हैं।)

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