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गुजराती वीआईपी, यूपी-बिहारी ढोर-डंगर!

क्या आप जानते हैं कि देश की एकता और अखंडता को लेकर जितना उत्तर प्रदेश और बिहार की जनता जागरूक रहती है, उतना देश के किसी अन्य प्रदेश की नहीं। देश को सबसे ज्यादा सांसद भी यूपी-बिहार से आते हैं। केंद्र में सरकार बनाने के लिए भी किसी भी पार्टी या गठबंधन को यूपी-बिहार जीतना जरूरी होता है।

अकारण नहीं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यूपी के वाराणसी को अपना संसदीय क्षेत्र चुना है। इसके बावजूद यूपी और बिहार के लोगों के साथ विभिन्न प्रदेशों में भेदभाव और उत्पीड़न की शिकायतें आए दिन सामने आती रहती हैं।

लॉकडाउन को ही यदि लिया जाए तो यूपी के श्रमिक लाखों की संख्या में पैदल अपने घर यानी गांव के लिए निकलने पर मजबूर हुए। रास्ते में भूखे-प्यासे जगह-जगह पुलिस के डंडे खाते मरते-खपते किसी तरह अपने गांव पहुंच रहे हैं। वहीं प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के गृह प्रदेश गुजरात के लगभग 1800 लोगों को वीआईपी की तरह हरिद्वार (उत्तराखंड) से लक्जरी बसों से गुजरात पहुंचाया गया।

यूपी-बिहार के लोगों को गांवों में घुसने नहीं दिया गया और वे 15 दिन गांवों के बाहर क्वारेनटाइन में बिताने के लिए मजबूर हैं। पर गुजरात के ये 1800 लोग कहां गुम हो गए, इसका किसी को अता-पता नहीं है।

क्या यूपी बिहार के लोग ढोर-डंगर थे, जिन्हें भूखे-प्यासे मरने-खपने के लिए सरकार ने छोड़ दिया था। यूपी बॉर्डर पर बसें भी मिलीं तो एक–एक हजार रुपये किराया उनसे वसूला गया।

गुजरात के मुख्यमंत्री के सचिव अश्वनी कुमार के अनुसार ‘गुजरात के अलग-अलग जिलों के करीब 1800 लोग हरिद्वार में फंसे हुए थे। केंद्रीय मंत्री मनसुखभाई मांडविया और मुख्यमंत्री विजय रूपाणी के विशेष प्रयासों से इन लोगों को वहां से निकालकर इनके घर पहुंचाने की व्यवस्था की गई।

इसी व्यवस्था के चलते उत्तराखंड परिवहन की कई गाड़ियां हरिद्वार से अहमदाबाद पहुंची थीं। ये काम इतनी गोपनीयता से किया गया कि उत्तराखंड के परिवहन मंत्री तक को ये खबर नहीं लगी कि उनके विभाग की कई गाड़ियां लॉक डाउन के दौरान कई राज्यों की सीमाओं को पार करते हुए 1200 किलोमीटर के सफर पर निकल चुकी हैं।

इसके साथ ही यह भी सवाल उठे कि तमाम जगहों से उत्तराखंड के जो प्रवासी पैदल ही लौटने पर मजबूर हैं उनके लिए कोई बस अब तक क्यों नहीं चलाई गई? साथ ही यह सवाल भी उठने लगे कि जब अहमदाबाद के लिए बसें निकल ही चुकी हैं तो फिर ये बसें खाली वापस क्यों लौटें, वहां फंसे उत्तराखंड के लोगों को ही वापस लेती आएं।

27 मार्च को जारी एक आदेश से पता चलता है कि उत्तराखंड परिवहन की ये गाड़ियां सीधे प्रदेश के मुख्यमंत्री कार्यालय के निर्देशों के तहत गुजरात भेजी गई थीं। इनका उद्देश्य हरिद्वार में फंसे गुजरात के लोगों को उनके घर पहुंचाना था। वापस लौटते हुए यही गाड़ियां वहां फंसे उत्तराखंड के लोगों को लेकर आ सकती थीं, लेकिन ऐसा कोई भी आदेश उत्तराखंड सरकार की ओर से जारी नहीं हुआ। जब ये बसें हरिद्वार से रवाना होने लगीं और यह खबर सार्वजनिक हुई तो यह मामला विवादों से घिरने लगा।

सवाल उठने लगे कि जब लॉकडाउन के चलते पूरे देश में ही लोग अलग-अलग जगहों पर फंसे हैं और उत्तराखंड में भी कई अलग-अलग राज्यों के लोग फंसे हैं तो सिर्फ गुजरात के लोगों के लिए ही विशेष बसें क्यों चलाई जा रही हैं?

गुजरात के ये तमाम लोग किसी धार्मिक अनुष्ठान में शामिल होने हरिद्वार पहुंचे थे। प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के अपने प्रदेश से आए इन लोगों को उनका करीबी भी बताया जा रहा है। गुजरात के मुख्यमंत्री के सचिव अश्वनी कुमार के आधिकारिक बयान से भी इतना तो स्पष्ट है कि जहां देश भर में लाखों लोग यहां-वहां फंसे हुए हैं, वहीं हरिद्वार में फंसे इन लोगों को सीधा गृह मंत्री के निजी हस्तक्षेप के बाद विशेष व्यवस्था करके निकाला गया है।

कोरोना वायरस को रोकने के लिए देश में 21 दिन का लॉकडाउन है। ये लॉक डाउन 24 मार्च की रात 12 बजे से शुरू हुआ और 14 अप्रैल तक चलेगा। इसका सबसे ज्यादा असर उन मजदूरों पर पड़ा है, जो बेहतर जिंदगी की तलाश में अपने गांवों से बड़े शहरों की ओर गए थे। पर, लॉकडाउन के कारण इन मजदूरों के लिए खुद और परिवार का खर्च निकाल पाना मुश्किल हो गया।

जब सब बंद हो गया, तो ये मजदूर भूख-प्यास की परवाह किए बगैर पैदल ही अपने-अपने गांवों की ओर निकल पड़े। इस सफर में कई लोगों को जान तक गंवानी पड़ गई। किसी को ट्रक-टैंपो ने टक्कर मार दी, तो किसी ने चलते-चलते दम तोड़ दिया। लॉकडाउन में अब तक 29 मजदूरों समेत 34 लोगों की जान जा चुकी है।

इस बीच महामारी के मद्देनजर लगाए गए लॉक डाउन के बीच प्रवासी मजदूरों की दुर्दशा को उजागर करते हुए संसद सदस्य महुआ मोइत्रा ने भारत के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखा, जिसके आधार पर उच्चतम न्यायालय ने स्वत: संज्ञान लेते हुए मुकदमा दर्ज किया है। जस्टिस एल नागेश्वर राव और जस्टिस दीपक गुप्ता की खंडपीठ इस मामले पर विचार करेगी। मोइत्रा ने कहा है कि वह मामले में व्यक्तिगत रूप से पेश होंगी।

पत्र में कृष्णानगर (पश्चिम बंगाल) से टीएमसी सांसद ने कहा कि उन्हें व्यक्तिगत रूप से केरल, गुजरात, महाराष्ट्र, तेलंगाना, दिल्ली, गुड़गांव आदि जगहों से अपने क्षेत्र के फंसे हुए प्रवासी कामगारों से मदद के लिए 300 से अधिक अनुरोध प्राप्त हुए हैं।

उन्होंने पत्र के साथ मज़दूरों के कुछ संदेश भी संलग्न किए हैं। उन्होंने पत्र में कहा है कि इन गरीब श्रमिकों में से कुछ निर्माण स्थलों पर काम कर रहे थे और कुछ ने कारखानों में काम किया। वे अपने घरों से हजारों किलोमीटर दूर हैं और अत्यधिक पीड़ा में हैं।

उन्होंने उच्चतम न्यायालय के जजों से कहा है कि इन गरीब कामगारों के जीवन के नुकसान और इनकी भयानक कठिनाइयों के बीच मैं, यौर लोर्डशिप आपके समक्ष यह मामला उठाते हुए उनकी समस्या दूर करने के लिए तत्काल भारत सरकार और निजी नियोक्ताओं को उचित निर्देश जारी करने का अनुरोध करती हूं।

उन्होंने कार्यकारी एजेंसियों और नियोक्ताओं को फंसे श्रमिकों के लिए व्यवस्था करने के लिए निर्देश देने की भी मांग की है, साथ ही इस अवधि के दौरान उन्हें भोजन, राशन और आश्रय देने के साथ इन श्रमिकों को मजदूरी जारी करने के लिए निर्देश की मांग की।

मोइत्रा ने पत्र में कहा है कि माय लॉर्ड, ये मज़दूर गरीबों में सबसे गरीब हैं और वे दैनिक मजदूरी पर निर्वाह करते हैं। जब तक कि कार्यकारी एजेंसियों द्वारा एक गंभीर और तत्काल हस्तक्षेप नहीं किया जाता है, हजारों भुखमरी से नष्ट हो जाएंगे और लाखों को फैलते हुए कोविड-19 वायरस से संक्रमित होने के जोखिम में डाल दिया जाएगा।

31 मार्च को मुख्य न्यायाधीश बोबडे की अगुवाई वाली पीठ ने प्रवासी श्रमिकों के कल्याण के लिए एक अन्य जनहित याचिका में दिशा-निर्देश जारी किए थे।

इस बीच बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ ने राज्य के अथॉरिटीज़ से कहा है कि वे कोविड-19 महामारी को देखते हुए राज्य में सभी श्रमिकों और प्रवासी मज़दूरों को बुनियादी सुविधाएं सुनिश्चित करने के लिए तत्काल क़दम उठाएं।

देश भर में कोविड-19 महामारी के कारण हुए लॉकडाउन के कारण श्रमिकों को उनका काम बंद हो जाने के कारण हुए अकल्पनीय मुश्किलों पर ग़ौर करते हुए न्यायमूर्ति सुनील बी शुक्रे की एकल पीठ ने कहा कि इस परिस्थिति में ज़रूरी बात है कि इन श्रमिकों को कपड़ा, दवा और स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराए जाने के अलावा इन्हें सुरक्षा का भरोसा दिलाए जाने की ज़रूरत है… इसलिए यह अदालत महाराष्ट्र राज्य को इन प्रवासी मज़दूरों सहित कामगारों, श्रमिकों के ठहरने, भोजन, इनकी स्वच्छता, कपड़े और स्वास्थ्य की देखभाल का प्रबंध करने का निर्देश देता है, जिनको इनकी ज़रूरत है।

देश व्यापी लॉकडाउन के कारण हर गतिविधि बंद हो गई है, सिर्फ़ आवश्यक सेवाएं ही चल रही हैं, जिसकी वजह से शहरी क्षेत्रों में रह रहे श्रमिकों को अपने घर वापस जाने कि लिए बाध्य होना पड़ रहा है।

अदालत ने कहा कि वे इस बात को जानते हैं कि आर्थिक तंगी इस काम के आड़े आएगी। इसे देखते हुए उन्होंने सुझाव दिया कि सार्वजनिक न्यास अधिनियम या वक़्फ़ अधिनियम के तहत पंजीकृत धर्मार्थ संस्थाओं को आम लोगों की मदद कर अपने दायित्व के निर्वाह के लिए कहा जा सकता है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार के सभी विभाग वित्त 2019-20 के दौरान हुए खर्चे से संबंधित अपने बिल ज़िला ट्रेज़री और उप ट्रेज़री को निर्धारित एक अप्रैल 2020 की सीमा के बाद भी जमा कर सकते हैं। ऐसा देशव्यापी लॉक डाउन को देखाए हुए किया गया है। इस मामले पर अगली सुनवाई अब 8 अप्रैल को होगी।

यह आदेश उड़ीसा हाईकोर्ट के अनुरूप है जिसने स्वतः संज्ञान लेते हुए श्रमिकों के शहर से भारी संख्या में पलायन को देखते हुए उनके लिए उपयुक्त इंतज़ाम के आदेश दिए थे। इन श्रमिकों की मेडिकल जांच के आदेश भी अदालत ने दिए थे। इसी तरह के आदेश केरल और राजस्थान हाईकोर्ट भी दे चुकी है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और इलाहाबाद में रहते हैं।)

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This post was last modified on April 4, 2020 9:27 am

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