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Categories: बीच बहस

चीन ने कैसे जीता कोरोना के ख़िलाफ़ युद्ध?

चीन ने अपने देश में कोरोना वायरस पर नियंत्रण पा लिया है। ये एक सुकून देने वाली खबर है। चीन में कोरोना वायरस का कोई नया मामला सामने नहीं आ रहा है. 34 नए मामले जरूर सामने आए हैं, लेकिन ये मामले विदेश से चीन आए लोगों के हैं. इस आधार पर चीन ने दावा किया है कि अब उनके देश में कोई नया मामला सामने नहीं आ रहा है। आप चाहें तो इस दावे को झूठा बता सकते हैं लेकिन जब कोरोना वायरस एक वैश्विक महामारी घोषित किया जा चुका है तो ऐसे में इतने बड़े स्तर पर ऐसा झूठा दावा शायद ही कोई देश करे।

अब सवाल ये खड़ा होता है कि चीन ने ये कैसै कर लिया? सबसे पहले तो जो मेडिकल और साइंटिफिक फैक्ट हैं, वो तो हम जानते हैं। सोशल डिस्टेंसिंग, टेस्टिंग की, जो पॉजिटिव थे उन्हें क्वारंटाइन किया। लेकिन ये सब इतने बड़े स्तर पर कैसे संभव हो पाया? ये असली सवाल है।

ये सब करने के लिए जरूरी था कि चीन ने अपने चार लाख 38 हजार मेडिकल स्टाफ को मोबिलाइज किया। उन्होंने दस दिनों के भीतर हजार-हजार बेड के दो बड़े अस्पताल बना दिए। होटलों, सिनेमाहॉल्स, सार्वजनिक इमारतों को क्वारंटाइन सुविधाओं में बदल दिया। यानी कि उन्होंने सार्वजनिक रिसोर्सेज का प्रयोग किया, मार्केट इकॉनमी की मदद नहीं ल। मार्केट इकॉनमी इस तरह की महामारी से लड़ भी नहीं सकती है. ये मैं आगे आपको समझाऊंगा। सिर्फ एक केंद्रीकृत समाजवादी व्यवस्था ही इस तरह की महामारी से निपट सकती है।

चीन की अर्थव्यवस्था में सार्वजनिक क्षेत्र बहुत मजबूत है, इसलिए वहां की सरकार के पास इस महामारी से निपटने के लिए बहुत सारे रिसोर्स थे। बहुत से लोग समझते हैं कि चीन के अंदर एक फ्री कैपिटलिस्ट मार्केट है। इसमें कोई शक नहीं कि चीन के अंदर एक कैपिटलिस्ट सिस्टम भी है। लेकिन दो बातें लोग नहीं जानते हैं। पहली, चीन के अंदर कैपिटलिस्ट कंपनियों में चीनी सरकार की साझेदारी है. किसी में तीस प्रतिशत तो किसी में चालीस प्रतिशत। सारी प्राइवेट कंपनियों में। चीन ने इस संबंध में कानून बनाया हुआ है।

दूसरी, 2008 के वैश्विक आर्थिक संकट के बाद चीन के अंदर निजीकरण और राष्ट्रीयकरण का ट्रेंड रिवर्स हो चुका है। यानि 1978 से 2008 के बीच चीन में प्राइवेट बाजार को बहुत तेजी से बढ़ाया गया लेकिन 2008 के बाद से चीन लगातार फ्री मार्केट को सिकोड़ता चला जा रहा है और राष्ट्रीयकरण को बढ़ाता जा रहा है. आप चाहें तो बड़े से बड़ा कैपिटलिस्ट अखबार और पत्रिका पढ़ सकते हैं. दि इकॉनमिस्ट, वॉल स्ट्रीट जर्नल, फाइनेंसियल टाइम्स, ये सब चीन के इस ट्रेंड की तस्दीक करते हैं। इसलिए आज चीन का सार्वजनिक क्षेत्र बहुत ज्यादा मजबूत है।

अब आप सोच रहे होंगे कि इस तरह की महामारी से कैपिटलिस्ट इकॉनमी क्यों नहीं निपट सकती! ऐसा करने के लिए एक केंद्रीकृत समाजवादी इकॉनमिक सिस्टम की क्यों जरूरत है? इसके पीछे चार मूल कारण हैं।

पहला, फ्री मार्केट इकॉनमी में उत्पादन केवल मुनाफे के लिए किया जाता है। मुनाफा केवल तब होता है, जब आप वस्तुओं को बेच पाएं. अगर एक गरीब आदमी को कोरोना वायरस संक्रमण हो जाए और उसके पास टेस्ट कराने और किट खरीदने के लिए पैसे ना हों तो आप उसे ये सेवाएं बेच भी नहीं पाएंगे और ना ही आपको कोई मुनाफा होगा। इसलिए उस गरीब आदमी के लिए ना तो किट तैयार की जाएगी और ना ही टेस्टिंग की सुविधा दी जाएगी। इसका मतलब है कि एक महामारी को नियंत्रण में लाने के लिए आपको पूरे समाज का ध्यान रखना पड़ेगा, ना कि केवल उस तबके का जो खुद अपने खर्च पर अपना ख्याल रखने में सक्षम है। तो कैपिटलिस्ट सिस्टम में प्रोडक्शन पूरे समाज के भले के लिए नहीं किया जाता।

महामारी से निपटने के लिए जरूरी है कि समाज के हर एक आदमी को सैनिटाइजर मिले, टेस्टिंग किट मिले, अस्पतालों में सुविधाएं मिलें इत्यादि. इसके लिए इन तमाम वस्तुओं और सेवाओं का बड़े स्तर पर उत्पादन करना पड़ता और उन्हें लोगों तक पहुंचाना होता है। ये सब चीजें मार्केट इकॉनमी नहीं कर सकती।

दूसरी बात, मार्केट इकॉनमी कॉम्पिटिशन के आधार पर चलती है। फ्री मार्केट में हर कंपनी, दूसरी कंपनी से होड़ करती है। इस होड़ के चलते एक कंपनी, दूसरी कंपनी से कोई जानकारी साझा नहीं करती। ऐसे में ओवर प्रोडक्शन और अंडर प्रोडक्शन की समस्या सामने आती है। इस आधार पर मार्केट इकॉनमी में ऐसी कोई योजना नहीं बन सकती कि अगर 10 लाख मास्क की जरूरत है तो उतने ही मास्क बनाए जाएं। हर कंपनी का मालिक बस अनुमान लगाता है कि कितने मास्क की डिमांड है।

मान लीजिए किसी कंपनी ने दस लाख मास्क बना दिए और फिर दूसरी कंपनी ने भी इतने ही मास्क बना दिए। ऐसे में दस लाख मास्क फालतू हो जाएंगे। पता चला कि किसी ने इस चक्कर में सैनिटाइजर बनाए ही नहीं। ऐसे में कंपनियों को प्रोडक्शन कम करना होगा, कर्मचारियों को नौकरियों से निकालना होगा। इसलिए महामारी से लड़ने के लिए आपके पास बिल्कुल सटीक जानकारी होनी चाहिए, जो फ्री मार्केट के कॉम्पिटिशन के चलते संभव नहीं।

एक समाजवादी व्यवस्था में आपके पास सटीक जानकारी होगी तो आप विभिन्न कंपनियों को अलग-अगल वस्तुओं और सेवाओं के निर्माण में लगा पाने में सक्षम होंगे और उन्हें आम लोगों के पास जल्द से जल्द ले जाने में भी।

तीसरी बात, आप देख रहे होंगे कि कोरोना वायरस संकट की वजह से विश्व भर का स्टॉक मार्केट डाउन है। एक कैपिटलिस्ट मार्केट में आप किसी पूंजीपति को स्टॉक मार्केट से अपने शेयर बेंचकर पैसा वापस निकालने से रोक नहीं सकते। ऐसी स्थिति में मार्केट से पैसा एकदम से गायब होता जाता है, जो महामारी को और खराब बना देता है।

चौथी, कैपिटलिस्ट सिस्टम में सबसे ऊपर जो तबका है वो पूंजीपति है और वही पॉलिसी से जुड़े फैसले लेता है। इस तबके को इस तरह की महामारी की कीमत अदा नहीं करनी पड़ती। एक उदाहरण आपको देता हूं। अभी कुछ दिन पहले रिपोर्ट आई थी कि जो दुनिया के सबसे अमीर लोग हैं, वो कोरोना वायरस से बचने के लिए अपने-अपने खरीदे हुए द्वीपों पर चले गए हैं।

वहां उन्होंने बकायदा बंकर्स बना रखे है। एक अमेरिकी कांग्रेसमैन ने अपने बंकर से कोरोना बियर पीते हुए फोटो भी डाली थी, जिसकी बाद उनकी बहुत आलोचना हुई। तो जो अमीर तबका है वो अपनी दौलत का प्रयोग करके केवल खुद को बचाने की कोशिश करेगा ना कि समाज के बारे में सोचेगा। क्योंकि ये सत्ता में भी है इसलिए समाज के लिए महामारी से निपटने के लिए कोई भी ढंग की पॉलिसी भी नहीं बनाएगा।

इसलिए एक केंद्रीकृत समाजवादी आर्थिक व्यवस्था ना केवल कोरोना वायरस जैसी महामारी से निपटने के लिए अच्छी है बल्कि संपूर्ण आर्थिक उत्पादन के लिए भी जरूरी है। आपको यकीन नहीं है तो खुद विश्व भर के पूंजीवादी झंडाबरदारों द्वारा इस समय उठाए जा रहे कदमों को देख लें।

पूंजीवादी रहनुमा डोनल्ड ट्रंप को ही देख लें। ट्रंप रिपब्लिकन पार्टी के हैं और घोर फ्री मार्केट की वकालत करते हैं। मतलब पूरा पूंजीवादी, जरा सा भी समाजवादी नहीं। लेकिन वो कोरोना वायरस संकट के समय कर क्या रहे हैं? डोनल्ड ट्रंप ने कहा है कि हम डिफेंस प्रोडक्शन एक्ट को लागू कर रहे हैं। इसके तहत अमेरिकी सरकार मेडिकल प्रोडक्शन और सुविधाओं को अस्थाई तौर पर अपने नियंत्रण में लेगी और युद्ध स्तर पर वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन करेगी।

अमेरिका का ये डिफेंस प्रोडक्शन एक्ट 1950 का है और कोरियाई युद्ध के समय बनाया गया था। इसका मकसद ये था कि कोरियाई युद्ध के लिए जो कुछ भी चाहिए, वो अमेरिकी सरकार बना सके। इसके तहत अमेरिकी सरकार को ये अधिकार था कि वो किसी प्राइवेट कंपनी को भी अपने नियंत्रण में ले सकती थी।

तो इस समय अमेरिका खुद एक तरह से समाजवादी रूप में काम कर रहा है। ठीक यही कनाडा में हो रहा है। बाकी के विकसित और घोर पूंजीवादी देशों में भी। जर्मनी, फ्रांस, इटली, ब्रिटेन इत्यादि कहीं का भी उदाहरण उठा लीजिए। कुल 15 विकसित पूंजीवादी देशों ने 2.78 खरब डॉलर का आर्थिक पैकेज तैयार किया है सिर्फ और सिर्फ वैश्विक पूंजीवाद को बचाने के लिए।

पूरी की पूरी मार्केट इकॉनमी कोरोना वायरस से लड़ने के लिए समाजवादी इकॉनमी के रूप में धीरे-धीरे परिवर्तित हो रही है। इसलिए क्योंकि मार्केट इकॉनमी इस महामारी से लड़ ही नहीं सकती, इसलिए पूंजीवादी सरगना भी समाजवादी हो जाने के लिए मजबूर हो रहे हैं। चीन के मॉडल को अपनाने के लिए मजबूर हो रहे हैं, राज्य के दखल द्वारा मार्केट इकॉनमी को सिकोड़ने और राष्ट्रीयकरण के लिए मजबूर हो रहे हैं।

(मुरारी त्रिपाठी मूल रूप से कानपुर से तअल्लुक़ रखते हैं और फ़िलहाल दिल्ली में रहते हैं। वे एक जनपक्षधर पत्रकार हैं।)

This post was last modified on March 21, 2020 12:49 am

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