Saturday, November 27, 2021

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सीपी-कमेंट्री: इंदिरा गांधी की इंटरनल इमरजेंसी और आरएसएस–भाजपा का लोकतंत्र का स्वांग

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रचारक रह चुके हम भारत के लोग के मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 26 जून, 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की कांग्रेस सरकार द्वारा लागू किये इंटरनल इमरजेंसी (आंतरिक आपातकाल) को लेकर जब-तब और खास कर उसकी बरसी पर लोकतांत्रिक बहस कराना चाहते हैं। यह लोकतंत्र की हिफाजत के लिए कोई बुरी नहीं बल्कि अछी बात है। लेकिन मोदी जी का खुरपेंच है कि ये बहस उनकी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) द्वारा परिभाषित ‘राष्ट्रवादी आयाम‘ में ही हो। जाहिर है मोदी जी बिल्कुल नहीं चाहते इस बहस में भाजपा के इमरजेंसी में रहे स्वरूप, भारतीय जनसंघ, उसके मात्रृ संगठन आरएसएस और उनकी सरकार में काबिना मंत्री रहीं मानेका गांधी की नकारात्मक भूमिका पर कोई चर्चा हो। अवामी हिन्दी न्यूज पोर्टल, जनचौक के अनियतकालीन कॉलम, सीपी-कमेंट्री के आज के अंक में हम अकाट्य दस्तावेजों, प्रामाणिक किताबों और संस्मरण के हवाले से इंटरनल इमरजेंसी के उन आयामों की चर्चा करेंगे जिनकी ‘हड़बड़-गड़बड़ गोदी मीडिया ‘ जान बूझ कर अनदेखी करती रही है।

इमरजेंसी पर ‘फर्जी राष्ट्रवादी’ बहस

इस अनदेखी का सबसे अहम बिन्दु है कि इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी के लिए सार्वजनिक रूप से माफी मांग ली थी। लेकिन उनकी छोटी बहू मेनका जी ने इमरजेंसी में अपने दिवंगत पति संजय गांधी की भूमिका के लिए आज तक माफी नहीं मांगी है। मेनका जी, अपनी इकलौती संतान फिरोज वरुण गांधी समेत भाजपा में हैं। मेनका जी, मोदी सरकार में मंत्री भी रही हैं। उनके सुपुत्र फिरोज वरुण भाजपा के लोक सभा सदस्य हैं।

यहीं इमरजेंसी पर आरएसएस, भाजपा और मोदी जी की राष्ट्रवादी बहस में लोकतंत्र का स्वांग है। दरअसल, उनका राष्ट्रवाद पूरी तरह फर्जी है। लेकिन उनमें ये तथ्य स्वीकार करने का कोई नौतिक साहस नहीं है ।

इंदिरा गांधी का नैतिक साहस

इंदिरा गांधी ने अपने नैतिक साहस के कारण ही इमरजेंसी के लिए खुली माफी मांगी थी। उनके इस नैतिक साहस के कारण ही भारत की अवाम ने उन्हें 1980 के लोक सभा चुनाव में माफ भी कर दिया था। आरएसएस और भाजपा के असत्य के प्रयोग का एक बड़ा सबूत है। आरएसएस के प्रचारक और और उसके सियासी संगठनों के प्रमुख विचारक रहे नानाजी देशमुख ने 1980 के लोक सभा चुनाव में इंदिरा गांधी की कांग्रेस का समर्थन किया था। उस चुनाव में बाकायदा पोस्टर लगे थे जिन पर लिखा था: नाना जी की बात पर मोहर लगेगी हाथ पर। ‘हाथ‘ उस बार कांग्रेस का चुनाव चिन्ह था, जो अभी भी बरकरार है।

ये बात ध्यान रहे कि आंतरिक आपातकाल, उसके पहले और बाद में भी हड़बड़, गड़बड़ मीडिया थी। पर तब तक एनडीटीवी इंडिया के एंकर रविश कुमार का बुद्धू बक्सा पर प्रादुर्भाव नहीं हुआ था। इसलिए उसमें गोदी मीडिया का उपसर्ग नहीं जुड़ा था।

ये तब की हड़बड़-गड़बड़ मीडिया का ही असत्य प्रचार है कि कम्युनिस्टों ने इंटरनल इमरजेंसी का समर्थन किया था। सत्य ये है कि भारत में कम्युनिस्टों के सिर्फ एक दल कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (सीपीआई यानि भाकपा) ने इसका समर्थन किया था। कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया मार्कसिस्ट (सीपीएम यानि माकपा) समेत उनके लगभग सभी सियासी दलों ने इंटरनल इमरजेंसी का प्रबल विरोध किया था और उनके कई नेताओं को पूरे आपातकाल में जेल में कैद रखा गया था।

उनमें माकपा और अखिल भारतीय किसान सभा के मध्य प्रदेश के नेता और अभी लोकजतन के संपादक बादल सरोज ही नहीं नई दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) छात्र संघ के अध्यक्ष रहे देवी प्रसाद त्रिपाठी (डीपीटी) भी शामिल हैं जो बहुत बाद में पूर्व रक्षा मंत्री शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के महाराष्ट्र से संसद ऊपरी सदन, राज्य सभा सदस्य भी रहे।

डेविड सेलबोर्न की पुस्तक और डीपीटी

इंटरनल इमरजेंसी पर व्यापक शोध के आधार पर 1977 में ब्रिटिश प्रकाशक पेंगुईन से छपी डेविड सेलबोर्न की 561 पेज की अंग्रेजी पुस्तक, ‘एन आई टु इंडिया’, के अनुसार जब जेएनयू छात्र संघ ने आंतरिक आपातकाल का प्रतिरोध किया तो उसके कुछ दिनों बाद 7 और 8 जुलाई 1975 की अर्धरात्रि की ट्रक और जीप पर सवार होकर आए करीब एक हजार सशस्त्र पुलिस कर्मियों ने कैंपस में सभी हॉस्टल को घेर लिया। किताब में छह पेज के वृतांत में लिखा है कि उन पुलिसकर्मियों ने सभी हॉस्टल के हर कमरे में जबरन घुस कर छात्र संघ प्रमुख डीपीटी को ढूंढा और फिर बाद में उन्हें उठा कर ले गई ।

जेएनयू में डीपीटी के समकालीन छात्र, उनके गृह राज्य उत्तर प्रदेश के ही मूल निवासी और हाल में दिवंगत अति वरिष्ठ पत्रकार शेष नारायण सिंह ने मुझे कैंपस में आपातकाल का छात्रों द्वारा किये जबरदस्त प्रतिरोध के बारे में मेरे जेएनयू में 1980 में दाखिला लेने के बाद विस्तार से बताया था। डीपीटी को पूरे आपातकाल में 19 माह तक जेल में कैद रखा गया। इस दौरान उनकी आँखें और खराब हो गईं।

दिवंगत पत्रकार सुदर्शन भाटिया के संस्मरण

अविभाजित भारत में लाहौर में पैदा हुए दिवंगत पत्रकार सुदर्शन भाटिया यूनाइटेड न्यूज ऑफ़ इंडिया (यूएनआई) के लखनऊ ब्यूरो प्रमुख पद से 1980 के दशक के आखिर में सेवानिवृत्त हुए। भाटिया साहब भारत विभाजन के बाद अपने परिजनों के साथ जालंधर चले आये थे।

उन्होंने 1964 में यूएनआई के मुख्य कार्याधिकारी नियुक्त हुए कुलदीप नैयर के कहने पर उसी बरस जालंधर से ही यूएनआई के लिए पत्रकारिता शुरू की थी। यूएनआई में ही तबादले पर दिल्ली से लखनऊ पहुँचने पर मेरी भाटिया साहब से गहरी सोहबत हो गई। वह रिटायर होने के बाद भी लगभग हर दिन यूएनआई दफ्तर आया करते थे और उसके पत्रकारों को उनके कामकाज में पूछने पर समुचित सलाह-मशविरा भी देते थे। उनका आवासीय फ्लैट यूएनआई दफ्तर से लगा हुआ था। सभी उनका बहुत आदर करते थे और रोज उनके साथ चाय जरूर पीते थे। अक्सर वह अपने घर से थर्मस भर कर चाय यूएनआई दफ्तर मंगवा लिया करते थे। उनके पास पत्रकारिता का विशद अनुभव था।  उन्होंने मुझे आंतरिक आपातकाल के बारे में विस्तार से बताया था। भाटिया साहब ने एक दिन मुझसे से कहा: तुम जेएनयू में पढ़ चुके हो। बताओ तो वहाँ इंटरनल इमरजेंसी में क्या-क्या हुआ।

मैंने जवाब दिया: तब हम दिल्ली के बाहर बिहार के दरभंगा में कॉलेज में पढ़ते थे। वहाँ आपातकाल के विरोध में कुछ खास नहीं हुआ। लेकिन 1980 में जेएनयू में दाखिला लेने पर पता चला कि वहाँ छात्र -छात्राओं के बीच इंटरनल इमरजेंसी का जबरदस्त प्रतिरोध हुआ था। इसके अनेक प्रामाणिक दस्तावेज मेरे पास संग्रहीत हैं। जेएनयू की शिक्षा के उपरांत राजनीति में आये लगभग सभी उसी प्रतिरोध की देन है। इंदिरा गांधी 1980 के लोकसभा चुनाव के बाद केंद्र की सत्ता में लौटने पर एक कार्यक्रम में जेएनयू पधारीं तो वहाँ उनके ‘अधिनायकवाद’ का जबरदस्त प्रतिरोध करने वालों में मैं खुद उनके साथ शामिल था जो बाद में मेरी पत्नी बनीं। यूं ही नहीं कहते कि जेएनयू, लोकतंत्र पर हमले के विरुद्ध छात्रों के प्रतिरोध का सर्वनाम है।

मैंने उन्हें यह भी कहा कि जेएनयू में पढ़े सोशल एक्टिविस्ट अनिल चौधरी ने जब 60 बरस पूरे किये तो इस उपलक्ष्य में नई दिल्ली में कंस्टीट्यूशन क्लब ऑफ़ इंडिया का हॉल बुक कर वहाँ जलसा किया गया। जलसा में जेएनयू के कुछ पूर्व छात्र नेताओं समेत साहित्य, कला, संस्कृति, राजनीति की भी हस्तियों को भी बुलाया गया। अनिल चौधरी खुद भी जेएनयू में छात्र नेता रहे थे। जेएनयू के जिन अन्य छात्र नेताओं को बुलाया गया उनमें कुछेक सांसद बन चुके थे। एक केंद्र सरकार के मंत्री भी बने थे। उन छात्र नेताओं में एक वो भी थे जिनका जिक्र इंदिरा गांधी सरकार में घोषित इंटरनल इमरजेंसी के 19 माह पर अंग्रेजी में डेविड सेल्बोर्न द्वारा लिखित पुस्तक ‘एन आई टू इंडिया’ में कुछेक पन्नों में जिक्र है। जेएनयू में पढ़ाई पूरी करने के बाद दिल्ली के हिन्दू कॉलेज में प्रोफ़ेसर बने ईश मिश्र उस जलसा में गए थे।

मैंने इमरजेंसी पर छपी किताबों में से कई पढ़ी हैं। मैंने समाजवादी नेता राजनारायण की याचिका पर इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायाधीश, जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा का निर्णय भी पूरा पढ़ा है जिसमें 1971 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की रायबरेली सीट से इंदिरा गांधी का निर्वाचन निरस्त कर दिया गया था। फिर भी मैं बहुत सारी बातों से अनभिज्ञ हूँ। आप तो तब लखनऊ में ही तैनात थे। उसके कुछ किस्से बताएं तो मेहरबानी होगी।

भाटिया साहब ने जो कुछ बताया वह विस्मित कर देने वाला था। उन्होंने बताया कि यूएनआई न्यूज एजेंसी ने जस्टिस सिन्हा के निर्णय को ज्यों का त्यों प्रसारित किया था। इसके मूल पाठ कुछ अखबारों में धारावाहिक रूप से भर-भर पन्ना कई दिन तक छपे थे।

कोर्ट के निर्णय से पहले उसके समक्ष इंदिरा गांधी की पेशी और अदालती जिरह आदि के विस्तृत समाचार देने के लिए भाटिया साहब ने इलाहाबाद में पहले से नियुक्त रिपोर्टर प्रकाश शुक्ला (अब दिवंगत) की मदद के लिए और दो रिपोर्टर भेजे।

भाटिया साहब का आकलन था कि कोर्ट का निर्णय ऐतिहासिक होगा। उन्होंने लखनऊ से अपने मुख्य सम्पादक जीजी मीरचंदानी को दिल्ली फोन कर कहा कि यूएनआई को कोर्ट के निर्णय के ऑपरेटिंग हिस्से के साथ ही उसके मूल पाठ को भी ज्यों का त्यों प्रसारित करना चाहिए। इस पर पहले तो मुख्य सम्पादक ने यह कह मना कर दिया कि मूल पाठ बहुत लंबा होगा। उसे ज्यों का त्यों प्रसारित करने से यूएनआई की संचार व्यवस्था जाम हो सकती है। लेकिन वह बाद में भाटिया साहब के तर्कों से सहमत हो गए।

न्यूज फ्लैश “इंदिरा गांधी अनसीटेड”

भाटिया साहब की हिदायत पर प्रकाश शुक्ला ने कोर्ट रूम में जाने से पहले अंग्रेजी में दो न्यूज फ्लैश लिख अपने एक सहकर्मी को दे दिए। पहला न्यूज फ्लैश था ‘ पिटीशन डिसमिस्ड, इंदिरा गांधी’ज इलेक्शन अपहेल्ड”। दूसरा न्यूज फ्लैश था, ‘ पिटीशन एक्सेप्टेड,  इंदिरा गांधी अनसीटेड’।

उन्होंने अपने सहकर्मी को हिदायत दे रखी थी कि वह कोर्ट रूम के बाहर मुस्तैद उनके संकेत का इन्तजार करे। हिदायत थी कि प्रकाश शुक्ला कोर्ट रूम से बाहर गलियारा में आकर एक या दो अंगुली से संकेत देंगे। जिस नंबर का संकेत होगा वह सहकर्मी फौरन किसी भी फोन से स्थानीय दफ्तर को कह उस नंबर का न्यूज फ्लैश टेलीप्रिंटर से प्रेषित करवा दे। प्रकाश शुक्ला और उनके सहकर्मी ने विस्तृत खबरें बाद में स्थानीय दफ्तर पहुँच कर प्रेषित की। यूएनआई का ध्येय वाक्य ही है : फास्ट विथ न्यूज।

स्थानीय दफ्तर के टेलीप्रिंटर से ‘ न्यूज फ्लैश ‘  के बाद की शुरुआती ख़बरों को भेजने के तत्काल बाद प्रकाश शुक्ला और उनके सहकर्मी भाटिया साहब की हिदायत पर रातों-रात एक जीप से लखनऊ पहुँच गए। क्योंकि उनके स्थानीय दफ्तर के पुराने टेलीप्रिंटर मशीन से और काम लेने का भरोसा नहीं किया जा सकता था। यूएनआई के प्रेषित न्यूज फ़्लैश का जिक्र उसके मुख्य सम्पादक रह चुके कुलदीप नैयर की किताब , द जजमेंट में किया गया है। उस किताब में लिखा है इंदिरा गांधी को दिल्ली में अपने आवास से साउथ ब्लॉक के उनके कार्यालय जाने के ऐन पहले उस न्यूज फ्लैश की पर्ची दिखाई गई। वह पर्ची को घूर कर देखने के बाद अपनी कार में बैठ गईं।

सुदर्शन भाटिया की हिदायत पर प्रकाश शुक्ला उस जजमेंट की सर्टिफाइड प्रति इलाहाबाद से लखनऊ से ले आये थे। यूएनआई के लखनऊ दफ्तर की टेलीप्रिंटर मशीन नई थी। अगले पांच दिन तक लख़नऊ से 100 -125 टेक्स ( पेज ) प्रसारित किये जाते रहे। उस मशीन के जरिये ख़बरों के डिस्पैच को कागज़ के रिबननुमा टेप पर टाइप कर इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सिग्नल के जरिये भारत सरकार के तब के डाक-तार विभाग से लीज पर लिए टेलीप्रिंटर लाइंस के जरिये देश -विदेश के करीब आठ हजार अखबारों , दूतावासों , हवाई अड्डों आदि को भेजा जाता था।

मेरे आग्रह पर सुदर्शन भाटिया ने वो सारी बातें और इंटरनल इमरजेंसी के दौरान खबरें देने पर सेंसरशिप,  इंदिरा गांधी सरकार द्वारा उनकी और तीन अन्य न्यूज एजेंसियों का एक सरकारी न्यूज एजेंसी में जबरन विलय कर देने और फिर आपातकाल समाप्त हो जाने के बाद फिर स्वतंत्र रूप से चालू होने का वृतांत अंग्रेजी में लिख कर सौंप दिया।

(चंद्रप्रकाश झा वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं। आप आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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