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भारत-चीन सीमा विवाद और गांधीवादी पंडित सुन्दरलाल

(भारत-चीन के जारी सीमा विवाद पर ऑल इंडिया पीपुल्स फ्रंट ने पुनः दोहराया कि दोनों मुल्कों में शांति और अमन चैन की स्थापना के लिए भारत व चीन को राजनयिक-कूटनीतिक प्रयासों व राजनीतिक वार्ता से इस सीमा विवाद को हल करना चाहिए। भारत-चीन सीमा विवाद के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को समझने के लिए ऑल इंडिया पीपुल्स फ्रंट ने भारत-चीन सीमा विवाद पर पं. सुंदर लाल के लेख को भी प्रेस को जारी किया। पेश है फ्रंट के प्रवक्ता और पूर्व आईजी एसआर दारापुरी द्वारा जारी किया गया पूरा लेख-संपादक)

(पं. सुन्दरलाल महान देशभक्त और स्वतंत्रता सेनानी हैं तथा गांधीवादी के रूप में विख्यात थे। ब्रिटिश शासन के जमाने में उन्होंने हलचल मचा देने वाली एक किताब लिखी थी ‘भारत में अंग्रेजी राज’, जिसे ब्रिटिश सरकार ने तुरंत जब्त कर लिया था। 1951 ई. में वे चीन जाने वाले भारतीय शिष्टमंडल के नेता थे। वहां से लौटकर उन्होंने चीन के संबंध में ‘आज का चीन’ प्रसिद्ध पुस्तक लिखी। अमरीकी साम्राज्यवाद के दबाव और ब्रिटिश साम्राज्यवाद के उकसावे पर सन् 62 ई. में जो भारत-चीन सीमा की लड़ाई हुई, उस लड़ाई को रोकने के लिए पं. सुन्दरलाल ने बहुत-कुछ कोशिशें की थीं। सन् 62 की लड़ाई के दस वर्षों के बाद, 4 नवंबर 1972 ई. के ‘मेनस्ट्रीम’ पत्रिका में उन्होंने भारत-चीन सीमा विवाद के बारे में कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों का उद्घाटन किया, जिसका अधिकांश हम नीचे उद्धृत कर रहे हैं- संबंधित किताब के संपादक की ओर से)

दुनिया के प्राचीनतम देशों में भारत और चीन दो देश हैं। दुनिया के विशाल राष्ट्रों में इन दो देशों की जनसंख्या दुनिया की पूरी जनसंख्या के आधे से अधिक है।

ऐतिहासिक शक्तियों के कार्यों के फलस्वरूप सिर्फ 25 वर्ष पहले एक ओर भारत अंग्रेजों द्वारा शासित था और दूसरी ओर था- चीन जो च्यांग काई शेक के नेतृत्व में कुओमितांग के कब्जे में था और सारी अर्थव्यवस्था अमरीकी साम्राज्यवाद के नियंत्रण में थी। कुछ समय के लिए दोनों देश विदेशी प्रभुत्व से मुक्त होने के लिए लड़े थे- भारत ब्रिटिश के दमनकारी हाथों से मुक्ति पाने के लिए और चीन अमरीकी साम्राज्यवाद द्वारा नियंत्रित कुओमितांग पार्टी के हाथों से मुक्त होने के लिए….

भारत 1947 ई. में स्वाधीन हुआ और चीन 1949 में। इसके कुछ ही समय बाद 1951 में जवाहरलाल नेहरू और अन्य लोगों ने चीन में एक ‘शिष्टमंडल’ भेजने का निर्णय लिया। ……जवाहरलाल नेहरू ने मुझे उस मंडल का नेतृत्व करने के लिए कहा था।

हमारे शिष्टमंडल के चीन-भ्रमण के फलस्वरूप पेकिंग में डा. तिन शी लिन के सभापतित्व में एक चीन-भारत मैत्री संघ और उसी तरह मेरे सभापतित्व में यहां एक चीन-भारत मैत्री संघ की स्थापना हुई थी।…

(यह संघ) कुछ वर्षों तक अच्छी तरह चला। सारा आकाश ‘हिंदी-चीनी-भाई-भाई’ की आवाज से गूंज उठा।…..

स्वाभाविक कारण से इन दोनों देशों के बीच का संपर्क अमरीका जैसे देश सरल भाव से ग्रहण और सहन नहीं कर पा रहे थे। भारत इस बीच दो हिस्सों में बंट चुका था- भारत और पाकिस्तान। आज का चीन पुस्तक में मैंने, तिब्बत में कुछ समय से अमरीकी साम्राज्यवाद किस तरह काम कर रहा था, इसका कुछ विवरण दिया है। इनका आधार चीन में तत्कालीन भारतीय राजदूत सरदार पणिक्कर से सुनी हुई घटनाएं थीं।

अमरीका ने इस बार पेकिंग के सिंहासन पर च्यांग को बैठाने के लिए मन में योजना बनाई। इस उद्देश्य से पाकिस्तान में अमरीकी फौजी अड्डे कायम किये गये और तिब्बत में संयुक्त राज्य अमरीका ने पांव टिकाने के लिए जगह बनाने का फैसला लिया। राजनीतिक और आध्यात्मिक रूप से तिब्बत तब लामाओं के शासन में था। देश के प्रशासन में जनसाधारण की कोई आवाज नहीं थी। अपनी योजना के अंतर्गत ही दलाई लामा के भाई को अमरीका ने निमंत्रण दिया और व्यवहारिक रूप से वे अमरीका में बस भी गए।

जवाहरलाल नेहरू सारी बातों को स्पष्ट रूप से समझ रहे थे। इस बारे में जवाहरलाल नेहरू के साथ कई बार मेरी व्यक्तिगत बातचीत हुई थी। वे साफ-साफ समझ पा रहे थे कि पाकिस्तान में अमरीकी अड्डा और तिब्बत में अमरीकी प्रभुत्व चीन के लिए और विश्वशांति के लिए विपत्तिजनक होगा। उन्होंने समझा था, भारत उस समय तिब्बत पर अमरीकी हमले का मुकाबला नहीं कर पायेगा।

चीन ने तिब्बत को मुक्त किया। मैं खुले हृदय से यह कह रहा हूं, यह घटना जैसे भारत के स्वार्थों के अनुकूल है, उसी तरह चीन के भी। और जवाहरलाल ने यह पूरी तरह से समझा था।

….कुछ समय बाद अक्साई चीन में चीनियों ने अपना फौजी अड्डा कायम किया। भारत की लोकसभा में कई सदस्यों ने इस बारे में जवाहरलाल का ध्यान आकृष्ट किया। उस समय इनका आरोप थाः एक ओर चीन-भारत के शान्तिपूर्ण सीमांचल में फौजी अड्डा कायम कर रहा है और दूसरी ओर भारत-चीन मैत्री की बात कर रहा है। इसलिए उन्होंने चीन की संधि के बारे में भी शंका प्रकट की। जवाहरलाल ने तत्काल चीन सरकार के पास चिट्ठी भेजी। जवाब भी तुरन्त आ गया, ‘‘इस बारे में आपकी शंका का कारण क्या है?

अक्साई चीन में हमने जो अड्डा बनाया है, वह उस तरफ से अमरीकी हमले का मुकाबला करने के लिए है। आप जानते हैं, पाकिस्तान का फौजी अड्डा अक्साई चीन के काफी नजदीक है। अक्साई चीन में हमारी फौजी तैयारी सिर्फ संभावित अमरीकी आक्रमण को रोकने के लिए है। इसके साथ भारत-चीन संबंधों का कोई संबंध नहीं है। इसके फलस्वरूप भारत-चीन संबंध कमजोर नहीं हो रहे हैं, और होना उचित भी नहीं। हम विश्वास करते हैं कि हमने जो किया है, वह दोनों के स्वार्थ में है।’’

चीन के जवाब ने स्वाभाविक रूप से जवाहरलाल को संतुष्ट किया। इसके बाद लोकसभा में कई सदस्यों ने भारत-चीन सीमाओं के बहुत पुराने नक्शों को निकालकर खोजना शुरू किया। भारत के नक्शों में अब देखा गया कि अक्साई चीन भारत का ही अंग है। लोकसभा में इन सब सदस्यों ने अक्साई चीन ‘भारत का अंग’ है।- अपने इस नये आविष्कार की ओर जवाहरलाल नेहरू और भारत का ध्यान खींचा। यह गौर करना चाहिए कि इन सब भद्र पुरूषों ने जब पहले-पहल अक्साई चीन में चीन के फौजी अड्डे के बारे में ध्यान खींचा था; चीन ने भारत की भूमि पर यह अड्डा तैयार किया है- यह आरोप तब नहीं था। यह बाद का आविष्कार है। लोकसभा में जब यह प्रश्न उठा तब प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने फिर चीन सरकार को एक चिट्ठी लिखकर कहा कि चीन ने जो फौजी अड्डा तैयार किया है, वह भारत की भूमि पर है।

एक बार फिर इस तरह का जवाब आया: ‘‘हम लोग नहीं जानते थे कि अक्साई चीन- भारत का अंग है। लीसा में जो सीमांचल नक्शे हैं, उन्हें हमने फिर से देखा। इन नक्शों के अनुसार अक्साई चीन का ही अंग है।

अब देखा गया, आपके पास दूसरी तरह के नक्शे हैं। गौर करने की बात यह है कि हम चीनी जब अक्साई चीन में आए तो इस प्रकार का कोई आदमी या सामरिक या गैर-सामरिक सरकारी कर्मचारी नहीं देखा गया जो हम लोगों को कह दे सकता था कि यह भारत की भूमि के अंतर्गत है। जो हो, अब जब देखा गया है कि हम लोगों के पास अलग-अलग ढंग के सीमांचल नक्शे हैं, तो दोनों प्रधानमंत्री और दोनों सरकारों के प्रतिनिधियों की बैठक का होना बहुत जरूरी है और यही लोग भारत-चीन सीमा विवाद का संतोषजनक समाधान कर लेंगे।’’

जवाहरलाल और उनके सहयोगियों को यह उत्तर उस समय संतोषजनक प्रतीत हुआ। इस प्रसंग में कहा जा सकता है कि लोकसभा में जवाहरलाल ने अपने एक भाषण में एक बार कहा था, अक्साई चीन एक ऐसी जगह है जहां न सिर्फ कोई आदमी नहीं रहता, बल्कि, उन्हीं की (जवाहरलाल की) भाषा में ‘‘एक मुट्ठी घास तक नहीं उगती है।’’

इस बार संयुक्त रूप से यह तय हुआ कि दोनों पक्षों के प्रतिनिधि, जो भी नक्शे उनके पास उपलब्ध हैं, उनको गौर से देखेंगे और उनके आधार पर दोनों अपने प्रश्न तैयार करेंगे। यह करने के बाद प्रधानमंत्री चाउ एन लाई और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, दोनों पक्षों के विचार-विमर्श के बाद, एक संतोषजनक समाधान पर आएंगे। ठीक यही किया गया।

चाउ एन लाई इस उद्देश्य से दिल्ली आए। मैंने उनके साथ हवाई अड्डे पर मुलाकात की और दिल्ली में रहते समय उनके साथ बाद में भी कई बार मुलाकात हुई। दोनों प्रधानमंत्रियों की बैठक में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और प्रधानमंत्री चाउ एन लाई तथा इनके अन्य सहयोगी और दोनों पक्षों के महत्वपूर्ण सरकारी प्रतिनिधि उपस्थित थे। देखा गया कि मोटे तौर पर दोनों देशों के बीच-बीच में 50 हजार वर्गमील का एक बड़ा इलाका है जो विवादास्पद है। इस 50 हजार वर्गमील के अंदर 18 हजार वर्गमील अर्थात् विख्यात मैकमहोन रेखा के दक्षिण का अंश भारतीय प्रशासन के हाथ में है, मैकमहोन रेखा के उत्तर को अक्साई चीन कहा जाता है, वह सारा हिस्सा, जैसा कि दावा भी किया गया था, चीन के हिस्से में पड़ा।

देखा गया कि 20 हजार वर्गमील अंचल को कई दर्जन हिस्सों में बांटा जा सकता है और दोनों पक्षों के प्रतिनिधियों ने बैठक में इन जनविहीन भूखंड के लिए अपनी-अपनी मांगे रखीं। उनकी मांगें और प्रत्युत्तर में मांगें मोटे तौर पर इस प्रकार हैंः एक सरकार के प्रतिनिधि ने कहा कि इन-इन वर्षों में, जैसे कि 1827 ई. में, सरकार का एक तहसीलदार वहां गया था और इस-इस बाजार और इस-इस इलाके से टैक्स वसूला था। दूसरे पक्ष के एक प्रतिनिधि ने कहा कि इस-इस साल, जैसे कि 1904 ई. में, उनके पक्ष के एक अमीन ने इस-इस जगह की नाप करवाई थी। तीन दिनों तक मांगें और प्रत्युत्तर में मांगें रखी जाती रहीं।

तीसरे या शायद चौथे दिन प्रधानमंत्री चाउ एन लाई ने कहा कि कोई दीवानी अदालत भी इस तरह की मांगों और प्रत्युत्तर की मांगों के आधार पर छः महीने में भी इस झमेले का फैसला नहीं कर पायेगी। इसलिए उनका यह प्रस्ताव हुआ कि इस विषय को लेकर दोनों देशों को मित्रता पूर्वक आधार पर विचार-विमर्श करना होगा। दरअसल उन्होंने जो प्रस्ताव दिया वह यह था कि 18 हजार वर्गमील का इलाका, जो भारत के अधिकार में है, वह भारत का ही अंग माना जाएगा, 20 हजार वर्ग मील जनविहीन भूखंड भी भविष्य में भारत का अंग माना जाएगा और 12 हजार वर्ग मील इलाका अर्थात अक्साई चीन का इलाका जो अब तक चीन के प्रशासन में है और जो, प्रधानमंत्री चाउ एन लाई के अनुसार, सामरिक पक्ष की दृष्टि से चीन के लिए बहुत महत्वपूर्ण है- वह चीनी भूखंड ही माना जाएगा।

यह पता चला कि प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री चाउ एन लाई के प्रस्ताव से व्यक्तिगत रूप से संतुष्ट हुए थे और उसे मान लेने के लिए तैयार थे। तब भी उन्होंने अपने सहयोगियों के साथ विचार किया और चाउ एन लाई को इस प्रकार जवाब दियाः लेकिन हमें हमारी जनता को समझाना पड़ेगा। चाउ एन लाई ने इसके जवाब में कहाः किंतु प्रधानमंत्री महोदय, हम लोगों को भी तो अपनी जनता को समझाना पड़ेगा।

तब यही तय हुआ कि दोनों पक्षों के प्रतिनिधियों को तीनों अंचलों के विभिन्न इलाकों के बारे में छानबीन करने और अपनी मांगों और प्रत्युत्तर में मांगों को रखने के लिए कुछ समय देने की जरूरत है और जब यह हो जायेगा, दोनों प्रधानमंत्रियों की उपस्थिति में दोनों देशों के बीच पूरे सीमांचल के प्रश्न का समाधान किया जायेगा। तब तक दोनों पक्षों में से कोई भी एकतरफा ढंग से जनविहीन भूखंड के किसी भी हिस्से में प्रवेश नहीं करेगा और करने की कोशिश भी नहीं करेगा। दोनों प्रधानमंत्रियों ने मिलकर इस संधि पर हस्ताक्षर किए। इस प्रकार दोेनों प्रधानमंत्रियों ने अपनी बैठक समाप्त की और चाउ एन लाई वापस लौट गए।

चाउ एन लाई के लौट जाने के बाद दोनों पक्षों के प्रतिनिधियों ने पुराने कागजातों में से विवादास्पद इलाके के संबंध में अपनी मांगों और प्रत्युत्तर में मांगों के आधार पर प्रश्न तैयार करने के लिए परिश्रम किया। दोनों पक्षों के सवाल तैयार हो जाने के बाद चीन सरकार ने अपने पूरे बयान की प्रामाणिक प्रतिलिपि भारत सरकार के पास भेज दी। इसी प्रकार भारत सरकार ने भी अपनी मांगों आदि के साथ अपना बयान चीन सरकार के पास भेज दिया।…

…इन दोनों बयानों को पढ़ने के बाद मैंने सोवियत नेता निकिता ख्रुश्चेव के पास इन बयानों की पूर्ण आलोचना करते हुए एक चिट्ठी लिखी। प्रधानमंत्री निकिता ख्रुश्चेव से मैंने कहा कि वे खुद पहल करके विवादास्पद सीमांचल पर विचार-विमर्श करने का भार अपने ऊपर लें और विवादास्पद इलाके का जो हिस्सा चीनी भूखंड के रूप में भारत स्थापित करेगा, सिर्फ उसी को लेकर संतुष्ट रहने के लिए चीन को राजी कराएं। इसका जो उत्तर मुझे मिला उसका अर्थ यही हैः ख्रुश्चेव का प्रस्ताव यह है कि भारतीय प्रशासन के अंतर्गत जो 18 हजार वर्ग मील इलाका है, वह भारत का ही अंग रहेगा।

20 हजार वर्गमील (जनविहीन भूखंड) भविष्य में भारत के ही हाथ में जाएगा, बाकी 12 हजार वर्गमील अर्थात् अक्साई चीन इलाका, जो चीनी प्रशासन के अंतर्गत है, वह चीनी भूखंड के रूप में माना जाएगा क्योंकि सामरिक दृष्टि से यह इलाका चीन के लिए महत्वपूर्ण है। ख्रुश्चेव ने इस प्रकार का संकेत भी दिया कि इस प्रकार सीमा निर्धारण करने से उसी के नजदीक चीन अपने भूखंड से 12 हजार वर्ग मील के बराबर एक दूसरा इलाका भी देने के लिए राजी है इसके फलस्वरूप भारत आखिरकार पूरा 50 हजार वर्ग मील इलाका अपने भूखंड के रूप में पाएगा।

ख्रुश्चेव ने संकेत दिया कि यह पूरा प्रस्ताव दोनों पक्षों के सामने कोई तीसरा पक्ष अर्थात खु्रश्चेव रखेंगे और इस प्रस्ताव पर दोनों को सहमत कराने की कोशिश की जायेगी। ख्र्रुश्चेव ने मुझे लिखा कि चीनी पक्ष से इस बीच पूछा गया है और भारत के सहमत होने पर चीन इसे मान लेगा।

चिट्ठी में मुझे यह भी कहा गया कि इस प्रश्न पर वे (अर्थात् खु्रश्चेव) जवाहरलाल के विचार जानना चाहेंगे और इस प्रस्ताव पर जवाहरलाल का मत जानने पर प्रधानमंत्री ख्र्रुश्चेव दोनों पक्षों के सामने इसे रखकर दोनों पक्षों से संधि पर हस्ताक्षर कराएंगे और यह मामला हमेशा के लिए मिट जाएगा। यह भी कहना जरूरी है (चिट्ठी में कहा गया था) कि दोनों पक्षों में से किसी को असुविधा नहीं होने पर यह पूरा प्रस्ताव रखा जा सकता है।

ख्रुश्चेव को लिखी गयी मेरी चिट्ठी की प्रतिलिपि और जो उत्तर मैंने पाया, उसे लेकर मैं जवाहरलाल से मिला। मैंने जो लिखा था और इस प्रकार लिखा था, उससे वे बहुत खुश हुए। चिट्ठी को उन्होंने अपने ही पास रखना चाहा और रख लिया। उसके बाद उन्होंने उसका उत्तर देखना चाहा। दिखाया गया। उत्तर को पढ़कर वे और भी खुश हुए और संतुष्ट हुए।

खुश मिजाजी में थोड़ी देर तक बातचीत करने के बाद उन्होंने हल्के ढंग से मुझसे पूछा, चीनी लोग हमें कहां पर बराबर का हिस्सा देंगे? मैंने उनसे कहा, वह शायद भारत की पसंद के ऊपर ही छोड़ देंगे और मैं समझता हूं, मानसरोवर की ओर और उसके आस-पास का इलाका, उस अक्साई चीन की तुलना में, जहां आप ही के विचारानुसार ‘‘एक मुट्ठी घास तक नहीं उगती है’’- हम लोगों की पसंद और काम का इलाका होगा।

कई मिनटों तक जवाहरलाल बहुत खुश रहे। इसके बाद उनके चेहरे के भाव बदलने लगे और हिंदी में उन्होंने यह कहाः मेरी समझ में नहीं आता, क्या करूं, खुदकुशी कर लूं? यही कहेंगे कि यही एरिया तो चाहते थे, बाकी सब तो बांट ही दिया और यही एरिया जवाहरलाल ने दे दिया, कम्युनिस्ट से मिला हुआ है।

ये बातें सुनकर मेरे मन को चोट लगी और मुझे दुःख हुआ। मैंने उनसे पूछा, ख्रुश्चेव को मैं क्या जवाब लिखूं? दो-एक मिनट चुप रहने के बाद उन्होंने मुझे कुछ दिन रुकने के लिए कहा जिससे इस बीच वे अपने महत्वपूर्ण सहयोगियों से बातचीत कर सकें। उसके बाद मुझे बतलाएंगे तो मैं खु्रश्चेव को चिट्ठी लिखूंगा। (मैंने जवाहरलाल से कहा था कि इस मामले पर मैं व्यक्तिगत रूप से उनसे और बातचीत नहीं करूंगा। बेशक, यदि वे समझते हैं कि इस मामले में मुझे कुछ करना है तो मुझे बुलवा सकते हैं।)

उसके बाद मैं जवाहरलाल से कई बार मिला और विभिन्न विषयों पर बातचीत होने पर भी भारत-चीन सीमा विवाद पर कोई बातचीत नहीं हुई। लेकिन उनके साथ मेरी उपरोक्त बातचीत के चार-पांच दिन के बाद ही उत्तर प्रदेश से लोकसभा के एक सदस्य मुझसे मिलने के लिए आए और मुझे बतलाया कि जवाहरलाल ने इस विषय पर गोविंद बल्लभ पंत के साथ बातचीत की है और जिस प्रकार उन्होंने मुझे कहा था, पंत का भी मनोभाव वैसा ही है।

मेरा ख्याल है, सारी चीजें मिट जातीं और आज तक उसमें कोई हेर-फेर नहीं होता।

इसके बाद ’62 के तथाकथित चीनी आक्रमण के समय मैं मास्को में था। मैंने यह कहा है कि चाउ एन लाई के भारत से जाने से पहले यह तय हुआ था कि जब तक दोनों मंत्री आपस में मुलाकात नहीं करते, दोनों पक्षों में से कोई भी एकतरफा जनविहीन भूखंड में प्रवेश नहीं करेगा और करने की कोशिश भी नहीं करेगा। जनरल कौल की अनटोल्ड स्टोरी और मैक्सवेल की इंडिया-चाइना वाॅर, इन दोनों किताबों में यह स्पष्ट है कि चीन ने यह संधि नहीं तोड़ी, लेकिन किसी कारण से भारत ने जवाहरलाल के निर्देश में उसे तोड़ दिया। इस पर चीन की सरकार ने भारत सरकार को एक के बाद एक तीन चिट्ठियां भेजीं। एक के बाद एक में भारत को संधि तोड़ने का दोषी ठहराया। आखिरी दो चिट्ठियों में चीनियों ने कहा कि यदि भारत संधि को तोड़ने का कार्यक्रम बंद नहीं करेगा तो चीन बदले की कार्रवाई करने के लिए मजबूर होगा। यह सारी चिट्ठियां भारत सरकार के प्रकाशन में निकली हैं।

देखा गया है कि भारत ने संधि तोड़ने का कार्यक्रम बंद नहीं किया। जनरल कौल और मैक्सवेल, दोनों से हम जान पाते हैं कि जनविहीन भूखंड पर उस समय भारत की कई एक डिवीजन भारतीय सेनाएं थीं। चीनी फौज ने भी तब जनविहीन भूखंड में प्रवेश किया। देखा गया कि उस इलाके में सैनिकों की संख्या और हथियारों की दृष्टि से वे यथेष्ट थे। उन्होंने उस इलाके में हमारे सभी सैनिकों को बंदी बना लिया, हमारी सेना के हाथ से सभी प्रकार के हथियार और गोलाबारूद छीन लिया और जहां से आए थे, उसी सीमा रेखा के पीछे लौट गए। इस दृष्टि से उन्होंने जनविहीन भूखंड में प्रवेश नहीं किया और कहीं भी भारतीय भूखंड में प्रवेश नहीं किया।

चीनियों ने चले जाने के बाद शांति स्थापना के लिए फिर कोशिश की। वे एक बार फिर जनविहीन भूखंड में लौट आए और प्रत्येक सैनिक, प्रत्येक हथियार और प्रत्येक वस्तु, जो वे हमारी सेनाओं के कब्जे से छीनकर ले गए थे, सब लौटा दिया और शुरू में वे जहां से आए थे, उसी रेखा के पीछे लौट गए। मैंने जो कहा है, इस विषय पर प्रकाशित पुस्तकों से इन सब घटनाओं को मिलाकर आप देख सकते हैं।

इसलिए अब यह एकदम साफ है कि 1962 में तथाकथित ‘भारत पर चीन का आक्रमण’, उस प्रकार भारत पर कोई आक्रमण नहीं हुआ है। इसलिए कि चीनी फौज ऐसे किसी इलाके में नहीं पहुंची जो भारतीय प्रशासन के हाथों में हो और वास्तविक लड़ाई ऐसे इलाके में ही सीमाबद्ध थी जिसे दोनों देशों की सरकार ने जनविहीन भूखंड के रूप में घोषित किया और मान लिया था।

आखिरी बात। चीनियों के बयान के अनुसार भारत ने ही पहले चाउ एन लाई और जवाहरलाल के बीच हुई संधि को तोड़ा कि भारत और चीन एकतरफा ढंग से इस विशेष भूखंड में प्रवेश नहीं कर सकते। सच पूछिए तो चीनियों ने केवल उस विशेष भूखंड से हमारी सेनाओं को भगा दिया था और वह भी पहले से कई बार सावधान करने के बाद। और उसके बाद भी, जैसा कि सभी मानते हैं, वे अपने प्रशासन के इलाके में वापस लौट गए। इसलिए इस तरह की घटना को ‘भारत पर चीन के आक्रमण’ नाम देना जरा भी सही नहीं है और अभी भी ठीक नही हो रहा है। 5.2.1973

पंडित सुंदरलाल।

(साभारः ‘नक्सलबाड़ी के दौर में’ नामक पुस्तक से)

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This post was last modified on July 3, 2020 8:09 pm

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