Friday, August 19, 2022

मुख्यमंत्री के वादों के बावज़ूद झारखंड के आदिवासी-मूलवासी वन अधिकार से वंचित

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सत्तारूढ़ दल झामुमो और कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्रों में वन अधिकार कानून को सही से लागू करने एवं जंगल में रहने वाले आदिवासी-मूलवासियों को वन पट्टा देने व जंगल पर पूर्ण अधिकार देने का वादा किया था। सरकार बनने के पूर्व और उसके बाद भी कई बार इस विषय में घोषणा हुई है। लेकिन ज़मीनी स्थिति इन वादों के विपरीत है।

अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 अंतर्गत वन आश्रित समुदायों के कई अधिकार हैं। उनमें से एक अधिकार है कि जो वन आश्रित लोग 13.12.2005 के पहले से वन भूमि पर स्वयं खेती करते रहे हैं और अपनी आजीविका के लिए वनों पर निर्भर हैं, वे उस जमीन (अधिकतम 4 हेक्टेयर) पर मालिकाना अधिकार के लिए पात्र होंगे।

2008 में जब से यह कानून लागू हुआ, वन विभाग लोगों को उनके अधिकार से वंचित करने की कोशिश करता रहा है। कानून के शुरुआती दिनों में विभाग द्वारा आदिवासी-मूलवासियों पर केस मुकदमा और वन रोपण के नाम पर वन भूमि से बेदखल करने के अनेक मामले थे। दुःख की बात है कि अभी भी एक तरफ़ प्रशासन द्वारा आदिवासी-मूलवासियों को वन अधिकार से वंचित रखा जा रहा है और दूसरी ओर वन विभाग द्वारा आतंक मचाया जा रहा है।

हाल में दो मामले सामने आए हैं। लातेहार ज़िला के बरियातू प्रखंड के गडगोमा गाँव में 25 अन्य परम्परागत वन निवासी व्यक्तिगत वन पट्टों के लिए एवं गाँव समाज की ओर से सामुदायिक वन अधिकार के लिए 2015 में पूर्ण अभिलेख के साथ आवेदन की क़ानूनी प्रक्रिया को पूरा करके अनुमंडल स्तरीय वन अधिकार समिति को जमा किए थे। लेकिन आज तक न व्यक्तिगत पट्टा मिला और न सामुदायिक।

7 दिसम्बर, 2021 को वन विभाग के कर्मी पट्टे के लिए आवेदन किए हुए ज़मीन पर वन रोपण करने पहुंच गए। लोगों द्वारा विरोध करने पर उन्होंने धमकी दिया कि केस दर्ज कर जेल भेज देंगे। 2022 में वन विभाग द्वारा ज़मीनों पर पिट कोड़ना शुरू किया गया। 11 फ़रवरी 2022 को गाँव की महिलाओं ने कुछ गड्ढों में मिट्टी भर दी। उसी दिन शाम को वन विभाग के अधिकारियों ने पुलिस बल के साथ आकर गाँव के दो युवा पुरुषों – दिनेश राणा, पिता-प्रवेश राणा और रंजन राणा, पिता-अमेरिका राणा को पकड़ लिया। 

जब उन्हें थाना से अनुरोध कर छुड़ाने के लिए ग्रामीण पुलिस पिकेट बरियातू पहुंचे, तो वन विभाग के कर्मियों द्वारा उनके साथ धक्का-मुक्की की गयी। पिट भरने और सरकारी काम में बाधा डालने के आरोप में दोनों युवा व उनके पिताओं पर मामला दर्ज कर दिया गया। युवाओं को जेल भेज दिया गया। वन विभाग द्वारा प्राथमिकी में पिताओं को फ़रार घोषित कर दिया गया जबकि दोनों थाने में ही उपस्थित थे और उनके साथ बल प्रयोग (धक्का-मुक्की) किया गया। दोनों निर्दोष युवा एक महीने तक जेल में रहे। अब उनके पिताओं को डर है कि पुलिस उन्हें भी पकड़ कर ले जाएगी। 

वन अधिकार क़ानून के धारा 4(5) में स्पष्ट उल्लेख है कि “जैसा अन्यथा उपबंधित हैं, उसके सिवाय किसी वन में रहनेवाली अनुसूचित जनजाति या अन्य परंपरागत वन निवासियों का कोई सदस्य उसके अधिभोगाधीन वन भूमि से तब तक बेदखल नहीं किया जायेगा या हटाया जायेगा, जब तक कि मान्यता और सत्यापन प्रक्रिया पूरी नहीं होती है।” यह स्पष्ट है कि वन विभाग खुले आम कानून का उल्लंघन कर रहा है।

ऐसी ही स्थिति मनिका प्रखंड के बेयांग गाँव की भी है। 40 अन्य परंपरागत वन अधिकार दावेदारों ने 2018 में व्यक्तिगत पट्टे के लिए और सामुदायिक अधिकार के लिए 2021 में दावा जमा किया था। लेकिन अभी तक उन्हें वन पट्टा नहीं मिला।

दिसम्बर 2021 में विभाग ने उन ज़मीनों पर वन रोपण की तैयारी शुरू कर दिया है। 4 जनवरी 2022 को ग्रामीणों ने वन प्रमंडल पदाधिकारी (सामाजिक वानिकी) लातेहार को लिखित शिकायत दिया कि बिना ग्राम सभा के अनुमति के वन रोपण किया जा रहा है। साथ ही, उनके पारंपरिक कब्ज़े वाले भूमि पर रोपण नहीं करने का अनुरोध किया। कोई सुनवाई नहीं होने पर ग्रामीणों ने दो बार DFO के पास जा कर अनुरोध किया,  आश्वासन तो मिला लेकिन गाँव में काम चलता रहा। 

अंत में अनुसूचित जाति के एक दावेदार कुंदन कुमार भुइया ने अनुसूचित जाति जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 के सुसंगत धाराओं और IPC धारा 166 अंतर्गत वन प्रमंडल पदाधिकारी, अन्य वन पदाधिकारी और गाँव के कुछ दलालों के विरुद्ध प्राथमिकी करने के लिए स्थानीय थाने में आवेदन दिया। थाना इंचार्ज ने आवेदन स्वीकार नहीं किया। 20 जनवरी 2022 को आवेदन को पंजीकृत डाक द्वारा थाना को भेजा गया एवं स्थानीय विधायक के दबाव के बाद 23 जनवरी को आवेदन स्वीकार किया गया। इससे संबंधित पुलिस अधीक्षक को भी शिकायत की गयी लेकिन आज तक प्राथमिकी दर्ज नहीं की गयी है।

ऐसे मामले लातेहार ज़िला के बालुमाथ प्रखंड के शांति गाँव, गुमला के कोयनजारा व चटकपुर, गढ़वा के रमना प्रखंड के बनखेता व सपाही, धुरकी प्रखंड के बिशुनिया, भंडरिया प्रखंड के रामर, महुगाई आदि में भी हैं। ये केवल चंद उदहारण मात्र हैं जो राज्य में वन अधिकार कानून एवं वनों पर निर्भर आदिवासी-मूलवासियों की स्थिति को दर्शाता है। राज्य में लाखों व्यक्तिगत वन अधिकार दावे एवं हजारों एकड़ के सामुदायिक दावे लंबित हैं। मुख्यमंत्री के वादे और प्रशासन-वन विभाग की कार्रवाई  के बीच एक बड़ी खाई दिख रही है।

इन तमाम स्थितियों के मद्देनजर झारखंड जनाधिकार महासभा ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर राज्य सरकार से निम्न मांगें की हैं:

•आदिवासी-मूलवासियों की कब्ज़े वाले वन भूमि पर वन रोपण के नाम पर लोगों को बेदखल करना बंद किया जाए।

•लंबित वन अधिकार दावों को अविलम्ब निपटाया जाए और वन अधिकार पत्र निर्गत किए जाएं।

•निर्दोष लोगों पर वन विभाग द्वारा दर्ज सभी केस वापस लिया जाएं। आदिवासी-मूलवासियों के वन अधिकारों व मानवाधिकार के उल्लंघन के ज़िम्मेवार वन विभाग के दोषी अधिकारियों के विरुद्ध कानूनी करवाई की जाए।

•वन अधिकारों को निहित करने की प्रक्रिया में वन विभाग के अधिकारियों के गैरकानूनी दखलंदाजी को बंद किया जाए।

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