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Categories: बीच बहस

संवैधानिक पुनर्समीक्षा की मांग करते हैं जस्टिस अरुण मिश्रा के फैसले

उच्चतम न्यायालय ने 2012 में कहा था कि एक जज को सीजर की पत्नी की तरह संदेह से ऊपर होना चाहिए। लोगों का न्याय व्यवस्था में भरोसा होना उन जजों पर निर्भर करता है, जो विभिन्न मामलों में फैसले सुनाते हैं। लोकतंत्र की कामयाबी और कानून के नियमों, न्याय व्यवस्था और न्यायिक प्रक्रिया के मजबूत बने रहने के लिए ये जरूरी है कि हर जज पूरी ईमानदारी और भेदभाव से दूर रहते हुए अपनी ड्यूटी निभाए।

इस मानक पर उच्चतम न्यायालय से 2 सितंबर 2020 को रिटायर हुए जस्टिस अरुण मिश्रा का कोई  भी निर्णय खरा नहीं उतरता, क्योंकि उनको पूर्वाग्रह से ग्रस्त न्यायाधीश माना जाता रहा है और उन्होंने अपने विभिन्न निर्णयों में इसे प्रदर्शित भी किया है। संविधान और कानून के बजाय अंतरात्मा से फैसले देने की बात कहने वाले जस्टिस अरुण मिश्रा के तमाम विवादास्पद फैसलों की समीक्षा जरूरी हो गई है।

आरसी चंदेल केस [2012(8) एससीसी 58]  फैसले के पैरा 37 में उच्चतम न्यायालय ने  कहा है कि एक न्यायाधीश को निर्दोष अखंडता और निर्बाध स्वतंत्रता का व्यक्ति होना चाहिए। उच्च नैतिक मूल्यों के साथ उसे अपने कर्तव्यों के प्रति ईमानदार होना चाहिए। जब एक मुकदमेबाज अदालत में प्रवेश करता है, तो उसे यह महसूस करना होगा कि न्यायाधीश जिसके समक्ष उसका मामला आया है, वह निष्पक्ष रूप से और बिना किसी पूर्वाग्रह के न्याय प्रदान करेगा। एक सामान्य व्यक्ति की तुलना में न्यायाधीश के व्यक्तिगत आचरण के मानक बहुत अधिक हैं।

यह कोई बहाना नहीं है कि चूंकि समाज में मानक गिर गए हैं, ऐसे न्यायाधीश जो समाज से लाए गए हैं उनसे उच्च मानकों और नैतिक दृढ़ता की उम्मीद नहीं की जा सकती है। सीज़र की पत्नी की तरह एक न्यायाधीश, संदेह से ऊपर होना चाहिए। न्यायिक प्रणाली की विश्वसनीयता इसके न्यायाधीशों पर निर्भर है। एक लोकतंत्र के बचे रहने के लिए कानून के शासन को बने रहने के लिए न्याय प्रणाली और न्यायिक प्रक्रिया को मजबूत होना चाहिए और प्रत्येक न्यायाधीश को ईमानदारी, निष्पक्षता और बौद्धिक ईमानदारी के साथ अपने न्यायिक कार्यों का निर्वहन करना चाहिए। जस्टिस अरुण मिश्र इस मानक पर कहीं से भी खरे नहीं उतरते।

जस्टिस अरुण मिश्रा सारी न्यायिक मर्यादाओं को ताख पर रखकर और उच्चतम न्यायालय द्वारा पूर्व में दिए गए न्यायिक दृष्टांतों की अनदेखी करके व्यवस्था के पक्ष में फैसला देने के लिए कुख्यात न्यायाधीश रहे हैं। जस्टिस  अरुण मिश्रा उन पीठों का हिस्सा रहे हैं, जिन्होंने एक नहीं, दो पूर्व चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा और रंजन गोगोई के पक्ष में खुलकर फैसले सुनाए। इसके लिए उन्होंने कभी भी खेद व्यक्त नहीं किया, बल्कि रिटायर होते समय अपने सभी फैसलों के पीछे अपनी अंतरात्मा की आवाज होने की बात कहकर न्यायोचित ठहराने की असफल कोशिश की।

जस्टिस अरुण मिश्र ने मेडिकल प्रवेश घोटाले में भ्रष्टाचार का आरोप झेल रहे तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्र को बचाया, क्योंकि मेडिकल प्रवेश घोटाले में संघ से जुड़े कुछ बड़े लोगों और कुछ संघी पत्रकारों के भी नाम आ रहे थे। यही नहीं तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्र द्वारा नौ जजों की वरिष्ठता अतिक्रमित करके महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई जस्टिस अरुण मिश्र को दी जा रही थी, इसका भी एहसान चुकता करना था। ऐसा करना क्या जस्टिस अरुण मिश्र की अंतरात्मा की आवाज थी या शुद्ध व्यक्तिगत रागद्वेष और वैचारिक लगाव की बात थी।  

जस्टिस अरुण मिश्रा की सदस्यता वाली तीन जजों की पीठ ने 14 नवंबर 2017 को वरिष्ठ वकील कामिनी जायसवाल की याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने अदालत की निगरानी में मेडिकल कॉलेज घूस मामले की एसआईटी जांच की मांग की थी। सीबीआई एक मेडिकल कॉलेज के मामले की जांच कर रहा थी। कॉलेज के लिए कहा गया था कि वह अपने पक्ष में फैसला सुनाने के लिए हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जजों को घूस देने की कोशिश कर रहा है। वरिष्ठ वकीलों प्रशांत भूषण, कामिनी जायसवाल और दुष्यंत दवे ने चीफ जस्टिस दीपक मिश्र के शामिल होने पर चिंता जताई, क्योंकि उन पर आरोप लगाए जा रहे थे, हालांकि सीबीआई की एफआईआर में उनका नाम नहीं था।

कैंपेन फॉर ज्यूडीशियल एकाउंटेबिलिटी एंड रिफॉर्म्स (सीजेएआर) ने 1 दिसंबर 2017 को इसी मामले पर दूसरी पीआईएल दायर की। इसे भी जस्टिस आरके अग्रवाल, एएम खानविलकर और अरुण मिश्रा की तीन सदस्यीय बेंच ने खारिज कर दिया। साथ ही सीजेएआर पर 25 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया गया।

मेडिकल कॉलेज घूस मामले में उस दौर के सीजेआई दीपक मिश्रा के खिलाफ आरोप थे। उन्होंने कहा था कि उन्हें यह तय करने का अधिकार है कि कौन सा जज इस मामले की सुनवाई करेगा। जांच की मांग करने वाली याचिकाओं को खारिज करने से विवाद उठा था, चूंकि यह मामला सीजेआई से संबंधित था और ‘मास्टर ऑफ द रोस्टर’ यानी चीफ जस्टिस के विशेषाधिकार के अनुसार, वह सिर्फ बेंच बनाने और मामले आवंटित करने के अधिकार का लाभ उठा सकते हैं।

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के बाद रंजन गोगोई नये चीफ जस्टिस बने। समूचे विधिक और न्यायिक सर्किल में यह तथ्य सर्वविदित है कि भाजपा सरकार के पावरफुल मंत्री अरुण जेटली से रंजन गोगोई की गेटिंग-सेटिंग हो गई थी, वर्ना चार जजों की प्रेस कांफ्रेंस में शामिल होने के बाद उनके चीफ जस्टिस बनने पर गंभीर संकट माना जा रहा था। 

तत्कालीन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई पर 20 अप्रैल 2019 को यौन शोषण के आरोप लगाए गए। इसकी जांच के लिए विशेष पीठ बनाई गई तो उसमें भी जस्टिस रंजन गोगोई ने जस्टिस अरुण मिश्रा को रखा, क्योंकि उन्हें अच्छी तरह से पता था कि डंके की चोट पर जस्टिस अरुण मिश्रा उनके मन माफिक आदेश पारित करेंगे। औचित्य के सभी नियमों को ताख पर रखकर सीजेआई की अगुवाई में वह विशेष पीठ बनाई गई थी, यह बात और है कि बाद में उनका नाम रिकॉर्ड से हटा दिया गया।

इसके बाद जस्टिस मिश्रा की अगुवाई में तीन सदस्यीय बेंच ने इस बात पर विचार किया कि क्या सीजेआई को ब्लैकमेल करने के लिए एक बड़ा षड़यंत्र रचा गया था। इस पीठ ने वकील उत्सव बैंस को नोटिस जारी किया। इसमें यह दावा किया गया था कि सीजेआई के खिलाफ यौन शोषण के आरोप न्यायपालिका को अस्थिर करने के षडयंत्र का हिस्सा थे।

जस्टिस अरुण मिश्रा उस विशेष पीठ का हिस्सा थे जो उस समय स्वत: संज्ञान मामले की सुनवाई के लिए बैठी थी जब उच्चतम न्यायालय की एक पूर्व कर्मचारी द्वारा तत्कालीन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के खिलाफ यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए गए थे  जो मीडिया रिपोर्टों के माध्यम से सामने आए थे। अदालत द्वारा नियुक्त न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) एके पटनायक की अध्यक्षता वाली एक समिति ने अंततः निष्कर्ष निकाला कि सीजेआई गोगोई को फंसाने के लिए एक बड़ी साजिश रची गई थी, जिसके लिए और जांच की आवश्यकता है।

बेटियों को पैतृक संपत्ति में बराबर की हिस्सेदारी देकर सुर्खियां बटोरने वाले जस्टिस  अरुण मिश्रा, जस्टिस गोगोई के विरुद्ध यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने वाली महिला को निष्पक्ष न्याय देने में क्यों विफल हो गए? अंतरात्मा की आवाज कहां तिरोहित हो गई?

रिटायर्ड जस्टिस एके पटनायक को मामले की जांच करने के बाद विस्तृत रिपोर्ट सौंपने को कहा गया। यौन उत्पीड़न मामले की जांच के बाद रिटायर जस्टिस एके पटनायक ने सितंबर 2019 के अंत में एक बंद लिफाफे में अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंपी। इस रिपोर्ट पर अब तक सुनवाई नहीं हुई है और जस्टिस अरुण मिश्रा की अध्यक्षता में बनी स्पेशल बेंच ने अप्रैल 2019 से इस पर कोई सुनवाई नहीं की है। सुप्रीम कोर्ट की जिस कर्मचारी ने यौन शोषण के आरोप लगाए थे, उसे जनवरी 2020 में बहाल कर दिया गया और उसके खिलाफ आपराधिक मामले रद्द कर दिए गए। मार्च 2020 में सीजेआई गोगोई को राज्यसभा में नामांकित कर दिया गया।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

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This post was last modified on September 5, 2020 4:21 pm

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