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निर्धनता का न्यायशास्त्र

उन्होंने बॉर्डर पर पानी भरे लोटे में नमक डालते हुए कहा “जा रहे हैं अपने घर और फिर कभी लौट कर नहीं आयेंगे।” संकल्प कहने लगा “देश आज़ाद हो गया। मगर बंधुआ मजदूरी ख़त्म नहीं हुई। हम बंधुआ मज़दूरों को रोटी खाने के लिए, महीने भर में सौ प्याज़ दिए जाते हैं। जो मज़दूर (रोटी) प्याज़ खाने से मना करते हैं, उनसे सौ रुपये ज़ुर्माना वसूला जाता है। और जो मज़दूर किसी तरह मालिक के दड़बे से भाग निकलते हैं, उन्हें खाकी वर्दी वाले सौ डंडे मार रहे हैं।”

संकल्प आँसू पोंछते हुए बोलता रहा “बहुमंज़िला लोकतंत्र में तरह-तरह की बीमारियाँ फैलती रही हैं। और इस तरह बीमार लोकतंत्र में, कुछ गरीब मज़दूर प्याज खाने से मर जाते हैं। कुछ डंडों की मार से जान गंवा देते हैं। और कुछ घर पहुँचते-पहुँचते, सड़क दुर्घटना या भूख से दम तोड़ देंगे। देखो ये मासूम बच्चे..गर्भवती स्त्रियाँ…! ना कोई उनकी अपील सुनता है, ना दलील।”

कुछ दिन बाद इतिहास के विद्वान विचारकों ने बताया “दड़बा छोड़-पिंजड़ा तोड़ भागे मज़दूरों को, किसी से भी डर नहीं रहा- ना बीमारी से, ना भूख से और ना मरने से। दरअसल उन्हें किसी की भी बात पर, भरोसा नहीं रह गया था। भले ही वो साहब हो या लाट साहब! वो सब बीवी, बच्चों और बूढ़ी माँ को बचाने में ‘गूँगे’ हो गए थे।”

महानगर सोचते रहे कि ना जाने कैसे उनके पाँवों में पहिये लग गए हैं। उन्होंने भूख-प्यास पर विजय पा ली है। उनके लिए दिन-रात, धूप-छाँव, सुख-दुख, मान-अपमान, और जीवन-मृत्यु का भेद ही ख़त्म हो गया है। वो प्रकाश गति से भागने-दौड़ने लगे हैं और पूरी दुनिया को कदमों से नापने लगे हैं। दिल्ली से गाँधी नगर, वाराणसी, गोरखपुर, पाटलिपुत्र कितनी दूर है!”

मुझे लगता है कि निस्संदेह अधिकाँश दिहाड़ी मज़दूर, महानगरों में कभी लौट कर नहीं आएंगे। हालांकि गाँवों में भी कितने दिन टिक पायेंगे-कहना कठिन है। पिछले दो ढाई महीनों में (मार्च 2020-मई 2020) कॅरोना बीमारी के अलावा सैकड़ों लोग भूख, सड़क दुर्घटना, पैदल या रेल यात्रा के दौरान मारे गए। कुछ गरीब-बेरोजगार और परिवार की देखभाल कर पाने में असक्षम व्यक्तियों ने आत्महत्या कर ली। न्यायपालिका ने लंबी चुप्पी के बाद प्रवासी मज़दूरों की देखभाल के लिए सरकार (विशेषकर राज्य सरकारों) को दिशा-निर्देश जारी किए हैं। समाजशास्त्र के विद्वान विद्यार्थी आत्महत्या और बच्चों की हत्या का मनोविज्ञान समझने-समझाने में लगे हैं।

गरीबी, भुखमरी और आर्थिक संकट के कारण, माँ द्वारा अपने ही बच्चों की हत्या और फिर आत्महत्या का प्रयास। युवा दंपति द्वारा आत्महत्या के प्रयास में बच्ची की मौत। निर्धनता और कानून से जुड़े मद्रास उच्च न्यायालय के दो महत्वपूर्ण निर्णय, मेरी स्मृति में ना जाने कब से जमा हैं।

पहला मामला करीब पचास साल पहले का है। मद्रास के सलेम जिले के एक गाँव में श्रीमती श्रीरंगी का विवाह 14 साल पहले हुआ था। उसके पाँच बच्चे थे। दो बेटे, तीन बेटियाँ। एक साल से लेकर 13 साल तक की उम्र के। पति अपनी रखैलों के साथ रहने लगा था। वह खुद दो रुपये से अधिक नहीं कमा पाती थी। निर्धनता के कारण, बच्चे बीमार और भूखे रहते। डॉक्टर की फीस और दवा के पैसे जुटाना मुश्किल था। देवर-जेठ से माँगती तो उनकी नज़र उसकी देह पर रहती। वो नाज़ायज़ फायदा उठाने की कोशिश करते, जो श्रीरंगी को मंजूर ना था।

एक दिन गाँव में शोर मचा कि कोई कुएँ में गिर गया है।अड़ोस-पड़ोस के लोग जमा हो गए। एक आदमी पाइप के सहारे कुएँ में उतरा और एक महिला को बाहर निकाला गया। उस समय वह बेहोश थी। बाद में होश आया तो उसने बताया कि उसने अपने पाँचों बच्चों को मार दिया है और अब वह जीना नहीं चाहती। ढूँढा तो घर के अंदर पाँच बच्चों की लाश मिली।

रिपोर्ट दर्ज होने के बाद जाँच-पड़ताल शुरू हुई। श्रीरंगी ने अपना अपराध स्वीकार किया और अपने बयान में बताया कि किन परिस्थितियों में उसने ऐसा किया। गवाहों के बयान और पोस्ट मॉर्टम रिपोर्ट के आधार पर सेशन जज ने पाँच बच्चों की हत्या के हर अपराध में उम्र कैद और आत्महत्या करने के प्रयास के ज़ुर्म में एक साल कैद की सज़ा सुनाई। परिस्थितियों को देखते हुए जज साहब ने यह सुझाव भी दिया कि सरकार चाहे तो सज़ा माफ़ की जा सकती है।

मद्रास हाईकोर्ट के सामने जब अपील सुनवाई पर आई तो न्यायमूर्तियों ने सेशन के फैसले को सही ठहराया। न्यायमूतियों (वी वी राघवन और के एन मुदलियार) ने फैसले में लिखा है, ”हमारी राय है कि निर्धनता की आड़ में गंभीर अपराधों को उचित नहीं ठहराया जा सकता। आरोपी महिला का इकबालिया बयान भूख और गरीबी की एक दु:खद दास्तान सुनाता है। वह और उसके पांच बच्चे भुखमरी से परेशान थे। अपने ही पति द्वारा उसकी और उसके पाँच बच्चों की उपेक्षा की जा रही थी। पति अपनी पत्नी और बच्चों के प्रति ज़िम्मेदारी का एहसास किए बिना, एक या दो रखैलों के साथ अवैध संबंध में लिप्त था।

उसके बच्चे बीमारी से त्रस्त थे और कम से कम एक बच्चा चेचक से पीड़ित होने के कारण अंधा हो गया था। अन्य बच्चे भी बीमारी और भुखमरी से अक्षम थे। जब उसने अपने देवर-जेठ से कुछ छोटी-मोटी आर्थिक मदद मांगी, तो उन्होंने उस स्त्री की गरिमा के साथ खिलवाड़ किया। उसने दुर्लभता का एक दुर्लभ गुण (सतीत्व) प्रदर्शित किया। लंबे समय तक उसे अपने और अपने पांच बच्चों के निरंतर अस्तित्व के लिए, इस दुनिया में कुछ भी न्याय संगत नहीं मिल पाया।

इस तरह वह पूरी तरह हताश थी। उसने अपने पांच बच्चों को एक के बाद, पानी के टब में डुबो कर मार डाला। अपने बच्चों के लिए दया के अपने मिशन को सफलतापूर्वक पूरा करने के बाद (उन्हें मारकर) खुद कुएं की ओर चल दी। इस पीड़ादायक यात्रा में दूसरी अज्ञात दुनिया में जाने के लिए, उसने खुद को उस कुएं में डुबो दिया। लेकिन दुर्भाग्य से एक राहगीर (कंदस्वामी) द्वारा उसे बचा लिया गया था।”

न्यायमूर्तियों ने 20 जनवरी, 1931 के एक सरकारी आदेश का हवाला देते हुए निर्देश दिया कि श्रीरंगी को मद्रास सेवा सदन या ऐसी किसी अन्य संस्था में रखा जाए। समुचित ट्रेनिंग दी जाए ताकि वह अपने पैरों पर खड़ी हो सके। (1973, पार्ट 1, मद्रास लॉ जर्नल 231)

दूसरा केस लगभग साठ साल पहले का  है। नारायनकुप्पम गाँव में वेलु और मरगाथम उर्फ लक्ष्मी, अपनी डेढ़ साल की बेटी रानी के साथ रहते थे। पति-पत्नी को करने के लिए, कोई काम नहीं मिल रहा था। कई दिनों से दोनों भूखे और परेशान थे। एक दिन (7 जनवरी,1959) उन्होंने तय किया कि वे कुएं में कूद कर, अपनी जान दे देंगे। उन्हें यह चिंता भी थी कि उनके बाद रानी को कौन पालेगा।

वेलु और लक्ष्मी ने कुएं में कूदने से पहले, एक दूसरे को रस्सी से बांध लिया। कुएं में कूदे तो लक्ष्मी के हाथ से रानी फिसल कर कुएं में गिर गई। राह चलते एक व्यक्ति (राज गोपाल) ने कुछ शोर सुना तो फौरन कुएं में कूद गया। उसने किसी तरह उन्हें तो बचा लिया, मगर बेटी रानी ढूँढने पर भी नहीं मिली। बाद में रानी की लाश बरामद हुई। दोनों पर मुकदमा चला। वेलु ने बचाव में यही कहा कि बेटी हाथ से फिसल कर गिर गई थी। सेशन कोर्ट ने रानी की हत्या और आत्महत्या के प्रयास के आरोप में दोनों को उम्र कैद की सज़ा सुनाई।

वेलु और लक्ष्मी ने हाई कोर्ट में अपील दायर की। मद्रास हाई कोर्ट के न्यायमूर्तियों (रामास्वामी और अनंतनारायण) ने अपील का फैसला (1961) सुनाते हुए कहा “यह मामला बेहद दुःखद और दयनीय है। बच्चे की मौत वास्तव में आर्थिक असुरक्षा के कारण हुई थी। इस तथ्य के कारण कि दोनों आरोपी खुद को विनाश से बचाने का प्रयास कर रहे थे। गरीबी और भूख के कारण ही, उन्होंने ऐसा कदम उठाया। तमाम तथ्यों को देखते हुए हमें लगता है कि उम्र कैद की सज़ा की बजाए, डेढ़ साल कैद की सज़ा न्यायोचित होगी।” (ए आईआर 1961 मद्रास 498)

कानून और स्थितियाँ वैसी ही हैं। ऐसे विकट समय में विचारणीय प्रश्न यह है कि ऐसे दुःखद मामलों में भी, कानून और न्यायपालिका की भूमिका को कैसे देखा-समझा जाये? और कैसे देखा-समझा जाए गरीबी, भूख, रोटी और कानून का न्यायशास्त्र? कैसे व्याख्यायित हो संविधान, राज्य और आम नागरिक के बीच अधिकार और उत्तरदायित्व?

एम ए एंटोनी बनाम केरल (2018) में परिवार के छह लोगों की हत्या के जुर्म में फाँसी की सज़ा को उम्र कैद में बदलते हुए, सुप्रीमकोर्ट के न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर और एस अब्दुल नज़ीर ने कहा कि गरीबी की आड़ में किये अपराध क्षमा योग्य नहीं। हाँ! सज़ा के सवाल पर आर्थिक-सामाजिक स्थितियों पर विचार करना न्याय के हित में अपरिहार्य है। इससे पहले के मामलों में आर्थिक-सामाजिक स्थितियों पर विचार ही नहीं किया गया था।

कॅरोना लॉक डाउन के चलते आर्थिक संकट, निरंतर गहराता जा रहा है। अभी इसकी मार मज़दूर-किसान और बेरोजगार झेल रहे हैं। लेकिन आगे आने वाले महीनों में, मध्यम वर्ग को भी भयावह आर्थिक संकट का सामना करना पड़ सकता है। नौकरी छूट गई, किश्तें चुकाने को पैसा नहीं, बचत खर्च हो गई, कर्ज़ और ब्याज का बोझ बढ़ेगा, उधार डूब गया, उत्पादन होगा नहीं, होगा तो बाज़ार में उपभोक्ता नहीं, खरीदने की क्षमता नहीं। परिणाम स्वरूप आर्थिक दबाव और सामाजिक तनाव में अवसाद, आत्महत्याओं के आँकड़े भी बढ़ सकते हैं। अगर समय रहते नई स्थितियों

परिस्थितियों का समुचित समाधान नहीं तलाशा गया तो मानसिक विक्षिप्तता और आत्मघाती प्रयासों को रोकना संभव नहीं हो पाएगा। क्या इन आशंकाओं को, निराधार कहा जा सकता है? अगर नहीं तो आओ मिलकर तलाशें जीवन के नए रास्ते।

(अरविंद जैन सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील हैं। और महिला तथा गरीबों और वंचितों के सवालों पर लिखते रहते हैं।)

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This post was last modified on June 15, 2020 2:15 pm

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