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कप्पन की पत्नी का यक्ष प्रश्न- क्या सरकार संघ से जुड़े पत्रकारों को करेगी गिरफ्तार!

जेपी सिंह November 22, 2020

केरल के पत्रकार सिद्दीक कप्पन की पत्नी रायनाथ कप्पन ने कहा है कि उनके पति का  पीएफआई से कोई संबंध नहीं है, लेकिन तर्क के लिए ही सही यदि भले ही वे उसके सदस्य हों  तो सवाल यह है कि क्या वे उन पत्रकारों को गिरफ्तार करेंगे जो आरएसएस या भाजपा से संबंध रखते हैं? कप्पन की पत्नी रायनाथ कप्पन का यह यक्ष प्रश्न केवल केंद्र और उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकारों से ही नहीं बल्कि न्यायपालिका से भी है, क्योंकि पूरा देश देख रहा है की गोदी मीडिया और संघ समर्थक पत्रकारों, समीर चौधरी, अमीश देवगन, अंजना ओम कश्यप, रजत शर्मा, दीपक चौरसिया, समीर चौधरी, अमीश देवगन, रुबिका लियाकत, जैसों के लिए सरकार के साथ न्यायपालिका भी उदार दिखती है। गिरफ़्तारी के सात दिन के भीतर जहां लोअर कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के बाद अर्णब गोस्वामी जेल से रिहा हो गए, वहीं केरल के पत्रकार सिद्दीक कप्पन पांच अक्तूबर से जेल में हैं, लेकिन उनको अब तक कोई राहत नहीं मिली है। 

पत्रकार, सरकार की बदले की कार्रवाई, उच्चतम न्यायालय और स्वतंत्रता के संवैधानिक मूल  अधिकार पूरे देश में चर्चा का विषय बने हुए हैं। हाल ही में आत्महत्या के लिए उकसाने के एक मामले में रिपब्लिक न्यूज़ चैनल के मालिक और पत्रकार अर्णब गोस्वामी को सुप्रीम कोर्ट से गिरफ़्तारी के एक सप्ताह के भीतर ज़मानत मिली है, लेकिन केरल के एक पत्रकार सिद्दीक़ कप्पन का मामला भी सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है और प्रक्रियात्मक सवाल जवाब जारी है और कई बार सिद्दीक़ कप्पन के वकील कपिल सिब्बल से कहा जा चुका है कि वे इलाहाबाद हाई कोर्ट क्यों नहीं जाते।

पत्रकार कप्पन को उत्तर प्रदेश पुलिस ने पांच अक्तूबर को तब गिरफ्तार कर लिया था जब वह एक दलित महिला के साथ बलात्कार और हत्या मामले की कवरेज के लिए हाथरस जा रहे थे। उनके साथ तीन और लोगों को गिरफ्तार किया गया था, जिसमें दो आंदोलनकारी छात्रों के साथ एक टैक्सी ड्राइवर भी शामिल है। यूपी पुलिस ने इस मामले में सात अक्तूबर को पहली एफ़आईआर दर्ज की। इस एफ़आईआर में यूएपीए के सेक्शन 17 और 18, भारतीय दंड संहिता के सेक्शन 124A (राजद्रोह), 153A (दो समूहों के बीच वैमनस्य बढ़ाने), 295A (धार्मिक भावनाएं आहत करने) और आईटी एक्ट के सेक्शन 62, 72, 76 लगाए गए थे।

कप्पन की हेबियस कॉर्पस याचिका पर 12 अक्तूबर को चीफ़ जस्टिस बोबडे, एएस बोपन्ना, वी रामासुब्रमनियन की बेंच ने पहली सुनवाई की। कप्पन के लिए केस लड़ रहे वकील कपिल सिबल ने कोर्ट को बताया था कि उनके मुवक्किल से परिवार को और वकील को नहीं मिलने दिया जा रहा है। उनकी मांग थी कि कोर्ट राज्य सरकार को नोटिस जारी करे और मथुरा ज़िला जज को जेल में मानवाधिकार उल्लंघन की जांच करने का निर्देश दे, लेकिन उच्चतम न्यायालय ने राज्य सरकार को नोटिस नहीं दिया और वकील सिबल को पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट जाने की सलाह दी, लेकिन सिबल के आग्रह पर कोर्ट ने चार हफ्ते बाद की तारीख़ दी।

16 नवंबर की सुनवाई के दिन कोर्ट ने कहा कि वो आर्टिकल 32 की याचिकाओं को बढ़ावा नहीं देना चाहता। हालांकि कोर्ट उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस भेजने के लिए राज़ी हो गया। उसी नोटिस पर 20 नवंबर को उत्तर प्रदेश सरकार ने कोर्ट ने अपना जवाब दाखिल किया है। सरकार ने कहा है कि कप्पन पीएफआई संस्था के सचिव हैं और हाथरस में कवरेज के लिए जा रहे थे, जबकि जिस अख़बार में वह काम करने का दावा करते हैं, वो 2018 में बंद हो चुका है। दूसरी ओर, बाकी तीन अभियुक्तों की हेबियस कॉर्पस याचिका पर सुनवाई इलाहाबाद हाई कोर्ट में चल रही है और अगली सुनवाई 14 दिसंबर को होगी।

दूसरी और 11 नवंबर को पत्रकार अर्णब गोस्वामी को उच्चतम न्यायालय से ज़मानत मिली है, जिसमें जस्टिस चंद्रचूड़ ने अपनी टिप्पणी में कहा कि अगर हम एक संवैधानिक कोर्ट के तौर पर आज़ादी की सुरक्षा नहीं करेंगे तो फिर कौन करेगा। इसके बाद पत्रकार कप्पन के केस की तुलना अर्णब के केस से की जाने लगी है, क्योंकि अर्णब 4 नवंबर को गिरफ्तार हुए और 11 को उन्हें ज़मानत मिल गई, वहीं कप्पन 5 अक्तूबर से जेल में हैं। दोनों ही मामले ‘पर्सनल लिबर्टी’ यानी निजी आज़ादी के दायरे में आते है। संविधान के आर्टिकल 21 में कहा गया है कि किसी भी व्यक्ति से उसकी ज़िंदगी या निजी आज़ादी नहीं छीनी जा सकती और सिर्फ़ कानून पालन की प्रक्रिया में ही ऐसा हो सकता है।

दोनों ही केस में कोर्ट के सामने सवाल था और है कि क्या अभियुक्त को हिरासत में रखना क़ानून के हिसाब से सही है। दोनों ही केस में अभियुक्त पत्रकार हैं। कप्पन को जब गिरफ्तार किया गया तो वह रिपोर्टिंग के लिए जा रहे थे। हालांकि अर्नब के केस में उन्हें एक पुराने मामले में गिरफ्तार किया गया था, जिसका संबंध उनकी पत्रकारिता से नहीं था, लेकिन आरोप लगाया गया कि कि महाराष्ट्र सरकार ने उनकी पत्रकारिता के जवाब में बदले की भावना से ऐसी कार्रवाई की। कप्पन मामले में भी उत्तर प्रदेश सरकार पर आरोप है कि ये पत्रकारों पर दबाव बनाने की कोशिश का हिस्सा है। यानी मामला मीडिया की आज़ादी का भी है और कप्प्न अल्पसंख्यक समुदाय से भी हैं।

सिद्दीक कप्पन के मामले में चीफ जस्टिस बोबडे ने पिछली सुनवाई पर मीडिया रिपोर्टिंग पर आपत्ति की थी। चीफ जस्टिस एसए बोबड़े इस बात से आहत दिखे कि मीडिया रिपोर्टों में गलत दावा किया गया है कि अदालत ने केरल के पत्रकार सिद्दीक कप्पन को राहत देने से इनकार कर दिया था, जो अनुचित है, लेकिन योर ऑनर इसकी जवाबदेही किसकी है कि अर्णब के मामले में बिना सामान्य प्रक्रिया का पालन किए हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट तत्काल सुनवाई करके फैसले सुना देता है और दूसरों के मामले में तारीख पर तारीख लगती है। पहले राज्य सरकार को नोटिस दी जाती है फिर जवाब के लिए समय दिया जाता है या कोई अनुच्छेद 32 के तहत सीधे आ जाता है तो उसे पहले हाई कोर्ट जाने को कहा जाता है।

नागपुर के समित ठक्कर जिसे कथित रूप से महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के खिलाफ कुछ आपत्तिजनक रूप से सोशल मीडिया पर कुछ लिखने के लिए, गिरफ्तार कर लिया गया है, का भी मामला, अनुच्छेद 32 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय में पहुंचा। इस पर भी उच्चतम न्यायालय ने यह निर्देश दिया कि वे पहले हाईकोर्ट जाएं। इसी प्रकार भीमा कोरेगांव मामले में गिरफ्तार तेलुगू कवि वरवर राव के भी इसी अनुच्छेद 32 के अंतर्गत दायर याचिका में, जो उनकी पत्नी हेमलता द्वारा दायर की गई थी, में भी उच्चतम न्यायालय ने यही निर्देश दिया कि वे पहले बॉम्बे हाई कोर्ट जाएं।

इस बात का जवाब विधिक क्षेत्रों में खोजा जा रहा है कि अर्णब गोस्वामी से जुड़े एक अन्य मामले में उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 32 के तहत सीधे सुनवाई की और अर्णब को बाम्बे हाईकोर्ट जाने को नहीं कहा। महाराष्ट्र विधानसभा ने अर्णब गोस्वामी के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का नोटिस जारी किया है। अर्णब इस मामले में उच्चतम न्यायालय में चले गए। उच्चतम न्यायालय से उन्हें राहत भी मिल गई। इस मामले में गोपनीयता का हवाला देते हुए विधानसभा के सहायक सचिव ने अर्णब को यह पत्र लिखा कि उन्होंने इस मामले में उच्चतम न्यायालय में याचिका क्यों दायर की। इस पर उच्चतम न्यायालय ने विधानसभा के उक्त अफसर को अदालत के अवमानना की नोटिस जारी कर दी। उच्चतम न्यायालय ने जोर देकर कहा कि यह किसी भी व्यक्ति के अनुच्छेद 32 के अंतर्गत प्राप्त मौलिक अधिकार कि, वह न्यायालय की शरण में जा सकता है, का उल्लंघन है और यह न्यायालय की अवमानना है।

इसके कुछ दिन बाद ही चीफ जस्टिस ने लगातार दो संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत रिट याचिकाओं पर सुनवाई करने के लिए अनिच्छा व्यक्त की। चीफ जस्टिस एसए बोबडे ने मंगलवार को कहा कि हम अनुच्छेद 32 क्षेत्राधिकार में कटौती करने की कोशिश कर रहे हैं। सीजेआई ने उक्त टिप्पणी वरिष्ठ अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा को दी, जो एक चुनावी मामले में अनुच्छेद 32 के तहत एक रिट याचिका में पेश हुई थीं और उच्च न्यायालय के सुनवाई के लिए जल्द तारीख नहीं देने की शिकायत कर रही थीं।

चीफ जस्टिस ने केरल यूनियन ऑफ़ वर्किंग जर्नलिस्ट्स द्वारा दायर की गई बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई के दौरान ऐसी ही टिप्पणी की थी, जिसमें मलयालम पत्रकार सिद्दीक कप्पन को हिरासत से मुक्त करने की मांग की गई है। जस्टिस ने वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल को बताया कि हम अनुच्छेद 32 के तहत दायर याचिकाओं को हतोत्साहित करने की कोशिश कर रहे हैं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

This post was last modified on November 22, 2020 7:54 pm

जेपी सिंह November 22, 2020
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