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Categories: बीच बहस

देश के अधिकांश किसान न तो अपनी पैदावार बचा पाएंगे और ना ही जमीन

देशव्यापी किसान आंदोलन ने समाज के सभी हिस्सों में एक नई जागृति ला दी है और एक व्यापक जनांदोलन की जमीन तैयार कर रही है। देश को जीवन देने वाले किसान समुदाय ने अपनी संप्रभुता का दावा जिस सूझबूझ से पेश किया है उससे पूरे जन जीवन में एक नई उम्मीद पैदा हुई है और यह बात सामने आ गई है कि वास्तविक संप्रभुता देश के नागरिकों में निहित है ना कि सरकारों में। आज सवाल यह है कि हमारे वोट से गठित सरकारों को हमारे हितों की अनदेखी करके मनमाने तरीके से कानून बनाने और उसे बलपूर्वक लागू करने का अधिकार है या नहीं? जन विरोधी कानूनों के खिलाफ हमें विरोध का अधिकार है या नहीं? इस तरह यह आंदोलन लोकतंत्र के प्रति लोगों को सचेत करने और एकजुट करने का एक शानदार प्रयास भी है, आज हमारे देश और समाज में इसकी बहुत जरूरत है।

यह कहना पूरी तरह ठीक नहीं होगा कि मौजूदा सरकार के तीन किसान विरोधी बिलों से यह आंदोलन पैदा हुआ और इसके खात्मे के बाद समाप्त हो जाएगा, वास्तव में इसकी जड़ें और गहरी हैं, किसानों की व्यथा का पुराना इतिहास है। हमारे देश में लंबे समय से किसान आत्महत्याओं और तबाही का सिलसिला चल रहा है और इसके खिलाफ लगातार आवाजें भी उठती रही हैं। किसान विरोधी बिलों ने किसान समस्याओं को खत्म करने की जगह किसानों के ही विस्थापन का कार्यक्रम पेश कर दिया और फिर लोग सड़कों पर उतर गए।

इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि इन बिलों की वापसी हो बल्कि यह भी है कि कैसे ऐसा माहौल बनाया जाए कि देश में खेती-किसानी पुनः सम्मानजनक जीवन जीने का एक जरिया बने। हमारी सरकार कहती है कि इन कानूनों से कृषि क्षेत्र में पूंजी निवेश बढ़ेगा लेकिन मूल प्रश्न यह है कि कृषि क्षेत्र से जो पूंजी बाहर जा रही है व्यापारिक और कानूनी असमानता के कारण उसे कैसे रोका जाए? बड़ी पूंजी के निवेश की राह खोलना बड़ी पूंजी  के मालिकाने  की राह खोलना है, इससे पूरे देश की खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी।

यहां  पर इस बात को याद रखना जरूरी है कि देश की अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र में बड़ी और सट्टा पूंजी के लिए दरवाजा खोलने का सिलसिला 1990 से शुरू हुआ था ।  फिर लाखों कल कारखाने बंद हुए, सरकारी उद्यमों का घाटा बढ़ना शुरू हुआ, शिक्षा चिकित्सा मुनाफे का कारोबार बनना शुरू हुआ, खेती किसानी घाटे का सौदा बनती गई, श्रमिक कर्मचारी ठेके पर रखने का नियम बना, वित्तीय क्षेत्र पर सरकार की पकड़ ढीली पड़ती गई, दस्तकारी बर्बाद हो गई और चौतरफा बेरोजगारी बढ़ती गई।

इसी तबाही के बीच से पैदा हुआ नया राजनीतिक साठगांठ वाला कारपोरेट सीधे तौर पर देश के चुनाव में पैसा लगाता है ( चुनाव बॉन्ड) और फिर एक-एक करके देश को अपने  सीधे मालिकाने में लेते हुए आगे बढ़ा। इसी दौर में क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियों ने सत्ता के लोभ में केंद्रीय सत्ताधारी पार्टी से गैर उसूली समझौते किए और अपनी पहचान तो मिटा ही दी साथ में पूरे देश में कॉर्पोरेट तानाशाही के लिए जगह बनाने में मदद की। कश्मीर और पंजाब के लोगों को इसकी समझ हो चुकी है और देश के दूसरे हिस्सों में यह होना बाकी है। शायद किसान आंदोलन इस समझ को साफ करने में मदद करेगा।

किसान आंदोलन पिछले तीन दशक के समाज की अंतहीन पीड़ाओं की ठोस अभिव्यक्ति है। सरकारों की सनक पूर्ण योजनाओं का प्रतिवाद है। इस प्रतिवाद में किसानों के साथ-साथ श्रमिकों कर्मचारियों युवाओं महिलाओं अल्पसंख्यकों आदिवासियों आदि की पीड़ाओं की भी अभिव्यक्ति है और  इसलिए इसका चौतरफा समर्थन बढ़ता जा रहा है ।  यह समर्थन देश में लागू कॉर्पोरेटी विकास मॉडल को खारिज करने की ओर बढ़ रहा है। इसलिए आज आंदोलन में पूरी भागीदारी के साथ साथ हमें समाज के वैकल्पिक विकास के मॉडल के बारे में भी सोचने समझने की शुरुआत करनी होगी। विकल्प कहीं दूसरी दुनिया में नहीं बनते बल्कि वास्तविक आंदोलनों के बीच पैदा होते हैं, ऐसे आंदोलनों के बीच पैदा होते हैं जो मौजूदा परिस्थितियों को पूरी तरह बदलने के लिए होती हैं, जो पूरे समाज की मुक्ति के सवालों को अपना सवाल बनाती हैं।

यह बात किसे नहीं समझ में आएगी कि आवश्यक वस्तु अधिनियम की सीमा खत्म करने से किसे फायदा होगा, संविदा खेती से किसकी तिजोरी भरेगी,  निजी मंडी की राह खुलने से सरकारी मंडी और उचित समर्थन मूल्य का क्या होगा? हम एक छोटे से फर्क पर गौर करें कि खेती के किसी उत्पाद पर किसान को क्या मूल्य मिलता है और वही उत्पाद आम नागरिकों को किस मूल्य पर बेचा जाता है? नए कृषि कानूनों की चिंता इस अंतर को कम करने की नहीं है बल्कि इसे और बढ़ाने की और इसे पैदा हुए लाभों पर कॉरपोरेट एकाधिकार कायम करने की है। देश के अधिकांश किसान ना तो अपनी पैदावार बचा पाएंगे और ना ही जमीन। देर सवेर सभी को अपनी जमीन को कारपोरेट खेती के लिए पट्टा करना पड़ेगा। अपने देश में खाद्य सामग्री का बाजार मूल्य लगभग तीस लाख करोड़ का है, इसी पर सब की गिद्ध दृष्टि लगी है।

हमारा देश कॉरपोरेट जागीरदारी के युग में प्रवेश कर रहा है। उद्योग और सेवा क्षेत्र में यह जागीरदारी पहले ही जड़ें जमा चुकी है, अब खेती किसानी को अपनी गिरफ्त में लेना है। इस जागीरदारी की बेरहमी का एक नमूना हम प्रवासी श्रमिकों की पैदल वापसी के रूप में देख चुके हैं। न्याय समेत सभी वैधानिक संस्थाओं के स्तर और भूमिका के लगातार गिरावट के रूप में देख रहे हैं, सत्ता और संपदा के अतिकेंद्रीयकरण एवं  राज्य सरकारों, पंचायतों को अप्रासंगिक होते देख रहे हैं। आम नागरिक के सामने सत्ता और व्यवस्था का कोई ऐसा रूप नहीं बचा है जिस पर वह भरोसा कर सके। सिर्फ दमन और निषेध के बल पर कोई व्यवस्था आखिर कब तक चलेगी? किसान आंदोलन ने इन सभी सवालों को उभार दिया है, जिस पर तरह-तरह से पर्दा डाला जा रहा था।

इस संघर्ष ने ना सिर्फ सरकार के सामने चुनौती पेश की है बल्कि पूरे समाज के सामने भी एक चुनौती पेश की है, वह है देश को बचाने की एक नई दिशा देने की। सवाल को यदि सीधे रूप में रखा जाए तो पहली बात तो यही है कि क्या हम जाति- धर्म- भाषा- क्षेत्र आदि से ऊपर उठकर एकीकृत भारतीय समाज के रूप में इस आंदोलन को आगे बढ़ा सकते हैं और गैर जरूरी मुद्दों से उलझने से इसे बचा सकते हैं? दूसरे यह कि देश के किसानों और ग्रामीण भारत की समस्याओं का हमारे पास क्या समाधान है? क्या हम परस्पर सहयोग और सहकारिता की सामाजिक- आर्थिक  वैकल्पिक व्यवस्था की ओर बढ़ने को तैयार हैं? एक बात हमें समझ लेनी चाहिए कि भोजन हमारे जीवन का आधार है इसलिए हम खेती किसानी को सिर्फ उपभोक्ता के बाजारू नजरिए से नहीं देख सकते। सारी जिम्मेदारी किसानों की ही नहीं है हमें भी उसमें हिस्सा बटाना होगा।

यह तीन कृषि बिल पूरे समाज की तबाही के दस्तावेज हैं। आवश्यक वस्तु अधिनियम के खत्म होते ही अनाज की जमाखोरी और कालाबाजारी का रास्ता साफ हो जाएगा फिर हमें अनाज किस भाव मिलेगा या नहीं मिलेगा? क्या यह सवाल सिर्फ किसानों का है? निजी मंडियों के बनने से भारतीय खाद्य निगम और सरकारी मंडियों में कार्यरत लाखों श्रमिकों का क्या होगा, किराने की छोटी-छोटी करोड़ों दुकानों और उससे आजीविका चलाने वाले लोगों का क्या होगा?

कारपोरेट फार्मिंग के द्वारा वही चीज बोई जाएगी जिससे विश्व बाजार में अच्छा मुनाफा मिलेगा, उन्हें इस बात की क्या परवाह होगी कि देश की जनता की क्या जरूरत है, देश की खेती की जमीन की उर्वरता की क्या जरूरत है, अन्य जीव-जगत, पशु पक्षियों की क्या जरूरत है? कॉर्पोरेटी मालिकाना एक शैतानी मालिकाना होता है चाहे वह देसी हो या विदेशी। इन कानूनों के बाद सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए अनाज क्या इन नए गोदामों के मालिकों से खरीदा जाएगा या जनधन खातों में सरकार कुछ पैसा डाल कर अपना पीछा छुड़ा  लेगी? असल में इस तरह की मानव विरोधी, देश विरोधी नीतियों को लागू करने के लिए धार्मिक मुखोटे की राजनीति ही कॉर्पोरेटों की पूरी दुनिया में पहली पसंद होती है। इनसे अपने समाज को बचाना है।

हमारे देश में खेती किसानी की तबाही के तार देश की नौकरशाही से भी जुड़े हैं। यह वही नौकरशाही है जो ब्रिटिश राज में किसानों को लूटने के लिए बनाई गई थी और आजादी के बाद इसने ही ग्रामीण क्षेत्र में पंचायती लोकतंत्र को विकसित होने में सबसे अधिक बाधा पहुंचाई, नीतिगत प्रश्नों पर फैसले लेने से किसानों को दूर रखा। इसी नौकरशाही और रीढ़ विहीन नेताओं के जरिए कॉरपोरेट देश के लोकतंत्र को अपनी गिरफ्त में लेते हैं और किसानों- श्रमिकों  को निचोड़ने की नीतियां लागू करते हैं।खेती- किसानी के बेहतरी का पहला कदम है पंचायतों, किसान समितियों, सहकारिता को इस नौकरशाही से मुक्त करना और उन्हें स्वायत्तता देना ताकि वे अपने और अपने देश- समाज के बारे में फैसले ले सकें और लागू कर सकें।

वास्तव में किसान आंदोलन का सिर्फ आर्थिक पक्ष ही नहीं है बल्कि एक सशक्त सामाजिक- सांस्कृतिक पक्ष है। किसान श्रमिक सिर्फ वस्तुएं ही पैदा नहीं करते, वे जीवन, समाज, देश और एक सांस्कृतिक परंपरा को भी पैदा करते हैं। किसानों- श्रमिकों पर हमला देश- समाज और हमारी साझा स्मृतियों पर हमला है। अपनी स्मृतियां, अपना इतिहास और  इस इतिहास की जीवंत ज्ञान परंपरा को खोकर हम वास्तव में एक सृजनशील मनुष्य से एक संसाधन में तब्दील हो जाएंगे। कॉरपोरेटी सत्ता यही चाहती है। हमें इसके विरोध में दृढ़ता से खड़ा होना है।

आज हमारे देश का सभी कुछ दांव पर लगा है, लोकतंत्र, भाईचारा, बहनापा, खेती- किसानी, श्रम, समृद्ध इतिहास ,हमारी साझा स्मृतियां और भविष्य के सपने।

हमें इसे बचाने के लिए आगे आना है , इसे  समृद्ध और मानवीय बनाने के लिए काम करना है।

कुछ  तात्कालिक कार्य:

  1. किसान आंदोलन के कार्यक्रमों को अपने अपने स्तर पर लागू करें।
  2. किसान विरोधी बिलों को वापस लेने के लिए बैठके करें और अपने जनप्रतिनिधियों को पत्र लिखें।
  3. ग्राम स्तर पर किसान समितियां गठित करें, उसे लोकतंत्र की बुनियादी इकाई के रूप में संचालित करें एवं उसके मार्फत अपने आपसी विवादों का समाधान करें।
  4. देश को अडानी- अंबानी एवं दूसरे कॉरपोरेट की  जागीर बनाने, निजीकरण की जनविरोधी नीति के खिलाफ जन जागरण करें।
  5. किसान आंदोलन के पक्ष में तमाम जन संगठनों, श्रमिक संगठनों से सरकार के पास ज्ञापन भिजवाएं।

(किसान आंदोलन समर्थन समिति की ओर से जारी एक पर्चा। शिवाजी राय इसके संयोजक हैं और राम कृष्ण सह संयोजक।)

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This post was last modified on December 26, 2020 4:52 pm

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