भाजपा वाले ही नहीं, संघ वाले भी और खुद प्रधानमंत्री मोदी भी यह कहते नहीं थक रहे कि आने वाला कल भारत का है। यहां तक तो सब ठीक है लेकिन जब विश्वगुरु बनने से लेकर दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने और विकसित देशों में शामिल होने की बात की जाती है तो या तो हंसी छूट जाती है या फिर रुदाली की स्थिति पैदा हो जाती है। पिछले दस सालों के दौरान देश की अर्थव्यवस्था जिस पटरी पर जा चुकी है उससे तो यही लग रहा है कि हम अपनी आभा मंडल को न सिर्फ खो चुके हैं बल्कि एक ऐसी इबारत लिख रहे हैं जहाँ से कंगाली की दखल होती है।
मुफ्त खाओ और मौज करो और केवल हमें चुनाव में जीत दिलाते रहो की नीति ने देश के जितने भी विकसित राज्य कहे जाते हैं उन्हें न सिर्फ कर्जखोर बना दिया है बल्कि कंगाली के गड्ढे में भी उतार दिया है। जो हालात हैं उससे साफ़ हो गया है कि अब इस कंगाली के गड्ढे से निकलना संभव ही नहीं। और अगर कोई उपाय है भी तो उसके लिए कई तरह के बलिदान देने हो सकते हैं। कई सरकारें जा सकती हैं और कई चुनावी परिणाम कुछ दलों की राजनीति का बिल्कुल सफाया भी कर सकते हैं। लेकिन सवाल तो वही है कि क्या इस देश का कोई भी राजनीतिक वर्ग किसी भी तरह का कोई बलिदान देने को तैयार है?
उत्तर तो यही है कि कोई भी नहीं। न बीजेपी, न मोदी, न ही कांग्रेस और न ही राहुल गाँधी। बाकी दलों की इस देश में कोई हैसियत नहीं है जो देश और जनता के बारे में कुछ सोच सकें और देश को आगे बढ़ाने की कोशिश कर सकें। क्षेत्रीय दलों को देश और राष्ट्र के निर्माण से कोई लेना देना नहीं होता। वह तो किसी भी तरह से सत्ता तक की पहुँच चाहता है। चाहे वह जातीय ध्रुवीकरण के आधार पर हो या फिर दंगा फसाद कराकर या फिर क्षेत्रीय स्तर के मुद्दों को उठाकर जनता को लोभी और बेकार बनाकर अपना मकसद पूरा करता रहता है।
लेकिन यहां सवाल तो कर्ज में लगातार डूब रहे राज्यों को लेकर है। हालत ये है कि कई राज्यों की हालत श्रीलंका, पाकिस्तान और सोमालिया जैसी हो गई है लेकिन दावा तो यही है कि हम बहुत आगे बढ़ रहे हैं। बहुत कुछ कर रहे हैं और आगे भी करते रहेंगे। नेताओं के यही दावे चार्वाक के दर्शन तक हमें ले जाते हैं जहां इस बात में यकीन किया जाता है कि कल कुछ भी नहीं है। कहीं कोई स्वर्ग और नरक नहीं है। जो है वह सब वर्तमान में ही है। जब तक जियो, ऐश करो। कर्ज लेकर भी खूब मौज करो। तो सवाल यह भी है कि भारत के आस्तिक नेता और आस्तिक समाज चार्वाक के नास्तिक वाले दर्शन के हिमायती हो गए हैं?
लगता है भले ही इसकी जानकारी देश के मुफ्तखोर हो चुके लोगों को नहीं हो लेकिन देश के नेता तो यह सब जानते ही हैं कि जो वे कर रहे हैं उससे न तो इस देश का बड़ा भला होने जा रहा है और न ही यहाँ की जनता का कोई कल्याण हो रहा है। वे यह भी जानते हैं कि वे जो कर रहे हैं वर्तमान में ही कर रहे हैं, उनकी भविष्य को लेकर कोई योजना नहीं है और जब भविष्य की चिंता ही नहीं है तब चिंतन कैसा? जो चिंतन दिखाने का माया रची जा रही है उसके पीछे का सच तो यही है कि जब तक रहो सत्ता में रहो। सत्ता से हटे तो मुश्किलें होंगी। जिसको दण्डित किया था, वह दंड उसे भी मिलेगा। ऐसे में जनता को जितना भी कंगाल बना सको वह करो क्योंकि कंगाल जनता ही भीख की आस रखती है। उसके सारे प्रयास केवल मुफ्त में जीने तक की ही रहती है क्योंकि उसे लम्बे समय से नाकारा जो बना दिया गया है। देश का हर नेता यही सब कर रहा है और आगे भी करता रहेगा।
आगे बढ़ें और कंगाल हो चुके राज्यों की कहानी आपके सामने रखें इससे पहले चार्वाक दर्शन का कुछ अंश आपके सामने रखने की ज़रूरत है। चार्वाक दर्शन एक प्राचीन भारतीय भौतिकवादी नास्तिक दर्शन है। यह मात्र प्रत्यक्ष प्रमाण को मानता है तथा पारलौकिक सत्ताओं को यह सिद्धांत स्वीकार नहीं करता है। यह दर्शन वेदवाह्य भी कहा जाता है।
अजित केशकंबली को चार्वाक के अग्रदूत के रूप में श्रेय दिया जाता है, जबकि बृहस्पति को आमतौर पर चार्वाक या लोकायत दर्शन के संस्थापक के रूप में जाना जाता है। चार्वाक, बृहस्पति सूत्र (600 ईसा पूर्व) के अधिकांश प्राथमिक साहित्य गायब या खो गए हैं। इसकी शिक्षाओं को ऐतिहासिक माध्यमिक साहित्य से संकलित किया गया है जैसे कि शास्त्र, सूत्र, और भारतीय महाकाव्य कविता में और गौतम बुद्ध के संवाद और जैन साहित्य से। चार्वाक प्राचीन भारत के एक अनीश्वरवादी और नास्तिक तार्किक थे।ये नास्तिक मत के प्रवर्तक बृहस्पति के शिष्य माने जाते हैं। बृहस्पति और चार्वाक कब हुए इसका कुछ भी पता नहीं है। बृहस्पति को चाणक्य ने अपने अर्थशास्त्र ग्रन्थ में अर्थशास्त्र का एक प्रधान आचार्य माना है।
चार्वाक दर्शन प्रत्यक्ष को ही एकमात्र प्रमाण मानता है लेकिन अनुमान को प्रमाण नहीं मानता। उनका तर्क है कि अनुमान व्याप्तिज्ञान पर आश्रित है। जो ज्ञान हमें बाहर इंद्रियों के द्वारा होता है उसे भूत और भविष्य तक बढ़ाकर ले जाने का नाम व्याप्तिज्ञान है, जो असंभव है। मन में यह ज्ञान प्रत्यक्ष होता है, यह कोई प्रमाण नहीं क्योंकि मन अपने अनुभव के लिये इंद्रियों पर ही आश्रित है।
चार्वाक केवल प्रत्यक्षवादिता का समर्थन करता है, वह अनुमान आदि प्रमाणों को नहीं मानता है। उसके मत से पृथ्वी, जल, तेज और वायु ये चार ही तत्व हैं, जिनसे सब कुछ बना है। उसके मत में आकाश तत्व की स्थिति नहीं है, इन्हीं चारों तत्वों के मेल से यह देह बनी है, इनके विशेष प्रकार के संयोजन मात्र से देह में चैतन्य उत्पन्न हो जाता है, जिसको लोग आत्मा कहते हैं। शरीर जब विनष्ट हो जाता है, तो चैतन्य भी खत्म हो जाता है देहात्मवाद।
इस प्रकार से जीव इन भूतों से उत्पन्न होकर इन्हीं भूतों के नष्ट होते ही समाप्त हो जाता है, आगे पीछे इसका कोई महत्व नहीं है। चार्वाक के मत से स्त्री पुत्र और अपने कुटुम्बियों से मिलने और उनके द्वारा दिये जाने वाले सुख ही सुख कहलाते हैं। उनका आलिंगन करना ही पुरुषार्थ है, संसार में खाना पीना और सुख से रहना चाहिये। इस दर्शन में कहा गया है, कि:-यावज्जीवेत सुखं जीवेद ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत, भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः ॥
अर्थ है कि जब तक जीना चाहिये सुख से जीना चाहिये, अगर अपने पास साधन नहीं है, तो दूसरे से उधार लेकर मौज करना चाहिये, श्मशान में शरीर के जलने के बाद शरीर को किसने वापस आते देखा है?
अब मुद्दे की बात की जाए। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा कि भाजपा सरकार ने प्रदेश को कर्ज में डुबो दिया है। यूपी के हर व्यक्ति पर 36 हजार का कर्ज है। राज्य पर लगभग नौ लाख करोड़ का कर्ज हो गया है। उन्होंने कहा कि प्रदेश के इस बजट में भी भाजपा सरकार ने 91 हजार करोड़ का कर्ज लिया है। आजादी के बाद 2017 तक यूपी पर तीन लाख करोड़ का कर्ज था। लेकिन, योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार पिछले आठ साल में 6 लाख करोड़ रुपए का और कर्ज ले चुकी है।
अखिलेश यादव जो कह रहे हैं उसमें सौ फीसदी सच्चाई है लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं है कि सिर्फ यूपी ही कर्ज के बोझ से कराह रहा है और वहां की हर नागरिक हजारों रुपये के कर्ज को ढो रहा है। सच तो यही है कि पूरे देश का यही हाल है और देश का हर राज्य कंगाल होता जा रहा है। आम आदमी कर्ज से बेहाल हो सकता है, जान तक दे सकता है और दे भी रहा है।
अभी कुछ दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने फ्रीबीज यानी मुफ्त की रेवड़ियों पर सख्त टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि लोगों को मुख्यधारा में लाने की बजाय क्या हम परजीवियों का एक वर्ग नहीं तैयार कर रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि लोग काम करने को तैयार नहीं हैं। इसकी वजह यह है कि उन्हें मुफ्त राशन और पैसा दिया जा रहा है। चुनाव से पहले मुफ्त की रेवड़ियों के एलान से देश की शीर्ष अदालत चिंतित है। मगर राजनीतिक दल इन चिंताओं को समझेंगे या नहीं। यह कह पाना मुश्किल हैं।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद मुफ्त की रेवड़ियों पर देशभर में नई बहस शुरू हो गई है। ऐसे में आइए जानते हैं कि ये क्या हैं। राजनीतिक दलों के सामने मजबूरी क्या है, राज्यों पर क्या असर होता है, कल्याणकारी योजनाओं से कितना अलग? किस राज्य में कौन-कौन सी मुफ्त की रेवड़ी बांटी जा रही है।
फ्रीबीज की कोई तय परिभाषा नहीं है। मगर बेहद कम समय में लक्षित आबादी को ध्यान में रखकर लोगों को मुफ्त में वस्तुएं एवं सेवाओं को देने को ही फ्रीबीज कहा जाता है। 2022 की अपनी रिपोर्ट में आरबीआई ने फ्रीबीज को एक लोक कल्याणकारी उपाय के तौर पर परिभाषित किया है, इन्हें मुफ्त में प्रदान किया जाता है। फ्रीबीज का इस्तेमाल राजनीतिक दल अधिकतर चुनाव के दौरान मतदाताओं को लुभाने में करते हैं। सभी राजनीतिक दलों के बीच मुफ्त बिजली देने का वादा सबसे लोकप्रिय फ्रीबीज है।
इसके इतिहास में जाएँ तो माना जाता है कि फ्रीबीज की शुरूआत दक्षिण भारत के राज्यों से ही हुई। यहां लोगों को मिक्सर और टीवी देने जैसी योजनाएं राजनीतिक दलों के जुबान पर होती हैं। मगर अब हर चुनाव में मुफ्त की योजनाएं व्यापक हो रही हैं। पिछले तीन-चार सालों में इनका चलन और भी तेज हुआ है।
पहले फ्रीबीज के नाम पर मुफ्त साड़ी, कंबल, टीवी, लैपटॉप, साइकिल, पानी, गेहूं, बिजली और चावल का वादा किया जाता था। मगर अब सीधे खातों पर पैसे भेजने की बात होती है। कुछ राज्यों में आर्थिक मदद भेजी जा रही है। बिहार में लंबे समय से लड़कियों को मुफ्त में साइकिलें देने का चलन है।
केंद्र सरकार की मुफ्त योजनाएं खूब चल रही हैं। आयुष्मान भारत के तहत लाभार्थी परिवार को पांच लाख रुपये तक का मुफ्त इलाज की सुविधा दी जाती है। किसान सम्मान निधि के तहत हर चार महीने में किसानों को 2000 रुपये की आर्थिक सहायता दी जाती है। योजना की शुरुआत 2019 में की गई थी। साल 2020 में केंद्र सरकार ने मुफ्त राशन योजना की शुरुआत की। इसके तहत 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन मिल रहा है।
उज्ज्वला योजना की शुरुआत 1 मई 2016 को की गई थी। योजना के तहत महिलाओं को मुफ्त में गैस सिलिंडर मुहैया करवाया जाता है। पीएम आवास योजना की शुरुआत 2014 में की गई थी। इस योजना में समाज के सबसे गरीब तबके को आवास दिया जाता है।
इसी तरह मध्य प्रदेश, पंजाब, झारखंड दक्षिण के सभी राज्य, पूर्वोत्तर के राज्य ,बिहार ,यूपी ,हरियाणा ,महाराष्ट्र ,छत्तीसगढ़ ,राजस्थान और लगभग सभी राज्य मुफ्त योजना चला रहे हैं। याद रखिये जहाँ ये योजनाएं चल रही हैं उन राज्यों की हालत बद से बदतर है और। वे कंगाली के शिकार हैं।
मुफ्त की रेवड़ियों ने कई राज्यों का बजट बिगाड़ रखा है। यह सभी राजनीतिक दल जानते हैं। बावजूद इसके फ्रीबीज का एलान करना उनके सामने चुनावी मजबूरी है। पंजाब, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों को राजकोषीय घाटे का सामना करना पड़ रहा है। मगर इन राज्यों में मुफ्त की रेवड़ी वाली योजनाएं धड़ल्ले से जारी हैं।
आर्थिक शोध एजेंसी एमके ग्लोबल की रिपोर्ट के मुताबिक चुनावी साल में राजकोषीय घाटे की स्थिति सबसे अधिक महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, बिहार, ओडिशा, मध्य प्रदेश, झारखंड और आंध्र प्रदेश में देखने को मिली। मुफ्त रेवड़ियों का ही असर है कि तेलंगाना पर बैंकों का 20,000 करोड़ रुपये से अधिक का बकाया है। इससे बैंकों की हालत भी बिगड़ रही है।
देशभर में मुफ्त बिजली व महिलाओं को मुफ्त सफर और मासिक आर्थिक सहायता सबसे लोकप्रिय फ्रीबीज योजनाएं हैं। मन से या बेमन से… हर राजनीतिक दल ने इन्हें स्वीकारना शुरू कर दिया है। सियासी दल चुनाव में लैपटॉप, साइकिल, स्मार्टफोन, आर्थिक सहायता, बेरोजगारी भत्ता और मुफ्त पानी देने का वादा करते हैं। कर्जमाफी भी मुफ्त की रेवड़ी का बड़ा उदाहरण है। पिछले साल तक सभी राज्यों ने सिर्फ सब्सिडी पर ही तीन लाख करोड़ से ज्यादा खर्च किये हैं। 2019 तक सभी राज्य सरकारों पर 47.86 लाख करोड़ का कर्ज था जो 2024 तक यह कर्ज बढ़कर 75 लाख करोड़ हो गया और 2025 तक यह 83 लाख करोड़ हो सकता है।
आंकड़ों के अध्ययन से पता चलता है कि देश के सभी राज्यों ने चार्वाक के दर्शन पर चलते हुए वर्तमान में जीने का रुख कर लिया है। आंकड़े बता रहे हैं कि तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, और महाराष्ट्र सबसे ज़्यादा कर्ज़ में डूबे राज्य हैं। वहीं, गुजरात, ओडिशा, और महाराष्ट्र में राज्यों का कर्ज़, उनके जीडीपी के 20 प्रतिशत से कम है।
वित्त वर्ष 2024-25 तक देश के सबसे कर्ज वाले राज्यों की सूची तैयार करें तो देश का कोई भी एक राज्य नहीं बचा है जो अपनी आमदनी के मुताबिक चल रहा हो। सभी राज्य कर्ज में जा चुके हैं और बड़ी बात तो यह है कि वे कर्ज से बाहर निकलने को सोच भी नहीं रहे हैं। तमिलनाडु का कर्ज़ 8 लाख 34 हज़ार 543 करोड़ रुपये हैं। जबकि उत्तर प्रदेश का कर्ज़ 7,69,245.3 करोड़ रुपये है। अभी इस राज्य के कर्ज में और भी बढ़ोतरी हो गई है जिसकी चर्चा अखिलेश यादव कर रहे थे।
इसी तरह महाराष्ट्र का कर्ज़ 7,22,887.3 करोड़ रुपये है।पश्चिम बंगाल का कर्ज़ 6,58,426.2 करोड़ रुपये ,कर्नाटक का कर्ज़ 5,97,618.4 करोड़ रुपये ,राजस्थान का कर्ज़ 5,62,494.9 करोड़ रुपये ,आंध्र प्रदेश का कर्ज़ 4,85,490.8 करोड़ रुपये गुजरात का कर्ज़ 4,67,464.4 करोड़ रुपये ,केरल का कर्ज़ 4,29,270.6 करोड़ रुपये ,मध्य प्रदेश का कर्ज़ 4,18,056 करोड़ रुपये ,पंजाब का कर्ज 3.51 लाख करोड़ का रुपये और बिहार का कर्ज 3.19 लाख करोड़ का है। सच तो यही है कि भारत के सार्वजनिक ऋण का एक तिहाई हिस्सा राज्यों का कर्ज़ है। केरल का ऋण-जीडीपी अनुपात भारतीय राज्यों में सबसे ज़्यादा है।
कुछ समय से पंजाब एक बड़े आर्थिक संकट से गुज़र रहा है। इसकी तुलना श्रीलंका में जारी आर्थिक बदहाली से की जा रही है। इस आर्थिक संकट की वजह से अब ऐसे राज्यों को ‘मिनी श्रीलंका’ समझा जा रहा है। पंजाब के आर्थिक हालात को अगर आंकड़ों के ज़रिए समझा जाए तो राज्य का ऋण, सकल घरेलू उत्पाद के अनुपात में 53 फ़ीसद है। ये भारत के अन्य राज्यों की तुलना में सबसे ज़्यादा है।
राज्य पर तीन लाख करोड़ का क़र्ज़ है यानी तीन करोड़ की आबादी वाले इस राज्य का हर नागरिक एक लाख रुपए के क़र्ज़ के नीचे दबा हुआ है।
(अखिलेश अखिल वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
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