Mon. Jun 1st, 2020

अब तक की सबसे बड़ी प्रशासनिक विफलता है लॉक डाउन

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आनंद विहार पर पहुँची भीड़।

दिल्ली से सबसे अधिक पलायन हुआ। कहा जा रहा है कि ” दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने अपने राज्य में रह रहे मजदूरों, कामगारों और विभिन्न राज्यों से आये हुए प्रवासी लोगों को नहीं रोका और सबको यूपी की तरफ ठेल दिया। उनके रुकने, खाने पीने किसी भी चीज का उपाय नहीं किया। सब यूपी की सीमा में आ गए। लाखों सड़कों पर हैं और यह लॉक डाउन ध्वस्त हो गया।

‘ बीजेपी आईटी सेल कह रहा है कि सरकार ने बिजली पानी काट दी। सच क्या है यह तो अभी पता नहीं। लापरवाही भी हुई है और दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने इस पलायन को रोकने की व्यवस्था नहीं की। कोई भी तैयारी दिल्ली सरकार द्वारा की ही नहीं गयी, यह भी आरोप सोशल मीडिया पर चल रहा है। यह केंद- राज्य या राज्य – राज्य के बीच कोऑर्डिनेशन का अभाव है या, लॉक डाउन प्रबंधन में कमी, या कोई साजिश, अभी क्या कहा जाए।

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दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने गलती की और केंद्र की मोदी सरकार उस गलती को निहारती रही। एक आधी-अधूरी सरकार ने एक बेहद मजबूत केंद्र सरकार के इस अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय का मज़ाक बना कर रख दिया और भारत सरकार कुछ नहीं कर पा रही है। अज़ीब बेचारगी है। यह भी कहा जा रहा है कि, यूपी सरकार ने जब 1000 बसों की व्यवस्था की तो कुछ भीड़ छंटी। केंद सरकार को दिल्ली सरकार से इस अव्यवस्था के बारे में पूछना चाहिए और तत्काल अपने संसाधनों का प्रयोग कर इस विकट स्थिति को संभालना चाहिए। स्थिति सुधरे यह 1000 बसों के बस की बात नहीं है। सरकार को कुछ और सोचना होगा। सड़कों पर लाखों की भीड़ थी और इंतज़ामात उतने नहीं थे जितने होने चाहिये। 

केंद्र और राज्यों में तालमेल का अभाव किसी भी योजना को ध्वस्त कर सकता है। इस बड़ी और बेहद ज़रूरी लॉक डाउन योजना में यही हुआ है। भाजपा आईटी सेल कह रहा है, दिल्ली सरकार ने केंद्र सरकार की सारी योजना बिगाड़ दी। और बेबस केंद्र सरकार असहाय हो गयी। केंद्र और दिल्ली दोनों एक दूसरे को नहीं जानते हैं क्या? दिल्ली तो वैसे ही आधी अधूरी सरकार है। यह पहली बार कोई एलिबाई नहीं ढूंढी जा रही है। कभी 300 लोग यूपी से आकर दिल्ली में एक सुनियोजित दंगा करा कर चले जाते हैं जिसमें, पचास से अधिक लोग मारे जाते हैं और करोड़ों की संपत्ति आग के हवाले हो जाती है, तो कभी केजरीवाल सारी फैक्ट्रियों के कामगारों को दिल्ली से निकाल कर यूपी सीमा पर छोड़ आता है और बेचारी सर्व शक्ति सम्पन्न केंद्र सरकार यह सब देखती रह जाती है। 

कितनी मासूमियत की बात है। कितनी बेबसी की बात हैं। आज तक, न तो, जेएनयू के उन नकाबपोश बदमाशों का पता लग पाया जिन्होंने 5 जनवरी को जेएनयू कैम्पस में घुसकर अराजकता फैलाई थी, न तो आज तक उन 300 दंगाइयों का पता लग पाया जो उत्तर प्रदेश जाकर दिल्ली में हिंसा फैला कर न जाने कहां गायब हो गये,  और आगे शायद यह भी न केंद्र पता लगा पाए कि केजरीवाल ने कैसे लॉक डाउन को विफल कर दिया। सरकार को यह तो पता है कि केजरीवाल एक आतंकी है, वह अर्बन नक्सल है, बस उसके पास इन सब व्याधियों का इलाज नहीं है। क्या यह प्रशासनिक अक्षमता नहीं है ? 

दरअसल देश में, हाल की राजनीति में एक नयी परंपरा और नयी राजनीतिक शब्दावली का विकास हुआ है। जैसे, जो प्रधानमंत्री की नीतियों का विरोध करता है वह देशद्रोही है, जो गरीबों और शोषण की बात करता है वह वामपंथी और अराजक है, जो सरकार के खिलाफ बोलता है वह देश तोड़क और पाकिस्तान परस्त है, जो धर्म के पाखंड की बात करता है वह तो पक्का धर्म द्रोही है ही, आदि-आदि की इस नयी शब्दावली ने देश के संघीय ढांचे, बहुदलीय व्यवस्था और बहुलतावादी राजनीतिक विचारधारा के परस्पर मान्य मतभेदों को शत्रु भाव में बदल कर रख दिया है। यही कारण है कि केंद्र और राज्य में जहां अलग-अलग दलों की सरकारें हैं उनके बीच न केवल प्रत्यक्ष वैमनस्य दिख रहा है बल्कि यह मतभेद एक शत्रु भाव में भी बदल जा रहा है।

यह विभाजन इतना स्पष्ट हो चला है कि सामान्य निजी सम्बंध प्रभावित हो चले हैं, राजनीतिक संबंधों की तो बात ही दीगर है। राज्य और केंद्र सरकारों में, जिसे जहां मौका मिल रहा है वहीं एक दूसरे को रगड़ दे रहा है। इसलिए केंद्र राज्य में समन्वय की कमी हर बड़े फैसले में रहती है। जब तक यह परस्पर  अविश्वास रहेगा, एक भी योजना चाहे जैसी भी हो, जितनी भी उपयोगी हो सफल हो ही नहीं सकती है । 

कभी किसी राष्ट्रीय समस्या पर सर्वदलीय बैठक या औपचारिक अनौपचारिक भेंट मुलाकात केंद्रीय सरकार द्वारा राज्य सरकारों के साथ हुई है ? कभी किसी राष्ट्रीय मसले पर सभी दलों के नेता एक साथ सामने आए हैं ? कभी केंद्र ने अपने अत्यंत महत्वपूर्ण विधेयकों चाहे वह जम्मू कश्मीर राज्य पुनर्गठन बिल 2019 हो, या कश्मीर में लंबे समय तक लॉक डाउन करने की बात हो, या एनआरसी, एनपीआर सीएए से उपजा व्यापक जन असंतोष हो, या अब इस नामुराद कोरोना प्रकोप का मामला हो, कभी केंद और राज्य के बीच कोई समन्वय बैठक हुई है ? यह तो छोड़ दीजिए, इन विषयों पर, एनडीए के सरकार समर्थित घटक दलों की भी कोई गोष्ठी नहीं बुलाई गयी।

यह भी अभूतपूर्व है कि, केंद्र सरकार के एक महत्वाकांक्षी योजना एनपीआर को लेकर 11 राज्य सरकारों और विधान सभाओं ने उसका क्रियान्वयन करने से मना कर दिया है। फिर भी केंद्र राज्य के बीच इस विषय पर एक बार भी सबकी कोई बैठक तक नहीं हुई। आखिर केंद्र सरकार ने क्यों नहीं इतने महत्वपूर्ण मसले पर राज्यों के मुख्यमंत्रियों और सभी दलों को अपने विश्वास में लिया ?

ऐसा इसलिए नहीं हुआ कि भाजपा और अन्य दलों के बीच अब केवल वैचारिक मतभेद ही नहीं रहे, अब वह एक पट्टीदारी के झगड़े जैसे हो गए हैं। जब शत्रुता और वैमनस्य का भाव निजी स्तर पर संक्रमित हो जाए तो ऐसी समस्याएं आएंगी ही कि सरकार और विपक्ष, जिसे जहां मौका मिलेगा एक दूसरे को नीचा दिखाने का अवसर नहीं छोड़ेंगे, बल्कि ऐसे अवसर ढूंढे और गढ़े भी जाएंगे। इन सब रस्सा कशी में सबसे पीड़ित और ठगे जाएंगे, हम भारत के लोग। यह एक संकीर्ण समाज का द्योतक है। घमंड भरी तानाशाही की सोच का परिणाम है यह। जब जनता के प्रति सरकार का दृष्टिकोण  लोक कल्याणकारी राज्य का नहीं रह जाता है तो शासन का यही विकृत रूप उभर कर सामने आ जाता है। 

कल्पना कीजिए, यदि दिल्ली की यही भीड़ आनन्द विहार और यूपी बॉर्डर के बजाय लुटियन ज़ोन की ओर रुख कर दी होती तो क्या दिल्ली पुलिस उन्हें नहीं रोकती ? तब तक दिल्ली स्थित सभी केंद्रीय पुलिस बल की टुकड़ियां इस जुगत में लग जाती कि यह भीड़ लुटियन ज़ोन से दूर ही रहे। दोनों सरकारों की पूरी सरकारी मशीनरी अब तक व्यवस्था में जुट जाती। क्योंकि राजा और राजन्य की नींद में खलल पड़ने का भय था। सुविधाओं का आदी शासक वर्ग सबसे अधिक अपनी सुविधा छिनने के भय से घबराता है। लेकिन यह भीड़ सरकारों की नींद में खलल डालने की आदत छोड़ चुकी है इसलिए उधर जाएगी नहीं। जनपथ ने राजपथ पर अतिक्रमण करना अब छोड़ दिया है।

डॉ. लोहिया के शब्दों में सूनी सड़कों ने संसद को आवारा बना दिया है। अब तो सबसे महत्वपूर्ण फाइनेंस बिल, जिसे बजट कहते हैं, बिना चर्चा के ही पास हो जाते हैं। दूसरे,  भीड़ को यह भी लगने लगा है कि, किसी भी समस्या का समाधान अब उधर भी नहीं है। जब कोई समाधान नहीं रहता है तो हम अपने गांव घर की तरफ ही निकल पड़ते हैं। आज भारत की चर्चा दुनिया भर में जितनी कोरोना प्रकोप के कारण नहीं हो रही है उससे अधिक इस लॉक डाउन के बदइंतजामी के लिये हो रही है। 

कोरोना प्रकोप, अब एक राष्ट्रीय आपदा घोषित हो चुकी है और यह संकट जाति धर्म और राजनीतिक विचारधाराओं की सीमा तोड़ कर सर्वव्यापी हो चुका है। सरकार को चाहिए कि वह एक सर्वदलीय बैठक बुलाये और स्वास्थ्य, वित्त, वाणिज्य, आपदा प्रबंधन के विशेषज्ञों सहित अन्य जो इस संकट की घड़ी में कुछ समाधान सुझा सकते हैं कि एक अधिकार सम्पन्न कमेटी बनाये और इस समस्या से निपटने के लिये तुरन्त ब्ल्यू प्रिंट तैयार कर उस पर काम करे। 

बड़ी आपदाओं के समय सर्वदलीय मीटिंग की जाती रही है और ऐसी कमेटियां बनती भी रही हैं। इस सर्वदलीय और विशेषज्ञों की कमेटी में वे ही लोग रखे जाएं जिनके पास ऐसे संकट से उबरने के लिये न केवल ज्ञान और दृष्टि हो बल्कि एक पेशेवर इच्छा शक्ति भी हो। केवल लफ़्फ़ाज़ी और हवा बाजी कि सब एकजुट रहें, राष्ट्र को बचाना है, जैसे जुमले काम नहीं आएंगे। आंधी, तूफान, बाढ़, या भूकम्प जैसी आपदायें आती हैं तो कोई भी एकजुट नहीं रहता है, समाज, परिवार और बंधन के सारे ताने बाने बिखर जाते हैं। हर व्यक्ति खुद बचने बचाने की जुगत में पड़ जाता है। फिर न कोई सुभाषित काम आता है और न कोई लफ्फाजी भरा भाषण। न मन कि बात और न ही रात आठ बजे के प्रवचन। 

अब जाकर कुछ पूंजीपतियों ने धन देना शुरू कर दिया है। कुछ धार्मिक संस्थाओं ने भी धन देना शुरू कर दिया है। सामाजिक संगठनों ने भी जितनी हैसियत है उसके अनुसार अपनी अपनी जगहों पर सहायता पहुंचानी शुरू कर दी है। लेकिन यह सहायता कैसे और किस तरह से बिना उसके दुरुपयोग हुए पहुंचाई जाए उसका एक मैकेनिज्म बनाना सरकार का काम है। सहायता में प्राथमिकताएं तय की जाएं। यह न युद्ध है न साम्प्रदायिक दंगे, न कोई स्थानीय दैवी आपदा, जैसे बाढ़, भूकम्प या भयावह आग कि जिसका प्रबंधन एक ही स्थान पर केंद्रित हो बल्कि यह एक ऐसी आपदा है जो घर-घर में घुस कर पीड़ित कर देने की क्षमता रखती है। इसके सटीक प्रबंधन की योजना बनानी पड़ेगी। जो फिलहाल तो कहीं दिख नहीं रही है। 

सरकार के पास प्रधानमंत्री राहत कोष पहले से है और अब एक नया कोष प्रधानमंत्री केयर फंड और बना है। सरकार को धन की ज़रूरत पड़ेगी, यह बात सबसे महत्वपूर्ण है। सरकार को सभी अनावश्यक और अनुपयोगी खर्चे रोक देने चाहिए। संसद के विस्तार के लिये 20 हजार करोड़ की योजना तुरन्त स्थगित कर दी जानी चाहिए। अन्य जो खर्चे अनुपयोगी हों उनकी भी समीक्षा की जानी चाहिये। सभी निजी अस्पतालों को कोविड 19 के मरीजों के इलाज और टेस्ट के लिए तैयार रहने के लिये सख्ती से हिदायत दे देनी चाहिए और अगर वे आनाकानी करें तो जब तक स्थिति सामान्य नहीं हो जाती तब तक के लिये उनका अधिग्रहण कर लेना चाहिए। 

हज़ारों लोग सड़कों पर निकल आये हैं । वे अपने घरों को, जो उनके नौकरी की जगह से सैकड़ों किलोमीटर दूर हैं, की ओर बिना यह जाने बूझे कि, कैसे जाएंगे, चल पड़े हैं । जो फ़ोटो सोशल मीडिया पर दिख रही हैं, उनसे तो यही लगता है कि लॉक डाउन अब टूट गया है। जिस सोशल डिस्टेंसिंग की बात दुनिया कर रही है उसका तमाशा बन चुका है। अब कम से कम इन बेसहारों को राहत पहुंचाने के लिए, रास्ते मे पड़ने वाले स्कूलों कॉलेज की बिल्डिंगों को तब तक उनका स्थानीय ठिकाना बना कर उनके भोजन पानी की व्यवस्था के लिये, इन्हें आसपास की स्वयंसेवी संस्थाओं को देखरेख  का दायित्व दे दिया जाना चाहिए। फिर जब जैसी परिस्थिति और व्यवस्था आगे हो वैसे ही उन्हें उनके गंतव्य तक भेजना चाहिए। फिलहाल तो उन्हें भी राहत मिले और कोरोना प्रकोप को फैलने से रोका जा सके। 

असल समस्या, धन की कमी नहीं होती है बल्कि असल समस्या होती है ऐसे आफत विपत्ति में कैसे इसे संभाला जाए। धन की व्यवस्था तो हो जाएगी पर धन रहते हुए भी चीजें कैसे पटरी पर आयें यह अक्सर समस्या से विचलित मन सोच भी नहीं पाता है। सर्वदलीय और विशेषज्ञों की कमेटी और एक योजना बनाने की बात मैं इसी लिये कह रहा हूँ। एनडीआरएफ, और एसडीआरएफ जैसे आपदा से निपटने के संगठन देश मे हैं और इनसे निपटने के लिये सरकार के पास शक्तियों की कमी नहीं है। और अगर अधिकारों की कमी है भी तो अध्यादेश केंद्र और राज्य सरकार पारित कर नए कानून बना भी सकती है। देर तो हो ही चुकी है पर यह सब केंद्रीय स्तर पर राज्यों से तालमेल कर के तुरन्त शुरू करना होगा अन्यथा जैसा कि कोरोना के स्टेज 3 यानी कम्यूनिटी स्प्रेडिंग की बात चिकित्सा विशेषज्ञ बता रहे हैं तब यह सब करना भी कठिन हो जाएगा। अगर इसे संभाला नहीं गया तो, यह उस आसन्न महामारी से भी घातक हो जाएगा जिसे बचाने के लिये हम यह सब उपक्रम कर रहे हैं। 

( विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं।)

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