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Categories: बीच बहस

निरंकुश शासन की ओर बढ़ने और विरोध को कुचलने के लिए दिल्ली में तामील की गयी है रासुका

वैसे तो नागरिकता कानून को लेकर पूरा देश उद्वेलित है लेकिन जिस तरह राजधानी दिल्ली में चतुर्दिक विरोध हो रहा है और अदालत की तीखी टिप्पणियाँ आ रही हैं उससे निपटने के लिए 19 जनवरी रविवार से अगले 3 महीने तक दिल्ली में ‘राष्ट्रीय सुरक्षा कानून’ लागू कर दिया गया है। इसका अर्थ है अर्थात ‘रासुका’ अब पूरे दिल्ली में अगले तीन महीने तक रहेगी। इस कानून के हिसाब से सरकार को यह बताने की जरूरत ही नहीं कि निरुद्ध व्यक्ति का अपराध क्या है? सरकार को जिस पर भी शक हो उसे गिरफ्तार कर सकती है, सरकार जिसे भी संदिग्ध मानती है उसे बिना कुछ बताए डिटेन कर सकती है। बिना आरोप तय किए ही सरकार निरुद्ध व्यक्ति को एक साल तक जेल में रख सकती है, जबकि सामान्य स्थिति में गिरफ्तारी के 24 घंटे के अंदर आरोपी को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना होता है।

अब यदि भीम आर्मी के चन्द्रशेखर रावण हों या जेएनयू की आईशी घोष हों या जामिया का कोई छात्र हो या फिर कन्हैया कुमार हों या कोई भी और दिल्ली पुलिस जिसे भी चाहेगी उसे बिना कुछ बताए रासुका में निरुद्ध कर देगी। तब कोई अदालत नहीं कह सकेगी कि किस कानून में लिखा है कि किसी धार्मिक स्थान के बाहर प्रदर्शन नहीं किया जा सकता है। लोग जहां चाहें शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर सकते हैं। जामा मस्जिद पाकिस्तान में नहीं है कि जहां प्रदर्शन की इजाजत नहीं दी जा सकती और शांतिपूर्ण प्रदर्शन तो पाकिस्तान में भी होते हैं।

अब कोई अदालत नहीं कह सकेगी कि संसद के अंदर जो बातें कही जानी चाहिए थीं, वे नहीं कही गयीं। यही वजह है कि लोग सड़कों पर उतर गये हैं। हमें अपना विचार व्यक्त करने का पूरा हक है लेकिन हम देश को नष्ट नहीं कर सकते। अब कोई अदालत नहीं कह सकेगी कि धरना में क्या गलत है? विरोध करने में क्या गलत है? विरोध करना एक संवैधानिक अधिकार है।

दरअसल दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट की जज कामिनी लाउ ने भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर रावण की याचिका पर सुनवाई करते हुए जनता के शांतिपूर्ण धरना-प्रदर्शन करने के अधिकार को लेकर दिल्ली पुलिस को जमकर खरी खोटी सुनाई। दिल्ली पुलिस ने जब कहा कि शांतिपूर्ण धरना-प्रदर्शन के लिए भी इजाजत की जरूरत पड़ती है तो इस पर जज साहिबा ने कहा कि ‘कैसी इजाजत, आप ऐसे व्यवहार कर रहे हैं जैसे जामा मस्जिद पाकिस्तान में हो। अगर वो पाकिस्तान में भी होती तो वहां भी धरना-प्रदर्शन करने का अधिकार होता, वो भी अविभाजित भारत का हिस्सा ही था। जज ने कहा कि जब संसद तक लोगों की आवाज नहीं पहुंचती तो लोगों को सड़क पर उतरना पड़ता है। मैंने कई नेताओं को धरना-प्रदर्शन करके बड़े नेता और मंत्री बनते हुए देखा है। चंद्रशेखर भी उभरते हुए नेता हैं, उन्हें भी धरना-प्रदर्शन करने का हक है। पुलिस ऐसा कोई सबूत पेश नहीं कर पाई, जिससे पता चले कि वो हिंसा करने वाले भड़काऊ बयान दे रहे थे।

दरअसल केंद्र सरकार ने जिस तरह जम्मू कश्मीर में संविधान ताक पर रखकर अघोषित आपातकाल लगा रखा है और तमाम विपक्षी नेताओं को रासुका जैसे काले कानून में नजरबंद कर रखा है उसे देखते हुए चंद्रशेखर रावण का मामला एक टेस्ट केस था जिसमें दिल्ली पुलिस प्रकारान्तर से केंद्र सरकार को मुंह की खानी पड़ी। इससे नपटने के लिए बजरिये दिल्ली के उप राज्यपाल दिल्ली में तीन महीने के लिए रासुका लगा दिया गया है। अब दिल्ली के राज्यपाल के मातहत पुलिस नहीं है बल्कि केन्द्रीय गृह मंत्रालय के मातहत है। राज्यों के राज्यपाल राज्य  सरकार की सलाह पर काम करते हैं लेकिन दिल्ली के रूप राज्यपाल ने किसकी सलाह पर रासुका को मंजूरी दी है, यह संविधान विशेषज्ञों के शोध का विषय है।

धरना प्रदर्शन का मामला 2011 में भी उछला था। दिल्ली के रामलीला मैदान में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई को लेकर शांतिपूर्ण धरना-प्रदर्शन चल रहा था।  इस प्रदर्शन में योग गुरु स्वामी रामदेव ने भी हिस्सा लिया। प्रदर्शन में उनके समर्थकों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी, जिसके बाद दिल्ली पुलिस ने उन पर बुरी तरह से लाठी चार्ज किया था। मामला अदालत में पहुंचा। इस पर उच्चतम न्यायालय ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। उच्चतम न्यायालय ने उस वक्त कहा था कि शांतिपूर्ण धरना-प्रदर्शन करना, किसी भी नागरिक का मौलिक अधिकार है। ये किसी भी तरह से उनसे छीना नहीं जा सकता। कार्यपालिका या न्यायपालिका, किसी भी कार्रवाई के जरिए इस अधिकार को वापस नहीं ले सकती।

मेनका गांधी वर्सेज यूनियन ऑफ इंडिया के मामले में जस्टिस भगवती ने कहा था कि अगर लोकतंत्र जनता का, जनता के लिए जनता द्वारा शासन है तो ये निश्चित है कि देश का हर नागिरक अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का इस्तेमाल करे। इसलिए उन्हें जनता के मुद्दों पर अपने विचार रखने, उन्हें प्रकट करने और उसके लिए एक जगह पर शांतिपूर्ण तरीके से इकट्ठा होने का पूरा अधिकार है।

गौरतलब है कि धरना प्रदर्शन में किसी भी तरह की हिंसा न हो और प्रदर्शन के लिए पहले से अनुमति लेना जरूरी है। मौलिक अधिकारों का हवाला देकर अपने अधिकार का इस्तेमाल करने के साथ ये भी जरूरी है कि सभी तरह के कानून का पालन किया जाए। संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (A) में अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार दिया गया है। वहीं अनुच्छेद 19 (1) (B) नागरिकों को अधिकार है कि वो अपनी मांग और किसी बात के विरोध के लिए शांतिपूर्ण तरीके से एक जगह इकट्ठा हों।

उच्चतम न्यायालय ने इस संदर्भ में 23 जुलाई 2018 को एक महत्वपूर्ण फैसला दिया था। कोर्ट ने जंतर-मंतर पर धरना और प्रदर्शन की इजाजत देते हुए अथॉरिटी से कहा था कि वह इस बात को सुनिश्चित करे कि धरना और प्रदर्शन के दौरान वहां रहने वाले आम शहरी को परेशानी न हो और उनके अधिकार प्रभावित न हों। उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि कानूनी तरीके से विरोध करना लोकतंत्र की विशिष्ट पहचान है। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि धरना और प्रदर्शन का अधिकार मौलिक अधिकार है, लेकिन साथ ही इसमें सरकार वाजिब रोक भी लगा सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अभिव्यक्ति के अधिकार अहम हैं। सवाल यह नहीं है कि प्रदर्शन न्यायसंगत है या नहीं है बुनियादी सवाल ये है कि प्रभावित लोगों का अधिकार है कि वह लोकतंत्र में आवाज उठा सकते हैं।

गौरतलब है कि अनुच्छेद-19 (1) के तहत विचार अभिव्यक्ति का अधिकार है। इसके तहत कोई भी नागरिक अपनी आवाज उठाने के लिए धरना-प्रदर्शन कर सकता है लेकिन यह धरना-प्रदर्शन कानून के तहत होना चाहिए। यानी अगर किसी इलाके में मजिस्ट्रेट ने निषेधाज्ञा यानी धारा 144 लगा रखी है तो वहां धरना प्रदर्शन नहीं हो सकता। मजिस्ट्रेट धारा-144 लगा सकता है। अगर कोई इसका उल्लंघन करता है तो पुलिस उस पर कार्रवाई कर सकती है। साथ ही सरकार द्वारा तय इलाके में धरना और प्रदर्शन हो सकता है, जिस इलाके में इसकी मनाही है वहां प्रदर्शन नहीं हो सकता। विचार अभिव्यक्ति का अधिकार पूर्ण नहीं है बल्कि संविधान के अनुच्छेद-19(2) में वाजिब प्रतिबंध है और इसके तहत सरकार धरना प्रदर्शन को सीमित कर सकती है या फिर उस पर रोक लगा सकती है।

लेकिन जनवरी 2020 में कश्मीर लॉकडाउन मामले में दिए गए अपने फैसले में उच्चतम न्यायालय ने माना है कि दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 144 के तहत मिले अधिकारों को विचारों की वैध अभिव्यक्ति या लोकतांत्रिक अधिकारों का उपयोग करने से रोकने के लिए एक उपकरण के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 144 के प्रावधान केवल आपातकाल की स्थिति में और कानूनन नियोजित किसी व्यक्ति को बाधा पहुंचाने से रोकने और परेशान करने या चोट से रोकने के उद्देश्य से लागू होंगे। सीआरपीसी की धारा 144 के तहत दोहराए गए आदेश, अधिकारों का दुरुपयोग माना जाएगा।

दिल्ली पुलिस ने हालांकि कहा है कि रासुका का प्रवधान एहतियातन लगाया गया है, लेकिन कानूनविदों का मानना है कि इसके आंकड़े एनसीआरबी (नेशनल क्राइम रिपोर्ट ब्यूरो) में भी दर्ज नहीं किए जाते, मतलब जब रिपोर्ट ही नहीं होगी, चार्जेज ही नहीं होंगे तो पता ही नहीं चलेगा कि कितने लोग जेल भेज दिए गए। इस कानून के अनुसार कानूनी मदद के लिए वकील की सहायता लेने पर भी प्रतिबंध है। सरकार चाहे तो इसमें निरुद्ध किसी भी व्यक्ति को बताने के लिए भी जिम्मेदार नहीं है कि किस कारण उसे  जेल में डाला जा रहा है और उसकी गलती क्या है?

इसे केवल हाईकोर्ट में ही चुनौती दी जा सकती है और यदि कोर्ट राष्ट्रवादी मोड में हो तो वह सक्षम अधिकारी की बात से सहमति जता सकता है कि आरोपी को जेल में रखा जाना जरूरी है। फिर जितने दिन सरकार चाहे जेल में रख सकती है। अब सरकार जिसे चाहे फेसबुक पोस्ट के लिए उठा सकती है, बिना कारण बताए जेल में डाल सकती है, न वकील मिलेगा, न कोई दलील चलेगी। जिसे चाहो जेल में डाल दो, पोस्ट लाइक-शेयर करने के लिए भी जेल में ठूंसा जा सकता है।

गौरतलब है कि राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा किससे है? राष्ट्रीय सुरक्षा शब्द अपने आप में काफी अनिश्चित है, अपरिभाषित है। अभी तक सरकार की नीतियों के विरोध पर देशद्रोही, तर्कपूर्ण बात पर टुकड़े-टुकड़े की संज्ञा से नवाजा जा रहा था, अब रासुका से नवाजा जायेगा। सरकार की आलोचना अब राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा मानी जा सकती है। आज जब देश भर में लोग नागरिकता कानून ,एनपीआर और एनआरसी के मुद्दे पर सड़कों पर हैं, सरकार इस कानून की आड़ लेकर विरोधियों को कुचलने का पूरा प्लान तैयार कर चुकी है।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह कानूनी मामलों के जानकार हैं और आजकल इलाहाबाद में रहते हैं।)

This post was last modified on January 19, 2020 1:38 pm

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