Thursday, January 20, 2022

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सांसदों-विधायकों के खिलाफ ट्रायल मामलों में देरी पर सुप्रीम कोर्ट सीबीआई और ईडी पर बरसा

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सांसदों और विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामलों के जल्द ट्रायल करने के मामले पर उच्चतम न्यायालय के चीफ जस्टिस एनवी रमना, जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस सूर्यकांत की पीठ में सुनवाई हुई। उच्चतम न्यायालय सीबीआई और ईडी पर ट्रायल में देरी पर जमकर फटकार लगायी। चीफ जस्टिस एनवी रमना ने कहा कि 15-20 साल से केस पेंडिंग हैं। ये एजेंसियां कुछ नहीं कर रही हैं। खासतौर से ईडी सिर्फ संपत्ति जब्त कर रही है। यहां तक कि कई मामलों में चार्जशीट तक दाखिल नहीं की गई है। केसों को ऐसे ही लटका कर न रखें। चार्जशीट दाखिल करें या बंद करें। मामलों में देरी का कारण भी नहीं बताया गया है।

चीफ जस्टिस ने कहा कि पीएमएलए  में 78 मामले 2000 से लंबित हैं। आजीवन कारावास में भी कई मामले लंबित हैं। सीबीआई के 37 मामले अभी लंबित हैं। हमने एसजी से हमें यह बताने के लिए कहा था कि इसमें कितना समय लगेगा। हम एसजी तुषार मेहता से सीबीआई और ईडी से इन लंबित मामलों के बारे में स्पष्ट स्पष्टीकरण देने को कहेंगे। इन एजेंसियों ने इन मामलों में देरी के कारणों के बारे में विस्तार से नहीं बताया है। एसजी ने कहा कि आप हाईकोर्ट को इसमें तेजी लाने का निर्देश दे सकते हैं।

पीठ ने 10 साल बाद भी कई मामलों में चार्जशीट दाखिल नहीं करने के कारणों का संकेत नहीं देने पर ईडी और सीबीआई पर नाराजगी व्यक्त की। ईडी और सीबीआई द्वारा दायर रिपोर्ट का हवाला देते हुए चीफ जस्टिस ने कहा कि हमें यह कहते हुए खेद है कि रिपोर्ट अनिर्णायक है और 10-15 साल तक चार्जशीट दाखिल नहीं करने का कोई कारण नहीं है। हमने पहले ही उच्च न्यायालयों को हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक समिति बनाने का निर्देश दिया है। जांच एजेंसियां आगे बढ़ सकती हैं और जांच पूरी कर सकती हैं।  

पीएमएलए एक्ट में पूर्व सांसद समेत 51 सांसद आरोपी हैं। 51 मामलों में से 28 की अभी जांच चल रही है, 4 का ट्रायल चल रहा है। ये कम से कम 10 साल पुराने मामले हैं। कुछ मामलों में अत्यधिक देरी हुई है। कुछ मामलों में मुकदमे की स्थिति का उल्लेख नहीं किया गया है। विधायकों के खिलाफ मामलों में भी यही स्थिति है। लगभग 70 में से 40 से अधिक की जांच चल रही है।

121 मामले 51 सांसदों के खिलाफ हैं। 112 विधायकों के खिलाफ हैं। सबसे पुराना मामला 2000 का है। सीबीआई की विशेष अदालतों में 58 मामले लंबित हैं और आजीवन कारावास की सजा से संबंधित हैं। मौत की सजा के मामले में भी केस सालों से लंबित हैं। एक मामले में वे कह रहे हैं कि मामला 2030 में पूरा होने की उम्मीद है।

केंद्र के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट से मौजूदा सांसदों और विधायकों के खिलाफ मामलों की जांच पूरी करने के लिए जांच एजेंसियों पर समय सीमा तय करने का आग्रह किया। एसजी का कहना है कि कोर्ट के दखल से चीजें सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रही हैं।

पीठ ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से सीबीआई और ईडी निदेशकों से बात करने के लिए कहा है ताकि एजेंसियों में जनशक्ति का पता लगाया जा सके ताकि जांच को समयबद्ध पूरा किया जा सके। निगरानी समिति के सुझावों पर भी गौर करें। एसजी ने कहा कि मैं उनके साथ एक संयुक्त बैठक करूंगा, जो भी कमी है उसे दूर किया जा सकता है।

पीठ ने कहा कि हालांकि संसद सदस्यों (सांसदों) और विधानसभा सदस्यों (विधायकों) के खिलाफ मामलों की सुनवाई में तेजी लाने के लिए निर्देश पारित किए जा सकते हैं, लेकिन न्यायाधीशों की कमी के कारण ऐसे निर्देशों को लागू करना आसान नहीं होगा।पीठ ने हालांकि कहा कि ऐसे आरोपी कानून निर्माताओं के सिर पर तलवार लटकी नहीं रहनी चाहिए और मुकदमे में अत्यधिक देरी से बचने के लिए एक नीति विकसित की जानी चाहिए।

पीठ ने टिप्पणी की कि यह कहना आसान है कि इसमें तेजी लाएं और इसे तेज करें, लेकिन जज कहां हैं?पीठ ने यह भी कहा कि जहां वह प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) जैसी जांच एजेंसियों का मनोबल गिराना नहीं चाहता है, वहीं इन एजेंसियों के जवाबों में ट्रायल में देरी के कारणों को स्पष्ट नहीं किया गया है।

पीठ ने टिप्पणी की कि हम एजेंसियों के बारे में कुछ नहीं कहना चाहते क्योंकि हम उनका मनोबल गिराना नहीं चाहते। वरना यह वॉल्यूम बोलता है। इन सीबीआई अदालतों में 300 से 400 मामले हैं। यह सब कैसे करें? सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता कहने के लिए खेद है, रिपोर्ट अनिर्णायक है। 10 से 15 साल तक चार्जशीट दाखिल न करने का कोई कारण नहीं है। केवल संपत्तियों को जोड़ने से किसी उद्देश्य की पूर्ति नहीं होती है।

जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि सीबीआई, ईडी के निदेशक बता सकते हैं कि कितनी अतिरिक्त मैनपावर की जरूरत है। चीफ जस्टिस रमना ने कहा कि मैनपावर एक वास्तविक मुद्दा है। हमारी तरह, जांच एजेंसियां भी इस मुद्दे से पीड़ित हैं। हर कोई सीबीआई जांच चाहता है।

जब एसजी ने कहा कि उच्च न्यायालयों द्वारा पारित स्थगन आदेशों ने मुकदमे को रोक दिया, तो पीठ ने कहा कि आंकड़े बताते हैं कि केवल 8 मामलों में स्थगन आदेश हैं (उच्च न्यायालयों द्वारा 7 और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एक)।

एमिकस क्यूरी वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसरिया ने बताया कि उन्होंने मामलों में देरी के कारणों का मूल्यांकन करने के लिए निगरानी समिति के गठन के संबंध में एक सुझाव दिया है। निगरानी समिति में उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश या उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, ईडी निदेशक, सीबीआई निदेशक, भारत सरकार के गृह सचिव, एक न्यायिक अधिकारी शामिल होंगे जो उच्चतम न्यायालय द्वारा नामित जिला न्यायाधीश के पद से नीचे का नहीं होगा। पीठ ने सॉलिसिटर जनरल से एमिकस क्यूरी द्वारा दिए गए इस सुझाव पर गौर करने को कहा।

पीठ अश्विनी उपाध्याय बनाम भारत संघ के सांसदों और विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामलों के लंबित होने और विशेष अदालतों की स्थापना करके उनके शीघ्र निपटान के संबंध में पीआईएल पर सुनवाई कर रही है। पिछली बार सुप्रीम कोर्ट ने सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों के संबंध में स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने में सीबीआई, ईडी और एनआईए जैसी केंद्रीय जांच एजेंसियों की ओर से देरी के लिए केंद्र सरकार की खिंचाई की थी।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

  

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