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Categories: बीच बहस

यूपी: एक रिटायर्ड आईएएस अफसर पूरी सत्ता पर पड़ रहा है भारी

सूर्य प्रताप सिंह, आईएएस पर एफआईआर दर्ज होने से एक बात तो यह तय हो गयी कि, अब थानों में बिना किसी भेदभाव के एफआईआर दर्ज होने लगीं नहीं तो रिटायर होने के बाद अब भी कुछ फोन मेरे पास आते रहते हैं कि अमुक थाने पर मुकदमा नहीं लिखा जा रहा है। मामले और मौके की जरूरत के हिसाब से हम भी सिफारिश कर देते हैं।

मुकदमे लिख भी लिए जाते हैं। सरकार और डीजी सहित हम सब रोज़ ही इस शिकायत से रूबरू रहते थे, (जब मैं नौकरी में था तब कि बात कर रहा हूँ ) थानों पर मुकदमे दर्ज नहीं होते हैं। मुकदमे दर्ज हों, इसके लिये टेस्ट एफआईआर का सिस्टम चलाया गया। अब भी चल रहा है।

अब बात एसपी सिंह पर दर्ज मुक़दमे की। उत्तर प्रदेश कैडर के आईएएस अफसर, सूर्य प्रताप सिंह पर थाना हजरतगंज कोतवाली, लखनऊ में आईपीसी की धारा, 188/ 505 और डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट के अंतर्गत मुकदमा दर्ज किया गया है। सूर्य प्रताप सिंह ने एक वीडियो बयान जारी करके अपनी बात रखी और यह बताया कि, उनके खिलाफ मुकदमा क्यों दर्ज किया गया है।

एसपी सिंह को मैं व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ और उनकी कार्यप्रणाली से भी परिचित हूँ। लेकिन हम साथ-साथ कहीं भी सेवा काल में नियुक्त नहीं रहे हैं। वे एक स्पष्टवादी और नियम कानूनों के अंतर्गत काम करने वाले प्रशासनिक अधिकारी रहे हैं। पर अपनी इस साफगोई के कारण जल्दी-जल्दी तबादले भी उनके होते रहे हैं। पूरे सेवाकाल में उनके 54 तबादले हुए हैं।

मामला, कोविड 19 की टेस्टिंग से जुड़ा है। सूर्य प्रताप सिंह ने एक ट्वीट कर के प्रदेश के मुख्य सचिव से पूछा है कि,

“सीएम योगी की टीम- 11 की मीटिंग के बाद क्या मुख्य सचिव ने ज्यादा कोरोना टेस्ट कराने वाले कुछ DMs को हड़काया कि ‘क्यों इतनी तेजी पकडे़ हो, क्या ईनाम पाना है, जो टेस्ट- टेस्ट चिल्ला रहे हो? “

इसी ट्वीट को आधार बनाते हुए उनके खिलाफ झूठी अफवाहें फैलाने के आरोप में एक एफआईआर थाना हजरतगंज में दर्ज की गई है। यह एक सवालिया ट्वीट है जो मुख्य सचिव से यूपी का कोई भी नागरिक पूछ सकता है। सूर्य प्रताप सिंह जो खुद ही एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी रहे हैं और वे सरकारी मीटिंग, आंकड़ों की बाजीगरी से भली भांति परिचित हैं तो उन्होंने यह सवाल सरकार से पूछ लिया।

होना तो यह चाहिए था कि इस ट्वीट के जवाब में या तो सरकार को उनके ट्वीट का प्रतिवाद करना चाहिए था, या टेस्ट की स्टेटस सार्वजनिक करनी चाहिए थी। लेकिन यह आरोप कि एसपी सिंह अफवाह फैला रहे हैं किसी भी व्यक्ति जो कायदा कानून जानता है, के गले नहीं उतर सकता है।

डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट में अफवाह फैलाना जुर्म है पर सरकार या किसी से सवाल पूछना अपराध नहीं है। हम रोज़ मीडिया पर, गोबर, गोमूत्र, काढ़े तथा तरह-तरह की दवाइयों का प्रचार जिसका न तो कोई वैज्ञानिक आधार है और न ही उसका कोई वैज्ञानिक परीक्षण किया गया है, प्रचारित होते देखते हैं जो न सिर्फ अवैज्ञानिकता का एक प्रकार से प्रचार है बल्कि आम जन मानस को अफवाह फैला कर भ्रमित करना है, पर आज तक किसी भी सरकार या पुलिस ने मुकदमा दर्ज नहीं कराया और न ही सरकार ने ऐसी फैल रही अफवाहों का कोई खंडन ही किया।

देहातों में खुल कर कोरोना माई की पूजा हो रही है, तांत्रिक और ओझा सोखा सक्रिय हैं पर इस पर ध्यान न तो सरकार का गया और न ही पुलिस का। डिजास्टर एक्ट में जिस अफवाहबाजी का प्रावधान है, उसका उद्देश्य महामारी के बारे में अवैज्ञानिक सोच और लोगों को गुमराह कर के उनके आर्थिक, सामाजिक और मानसिक दोहन करने से रोकना है, न कि सरकार से सवाल पूछने वाले को हतोत्साहित करना है।

लखनऊ के हजरतगंज थाने में दायर हुई इस एफआईआर में उनके ट्वीट्स को भ्रामक बताया गया और यह कहा गया कि इससे जनता में भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो गई है। एफआईआर दर्ज होने के बाद सूर्य प्रताप सिंह ने दोबारा, ट्वीट कर कहा,

” टीम-11 पर किए मेरे ट्वीट को लेकर सरकार ने मेरे खिलाफ मुक़दमा कर दिया है। सबसे पहले तो मैं ये साफ कर देना चाहता हूं कि उत्तर प्रदेश सरकार की पॉलिसी पर दिए नो टेस्ट, नो कोरोना, वाले बयान पर मैं अडिग हूं, और सरकार से निरंतर सवाल पूछता रहूंगा।”

ऐसा बिल्कुल नहीं है आज पहली बार सरकार से उन्होंने कोई सवाल पूछा है। समाजवादी पार्टी की सरकार के समय भी उन्होंने उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की भर्तियों पर भी बेहद असहज करने वाले सवाल उठाए थे। तब उनके बयान अखबारों में खूब छपते थे। उस समय भाजपा विपक्ष में थी, और भाजपा ने एसपी सिंह के उन बयानों का खूब स्वागत किया तथा राजनीतिक लाभ लिया। इस पर भी एक ट्वीट कर के उन्होंने कहा कि,

” मैंने आईएएस अधिकारी रहते पिछली सरकार के खिलाफ आंदोलन चलाया था, तब भाजपा के बड़े-बड़े नेता मेरी पीठ थपथपाते थकते नहीं थे। “

वे आगे कहते हैं,

” पूर्व सीएम अखिलेश यादव ने कभी भी मेरे आंदोलन को निजी तौर पर नहीं लिया पर आज ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ की बात करने वाली सरकार का रवैया देख आश्चर्यचकित हूं, स्तब्ध हूं। 25 साल में 54 ट्रांसफर मेरी सदनीयत व नीतियां नहीं बदल सके तो एक एफआईआर क्या बदलेगी? सत्य पक्ष हमेशा सत्ता पक्ष पर भारी पड़ता है।”

1982 बैच के आईएएस एसपी सिंह पहले भी योगी सरकार के खिलाफ मुखर रहे हैं। 69,000 शिक्षक भर्ती के मामले में भी उन्होंने ट्वीट करते हुए कहा था कि,

” शिक्षक भर्ती घोटाले में योगी सरकार फंसती जा रही है। यूपी के शिक्षा मंत्री पत्रकारों से नजर नहीं मिला रहे हैं। सरकार इस मामले में सीबीआई जांच कराने से क्यों डर रही है। ”

इससे पहले वह पीएम केयर फंड को लेकर भी सवाल उठा चुके हैं।

इस मुक़दमे पर उन्होंने यही कहा है कि,

” मैंने सिर्फ कम टेस्टिंग पर सवाल उठाए थे। ऐसा क्या गुनाह कर दिया। यह बात तो तमाम लोग कह रहे हैं कि यूपी में टेस्टिंग बेहद कम हो रही है। 20 करोड़ से अधिक आबादी और अभी 5 लाख लोगों की भी टेस्टिंग नहीं हुई। यानी 1% आबादी की भी टेस्टिंग नहीं हुई है। ज़ीरो पाॅइंट कुछ पर्सेंटेज है टेस्टिंग का। कई जिलों में तो बेहद कम ही टेस्टिंग हो रही है क्योंकि वहां टेस्टिंग सेंटर्स ही नहीं हैं। ऐसे में मैंने क्या गलत सवाल उठा दिया। कोई तो सवाल उठाने वाला होना चाहिए ऐसे दौर में जब सब चुप बैठे हैं। “

एसपी सिंह अपने स्टैंड पर बरकरार है, और उन्होंने अपने ट्वीट्स नहीं डिलीट किये हैं।

आंकड़े बाजी और आंकड़ों में हेर-फेर कोई नयी बात नहीं है बल्कि यह नौकरशाही का बहुत पुराना शगल है। कोविड 19 की टेस्टिंग की गति पूरे देश में ही कम है और यह बात आईसीएमआर तथा भारत सरकार की जानकारी में भी है। खुद स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने भी यह बयान जारी कर के कहा कि 130 करोड़ की आबादी में सबकी टेस्टिंग नहीं हो सकती है।

यूपी सरकार को लगता है कि उसकी टेस्टिंग की दर पर्याप्त है और वह इस टेस्टिंग से संतुष्ट है तो वह एसपी सिंह के ट्वीट के उत्तर में सारे आंकड़े सार्वजनिक कर के इसका प्रतिवाद कर सकती थी। लेकिन बजाय सरकार ने अपना पक्ष रखने और जनता को आश्वस्त करने के, सवाल पूछने वाले को ही अपराधी और सवाल पूछने को अपराध बता दिया तथा उस पर मुकदमा भी दर्ज कर दिया। अब देखना है कि यह ट्वीट अफवाह फैला रहा है, कैसे प्रमाणित होता है।

इससे यह निष्कर्ष न निकाला जाए कि थानों में मुक़दमे लिखे जाने लगे हैं। शिक्षक भर्ती घोटाले की एक एफआईआर लेकर वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी, अमिताभ ठाकुर अभी भी नगरी-नगरी द्वारे-द्वारे टहल रहे हैं पर उनकी एफआईआर दर्ज नहीं हो रही है। लेकिन एसपी सिंह की हिम्मत कैसे पड़ गयी सरकार से यह दरयाफ्त करने की कि कम टेस्ट का दबाव क्यों है तो सरकार विफर गयी और मुकदमा दर्ज हो गया।

( विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं।)

This post was last modified on June 15, 2020 7:45 pm

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