हिंसा की राजनीति और आतंक का व्यापार

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दिल्ली दंगों का एक दृश्य।

कहते हैं ‘जब रोम जल रहा था, नीरो बंसी बजा रहा था। ‘इसके पीछे की कहानी बड़ी दर्दनाक है। रोम में उन दिनों बादशाह नीरो के अत्याचारों के खिलाफ़ शांतिपूर्ण ढंग से जनता प्रदर्शन कर रही थी। जैसे आजकल भारत में नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ़ जगह-जगह शाहीन बाग उठ खड़े हुए हैं। कई लोगों ने और राज्यों ने अवज्ञा का ऐलान कर दिया है। ऊपर से दिल्ली के हालिया चुनावों में हुई हार ने हिन्दू-ध्रुवीकरण की राह में काँटे बिछाने का काम कर दिया है। जैसे मोदी बौखलाए हुए हैं, नीरो भी बौखलाया हुआ था। उधर से नीरो के मेहमान आ रहे थे और रोम के सबसे बड़े बाग में उनके स्वागत का भव्य आयोजन किया गया था। जैसे यहाँ अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प सपरिवार आ रहे थे और उनके स्वागत का इंतजाम विशालकाय मोटेरा स्टेडियम में भव्य तरीके से किया गया था।

नीरो के साथ समस्या यह थी कि मेहमानों की आँखों को चौंधिया देने वाली रौशनी का अभाव था। नीरो ने कैदियों और गरीब विद्रोहियों को बाग के चारों तरफ इकठ्ठा किया और उन्हें जिंदा जला दिया। बाग के चारों तरफ रोम के गरीब-कैदी-विद्रोही जल रहे थे और बाग में मेहमानों का भव्य स्वागत-समारोह चल रहा था। शक्ति-प्रदर्शन के लिए तानाशाह शासक ऐसा भी करते हैं। यहाँ भी जब ट्रम्प अपने प्रिय मित्र मोदी को गले से लगा कर उनके ‘सुशासन’ की तारीफ़ों के पुल बांध रहे थे, राजधानी दिल्ली में सीएए की समर्थक भीड़ ने बाकायदा दिल्ली पुलिस की निगरानी में ‘जय श्री राम’ के नारे लगाते हुए, नागरिकता कानून का विरोध कर रहे आंदोलनकारियों को पीटना, काटना और जलाना शुरू कर दिया था। जितने दिन ट्रम्प भारत में रहे, ‘अखंड हिंसा’ का दौर जारी रहा।

देश के कई जाने-माने बुद्धिजीवियों ने मोदी और केजरीवाल की खामोशी और निष्क्रियता पर तंज़ कसे। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय ने सुप्रीम कोर्ट में हस्तक्षेप याचिका दायर की है। विश्व की जानी-मानी पत्रिका ‘टाइम’ ने (जिसने कुछ महीने पहले प्रधानमंत्री मोदी को ‘भारत का महान विभाजक’ बताया था) अपनी ‘कवर स्टोरी’ में एक सवाल पूछा है ‘भारतीय मुसलमानों के लिए दिल्ली दंगों के बाद अगला कार्यक्रम क्या होगा?’ सारे देश के लिए यह वाकई बहुत ही शर्मनाक है क्योंकि यह सवाल एक ऐसे व्यक्ति से पूछा गया है, जो भारत का प्रधानमंत्री है। 

1984 में दिल्ली में हुए नरसंहार में भी यही हुआ था, 2002 में गुजरात में हुई कत्लो गारत में भी और अब की दिल्ली में भी यही हुआ कि क़ातिलों को तीन दिन की खुली छूट दी गई। 1984 में हुए सिख नरसंहार में कांग्रेसी नेताओं के साथ-साथ भाजपा और आरएसएस के लोग भी शामिल थे। हिंदुस्तान टाइम्स की दो फरवरी 2002 की एक रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली में दर्ज 14 प्राथमिकियों में आरएसएस और भाजपा के 49 व्यक्ति नामजद थे।

जैन-अग्रवाल समिति की सिफ़ारिशों के बाद आगजनी, दंगा करने, हत्या के प्रयास और डाकाजनी के आरोपों में ये मामले जिन लोगों पर दर्ज किए गए थे वे कोई साधारण कार्यकर्ता नहीं थे। इनमें से एक आरोपी राम कुमार जैन तो प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का चुनाव एजेंट था, जब उन्होंने 1980 में लखनऊ लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा था। 2002 में गुजरात की सड़कों पर तो हमलावर नारे लगा रहे थे ‘अंदर की यह बात है, पुलिस हमारे साथ है’ लेकिन इस बार तो यह अंदर की बात नहीं रही, दिल्ली में पुलिस वाले भी ‘जय श्री राम’ का नारा लगते हुए क़ातिलों का साथ देते देखे गए। स्पष्ट है, हत्यारों के पीछे सत्ता का अदृश्य हाथ था।

ऑक्सफोर्ड युनिवर्सिटी के प्रो. प्रीतम सिंह को तो 1984 में दिल्ली में और 2002 में गुजरात में हुए नरसंहार के साथ-साथ फरवरी 2002 में हुई हिंसा के लिए ‘दंगा’ शब्द का इस्तेमाल पर भी एतराज़ है और वह इसे एक गुमराहकुन प्रयोग बताते हैं। प्रो. प्रीतम सिंह के अनुसार शब्द ‘दंगा’ एक तरह से हमलावर गिरोह की पीड़ितों पर की गई हिंसा की भयानकता को घटा कर पेश करता है। 1984 में सिख भाईचारे के खिलाफ़ हिंसा इतने बड़े स्तर पर हुई थी कि इसको संयुक्त राष्ट्र द्वारा तय परिभाषा के तहत नस्लकुशी या नस्लघात/जातिसंहार (genocide) के करीब माना जा सकता है।

नस्लकुशी के जुर्म और रोकथाम संबंधी कन्वेन्शन (1948) की धारा 2 में नस्लकुशी को इस तरह परिभाषित किया गया है कि “निम्नलिखित में से कोई भी ऐसी कार्रवाई जो किसी कौम, जाति, नस्ल या धार्मिक भाईचारे को पूरी तरह से या इसमें से कुछ हिस्से को ख़त्म करने के लिए की गई हो, जैसे: समुदाय के सदस्यों को कत्ल करना, किसी समुदाय के सदस्यों को गंभीर जिस्मानी या मानसिक नुकसान पहुंचाना; जान-बूझ कर समुदाय के लिए ऐसे हालात पैदा करना जो उसे पूरे या आंशिक तौर पर जिस्मानी खात्मे की ओर ले जाते हों।“ लेकिन इसी धारा में दर्ज पाँच तरह की जाति संहार की कर्वाइयों के दायरे में वर्गीय और राजनीतिक हिंसा को जगह नहीं दी गई है। कौन हत्याकांड नस्लकुशी है या नहीं यह एक विवादास्पद मामला है। मसलन, नाज़ियों द्वारा यहूदियों के सफाये (होलोकास्ट) को नस्लकुशी मानने पर कोई सवाल नहीं उठाता। पर विचित्र बात यह है कि कंबोडिया में पोल पोट सत्रह लाख लोगों की हत्या को संयुक्त राष्ट्र तकनीकी रूप से नस्लकुशी नहीं मानता।  

शाहीन बाग का बेमिसाल जनविरोध की खुन्नस, विधान सभा चुनावों में मिली हार या भाजपा नेताओं के ‘गद्दारों’ को गोली मारने वाले भाषणों को दिल्ली की हिंसा के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है लेकिन इसका होना 2014 में ही तय हो गया था। 2014 में जब भाजपा सत्ता में आई थी तब कोई संवैधानिक हैसियत न होते हुए भी ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने सरकारी मीडिया पर ‘राष्ट्र के नाम सन्देश’ प्रसारित किया।

आरएसएस के एक और प्रचारक राजेश्वर सिंह भी अल्पसंख्यकों को टीवी पर खुलेआम धमकी देते दिखे कि अगर उन्होंने 2025 तक धर्मान्तरण नहीं किया तो उन्हें भारत से खदेड़ दिया जायेगा। कुछ दिन बाद विश्व हिन्दू परिषद के अशोक सिंघल ने स्पष्ट रूप से कहा था कि “भारत में आठ सौ साल बाद हिन्दुओं का राज स्थापित हुआ है।” इसी दरम्यान योगी आदित्यनाथ की तर्ज़ पर भाजपा की सहयोगी पार्टी शिव सेना ने भी यह मांग शुरू कर दी थी कि मुसलमानों से वोट देने का अधिकार छीन लिया जाना चाहिए।

पिछले छह वर्षों में इन धमकियों को यथार्थ के धरातल पर उतारने के लिए संघ-भाजपा से जुड़े संगठनों की ओर से खौफ़, नफ़रत और हिंसा की गतिविधियों में तेजी से इज़ाफ़ा हुआ है और हैरानी इस बात की है कि इन सब बातों पर देश हैरान क्यों है! जबकि यह स्पष्ट है कि इस देश की जनता ने सत्ता उस दल के हाथों में दे दी है जिसके पैतृक संगठन आरएसएस के पूर्व प्रमुख गुरु गोलवलकर घोषित रूप से हिटलर को अपना आदर्श और हिन्दू राष्ट्र के निर्माण के लिए मुसलमानों, इसाइयों और कम्युनिस्टों को राष्ट्र-शत्रु मानते हैं। 

सच तो यह है कि भारतीय जनता, इंसाफ की उम्मीद या मुगालता एक ऐसे व्यक्ति से पाले हुए है जो आरएसएस का आजीवन सदस्य है, हिन्दू राष्ट्र की स्थापना जिसका अंतिम लक्ष्य है और जो हिटलर की ही तरह बाकायदा चुनावों में भाग लेकर लोकतान्त्रिक प्रक्रिया के जरिये ही सत्ता के शीर्ष पर पहुंचा है। आरएसएस के प्रचारक से भारत के प्रधानमंत्री पद तक पहुँचने तक की नरेंद्र मोदी की रहस्यमय यात्रा में सिर्फ उन पूंजीपतियों का ही हाथ नहीं है जिन्होंने 2014 में मोदी की जीत को खुले तौर पर पहली बार ‘भारतीय पूँजीवाद की जीत’ बताया था बल्कि देश भर में फैले संघ के कई सहयोगी संगठन जैसे सनातन संस्था, हिन्दू युवा वाहिनी, बजरंग दल, श्री राम सेने, हिन्दू ऐक्य वेदी, अभिनव भारत, भोंसले मिलिट्री स्कूल और राष्ट्रीय सिख संगत आदि का भी उतना ही योगदान है।

इन तमाम संगठनों के आरएसएस से गहरे संबंध कोई लुके-छुपे नहीं हैं। यही वह संगठन हैं जिनके कथित ‘स्वयंसेवक’ ही नरेंद्र दाभोलकर, गोविन्द पानसरे, एमएम कलबुर्गी और गौरी लंकेश की हत्या में शामिल पाये गए हैं। समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट, अजमेर शरीफ ब्लास्ट, पुणे जर्मन बेकरी ब्लास्ट जैसे कई कारनामों में यह भगवा आतंकी संगठन शामिल रहे हैं। संघ के स्वयंसेवक स्वामी असीमानंद जैसे लोग गिरफ्तार भी हुए और बाइज़्ज़त बरी भी हो गए। माले गाँव कांड वाली संघ की साध्वी प्रज्ञा ठाकुर (जो गांधी के हत्यारे गोडसे को महान देशभक्त मानती हैं) जमानत पर बाहर आईं और भोपाल से बीजेपी की सांसद भी बन गईं।

गर्भवती महिलाओं का पेट चीरकर निकाले बच्चे को त्रिशूल पर टाँग देने वाले बजरंग दल के ‘बाबू बजरंगी’ और ओड़ीसा में आस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टीवर्ट स्टेंस और उनके दो मासूम बच्चों को ज़िंदा जला देने वाले बजरंग दल के ही दारा सिंह का नाम कौन भूल सकता है? दिल्ली की हिंसा का श्रेय इनमें से किस संगठन को जाता है इसका पता तो शायद ही कभी चल पाये। 

रिटायर्ड पुलिस अधिकारी और उपन्यासकार विभूति नारायण राय की किताब ‘सांप्रदायिक दंगे और भारतीय पुलिस’ में हिंसा के पीछे की ‘व्यावसायिक साजिशें’ और ‘आर्थिक उद्देश्य’ भी सामने आते हैं। राय के अनुसार पिछले कुछ वर्षों के दंगों का सूक्ष्मता से अध्ययन किया जाए तो हम पाएंगे कि दो हिन्दू-मुसलमान व्यापारियों की आपसी प्रतिद्वंद्विता कई बार हिंसा के पीछे असली कारण होती है। अहमदाबाद में भू-माफिया द्वारा दंगों को भड़काने में निभाई जाने वाली भूमिका का गुजरात मॉडल तो सचमुच अनोखा है।

हिन्दू-मुसलमान बिल्डर लॉबी वाला यह माफिया आपस में पूरी तरह से धर्मनिरपेक्ष संबंध कायम रखता है और दंगे हिन्दू-मुसलमान की मिली-जुली आबादी वाले इलाकों में रह-रहकर करवाए जाते हैं। (समाज-विज्ञानी क्रिस्टोफ़ जैफ़्रेलो इन्हें ‘लो ईंटेंसिटी स्ट्रेट्जी’ कहते हैं।) दंगों के कारण इन इलाकों से निकलकर हिन्दू-मुसलमान दोनों अपने-अपने लिए सुरक्षित बस्तियाँ तलाशनी शुरू कर देते हैं। बिल्डर लॉबी हिंदुओं और मुसलमानों के लिए पहले अलग-अलग आवासीय क्षेत्र चुनती है और फिर उसे विकसित करना शुरू करती है। प्लाटों या मकानों के रजिस्ट्रेशन के दौरान व्यवस्थित ढंग से नगर में सांप्रदायिक तनाव पैदा किया जाता है।

घबराकर मिश्रित आबादी में ‘फँसे’ लोग रजिस्ट्रेशन कराना शुरू का देते हैं। मकानों के बन जाने या प्लाटों के विकसित हो जाने के बाद यदि आसानी से उनकी बिक्री नहीं हो पाती तो फिर दंगा-तनाव पैदा किया जाता है और इस तरह फिर डरे हुए लोग इन बिल्डरों की शरण में आ जाते हैं। दिलचस्प तथ्य यह है कि दंगा-तनाव पैदा करने के लिए हिंदू और मुस्लिम बिल्डर अपने धन अथवा बाहुबलियों के माध्यम से एक-दूसरे की खुलकर मदद करते हैं। 1992-93 के दंगों में ऐसे भी उदाहरण मिले, जब चालों या झुग्गी-झोपड़ियों को उनमें रहनेवालों के साथ ही जला दिया गया। मकसद सिर्फ एक था-किसी भी तरह जमीन साफ कर वहाँ नई इमारतें बनाना।

मैंगलोर में बजरंग दल का संयोजक बनने के तुरंत बाद शरण पैंपवेल ने ‘ईश्वरी मैनपावर सॉल्यूशन्स लिमिटेड’ के नाम से सुरक्षा एजेंसी का काम शुरू किया था। जो दिन दुगनी रात चौगुनी तरक्की कर रहा है क्योंकि सांप्रदायिक तनाव को देखते हुए सुरक्षाकर्मियों की प्रचुर मांग है। शहर के सभी शॉपिंग मॉल्स बड़े शोरूम और बाज़ारों का ठेका दंगों से पहले और दंगों के बाद इसी कंपनी के पास है। सभी सुपरवाइज़र और सुरक्षाकर्मी बजरंग दल के ही कार्यकर्ता हैं।    

इस बार हिंसा की चपेट में जो उत्तर-पूर्वी दिल्ली का इलाका आया है वह उत्तर प्रदेश की सीमा से लगा हुआ है जहां आरएसएस से जुड़े यह तमाम संगठन काफी मजबूत स्थिति में हैं। यही गांधी नगर से जुड़ा वह इलाका है जहाँ एशिया के सबसे बड़ी रेडीमेड गार्मेंट्स की मंडी है। इसी मंडी से जुड़े हुए कारीगर-मज़दूर या ग्राहक-विक्रेता हैं वह हिंसा के शिकार हुए एक हजार परिवार जो मुस्तफाबाद की ईदगाह में बने रिलीफ़-कैंप में रह रहे हैं और इतने आतंकित हैं कि अपने घरों को लौटने को तैयार नहीं हैं। व्यापारियों के लिए यही आतंक तो मुनाफ़े का सौदा साबित होता है।

यहाँ सुरक्षा-माफ़िया, भू-माफ़िया और बिल्डर लॉबी अपनी कौन सी नई परियोजनाओं के साथ सामने आती है यह तो भविष्य ही बताएगा। बात यह भी गौरतलब है अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भी दुनिया के सबसे बड़े बिल्डर्स में से एक हैं। जिनकी कई ‘ट्रम्प टावर्स’ परियोजनाएं सरकार की ‘खास-देखरेख’ में यहाँ पहले से चल रही हैं। पर इससे आम आदमी का क्या लेना-देना? बड़े लोगों की बड़ी बातों से आम आदमी सदा अनभिज्ञ रहता है। जाने-माने इतालवी लोकतंत्रवादी सालविनी हिंसा के इस बिन्दु पर बिलकुल सही थे जब उन्होंने पाया कि – ‘घटनाओं को लेकर बढ़ती आम आदमी की अनभिज्ञता अन्याय को मुख्य रूप से आश्रय देती है।’ दुनिया के सबसे बड़े लोकतन्त्र में उनके माथे पर हिंसा की राजनीति और आतंक का व्यापार एक बहुत बड़ा कलंक है जिनके पास अपनी देशभक्ति और नागरिकता का प्रमाण-पत्र नहीं है। फ़ासीवाद के साथ घी-शक्कर हुए हिन्दू राष्ट्रवादियों के लिए गंदा है पर धंधा है यह।

(देवेंद्र पाल स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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