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किस-किस को कैद करोगे! सामाजिक कार्यकर्ताओं की रिहाई के लिए पीयूसीएल का अभियान

पीयूसीएल और झारखंड जनाधिकार महासभा ने भीमा कारेगांव मामले में जेलों में बंद सामाजिक कार्यकर्ताओं की रिहाई के लिए अभियान छेड़ दिया है। ‘किस-किस को कैद करोगे’ के नारे के आज से शुरू हुआ यह अभियान पांच सितंबर तक जारी रहेगा। इसमें संगठनों ने चार सूत्री मांगें रखी हैं।

पर्चे में कहा गया है कि आज देश अघोषित आपातकाल से गुजर रहा है, दिन पर दिन लोगों की अभिव्यक्ति की आज़ादी और अन्य लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमले बढ़ते जा रहे हैं। केंद्र सरकार देश को धर्मनिरपेक्षता और समानता के संवैधानिक मूल्यों के विरुद्ध धार्मिक बहुसंख्यावाद की ओर ले जा रही है, साथ ही सरकार की जन विरोधी नीतियों और विफलताओं पर सवाल उठाने वालों पर लगातार दमन कर रही है।

पर्चे में कई सवालों के साथ भाजपा सरकार पर आरोप लगाया गया है कि वह चाहती नहीं है कि उसके द्वारा देश को धर्मनिरपेक्षता व समानता सरीखे संवैधानिक मूल्यों के विपरीत ले जाने पर कोई सवाल उठाए। इसका एक स्पष्ट उदाहरण है भीमा कोरेगांव मामला जिसमें विभिन्न राज्यों के 12 सामाजिक कार्यकर्ताओं, वकीलों, लेंखकों व शिक्षकों को फर्जी आरोपों पर महीनों से जेल में डाला गया है। इनमें प्रमुख रूप से आंनंद तेलतुम्बड़े, अरूण फरेरा, गौतम नवलखा, हैनी बाबू, महेश राउत, सुरेंद्र गाडलिंग, सुधा भारद्वाज, शोमा सेन, सुधीर ढावले, रोना विल्सन, वर्नन गोंजाल्वेस और वरवर राव शामिल हैं।

इसके अलावा कई अन्य लोगों को लगातार पूछताछ और छापे के जरिये परेशान किया जा रहा है। ये ऐसे नागरिक हैं जो लगातार भाजपा व मोदी सरकार की हिन्दुत्व की राजनीति पर सवाल उठाते रहे हैं और वर्षों से आदिवासी, दलित, अल्पसंख्यकों व अन्य वंचित समुदायों के अधिकार के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इस दौरान झारखंड में दशकों से आदिवासियों के अधिकारों के लिए संघर्षरत स्टेन स्वामी के आवास पर कई बार छापा मारा गया और उन्हें लगातार परेशान किया जा रहा है।

पर्चे में बताया गया है कि 1 जनवरी, 2018 को हजारों दलित, 200 साल पहले पेशवा राज की सेना के विरूद्ध जंग में दलित सैनिकों की जीत को शौर्य के उत्सव के रूप में मनाने के लिए हर साल की तरह महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव में एकजुट हुए थे। इस मौके पर एक दिन पहले पास के पुणे में एलगार परिषद का आयोजन किया गया था, जिसमें देश में बढ़ती साम्प्रदायिकता और हिन्दुत्व फासीवाद का विरोध किया गया ।

इस दौरान उस क्षेत्र में कई हिन्दुत्ववादी संगठनों द्वारा हिंसा की गई। महाराष्ट्र की भाजपा सरकार ने इन संगठनों को सजा नहीं दी। इन संगठनों से जुड़े व हिंसा के लिए जिम्मेदार मिलिंद एकबोटे और संभाजी भिंडे पर अभी भी कार्रवाई नहीं हुई है और वे आजाद घूम रहे हैं। इसके बजाय सरकार ने यह कहानी रची कि एलगार परिषद और उस दौरान हुई हिंसा को माओवादियों ने कई सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर आयोजित की थी।

दिलचस्प बात यह है कि गिरफ्तार हुए कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने एलगार परिषद की बैठक में भाग तक नहीं लिया था। इस मामले में महाराष्ट्र पुलिस ने 8 जून, 2018 को पांच सामाजिक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया। 28 अगस्त, 2018 को और नौ सामाजिक कार्यकर्ताओं के यहां छापा मारा और पांच को गिरफ्तार किया। इन सभी कार्यकर्ताओं पर कई फर्जी मामले दर्ज किये गये, जिनमें मुख्यतः विधि विरूद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम और देशद्रोह की धाराएं शामिल हैं।

पर्चे में आगे कहा गया है कि महाराष्ट्र में नवंबर 2019 में बनी गैर भाजपा सरकार ने इन मामलों को नेशनल इन्वेस्टीगेशन एजेंसी (एनआईए) के हवाले कर दिया। एनआईए ने भी कई गिरफ्तारियां की और कई लोगों से घंटों पूछ-ताछ की। इस मामले में ऐसी चार्जशीट बनाई गयी कि कोई भी सामाजिक कार्यकर्ता जो लोगों के लिए आवाज उठाता है, उसे फंसाया जा सकता है। साथ ही इनके विरूद्ध बार-बार फर्जी प्रमाण के आधार पर आरोप लगाया जाता है। जिन लोगों को जेल में डाला गया है, उनकी न्यायिक प्रक्रिया बार-बार टाली जाती रही है, ताकि सरकार का झूठ सामने न आए। भीमा कोरेगांव मामले के बहाने अब एनआईए एक फर्जी कहानी रच रही है कि सभी सामाजिक कार्यकर्ता एक देश व्यापी माओवादी पहल से जुड़े हैं।

पर्चे में केन्द्र सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा गया है कि दिल्ली में हाल में हुए दंगों में पुलिस एक ही दिशा में कार्रवाई कर रही है। केंद्र सरकार के इशारे पर दिल्ली पुलिस ने दंगों में कम से कम 19 सामाजिक कार्यकर्ताओं पर फर्जी आरोप लगाए हैं। ये कार्यकर्ता मोदी सरकार की असंवैधानिक और जन-विरोधी नीति (सीएए और एनआरसी) के विरूद्ध लोगों को संगठित व जागृत कर रहे थे।

भीमा कारेगांव मामले में फर्जी तरीके से आरोपित सामाजिक कार्यकर्ता और नागरिकता कानून संशोधन का विरोध करने वाले के दमन से स्पष्ट है भाजपा शासित केंद्र सरकार देश में लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध और आदिवासी, दलित, अल्पसंख्यक व अन्य वंचित समुदायों के अधिकारों को कुचलकर भारत को एक हिन्दू राष्ट्र बनाने में लगी है। साथ ही भाजपा सरकार हिन्दुत्व की राजनीति पर सवाल उठाने वाले व संवैधानिक मूल्यों के लिए संघर्षरत लोगों को किसी भी कीमत पर, एनआईए जैसी सरकारी एजेंसी का इस्तेमाल कर, फर्जी आरोप में घेरने और फर्जी कहानियां रच कर चुप कराने में सक्रिय है।

इस मंशा के विरूद्ध भीमा कोरेगांव मामले में फंसाए गये सामाजिक कार्यकर्ताओं की रिहाई और लोकतांत्रिक अधिकारों के संरक्षण कि लिए संगठनों ने दूसरे कार्यकर्ताओं और संगठनों से इसमें जुड़ने की अपील की है। इसके साथ ही उसने विरोध के अलग-अलग क्या तरीके हो सकते हैं उसके बारे में भी बताया है।

पर्चे के अंत में संगठनों की चार सूत्री मांगों में कहा गया है कि

  1. तुरंत ही भीमा कोरेगांव मामले में गिरफ्तार 12 लोग रिहा हों, सामाजिक कार्यकर्ताओं का दमन बंद हो, सभी फर्जी मामले वापस लिये जाएं। (2) सीएए व एनआरसी का विरोध करने वाले पर थोपे गये झूठे मामले वापस लिये जाएं और जेल में कैद लोग रिहा हों। (3) भारतीय दंड संहिता की धारा 124 ए (राजद्रोह) एवं धारा 499 (मानहानि), विधि विरूद्ध क्रिया कलाप (निवारण) अधिनियम (यूएपीए) एवं राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) को रद्द किया जाए और (4) संवैधानिक मूल्यों का पूर्ण पालन हो और धार्मिक बहुसंख्यवाद की राजनीति तुरंत बंद हो।

(झारखंड से वरिष्ठ पत्रकार विशद कुमार की रिपोर्ट।)

This post was last modified on August 28, 2020 5:57 pm

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Published by
Janchowk

Janchowk Official Journalists in Delhi