Saturday, October 16, 2021

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बाबरी मस्जिद पर सुप्रीम कोर्ट के बारे में 10 साल पहले कही गयी राजेंद्र यादव की बात सच निकली

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बाबरी मस्जिद को लेकर अक्तूबर 2010 में हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच का फ़ैसला आया था तो मैंने इस बारे में हिन्दी के कई प्रमुख लेखकों से बात की थी जो समयांतर के नवंबर 2010 अंक में प्रकाशित हुई थी। उसी कड़ी में `हंस` के तत्कालीन संपादक और वरिष्ठ लेखक राजेंद्र यादव से भी बात की थी। इस बातचीत में उन्होेंने यह कहा था- 

राजेंद्र यादव-

बौद्ध धर्म की सारी किताबें, मूर्तियां और स्मारक शंकराचार्य के अनुयायियों ने नष्ट कर डाले थे। यहां तक कि बुद्ध की जो भी मूर्तियां मिलती हैं, वे अफगानिस्तान, नेपाल, तिब्बत, रंगून आदि में तो मिलती हैं लेकिन हिन्दुस्तान में बुद्ध की एक भी ऐसी मूर्ति नहीं मिलती जो खंडित न हो। इस तरह हम देखते हैं कि हिन्दू कम कट्टर नहीं हैं। उन्होंने बाबरी मस्जिद को भी बाकायदा योजनाबद्ध ढंग से ढहा दिया था। कुछ हिन्दुत्ववादी नेता भीड़ को रोकने के नाम पर मस्जिद से बाहर खड़े रहे थे और षड्यंत्र के तहत महज आधा घंटे में उसे जमींदोज कर दिया गया था। उमा भारती उल्लास में मुरली मनोहर जोशी के कंधे पर बैठ कर तस्वीरें खिंचवा रही थीं। उमा भारती और ऋतंभरा के आग उगलते हुए भाषण बाकायदा रेकॉर्डड हैं।

हाई कोर्ट के फैसले में इसका कोई जिक्र नहीं है। यह मानकर चला गया है कि जहां बीच का गुंबद था, वहीं नीचे राम का जन्म हुआ था। कोर्ट ने जिस तरह जमीन का बंटवारा किया है, उसमें बीच में रामलला का मन्दिर है, एक साइड में राम चबूतरा है और एक तरफ सीता रसोई। कोर्ट द्वारा मुसलमानों को दिए गए हिस्से में मस्जिद बनाई भी जाती है तो वह राम चबूतरे और सीता रसोई के बीच में होगी। जाहिर है, रोज दंगे होंगे। एक तरह से यह जान-बूझकर किया गया लगता है कि बहुसंख्यक आतंक में दबकर मुसलमान खुद ही कहें कि भैया इस जगह को भी आप ही ले लें। यह फैसला निश्चय ही अन्यायपूर्ण, अवैध और अतार्किक है। यह तर्क और कानून के ऊपर आस्था की विजय है। 

आखिर कोर्ट ने यह कैसे तय कर लिया कि राम कहां पैदा हुए थे। अयोध्या में ही राम के करीब 10 मन्दिर ऐसे हैं जहां राम का जन्मस्थान होने का दावा किया जाता है। कोर्ट ने कानून पर आस्था को तरजीह दे दी है तो हर कहीं आस्था और अंधविश्वास को वैधानिकता मिल जाएगी। सती, नर बलि आदि को भी परंपरा और आस्था के नाम पर सही ठहराया जा सकता है। फिर तो खाप-पंचायतें भी प्रेमी-प्रेमिकाओं के गले काटने को अपनी आस्था और परंपरा के आधार पर अपना अधिकार मानेंगी। ओझे, सयाने, झाड़-फूंक करने वाले औरतों को डायन बताकर क्यों नहीं पीटेंगे?

बाबरी मस्जिद तोड़ी गई थी तो हिन्दुओं ने पाकिस्तान और बांग्लादेश में मंदिर तोड़े जाने का रोना रोया था। तरुण विजय आज भी गिनाते रहते हैं कि पाकिस्तान में कितनी मस्जिदें तोड़ी गईं और मुंबई में ब्लास्ट हुए। एक बात बताइए कि आप तो खुलेआम मस्जिद तोड़ दें और फिर चाहें कि दूसरा पक्ष कुछ भी न करे। हिन्दुस्तान में हिन्दुत्व की राजनीति करने वाले यह भी भूल जाते हैं कि उनकी वजह से पाकिस्तान और बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिन्दू कितने असुरक्षित हो जाते हैं। बांग्लादेश में हिन्दू अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न को आधार बनाकर तस्लीमा नसरीन ने `लज्जा` उपन्यास लिखा था तो `पांचजन्य` ने कहा था कि देखिए, मुसलमान कितने अत्याचारी हैं। लेकिन, हिन्दुस्तान में भी बहुसंख्यकों के आतंक का ही नतीजा है कि बाबरी मस्जिद के ऐसे फैसले को लेकर मुसलमान चुप हैं।

कुछ बूढ़े-बुजुर्ग जो लंबे समय से इस मसले में लगे हैं, सुप्रीम कोर्ट जा रहे हैं पर सच कहूं तो मुझे सुप्रीम कोर्ट से भी कोई बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं है। कभी-कभी सुप्रीम कोर्ट भी इस तरह की स्थिति से हाथ खींच लेता है। सुप्रीम कोर्ट भी मैत्री और शांति बनाने के तर्क पर कानून के खिलाफ जाकर फैसला दे सकता है। लेकिन क्या वाकई इस तरह मसले का निपटारा हो सकता है? हाई कोर्ट के फैसले ने भी शांति स्थापित करने के बजाय भीतर आग लगा दी है जो फिर भड़क सकती है।

एक बात यह भी कि बाबर के एक जनरल मीर बाक़ी ने जो मस्जिद बनवाई थी, वह तो आपने तोड़ दी लेकिन देश में आप क्या-क्या तोड़ेंगे? राम पर एक बहस में हिस्सा लेते हुए मैंने कहा कि राम ने लंका पर आक्रमण किया, रावण की बहन की नाक काटी। नाक काटने के मुहावरे का सीधा अर्थ है इज़्ज़त लेना। बाबर भी 1800 सैनिकों के साथ हिन्दुस्तान आया था। उसने भी यहां के लोगों को मिलाकर अपना साम्राज्य स्थापित किया। फिर राम और बाबर में अंतर क्या है जो राम का इतना महत्व गाते रहते हैं? हालांकि राम सिर्फ माइथोलॉजिकल केरेक्टर है और उसका कोई पौराणिक महत्व भी नहीं है। वाल्मीकि से पहले राम का कहीं जिक्र मिल जाता हो तो मिल जाता हो।

हमारी राजनीति ने साम्प्रदायिक समस्याओं को इतना दूषित और जटिल बना दिया है कि कोई गुंजाइश नज़र आती ही नहीं है। लगता नहीं है कि हम लोगों की ज़िंदगी शांति से गुजर पाएगी। अशांति रहेगी, आतंकवादी विस्फोट होंगे। हिन्दुत्व की राजनीति करने वालों को इससे कोई मतलब नहीं है, उन्हें लाशों का ढेर लगाकर दिल्ली के सिंहासन पर बैठना है। हिन्दुत्व की राजनीति संगठित है और हिन्दू वोटों के लालच में यूपीए सरकार का रवैया भी नर्म है। कांग्रेस कोर्ट के फैसले को सपोर्ट ही कर रही है। रामभक्त कोर्ट में हो सकते हैं तो कांग्रेस में क्यों नहीं?

हिन्दी लेखकों ने इस मसले पर जो कुछ भी लिखा, इस फैसले को आस्था और अंधविश्वास की विजय ही बताया है। भगवान सिंह, कृष्णदत्त पालीवाल जैसे कुछ उलटे-सीधे लोगों को छोड़ दीजिए जिन्होंने हिन्दुत्व की बात कही है। कुछ लेखकों का स्वर नर्म हो सकता है पर अधिकांश लेखक अपने स्टैंड पर कायम हैं। मुझे नहीं लगता कि हिन्दी लेखकों में पुनरुत्थानवाद की कोई लहर चल रही है।

(प्रस्तुतकर्ता धीरेश सैनी जनचौक के रोविंग एडिटर हैं।)

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