Wednesday, December 7, 2022

शहीद भगतसिंह और आतंकवाद

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प्रो. जगमोहन सिंह शहीद भगतसिंह के भांजे और क्रांतिकारी विरासत के विचारक से पिछले कुछ सालों की तरह इस बार भी 13–14–15 अगस्त 2022 को आगाज़ ए दोस्ती यात्रा में साथ-साथ रहने का मौका मिला। हर बार की तरह इस बार भी उनका साक्षात्कार लेने का लोभ संवरण नहीं कर पाया।

इस बार साक्षात्कार का विषय रहा शिरोमणि अकाली दल (अमृतसर) के नेता और संगरूर लोकसभा सीट से नवनिर्वाचित सांसद सिमरनजीत मान का सनसनीखेज भरा बयान कि शहीद भगत सिंह एक आतंकवादी थे। इस बयान के विरुद्ध और समर्थन में अनेक प्रकार की प्रतिक्रियाएं आयीं और स्पष्ट है कि सांसद महोदय का इसके बहाने सुर्खियां बटोरने का मक़सद भी पूरा हो गया।

इस संबंध में प्रो. जगमोहन सिंह की टिप्पणियां महत्वपूर्ण और सारगर्भित हैं। उनके अनुसार सिमरनजीत सिंह मान के राजनीतिक चरित्र का उल्लेख करते हुए बताया ये जनाब सन 1989 में भी सांसद चुने गए थे लेकिन पूरे पांच साल तक अपने हल्के की नुमाइंदगी करने के लिए संसद भवन में नहीं गए। बहाना यह रहा कि सिक्खी की निशानी के तौर पर तलवार के बिना संसद में नहीं घुसेंगे। इस बार संसद में गए, ओथ भी ली, लेकिन चुपके से सभापति के चैंबर में ही। भारतीय संविधान के प्रति निष्ठा की कसम खाते हुए वे अपना चेहरे को सार्वजनिक होने से बचाना चाहते थे।

बातचीत को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने सन 1979 की एक घटना का ज़िक्र किया जब फरीदकोट जिले के एसएसपी होते हुए सिमरनजीत मान ने गैर कानूनी ढंग से चार निहंगो को हाथों में मुश्के बांधकर गोली से उड़वा दिया था। इनमें से दो को तो स्वयं मान साहब ने निशाना बनाया था। पांचवें निहंग की जान तब बच पाई जब मजिस्ट्रेट ने एसएसपी साहब का हाथ पकड़ कर फायरिंग नहीं करने दी। इस घटना के दौरान गुरुद्वारा सराय नागा जिला फरीदकोट जो कि सिक्खों के दूसरे गुरु अंगद देव जी का पूजनीय जन्म स्थान हैं।

इस घटना के दौरान इस गुरूद्वारे पर सैकड़ों गोलियों से हमला किया गया जिसकी उन्होंने सिक्ख समुदाय से कभी माफ़ी नहीं मांगी। यहां दो कारणों से तनाव हुआ था। एक तो पंजाब के भूतपूर्व मुख्यमंत्री और उड़ीसा के भूतपूर्व राज्यपाल श्री हरचरण सिंह बराड़ के तबेले से गंदा पानी गुरुद्वारा के पवित्र सरोवर को दूषित कर रहा था और तत्कालीन कारण था कि बराड़ साहब के कुत्ते ने निहंगों की बंदरी को काट दिया था। निहंगों ने गुस्से में एक सिपाही को मार दिया था और बदले में तत्कालीन एसएसपी सिमरनजीत मान ने सौ पुलिसकर्मियों के साथ गुरुद्वारे की घेराबंदी की, और पवित्र गुरूद्वारे पर सैकड़ों गोलियां चलाई, अनेक पंचायतियों को बीच में लेकर निहंगों को सुरक्षा का आश्वासन दिलाकर सरेंडर करवाया लेकिन इस सबके बावजूद मुश्क बांधे हुए चार निहंगों का सरेआम कत्ल कर दिया।

क्या यह सब जालियांवाला बाग में नरसंहार करने वाले जनरल डायर का अंदाज़ नहीं था?

इसी सिलसिले में प्रो. जगमोहन सिंह ने बताया कि सन 1919 में जब जलियांवाला कांड के बाद जनरल डायर को स्वर्ण मंदिर में सम्मानित किया गया था। उस वक्त स्वर्णमंदिर का सरबरा (मुखिया) सिमरनजीत मान का नाना अरूढ़ सिंह था और इस शर्मनाक कारस्तानी के लिए सिमरनजीत मान ने अपने नाना की कार्यवाही को हमेशा यह कह के डिफेंड किया कि और अधिक नुकसान से बचाने के लिए उस मौके पर जनरल डायर के गुस्से को ठंडा करने के लिए ऐसा किया गया था।

शहीद भगतसिंह ने आतंकवाद को कभी वैचारिक समर्थन नहीं दिया बल्कि उनका आत्मकथन था : कि आतंकवाद हमारे समाज में क्रांतिकारी चिंतन की पकड़ के अभाव की अभिव्यक्ति है या एक पछतावा इस तरह ये अपनी असफलता को स्वीकार करना भी है, अभी हम पूरी तरह इंकलाबी नहीं बने हैं।

लाला लाजपतराय की मौत के बाद पंजाब में एक गहरी निराशा और अवसाद का माहौल पैदा हो गया था। उस मौके पर सीआर दास की पत्नी बसन्ती देवी का बयान एक बड़ा संकेत है जब उन्होंने कहा कि क्या पंजाब के नौजवान में इतनी हिम्मत नहीं है कि इस निराशाजनक माहौल को खत्म करें।और इसी माहौल में सांडर्स को मारने का कदम राष्ट्रीय स्वाभिमान को जागृत करने के लिए एक मजबूरी वाला फैसला था ना कि एक नीति के रूप में। इस कदम से एक नया खून देश के नौजवानों में दौड़ा जो तत्कालीन समय की मांग थी। और आज़ादी की लड़ाई को और मजबूती मिले।

यह दिलचस्प लगेगा कि सांडर्स मर्डर के बाद अगले छः महीनों तक ब्रिटिश पुलिस को पता ही नहीं चल पाया था कि इसके पीछे भगतसिंह और उनके साथियों का हाथ था। बाद में दिल्ली स्थित केंद्रीय असेंबली में बहरों को सुनाने ने के लिए जो बम का धमाका किया गया वह हिंसा और आतंक फैलाने के उद्देश्य से नहीं किया गया था बल्कि देश की आज़ादी की लड़ाई में एक नई चिंगारी सुलगाना इसका उद्देश्य था। इससे ब्रिटिश साम्राज्यवाद आतंककित जरूर हुआ। इसके लिए जब भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने बिना भागे स्वयं गिरफ़्तारी दी  तो उन पर चलाए गए मुकद्दमे के दौरान ही लाहौर षड्यंत्र चलाया गया जिसमें एक किस्सा सांडर्स हत्या प्रकरण भी था।

आतंकवाद पर भगतसिंह के विचारों को उनकी लेखनी से बेहतर समझा जा सकता है।

“आतंकवाद के दानव की प्रशंसा करने की आवश्यकता नहीं है। आतंकवाद ने दुनियाभर में बहुत कुछ किया है और दुनिया को बहुत कुछ सिखाया भी है। अगर हम अपने उद्देश्यों और तौर तरीकों के बारे में गलतियां ना करें तो आज भी इसका उपयोग हो सकता है। ख़ासतौर पर निराशा के दौर में आतंकवादी तरीकों का प्रयोग विचारों के प्रचार प्रसार के लिए किया जा सकता है। लेकिन यह सब केवल एक आतिशबाजी की तरह ख़ास मौके और ख़ास व्यक्तियों के लिए ही किया जाए। एक क्रांतिकारी को आतंकवाद और व्यक्तिगत आत्मबलिदान जैसे व्यर्थ के दुष्चक्र में नहीं झोंका जाना चाहिए। “

(संदर्भ: ’भगतसिंह के और उनके साथियों के दस्तावेज: प्रोफेसर जगमोहन सिंह और प्रोफेसर चमनलाल )

साक्षात्कार के अंत में प्रो. जगमोहन सिंह ने उल्लेख किया कि सिमरनजीत सिंह मान और उनके परिवार को अंग्रेजों के वक्त से ही सरकारिए के नाम से जाना जाता है। जिसका भाव ये है कि जो भी राज करने वाली सरकारें होंगी उनकी सेवा करके अपना निजी हित संरक्षित करेंगे। आज भी उसकी राजनीति किसी न किसी प्रकार से सत्तासीन निज़ाम की तरफ़दारी की राजनीति है। अभी उनके बेटे जो उनकी पार्टी के यूथ विंग का ओहदेदार हैं ने एसजीपीसी से मांग की है कि स्वर्णमंदिर के अजायबघर से भगतसिंह की तस्वीर को हटाया जाए।

लेकिन ये बात करते हुए उसने अपनी सिक्ख इतिहास के बारे में बेअक्ली को भी प्रदर्शित किया। इस प्रकार से उनकी ओर से गैरजिम्मेदाराना और सस्ते किस्म की बयानबाजी हैरानी की बात नहीं है। कुछ अन्य उदाहरणों से इस बात को बेहतर तरीके से समझा जा सकता है। जैसे, दिल्ली गुरुद्वारा प्रबन्धक कमेटी पर अमीर सिक्खों के माध्यम से मौजूदा सरकार ने कब्ज़ा कर लिया है और इस प्रकार से समाज में बंटवारे और नफ़रत के ऐजेंडे को चलाने के लिए सिक्खों का सहारा लेना शुरू कर दिया है। और, अब अंग्रेजों की तर्ज़ पर एसजीपीसी पर सिमरनजीत मान के नाना की तरह अब सरकार सिमरनजीत मान जैसे सूटेबल सेवादार की तलाश में है। कैप्टन अमरिंदर सिंह का भाजपा में जाना इसी एजेंडा का हिस्सा है। ध्यान रहे कि सिमरनजीत सिंह मान और कैप्टन अमरिंदर सिंह नजदीकी रिश्तेदार हैं जो कि आपस में साढू हैं।

(सुरेन्द्र पाल सिंह लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं, पंचकूला चंडीगढ़ में रहते हैं।)

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