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Saturday, September 18, 2021

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शिक्षक दिवस पर विशेष: हमें चाहिए ऐसे शिक्षक

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लेख- अविजित पाठक

तुम्हारे बच्चे तुम्हारे बच्चे नहीं हैं। वे जीवन की स्वयं के प्रति लालसा की संतानें हैं। – खलील जिब्रान

पाशविक शक्ति, उत्तेजक राष्ट्रवाद और बाजार-चालित यांत्रिक विवेक से ग्रसित समाज के लिए क्या शिक्षण-कार्य, इसकी गहरी दृष्टि और रचनात्मक अधिशेष के महत्व को समझना और उसका पोषण करना संभव है ? एक ऐसा समाज जो भौतिक सफलता के लिए किसी प्रकार के ज्ञान का कैप्सूल पा जाने को ही शिक्षा समझता हो, उसे क्या यह समझा पाना संभव है कि शिक्षक का अर्थ यह नहीं होता कि वे शिक्षा को “उत्पाद” के रूप में बेचें ? कोचिंग सेंटरों के “गुरुओं” ने जब हमारे युवाओं और उनके चिंताग्रस्त मां-बाप के मानस पर कब्जा कर लिया हो, और कैंसर जैसी तेजी से बढ़ रही शिक्षा की फैंसी दुकानें जब उपयोगितावादी शिक्षा के भेड़ विमर्श को बढ़ावा दे रही हों, तो क्या ऐसे में मनोविकारों से मुक्ति दिलाने वाले, संवाद बनाने वाले और घुमक्कड़ के रूप में जीवन का ज्ञान कराने वाले शिक्षकों की संकल्पना संभव है ? यद्यपि शिक्षक दिवस जैसे विशेष अवसरों पर हम शिक्षण-कार्य के बारे में ढेर सारी महानता भरी बातें कहते हैं और कुछ शिक्षकों को राज्य द्वारा सम्मानित भी किया जाता है, फिर भी तथ्य यह है कि मुक्तिदायिनी शिक्षा के दूतों के रूप में शिक्षकों की भूमिका के बारे में हमारा समाज बहुत गंभीर नहीं है।

आइए हम थोड़ा “अव्यावहारिक” होने का साहस करें और कल्पना करें कि शिक्षण-व्यवसाय क्या होना चाहिए। ठीक है, हमारे बीच भाति-भांति के “जानकार” लोग- विशेषज्ञ और माहिर लोग होने चाहिए। लेकिन एक शिक्षक महज एक विषय विशेषज्ञ नहीं होती। वह केवल क्वांटम भौतिकी या मध्यकालीन इतिहास नहीं पढ़ाती हैं; वह कुछ और भी करती है। वह अपने छात्रों के साथ सह-यात्री के रूप में चलती है; वह उनकी आत्मा को छूती है; और एक उत्प्रेरक के रूप में, वह युवा शिक्षार्थी को उसकी विशिष्टता और जन्मजात संभावनाओं को समझने में मदद करती है। वह कोई मशीन नहीं है जो केवल आधिकारिक पाठ्यक्रम के निर्देशों को दोहराती है; न ही वह निगरानी की एजेंट है, जिसका काम परीक्षाओं और ग्रेडिंग के अनुष्ठान के माध्यम से अपने छात्रों को अनुशासित करना, दंडित करना, श्रेणियों में बांटना और नियमबद्ध करना हो। इसके बजाय, वह सृजनात्मक और चिंतनशील है; और जुड़ाव की बारीक कला के माध्यम से वह शिक्षार्थी के विश्वास को सक्रिय करती है कि वह अद्वितीय है, उसे किसी और की तरह होने की आवश्यकता नहीं है, उसे अपने आंतरिक विकास की प्रक्रिया पर ध्यान देना चाहिए, और कृत्रिम रूप से तैयार किये गये “सफलता” और “विफलता” के पैमाने का परित्याग कर देना चाहिए।

एक शिक्षक को एक और महत्वपूर्ण बात का ध्यान रखना चाहिए। उसे यह महसूस करना होगा कि शिक्षण और उपदेश देने की एक सीमा होती है; और उसे शिक्षार्थी के दिमाग़ में ढेर सारा किताबी ज्ञान नहीं ठूंसना चाहिए। इसके बजाय, उसका प्राथमिक कार्य शिक्षार्थी को अपनी अवलोकन की शक्ति, चिंतन और उसकी अभिव्यक्ति की क्षमता, सौंदर्यपरक संवेदना, और सबसे बढ़कर, अनंत की झलक को महसूस करने की आध्यात्मिक प्रेरणा को तेज करने में मदद करना है। एक बार जब ये क्षमताएं विकसित हो जाती हैं, तो व्यक्ति, डिग्री और डिप्लोमा से परे, जीवन भर सीखने वाला बन जाता है। वास्तव में, सहभागितापूर्ण जुड़ाव के रूप में शिक्षण की भूमिका और अस्तित्व की भौतिक, प्राणिक, बौद्धिक और मानसिक अवस्थाओं के समग्र विकास की एक परियोजना के रूप में शिक्षा प्राप्त करने का भाव ही मुक्तिदायिनी शिक्षा के लिए आधार तैयार कर सकता है और मुक्तिदायिनी शिक्षा केवल “कौशल सीखने” का कार्य नहीं है; न ही यह अकादमिक विशेषज्ञता के साथ शुद्ध बौद्धिकता है।

वास्तव में, मुक्तिदायिनी शिक्षा सार्थक, रचनात्मक और गरिमापूर्ण ढंग से जीने की इच्छा है। यह शिक्षा वर्चस्व और प्रलोभन की विविध विचारधाराओं और प्रथाओं की पहचान करने और उन्हें खत्म करने की क्षमता प्रदान करती है। वर्चस्व और प्रलोभन की विचारधाराएं और प्रथाएं, जैसे कि आत्ममुग्धता से ग्रस्त ऐसे व्यक्तित्वों का पंथ जो लोकतंत्र को महज अपने स्वामियों का “चुनाव” करने के एक कर्मकांड में बदल देना चाहता है। इसी तरह सैन्यवादी राष्ट्रवाद का सिद्धांत जो बड़े पैमाने पर भय और नफरत के मनोविज्ञान का निर्माण करता है। इसी तरह नवउदारवादी विचार जो यह प्रचारित करता है कि “स्मार्ट” होने का मतलब एक ऐसा अति-प्रतिस्पर्धी उपभोक्ता बन जाना है जो उनके द्वारा प्रचारित सभी प्रकार की वस्तुओं के निरंतर उपभोग के माध्यम से तत्काल संतुष्टि पाने वाला बन जाने को तैयार हो। इन जंजालों से मुक्ति दिलाने के साथ ही एक शिक्षक को ऐसी मुक्तिदायिनी  शिक्षा के वाहक के रूप में भी देखा जाना चाहिए जो अपने युवा शिक्षार्थी में लिंगवाद, नस्लवाद, जातिवाद, पारिस्थितिकी को नष्ट करने वाले विकासवाद और खोखले उपभोक्तावाद पर सवाल उठाने को प्रेरित कर सके और जो रचनात्मक संभावनाओं से भरे हुए युवाओं को महज “संसाधनों” में बदल देने वाली और उन्हें आध्यात्मिक दरिद्रता तथा अलगाव से ग्रस्त मानव-मशीनों में बदल कर जीवन्तता को नष्ट कर देने वाली “उत्पादकता” की प्रथा पर सवाल उठाने के लिए प्रेरित कर सके।

फिर भी, विडंबना यह है कि हम ऐसा माहौल नहीं बनाना चाहते हैं जो मुक्तिदायिनी शिक्षा को बढ़ावा दे, और शिक्षण-कार्य की सच्ची भावना को पोषित करे। देश के किसी भी सामान्य स्कूल की हालत देखिए। रट्टामार पढ़ाई, शिक्षक-छात्र के खराब अनुपात, दयनीय बुनियादी ढांचे, अव्यवस्थित कक्षाओं और हतोत्साहित शिक्षकों के साथ, बौद्धिक उत्तेजना से भरी हुई और नैतिक रूप से मथ देने वाली शिक्षा की रत्ती भर भी उम्मीद करना व्यर्थ है। यह दुःख की बात है कि हमारा समाज अच्छे स्कूली शिक्षकों के महत्व को स्वीकार नहीं करता।

इसके अलावा, भाई-भतीजावाद, भ्रष्टाचार और बीएड डिग्री को महत्वहीन बना देने के कारण भी इस पेशे का बड़े पैमाने पर अवमूल्यन हुआ है। इसी तरह, जहां एक तरफ विजयी राजनीतिक वर्ग ने हमारे कुछ प्रमुख सार्वजनिक विश्वविद्यालयों को गंभीर नुकसान पहुंचाया है, और प्रौद्योगिकी और प्रबंधन के फैंसी संस्थान शिक्षा को मुख्य रूप से तकनीकी-कॉर्पोरेट साम्राज्य को आपूर्ति किये जाने वाले मजदूरों-कर्मचारियों के प्रशिक्षण कार्य के रूप में देखते हैं, वहीं शिक्षक को केवल “सेवा प्रदाता” और विनम्र आज्ञापालक बना कर रख दिया गया है। हमारा समाज नौकरशाही की ताकत, तकनीकी प्रबंधकों के दावों और मशहूर हस्तियों की चकाचौंध से सम्मोहित समाज बन गया है। इस वजह से इसमें हैरत की बात नहीं कि यह समाज इस बात को भी महसूस करने में विफल है कि जिस समाज ने अपने शिक्षकों को खो दिया है वह मर चुका है।

फिर भी, जो लोग शिक्षण-कार्य से प्यार करते हैं और जिन्होंने इस कार्य में अपार संभावनाओं को देखना बंद नहीं किया है, उन्हें हार नहीं माननी चाहिए। आखिरकार, हमारा समाज एक ऐसा समाज भी तो है जिसने गिजुभाई बधेका, रवींद्रनाथ टैगोर और जिद्दू कृष्णमूर्ति को देखा है, जिन्होंने हमें प्रेरित किया, और हमें विश्वास दिलाया कि एक शिक्षक, नौकरशाही मशीन की चकरी का एक दांता मात्र नहीं है, बल्कि वह अपने हाथों में सच्चाई का एक दीपक लिये हुए अपने विद्यार्थियों के साथ-साथ घुमक्कड़ों और अन्वेषियों की तरह चलता है, ताकि वे उस दुनिया का बोध कर सकें जिसमें वे रहते हैं, और वे मनुष्य में लघुता और ओछापन पैदा करने वाली चीजों से मुक्त हो सकें। हमें उम्मीद के इस शिक्षा-शास्त्र का जश्न मनाना चाहिए।

(साभार- इंडियन एक्सप्रेस)

अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद-शैलेश

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