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Wednesday, August 4, 2021

अदालतों को शर्मिंदा करके चले गए स्टेन स्वामी!

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84 वर्षीय फादर स्टेन स्वामी ने अदालतों को यह तय करने नहीं दिया कि वे एनआईए द्वारा उनके खिलाफ लगाये गये उन गंभीर आरोपों के लिए दोषी हैं या नहीं, जिनके तहत उन्हें गिरफ्तार किया गया था और गम्भीर रूप से बीमार होने के बावजूद मेडिकल जमानत भी अदालतों द्वारा नहीं दी गयी थी। स्टेन स्वामी और भीमा कोरेगांव मामले में गिरफ्तार सुधा भारद्वाज, गौतम नवलखा से लेकर दलित चिन्तक आनंद तेलतुम्बडे तक बौद्धिकों को बिना मुकदमा चलाये लगभग तीन साल से जेल में बंदी ने पूरी दुनिया को याद दिला दिया कि हिटलर के यातना शिविरों में होने वाले शारीरिक के साथ मानसिक उत्पीड़न और स्टालिन द्वारा साईबेरिया के आलू के खेतों में असंतुष्ट बौद्धिकों से कैसे आलू की खेती करायी जाती थी ताकि उनका मनोबल तोड़ा जा सके।

न्यायिक हिरासत में 84 वर्षीय फादर स्टेन स्वामी की सोमवार को हुई मौत ने भारत की न्याय प्रणाली पर गम्भीर प्रश्नचिन्ह छोड़ दिया है। क्या न्याय प्रणाली की शीर्ष संस्था उच्चतम न्यायालय से पूछा जा सकता है की फादर स्टेन स्वामी की हैसियत, व्यक्तित्व और कृतित्व रिपब्लिक टीवी के मालिक अर्णव गोस्वामी और न्यूज़ 18 के एंकर अमिश देवगन से भी कमतर थी। चीन्ह चीन्ह के न्याय देने से उच्चतम न्यायालय की गरिमा लगातार गिरती जा रही है।

क्या बॉम्बे हाईकोर्ट और एनआईए स्वामी के वकील मिहिर देसाई द्वारा सोमवार को बॉम्बे हाईकोर्ट के समक्ष उठाये गये इस सवाल का जवाब देंगे कि स्टेन स्वामी की गिरफ्तारी की क्या आवश्यकता थी, जबकि एनआईए की तरफ से एक दिन की भी हिरासत नहीं मांगी गई थी? इसका अर्थ यह है कि स्टेन स्वामी के कस्टोडियल पूछताछ की कोई आवश्यकता नहीं थी, फिर उन्हें गिरफ्तार क्यों किया गया?

आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता स्टेन स्वामी का सोमवार को निधन हो गया। स्वामी को पिछले साल 8 अक्टूबर को गिरफ्तार किया गया था और अगले दिन मुंबई ले जाया गया, लेकिन केंद्रीय एजेंसी ने पूछताछ के लिए उनकी हिरासत की मांग नहीं की थी। अगले दिन, 9 अक्टूबर को एनआईए अदालत ने जहां स्वामी को पेश किया गया था उन्हें तलोजा सेंट्रल जेल में न्यायिक हिरासत में भेज दिया। स्वामी 28 मई तक वहीं रहे हैं जिसके बाद उन्हें एक निजी अस्पताल में स्थानांतरित किया गया, जहां सोमवार को उनकी मृत्यु हो गई।

स्वामी के वकील मिहिर देसाई ने सोमवार को बॉम्बे हाईकोर्ट के समक्ष सवाल उठाया कि उनकी गिरफ्तारी की क्या आवश्यकता थी क्योंकि एक दिन की हिरासत नहीं मांगी गई थी?  पूरे मामले की जांच की मांग करते हुए देसाई ने कहा कि उन्हें अदालत या अस्पताल के खिलाफ कोई शिकायत नहीं है, लेकिन एनआईए और जेल अधिकारियों को लेकर जांच जरूर होनी चाहिए।

पहली बार एल्गर परिषद मामले के संबंध में जांच के लिए पुणे पुलिस 2018 और 2019 में रांची उनके घर पहुंची थी। जनवरी 2020 में एनआईए द्वारा मामले की जिम्मेदारी लेने के बाद, जुलाई-अगस्त में पांच दिनों में उनसे लगभग 15 घंटे तक पूछताछ की गई थी। एनआईए ने उन्हें पिछले साल अक्टूबर में फिर से मुंबई कार्यालय में तलब किया था। 9 अक्टूबर को, जिस दिन उन्हें अदालत के सामने पेश किया गया उस दिन एनआईए ने उनके और सात अन्य के खिलाफ आरोप पत्र दायर किया, जिसमें उन पर प्रतिबंधित संगठन सीपीआई (माओवादी) के सदस्य होने और इसकी गतिविधियों को आगे बढ़ाने के लिए काम करने का आरोप लगाया गया था।

एनआईए ने कस्टोडियल पूछताछ के लिए स्वामी की हिरासत की मांग नहीं की,लेकिन लगातार उनके जमानत का विरोध किया। जब स्वामी की तरफ से कोविड महामारी और अपनी उम्र के आधार पर अंतरिम जमानत की मांग की गयी तो एनआईए की तरफ से इसका अदालत में विरोध किया गया। स्वामी ने उसके खिलाफ दायर चार्जशीट के आधार पर नवंबर में फिर से जमानत के लिए अर्जी दी।

सीपीआई (माओवादी) के साथ उनके कथित जुड़ाव के सबूत  के रूप में, एनआईए ने अदालत को बताया कि स्वामी और अन्य सह-आरोपियों के बीच ईमेल का आदान-प्रदान हुआ था साथ ही यह भी दावा किया गया कि 2019 में, उन्होंने कोलकाता में एक बैठक में भाग लिया था। जो एल्गार परिषद मामले में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के विरोध में आयोजित किया गया था।हालाँकि इस कथित ईमेल की हकीकत पर भी गंभीर प्रश्नचिन्ह लग चुका है और आरोप है यह कूटरचित फर्जी प्लांटेड ईमेल है।

आदिवासी युवाओं के माओवादी के नाम पर होने वाले अवैध गिरफ्तारी का विरोध करते रहे स्वामी की जमानत याचिका को खारिज करते हुए अदालत ने  कहा था कि उनकी वृद्धावस्था और बीमारी सहित राहत मांगने के उनके आधार समुदाय के सामूहिक हित से बढ़कर नहीं है। एनआईए की विशेष अदालत के आदेशों के खिलाफ स्वामी की ओर से बॉम्बे हाईकोर्ट के समक्ष दायर अपील पर सुनवाई लंबित थी।एनआईए ने उनकी मृत्यु तक चिकित्सा आधार सहित अन्य आधारों पर उनके द्वारा मांगी गयी जमानत का विरोध किया था।

तेजी से तबीयत बिगड़ने के कारण रविवार से उन्हें अस्पताल में वेंटिलेटर पर रखा गया था। होली फैमिली अस्पताल के निदेशक डॉ इयान डिसूजा और कार्यकर्ता के वकील मिहिर देसाई ने उच्च न्यायालय को बताया कि दिल का दौरा पड़ने से स्वामी की मौत हो गयी। स्वामी का होली फैमिली अस्पताल में उपचार चल रहा था।

जस्टिस एस एस शिंदे और जस्टिस एन जे जमादार की पीठ ने इस खबर पर हैरानी जतायी और कहा कि उन्हें कहने के लिए कुछ शब्द नहीं मिल रहे और आशा जतायी कि स्वामी की आत्मा को शांति मिलेगी।

स्वामी के वकील देसाई ने उच्च न्यायालय से कहा कि उन्हें अदालत और निजी अस्पताल से कोई शिकायत नहीं है, जहां उनका उपचार हुआ लेकिन वह एल्गार परिषद-माओवादी जुड़ाव मामले में जांच कर रहे एनआईए और राज्य के जेल प्रशासन के लिए ऐसा नहीं कह सकते।देसाई ने दावा किया कि एनआईए ने स्वामी को समय पर और पर्याप्त चिकित्सा सहायता प्रदान करने में लापरवाही की और उच्च न्यायालय से उन परिस्थितियों की न्यायिक जांच शुरू करने का आग्रह किया, जिनके कारण कार्यकर्ता की मृत्यु हुई।

उन्होंने कहा कि स्वामी को होली फैमिली अस्पताल में भर्ती होने से 10 दिन पहले (इस साल 29 मई को) सरकारी जे जे अस्पताल ले जाया गया था, लेकिन जे जे अस्पताल में कोविड-19 की उनकी जांच नहीं की गयी। वकील ने कहा कि निजी अस्पताल में स्वामी की कोरोना वायरस की जांच में संक्रमण की पुष्टि हुई।उन्होंने यह भी बताया कि चूंकि स्वामी की हिरासत में मृत्यु हुई है, इसलिए राज्य के अधिकारी संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग के दिशा-निर्देशों के अनुसार पोस्टमॉर्टम करने के लिए बाध्य हैं।

उच्च न्यायालय ने न्यायिक जांच शुरू करने का कोई आदेश पारित नहीं किया, लेकिन उसने अपने आदेश में दर्ज किया कि दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की संशोधित धारा 176 (1 ए) में हिरासत में मौत के हर मामले में न्यायिक जांच अनिवार्य है। उच्च न्यायालय ने कहा कि यदि मौजूदा मामले में भी यही प्रावधान लागू होता है तो राज्य और अभियोजन एजेंसियों को इसका पालन करना होगा। अदालत ने निर्देश दिया कि राज्य के अधिकारी सभी औपचारिकताएं पूरी करें और स्वामी का शव उनके सहयोगी फादर फ्रेजर मस्कारेनहास को सौंप दें। यह निर्देश तब आया जब देसाई ने अदालत को बताया कि जहां आम तौर पर शव को उसके परिवार वालों को सौंप दिया जाता है, वहीं स्वामी एक पादरी थे और उनका कोई परिवार नहीं था। उन्होंने कहा, जेसुइट ही उनका एकमात्र परिवार था।

स्वामी ने कहा था कि तलोजा जेल में रहने के दौरान उनके स्वास्थ्य में लगातार गिरावट आ रही थी। स्वामी ने जे जे अस्पताल में भर्ती होने से इनकार कर दिया था और कहा था कि अगर चीजें वैसी ही बनी रहीं, तो वह जल्द ही मर जाएंगे।’ उन्होंने अदालत से कहा था कि यदि ऐसा ही चलता रहा तो मैं बहुत कष्ट भोगूंगा, संभवत: बहुत जल्द मर जाऊंगा। मेरी हालत जिस तरह तेजी से खराब हो रही है ऐसे में जे जे अस्पताल की दवा काम नहीं आएगी। स्वामी ने कहा था कि वह अपने लोगों के बीच रांची जाना चाहते हैं।

 (जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)

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