Sunday, October 17, 2021

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पूंजीवाद के इंजन को हमेशा के लिए बंद करना ही हमारा काम: अरुंधति रॉय

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कोरोनावायरस की महामारी ने पूंजीवाद के इंजन को रोक दिया है। परन्तु यह एक अस्थाई स्थिति है। आज जब पूरी मनुष्य जाति कुछ समय के लिए अपने घरों में कैद है तब धरती ने खुद ही अपने ज़ख्म भरने की ताकत के संकेत हमें दिए हैं। और इधर हम जो बीमार और लुटी-पिटी और कुछ न कर पाने की सी हालत में हैं, और कुछ न कर पायें तो इस नज़ारे को देख, साँसें रोक कर हैरान तो हो ही सकते हैं। 

पर यह सब कैसे खत्म कर दिया जाए, इस पर जोर-शोर से काम जारी है।   

उदाहरण के लिए, पिछले कुछ दिनों में, टाइगर रिज़र्व के लिए सुरक्षित एक क्षेत्र के बड़े हिस्से को कुम्भ मेले जैसे विशाल धार्मिक आयोजन के लिए लगभग तैयार किया जा चुका है, कुम्भ-मेला में करोड़ों लोग शामिल होते हैं। 

असम में हाथियों के लिए सुरक्षित एक वन-क्षेत्र को कोयला खनन के लिए चिन्हित किया जा रहा है। 

अरुणाचल प्रदेश में स्थित हिमालय के जंगलों की हजारों एकड़ भूमि की निशानदेही एक जल-विद्युत बाँध के निर्माण के लिए जलमग्न कर देने के लिए कर दी गई है। 

इस बीच, राष्ट्रपति ट्रम्प ने भी पीछे न रहते हुए चाँद पर खुदाई की अनुमति देने के प्रशासनिक आदेशों पर हस्ताक्षर कर दिए हैं।  

कोरोना वायरस ने जैसे मनुष्य की देह में घुसकर उसकी मौजूदा बीमारियों का और खुलासा कर दिया है ठीक उसी तरह इस वायरस ने अलग-अलग देशों और समाजों में घुसकर उनकी दुर्बलताओं और बीमारियों की भी पोल-पट्टी खोल दी है। इसने हमारे समाजों में मौजूद अन्याय, साम्प्रदायिकता, नस्लवाद, जातिवाद और इन सब से ज्यादा गैर-बराबरी का ढिंढोरा पीट दिया है। 

सत्ता के वे सारे अंग जिनका कभी गरीबों के दुःख-तकलीफ से कुछ लेना-देना नहीं रहा बल्कि जिन्होंने उनके जख्मों पर हमेशा ही नमक छिड़कने का काम किया है, अब उनके बचाव में लगे हैं कि गरीबों में अगर बीमारी फ़ैली तो अमीरों के लिए यह बड़ा खतरा होगा। अभी तक इस बीमारी से बचाव के लिए कोई सुरक्षा-दीवाल नहीं है। लेकिन कोई न कोई सुरक्षा-दीवाल तो शीघ्र बन ही जायेगी और निस्संदेह यह किसी वेक्सीन की शक्ल में होगी। और हमेशा की तरह इस दीवाल पर सबसे पहला कब्ज़ा उन्हीं का होगा जिनके हाथों में ताकत है। और वही खेल एक बार फिर शुरू हो जाएगा – जो जितना अमीर होगा उसके जिंदा रहने की गुंजाइश भी उतनी ही ज्यादा होगी। 

मेरे लिए यह अबूझ पहेली है कि सत्ता के ये सारे अंग, जिनके लिए विकास और सभ्यता का अर्थ हमेशा विध्वंस रहा है भला कैसे वायरस द्वारा बरपा तबाही को रोकने के लिए आज दिन-रात एक किये हुए हैं। विध्वंस का विचार परमाणु, रसायनिक, और जैविक हथियारों का अम्बार खड़ा करते समय भी उनके दिमागों में खड़ा रहा है।  इस विचार को वे तब भी गले लगाते रहे हैं जब वे तमाम देशों पर आर्थिक बंदिशें लागू कर उनकी जनता तक जीवन-रक्षक दवाओं की पहुँच रोकते रहे हैं। यह विचार उन पर तब भी हावी रहा है जब वे लगातार इस गृह को नष्ट करने का काम इतनी तेजी से करते रहे हैं कि कोविड 19 द्वारा दुनिया भर में की जाने वाली बरबादी तो बच्चों का खेल नज़र आयेगी। ( हालांकि सच यह है कि वह बरबादी पहले ही हो चुकी है, बस टेलीविजन पर उसे दिखाया नहीं गया है)

अब हम जब लॉकडाउन में बंद हैं तो उनकी शतरंजी चालें बहुत तेज़ी से बढ़ रही हैं। अधिकारवादी सरकारों के लिए कोरोना वायरस किसी उपहार की तरह आया है। महामारी फैलना कोई नई बात नहीं है। पर इस डिजिटल युग में महामारी पहली बार आई है। यह दौर देशी स्तर के अधिकारवादियों के हितों के साथ अंतर्राष्ट्रीय स्तर के विध्वंसक-पूंजीवादियों और डाटा-खनिकों के अनोखे मिलन का गवाह है।   

भारत में यह काम और भी तेज़ी से हो रहा है। फेसबुक ने भारत के सबसे बड़े फोन नेटवर्क वाली कम्पनी जियो से एक करार पर हस्ताक्षर किये हैं। इस करार के अनुसार फेसबुक व्हाट्सएप इस्तेमाल करने वाले अपने चालीस करोड़ उपभोक्ताओं को जियो से साझा करेगा। बिल गेट्स भी ज्यादा से ज्यादा मुनाफे की उम्मीद में प्रधानमंत्री मोदी की तारीफों के पुल बांधे जा रहे हैं। निगरानी/स्वास्थ्य सम्बन्धी ऐप आरोग्यसेतु को अब तक छह करोड़ से ज्यादा लोग डाउनलोड कर चुके हैं। सरकारी कर्मचारियों द्वारा इस ऐप को डाउनलोड करना अनिवार्य कर दिया गया है। 

अगर पूर्व-कोरोना काल में हम पर नींद में चलते हुए निगरानी रखी जा रही थी तो अब हम दिन-दहाड़े उससे भी कड़ी निगरानी के शिकंजे की ओर बढ़ रहे हैं और हमें एक तरह से कहा जा रहा है कि हम अपना सब कुछ त्याग दें। अपनी निजता, गरिमा और स्वतंत्रता का परित्याग कर हम खुद को नियंत्रित और सूक्ष्म स्तर पर प्रबंधित होने दें। लॉकडाउन खत्म होने के बाद ही सही, अगर हम तेज़ी से आगे न बढ़े तो निश्चित रूप से हम हमेशा के लिए कैद कर लिए जायेंगे। 

हम सब ने इस इंजन को हमेशा के लिए कैसे बंद करना है? यही हमारा अगला काम है।

(अरुंधति रॉय का यह लेख ‘इंटरनेशनल प्रोग्रेसिव’ में प्रकाशित हुआ था। जिसका हिंदी में अनुवाद सामाजिक कार्यकर्ता कुमार मुकेश ने किया है।) 

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