कोरोना संबंधी याचिकाओं की सुप्रीम कोर्ट में बाढ़, नोटिस और जवाब तलब से इतर कोई ठोस आदेश नहीं

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सुप्रीम कोर्ट।

उच्चतम न्यायालय में पिछले 10 दिन से कोविड 19 के कहर को लेकर लगभग रोज ही विभिन्न मुद्दों पर याचिकाएं दाखिल की जा रही हैं। इन पर अब तक तो नोटिस जारी करके जवाब माँगा जा रहा है। अभी तक किसी याचिका पर कोई विशिष्ट या ठोस आदेश उच्चतम न्यायालय ने नहीं पारित किया है। बेहद जरूरी मामलों की सुनवाई करने के लिए बैठ रहे उच्चतम न्यायालय की पूरी कार्रवाई कोरोना के इर्द-गिर्द रही।

उच्चतम न्यायालय में सारा कामकाज वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए हो रहा है।सुबह 11 बजे जस्टिस डीवाई चंद्रचूड और एमआर शाह बैठे। दोपहर 2 बजे जस्टिस नागेश्वर राव और अब्दुल नजीर सभी मामलों में जजों ने अपने घर पर बने दफ्तर से सुनवाई की। वहीं वकीलों ने अपने-अपने दफ्तरों से जजों को संबोधित किया।

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इसी कड़ी में देश में सैनेटाइजर और मास्क के महंगी कीमतों पर बिकने के मामले में उच्चतम न्यायालय ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। याचिकाकर्ता ने बताया कि सरकार ने सैनेटाइजर और मास्क की कीमत तय कर दी लेकिन उसके आगे कदम नहीं उठाए। यह नहीं देखा कि उस कीमत पर यह ज़रूरी चीज़ें उपलब्ध हो रही हैं या नहीं। लोग मुंह मांगी कीमत पर इन्हें खरीदने को मजबूर हैं। सरकार तुरंत वाजिब कीमत पर इन्हें उपलब्ध करवाए। ज़रूरतमंदों को मुफ्त में भी इन्हें दिया जाए। कोर्ट ने सरकार से उस याचिका पर भी जवाब देने को कहा है, जिसमें डॉक्टरों को पर्याप्त सुरक्षा उपकरण मुहैया करवाने की मांग की गई है।

पहली अहम सुनवाई ईरान में फंसे 800 भारतीय तीर्थ यात्रियों के मसले पर हुई। ईरान के क़ोम शहर में फंसे शिया मुस्लिम तीर्थ यात्रियों के मसले पर पिछले हफ्ते कोर्ट ने केंद्र से जवाब मांगा था। आज केंद्र ने कोर्ट को बताया कि ज़्यादातर लोगों को वापस ले आया गया है। इस पर याचिकाकर्ता के वकील संजय हेगड़े ने कहा कि 250 लोगों को कोरोना पॉज़िटिव होने की आशंका के चलते नहीं लाया गया है। उन्हें भी लाया जाना चाहिए। सरकार की तरफ से पेश सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि उन लोगों तक ज़रूरी सुविधाएं पहुंचाई जा रही हैं। स्थिति के हिसाब से आगे फैसला लिया जाएगा। कोर्ट ने भी इससे सहमति जताई।

कोर्ट ने कोरोना से लड़ाई में अग्रिम मोर्चे पर डटे डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ को विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) से मान्य सुरक्षित कपड़े और उपकरण उपलब्ध करवाने की मांग पर सरकार से जवाब मांगा। याचिका नागपुर के रहने वाले डॉक्टर जेरिल बनेट ने दाखिल की है। सरकार की तरफ सॉलिसीटर जनरल ने बताया कि इस दिशा में तेज़ी से काम हो रहा है। जजों ने सरकार को स्थिति पर जानकारी देने को कहा है। अगले हफ्ते मामला फिर सुना जाएगा।

कोरोना के मद्देनजर देश में आर्थिक आपातकाल लागू करने की मांग पर आज सुनवाई से उच्चतम न्यायालय ने मना किया। याचिका में कहा गया है कि इस समय पूरे देश में एक जैसी व्यवस्था ज़रूरी है। इसलिए, संविधान के अनुच्छेद 360 के तहत आर्थिक आपातकाल की घोषणा की जानी चाहिए। पीठ ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारें बीमारी की रोकथाम के लिए ज़रूरी कदम उठा रही हैं। मौजूदा हालात में इस तरह की मांग पर विचार करना सही नहीं होगा। मामला अब 2 हफ्ते बाद लगेगा।

कोर्ट ने कोरोना से जुड़े 2 और मामलों पर भी सुनवाई के लिए सहमति जताई। एक याचिका वकील शशांक देव सुधि की तरफ से दायर की गई है। इसमें कहा गया है कि कोरोना की जांच के लिए प्राइवेट लैब को इजाजत देने वाली अधिसूचना गलत है। इसमें टेस्ट की कीमत 4500 रुपये तक रखी गई है। यह टेस्ट मुफ्त में या वाजिब कीमत पर होना चाहिए। दूसरी याचिका सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर और अंजलि भारद्वाज की है। इसमें कहा गया है कि लॉक डाउन के दौरान मजदूर और स्वरोजगार करने वाले गरीबों के पास कमाई का कोई जरिया नहीं है। इसलिए, सरकार उन्हें उनका वेतन या न्यूनतम आमदनी मुहैया करवाए। कोर्ट ने इन याचिकाओं पर जल्द सुनवाई का आश्वासन दिया है।

इस बीच, उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से कोरोना वायरस के बढ़ते संक्रमण को रोकने के लिए उठाए गए कदमों पर संतोष व्यक्त किया है। हालांकि, सोशल मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया में इसको लेकर फैलाई गई फर्जी खबरों पर कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है। कोर्ट ने कहा कि अलग-अलग माध्यमों से फैलाई गई फर्जी खबरों की वजह से प्रवासी मजदूरों का बड़ी संख्या में शहरों से अपने गांवों को पलायन हुआ।

चीफ जस्टिस एसए बोबडे और जस्टिस एल नागेश्वर राव की पीठ ने कहा, केंद्र की ओर से दायर स्टेटस रिपोर्ट के अवलोकन के बाद, हम कोरोनो वायरस के प्रसार को रोकने के लिए सरकार की ओर से उठाए गए कदमों से संतुष्ट हैं। कोर्ट ने कहा, ‘शहरों में बड़ी संख्या में काम करने वाले प्रवासी मजदूरों में आतंक उस समय फैला जब कुछ फर्जी खबरें सामने आने लगीं, जिसमें ये कहा गया कि लॉक डाउन तीन महीने से अधिक समय तक जारी रहेगा’।

उच्चतम न्यायालय ने अपने आदेश में डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट, 2005 की धारा 54 का जिक्र किया, जिसमें किसी व्यक्ति के फर्जी खबरें फैलाने के जुर्म में एक साल की जेल और जुर्माने का प्रावधान है। इसमें यह भी कहा गया है कि ऐसे मामलों में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 188 के तहत सजा दी जा सकती है। पीठ ने कहा कि यह सभी लोग जानते हैं कि घबराहट और डर का माहौल मानसिक स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है। हमें इसकी जानकारी है कि सरकार इन मजदूरों की मानसिक स्थिति के महत्व के प्रति जागरूक है, जो लोग दहशत की स्थिति में हैं उन्हें शांत करने की ओर कदम उठाएगी।

इस बीच, कर्नाटक हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह 3 अप्रैल तक एक व्यापक योजना बनाए ताकि कोरोना वायरस के प्रसार से बचने के लिए 24 मार्च को घोषित 21 दिनों के राष्ट्रव्यापी लॉक डाउन की अवधि के दौरान जरूरतमंद लोगों, गरीब लोगों, दैनिक मजदूरी करने वाले श्रमिकों, सड़कों पर रहने वाले लोगों, रेलवे प्लेटफार्मों व बस स्टैंड आदि पर रहने वाले लोगों को अनाज/ भोजन की आपूर्ति की जा सके।

दिल्ली हाईकोर्ट में एक याचिका दायर कर उन दंगा प्रभावित परिवारों की दुर्दशा पर प्रकाश डाला गया है, जिन्हें कोविड 19 महामारी के कारण ईदगाह शिविर छोड़ना पड़ा है। दिल्ली सरकार ने दिल्ली हाईकोर्ट में आश्वासन दिया है कि ऐसे परिवारों से संपर्क किया जाएगा और उन्हें सहायता प्रदान की जाएगी। नगर निगम की तरफ से उपस्थित अभिनव अग्रवाल ने अदालत को सूचित किया कि इन पीड़ितों को मौजूदा रैन बसेरों में नहीं रखा जाएगा। अदालत इस मामले की अगली सुनवाई 3 अप्रैल को करेगी।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार होने के साथ क़ानूनी मामालों के जानकार हैं।)

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