Thu. Oct 24th, 2019

आरोपी की पहुंच और पीड़िता का अकेलापन

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चिन्मयानंद, मोदी और योगी।

गैंडे की तरह लेटा एक शख्स पूरे देश को बता रहा है कि उसका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता। क्योंकि पूरा कानून, संविधान और सरकार उसकी मुट्ठी में है। यह बात पहले भी उसने उस बच्ची से बता दी थी जिसको उसने अपनी हवस का शिकार बनाया था। उसने कहा था कि चाहे जहां जाओ, रोओ और फरियाद करो लेकिन उसका कुछ नहीं बिगड़ने वाला है। क्योंकि सब कुछ उसकी गिरफ्त में है। बावजूद इसके उस बच्ची ने हिम्मत दिखायी।

इन तमाम धमकियों को दरकिनार कर उसने एक ऐसे शख्स के खिलाफ लड़ने का संकल्प लिया जिसकी जड़ें न केवल मौजूदा सत्ता प्रतिष्ठान बल्कि उसकी पितृ संस्था तक में बेहद गहरी हैं। वह एक तरफ अगर देश के गृह राज्यमंत्री के पद पर रहा है तो दूसरी तरफ भगवा धारण कर बाबरी मस्जिद विध्वंस की अगुआई भी कर चुका है। मौजूदा सत्ता के पितृ पुरुष के साथ अभी भी उसके गहरे रिश्ते हैं। उसको उनके साथ एक मेज पर भोजन करते हुए देखा जा सकता है। मौजूदा केंद्रीय सत्ता के शीर्ष सरदार के ड्राइंग रूम तक उसकी पहुंच है। यह बात किसी से छुपी नहीं है।

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कानून की इस पीड़ित छात्रा के मामले को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुए तकरीबन एक पखवाड़ा बीत गया है। उसके बाद एसआईटी भी बैठा दी गयी। इस दौरान जांच टीम ने आरोपी से ज्यादा पीड़िता से पूछताछ की। 12-12 घंटे बैठाकर उससे इस तरह से सवाल जबाव किए गए जैसे वह पीड़िता न होकर खुद आरोपी हो। मामले में स्वामी से भी पूछताछ की औपचारिकता निभायी जा चुकी है। और सबूतों के लिहाज से जांट टीम को 45 से ज्यादा वीडियो टेप मुहैया कराए जा चुके हैं। अब तक सामने आए वीडियो अपनी कहनी खुद कह रहे हैं। ऐसे में हर तरीके से स्वामी के खिलाफ रेप का केस दर्ज कर गिरफ्तारी का मामला बनता है। लेकिन एसआईटी सबूतों की तलाश के लिए हड़प्पा की किस खुदाई में लगी हुयी है। यह किसी के लिए भी समझ पाना मुश्किल है। या फिर वह कोई दूसरी साजिश कर रही है? कुल मिलाकर अभी तक उसके रवैये को लेकर किसी सकारात्मक नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सकता है।

पूरे मसले पर कोर्ट का रवैया भी किसी की समझ से परे है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले को संज्ञान में लेकर उसे इलाहाबाद हाईकोर्ट के हवाले कर दिया। और वहां इसके लिए एक बेंच भी गठित कर दी गयी है। लेकिन अभी तक बेंच इस मामले में जांच की प्रगति पर कोई खास तवज्जो दी हो ऐसा कुछ दिखा नहीं।

हिंदू-मुस्लिम झगड़े को सांस्कृतिक खुराक समझने वालों के लिए यह केस एक नजीर है। अगर किसी को लगता है कि यह सरकार केवल मुसलमानों के खिलाफ है तो उसे यह गलतफहमी अपने मन से निकाल देनी चाहिए। पीड़िता न केवल हिंदू है बल्कि सवर्ण परिवार से आती है और यूपी की सत्ता में बैठे शीर्ष भगवा पुरुष से उसका बिरादरी और गोत्र का रिश्ता है। लेकिन गरीब है यही उसकी सबसे बड़ी कमी है। मामले में सरकार द्वारा बरती जा रही हीला-हवाली और किसी नई साजिश के अंदेशे ने उसे और ज्यादा परेशान कर दिया है। पहले से ही हर तरह के अपमान और जलालत की मार सह चुकी बच्ची के सब्र का बांध भी अब टूटने लगा है। लिहाजा आजिज आकर अब उसने आत्मदाह तक की धमकी दे डाली है।

हमें नहीं भूलना चाहिए कि शाहजहांपुर के बगल में ही वह उन्नाव है जहां के एमएलए को बचाने के लिए योगी ने हर वह काम किया था जो एक सभ्य समाज को शोभा नहीं देता है। केस अभी भी सुर्खियों में बना हुआ है। लिहाजा किसी के लिए यह समझना मुश्किल नहीं है कि बीजेपी एक ऐसे विधायक के लिए जो ठीक से उसका अपना भी नहीं था, किसी हद को पार कर सकती है। तो एक ऐसा शख्स जिसकी पैदाइश ही नागपुर के आंगन में हुई है। और बड़ा होकर जिसने बाबरी विध्वंस की अगुआई की हो। उसको बचाने के लिए वह किस हद तक जा सकती है। यहां यह जानना बेहद जरूरी है कि इसी शख्स के खिलाफ दर्ज रेप के एक दूसरे मुकदमे को यह सरकार वापस ले चुकी है। ऐसे में भला वह उसे किसी दूसरे केस में कैसे फंसने देना चाहेगी। लिहाजा अगर यह कहा जाए कि उसे बचाने के लिए घर से लेकर अस्पताल और आकाश से लेकर पाताल तक वह एक कर देगी तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।

इस मामले में सचमुच में अगर कोई न्याय चाहता है तो उसकी बुनियादी शर्त यही है कि उसे सड़कों पर उतरना होगा। वैसे तो देश में महिला सशक्तीकरण की तमाम बातें की जाती हैं और ऊपर से लेकर नीचे तक गिनाने के लिए तमाम नेता और संगठन भी मिल जाएंगे। लेकिन इस मामले को लेकर लखनऊ से दिल्ली तक छायी चुप्पी बेहद चकित करने वाली है। आजम खान के एक लफ्ज पर बीजेपी की महिला सांसद एक पैर पर खड़ी हो जाती हैं। लेकिन एक बच्ची की महीनों तक लुटी अस्मत पर उनके बाल में जूं तक नहीं रेंगता। बहरहाल सत्ता में बैठी किसी ईरानी और लेखियानी से दूसरी कोई उम्मीद भी नहीं की जा सकती है। लेकिन विपक्ष का झंडा बुलंद करने वाली तमाम महिला नेता क्या कर रही हैं? यह सवाल जरूर पेश-ए-नजर है।

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