भारत-नेपाल संबंधों को बिगाड़ने की नीयत से किया गया था बनारस में मुंडन की घटना को प्रायोजित

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बनारस में नेपाली व्यक्ति के विश्व हिंदू सेना द्वारा जबरिया मुंडन की घटना के बारे में अब कुछ नयी बातें सामने आयी हैं, जैसे,

● जिस आदमी का जबरिया मुंडन किया गया वह नेपाल का नागरिक नहीं था। 

● वह भारत का ही नागरिक है और उसे इस काम के लिये 1000 रुपये दिए गए थे। 

● यह पूरा आयोजन प्रायोजित था जिसे विश्व हिंदू सेना के लोगों ने प्रायोजित किया था। 

लेकिन जो नुकसान, बनारस और भारत की छवि का नेपाल या अन्य देशों में होना था वह हो चुका है। नेपाल के लगभग सभी बड़े अखबारों ने इस घटना को छापा है और इससे यह मूल सन्देश छिप नहीं रहा है कि, भारत में एक वर्ग ऐसा है जो धर्म, आस्था और मिथ्याभिमान के पाखंड में लिप्त होकर ऐसी हरकतें करता है जो देश की अंतरराष्ट्रीय छवि ही नहीं बल्कि बनारस की महान संस्कृति और परंपरा को भी बदनाम करता है। 

आज अगर सबसे अधिक संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय मित्रता में सौहार्द की आवश्यकता है तो वह भारत-नेपाल सम्बन्धों में है। भारत नेपाल सम्बन्धों में यदा कदा कुछ खटास भरे मौकों को छोड़ दें तो, साझी संस्कृति, सभ्यता, साझे इतिहास और परस्पर सदियों से चले आ रहे रोटी-बेटी के सम्बन्धों को देखते हुए उभय देशों के बीच आंतरिक और प्रगाढ़ मित्रता की एक अंतर्धारा सदैव प्रवाहित होती रही है और आज भी विद्यमान है। 

लेकिन आज हमारे संबंध नेपाल से, उतने अच्छे नहीं रहे जितने पहले थे या जितने रहने चाहिए। लिपुलेख सड़क और नेपाल के नए नक़्शे को लेकर नेपाल आज चीन के खेमे में दिखायी दे रहा है। नेपाल और चीन में एक ही विचारधारा, कम्युनिस्ट शासन की समता के कारण यह आपसी नज़दीकी और बढ़ रही है। पर नेपाल में किस दल और किस विचारधारा का शासन होगा यह तो नेपाल की जनता को तय करना है न कि भारत या किसी अन्य देश को। कूटनीतिक सम्बन्धों या विदेश नीति की विशेषता भी यह होती है कि परस्पर विरोधाभासों के बीच भी बेहतर सम्बन्धों की राह तलाशी जाए और परस्पर हितों के टकराव को दरकिनार करते हुए एक मजबूत परस्पर अंतरराष्ट्रीय सम्बंध बनाये रखे जाएं। 

नेपाल के साथ जबकि ऐसा कोई विरोधाभास भी बहुत नहीं है। नेपाल, चीन की तुलना में भारत से सभ्यता, संस्कृति, भाषा, खानपान, धर्म की परंपराओं और भौगोलिक स्थितियों को लेकर भी बहुत निकट है। लेकिन इस समय वह भारत की अपेक्षा चीन के अधिक निकट दिख रहा है। नेपाल में चीन का निवेश बढ़ रहा है और नेपाल के प्राइमरी स्कूलों में नेपाली बच्चों को चीनी भाषा पढ़ाई जा रही है। संस्कृति के नाम पर तिब्बत की हथेली की अंगुलियों वाला सिद्धांत परोसा जा रहा है।

नेपाल का बौद्ध धर्म जो मूलतः तिब्बती बौद्ध धर्म से आया है को चीन से जोड़ कर देखने की बात की जा रही है। यह एक प्रकार की छोटी-मोटी सांस्कृतिक क्रांति की पीठिका की तैयारी है। हो सकता है चीन आगे चल कर अपनी सांस्कृतिक क्रांति के प्रयोगों को भी इस हिमालयी राज्य में दुहराए, पर यह अभी केवल एक अनुमान है और इसके कोई पुष्ट प्रमाण नहीं है। 

नेपाल मूलतः एक शैव और शाक्त परंपरा का देश है। यह देश कभी घोषित हिंदू राष्ट्र था, जब श्री पांच को सरकार यानी राजा का शासन था, पर अब न केवल संविधान बदल गया है बल्कि नए संविधान में नेपाल एक लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बन गया है। पर यह सब नेपाल के आंतरिक मामले हैं। हालांकि ऐसे आंतरिक मामलों पर भी अन्य शक्ति सम्पन्न देश नज़र रखते हैं क्योंकि किसी भी देश के आंतरिक मामलों से ही कूटनीतिक गणित तय होती है। चीन का उद्देश्य, भारत के इर्द-गिर्द एक ऐसा मकड़ जाल बुन देना है जिससे भारत की छवि दुनिया मे एक ऐसे कूटनीति विपन्न राष्ट्र के रूप में बनने लगे कि भारत अपने पड़ोसियों से समानता का नहीं बल्कि दादागिरी का व्यवहार करता है। आज जिस प्रकार से भारत की अपने पड़ोसियों से सम्बंध चल रहे हैं वे उतने मधुर नहीं है, जितने सार्क देशों में एक मजबूत शक्ति के रूप में भारत को रहने के नाते होने चाहिए थे। 

नेपाल, भारत और चीन के बीच एक बफर स्टेट के रूप में है और अगर वह भारत के विपरीत चीन के प्रभाव क्षेत्र में आ जाता है तो, चीन की सीधी पैठ हमारी उत्तरी सीमाओं तक हो जाएगी और चीन की विस्तारवादी आकांक्षाओं की उड़ान जगजाहिर है तो यह भारत के लिये एक बड़ा खतरा होगा। भारत का विदेश मंत्रालय इन सब समस्याओं से वाकिफ है और वह इसके समाधान के लिये प्रयास भी कर रहा होगा, पर विदेश नीति की अनेक गतिविधियां सार्वजनिक नहीं होतीं, और उन्हें सार्वजनिक होनी भी नहीं चाहिए, तो यह सब पता भी नहीं चलता है। 

जहां तक भारत नेपाल के बीच पीपुल टू पीपुल कांटेक्ट या परस्पर जन संवाद की स्थिति है वह सामान्य है और आपस मे कोई खटास भी नहीं है। ऐसा भी नहीं है कि वैचारिक आधार ही सरकारों की मित्रता का आधार होता है। अगर ऐसा होता तो सोवियत रूस काल में भी चीन रूस का सीमा विवाद न रहा होता, और अब भी चीन वियतनाम का आपसी तनाव हम देख ही रहे हैं। लेकिन चीन आर्थिकी के दृष्टिकोण में भारत से बहुत मजबूत स्थिति में है और दुनिया भर के गरीब देशों में उसकी अपनी बड़ी-बड़ी परियोजनाएं चल रही हैं जिससे उसका विस्तार बढ़ रहा है। 

दुनिया एक दूसरे शीतयुद्ध की दहलीज पर है। चीन और अमेरिका के बीच संभावित इस रस्साकशी में हम प्रत्यक्ष रूप से अमेरिकी गोद में बैठ चुके हैं। जैसी कभी अमेरिका के लिये पाकिस्तान की दशा थी आज हम उतनी तो नहीं पर कुछ कुछ उसी दिशा की ओर बढ़ रहे हैं। भारत वर्चस्व के जो अंतरराष्ट्रीय संगठन जैसे गुट निरपेक्ष आंदोलन और सार्क आदि थे और हैं वे भी कोरोनोत्तर काल के बदलते अंतरराष्ट्रीय समीकरण में नए कलेवर धारण कर रहे हैं। पाकिस्तान तो चीन के कैंप में आ ही गया। बांग्लादेश की दिक्कत उसकी भौगोलिक बाध्यता है, श्रीलंका, मालदीव के सागरों में चीन की उपस्थिति साफ साफ दिख रही है। अतः ऐसी स्थिति में नेपाल का चीन की ओर लगातार झुकते जाना भारत के लिये एक अच्छा संकेत बिल्कुल नहीं होगा। 

बनारस की यह प्रायोजित घटना न केवल भारत-नेपाल आपसी सम्बन्धों को  बिगाड़ेगी बल्कि इससे तरह-तरह की अफवाह भी फैलाई जाएगी। नेपाल में सक्रिय भारत विरोधी समूह जो नेपाल सरकार के चीन की ओर झुकने का पक्षधर है वह इस घटना को बढ़ा-चढ़ा कर दिखायेगा जिससे आपसी सम्बन्धों में और खटास आएगी। मीडिया की गैर जिम्मेदारी पर क्या कहा जाए। भारत-पाकिस्तान के आपसी विवाद के बाद अब भारतीय मीडिया नेपाल से सम्बंध बिगाड़ने की सनक में आ गया है। बनारस की यह घटना एक षड्यंत्र के रूप में है जो धर्म की आड़ में भारत नेपाल सम्बन्धों पर प्रतिकूल असर डालेगी। सरकार को बनारस की घटना को एक देश विरोधी कृत्य मानते हुए कड़ी कार्यवाही करनी चाहिए। 

( विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं।)

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