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Categories: बीच बहस

राजनीति में मध्ययुगीन शब्दावली का प्रयोग और उसके निहितार्थ

एक जुमला चल निकला हैः ‘राजा अहंकारी हो गया है’। दुनिया की सबसे बड़े लोकतंत्र में प्रधानमंत्री को यह ‘राजा’ वाला खिताब क्या सचमुच बुरा लग रहा होगा? आधुनिक राज्य व्यवस्था के पद को मध्ययुगीन शब्दावली से नवाजना कायदे से तो बुरी बात है, यह लोकतंत्र की व्यवस्था को नीचा गिराने जैसा है। यदि हम 2002 में गुजरात में हुए मुस्लिम समुदाय के नरसंहार के बाद उस समय के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा की प्रेस-वार्ता, जिसमें उस समय के गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी भी उपस्थित थे, में हिदायत देते हुए कहा था ‘राजा के लिए, शासक के लिए प्रजा, प्रजा में भेद नहीं हो सकता’ और उसे ‘राजधर्म’ निभाना चाहिए। ये सारी शब्दावली मध्ययुगीन प्रशासनिक शब्दों की याद दिलाते हैं। मसलन, पौनी-प्रजा एक ऐसे सामाजिक व्यवस्था को पेश करता है, जिसे आधुनिक समाज वैज्ञानिक ‘बंधुआ व्यवस्था’ का नाम देते हैं। राजधर्म भी एक मध्ययुगीन शब्दावली है, जिसका आधुनिक लोकतंत्र में कोई अर्थ नहीं है।

लोकतंत्र में नागरिक, संविधान, राज्य, पार्टी, दल, समूह, संगठन, विचार, चिंतन, आंदोलन, मतदान… जैसी शब्दावलियां आती हैं। तब क्या नरेंद्र मोदी को ‘राजा’ से नवाजना बुरा लग रहा है? फिलहाल, इस संदर्भ में कोई बयान दिखाई नहीं दे रहा है, लेकिन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस शब्द से कैसा लग रहा होगा? निश्चित ही गणित की प्रायिकता पर निर्भर होकर निर्णय नहीं किया जा सकता, लेकिन, यदि हम एक बार फिर अटल बिहार वाजपेयी की उसी प्रेस-वार्ता पर नजर डालें और सुनें तब उस समय के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी वक्तव्य के बीच में बोलते हुए दिखते हैं: ‘मैं भी वही कर रहा हूं’।

हम समय को लांघते हुए, पिछले दिनों लोकसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सुनें, तब वह तर्क देते हुए दिखते हैं कि कई ऐसे कानून बनाने होते हैं, जिसकी मांग जनता नहीं कर रही होती है, लेकिन जनता के हितों के लिए इसे बनाया जाता है। इस संदर्भ में, उन्होंने जिन कानूनों का उदाहरण दिया वे निश्चय ही उनके दावे के अनुकूल नहीं थे, लेकिन साफ था कि लोकतंत्र में ऐसे कानूनों के हितों को समझने और उसे बनाने का निर्णय लिया जा सकता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने पहले और दूसरे कार्यकाल में अभी तक कई ऐसे निर्णय ले चुके हैं जो निहायत ही एकतरफा थे और ‘प्रजा’ पर थोप दिए गए। ‘प्रजा’ के विरोध को नजरअंदाज किया गया। जब विरोध का स्वर तीखा हुआ तब उसे बहुमत के बरक्स रखकर उसे ‘संकीर्ण हितों से प्रेरित’ और ‘एक छोटा सा विरोधी विचलित समूह’ घोषित किया गया। इस संदर्भ में केंद्र में शासन कर रही भाजपा की ओर से चलाए गए राजनीतिक अभियानों को देखें तब स्थिति और भी साफ हो जाती है। शब्दावली और राजनीतिक शैली आधुनिक लोकतंत्र की शब्दावली और शैली से काफी दूर दिखेगी।

भारत में शासन और प्रशासन के तौर-तरीके इतने गजब हैं कि उसे सिर्फ लोकतंत्र के नजरिये से समझ पाना मुश्किल होने लगेगा। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जब एक ‘गूंगी गुड़िया’ से आगे बढ़कर एक मुखर नेता के तौर पर उभरीं तब कांग्रेस पार्टी का पूरा चरित्र ही बदल गया। भारत के आधुनिक दौर का पहला राजनीतिक दल, जिसमें समाज के हरेक हिस्से ने भागीदारी की और विभिन्न भाषा और जातीय समूहों ने हिस्सेदारी की, उसे इंदिरा गांधी ने खुद के और परिवार के नियंत्रण में ले आईं। कांग्रेस के भीतर खेमेबंदी हुई और नेतृत्व का केंद्र एक अत्यंत छोटे से समूह में समा गया। यहां से लिया गया निर्णय पार्टी, देश और जनता एक साथ तीनों पर ही लागू होने लगा। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में यह पाकिस्तान के साथ युद्ध और बांग्लादेश निर्माण में अभिव्यक्त हुआ। भारत के अंदर पंजाब से लेकर जम्मू-कश्मीर और उत्तर-पूर्व में सैन्य अभियानों के रूप में सामने आया। विपक्ष नामभर का एक समूह रह गया था।

ऐसे ही विपक्ष के एक नेता के तौर पर अटल बिहारी वाजपेयी ने इंदिरा गांधी को ‘दुर्गा’ की उपाधि दी थी। दुर्गा यानी संहार करने वाली देवी। किसका संहार? इसका निहितार्थ संभव है वही अधिक स्पष्ट रूप से जानते थे, लेकिन, इंदिरा गांधी के साथ ‘तानाशाह’ शब्द चिपक गया। उसका बड़ा कारण संविधान और संसद का सहारा लेकर आपात्काल घोषित करना था। यह एक ‘लोकतांत्रिक प्रक्रिया ही थी जो लोकतंत्र का निषेध’ कर रही थी। इसकी व्याख्या राजा, राजधर्म आदि मध्ययुगीन शब्दावली से नहीं कर सकते हैं, लेकिन हम जरूर ही उस मंशा पर सवाल उठा सकते हैं जिसकी वजह से आपात्काल लागू हुआ।

इंदिरा गांधी के समय में ही दरबार और जी हुजूरियों की परिकल्पनाएं आईं। जूतियां उठाने वाले नेताओं का समूह पैदा हुआ और राजनीति में चरम अवसरवादीयों के लिए रास्ते खुले और ‘बौने राजनेताओं’ का जन्म हुआ। (बौने राजनेताओं के संदर्भ में पुस्तक देखें आधा शेरः विनय सीतापति), लेकिन क्या यह सब कुछ इंदिरा गांधी के समय में शुरू हुआ। ऐसा कहना ठीक नहीं होगा।

यदि आप पाब्लो नेरूदा की जीवनी पढ़ने की जहमत उठाएं, तब आप जवाहर लाल नेहरू के बारे में उनकी टिप्पणियों को देख सकेंगे। पाब्लो नेरूदा 1928 के बाद 1958 में भारत आए। दोनों ही समय में उनकी मुलाकात जवाहर लाल नेहरू से हुई थी। दूसरी मुलाकात के समय जवाहर लाल नेहरू प्रधानमंत्री थे। पाब्लो एक महान कवि की तरह स्थापित हो चुके थे और चिली के जनांदोलनों के क्रांतिकारी नेतृत्व में गिने जात थे। उनकी यह दूसरी मुलाकात बहुत आसान नहीं थी। पाब्लो के शब्दों में जवाहर लाल नेहरू की नजर मेरी तरफ उसी तरह से देख रही थी जैसे एक जमींदार किसान को देखता है।

भारत के जनमानस में भी यह बात काफी चर्चा में रही है कि उनके कपड़े धुलने के लिए पेरिस जाते थे। कांग्रेस के भीतर नेतृत्व चुनाव के समय में भी उन्हें गांधी का ‘चुना हुआ’ अधिक माना गया। यहां हम पाब्लो नेरूदा की ‘मनःस्थिति’ या गांधी की ‘दूरदृष्टि’ पर उपरोक्त बातों को छोड़ सकते हैं। हम जवाहर लाल नेहरू की रचनाओं में लोकतांत्रिक मूल्य, संविधान और उसकी कार्यशैली पर हम बेहतर रचनाओं को देख सकते हैं, लेकिन भारतीय संदर्भ में भारतीय राजव्यवस्था में पैबस्त राजा-रजवाड़ों, सामंती भूमि व्यवस्था, जमींदारी के साथ उनका एक ऐसा गठजोड़ दिखता है, जिसका हल आने वाले समय में नहीं हो पाया।

आओ रानी, हम ढोएंगे पाली
यही हुई है राय जवाहर लाल की
इस कविता में बहुत से निहितार्थ हैं, जिसका हमें जरूर पुनर्पाठ करना चाहिए।

राजा, रानी, दुर्गा, राजधर्म आदि शब्दावलियों का यह संदर्भ देने के पीछे यह कारण बताना नहीं था कि ऐसा हमारे इतिहास में होता आया है, और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘अहंकारी राजा’ कहना कोई नई बात नहीं है। संसद में तानशाह और फासिस्ट शब्दावली का प्रयोग हो चुका है, और साथ ही ‘डरपोक’ और ‘क्रूर’ शब्द का प्रयोग हुआ है। आने वाले दिनों में और भी कुछ शब्दों का प्रयोग होगा। यहां मसला है कि इसे राजनीतिक भाषा में कैसे समझा जाए।

क्या यह वैसा ही शब्द है, जैसा अमेरीकी साम्राज्यवाद के लिए ‘इंपायर’ का प्रयोग किया जाता है? क्या यह भी उसी के सामानार्थी है और भारतीय लोकतंत्र की ‘चरम अवस्था’ को पेश कर रहा है? क्या यह भारतीय पूंजीवाद के साम्राज्यवाद में बदलने और पतित होने की स्थिति को पेश कर रहा है? क्या इन संदर्भ में ‘राजा’ शब्द उपयुक्त है? आज हम जो देख रहे हैं, इस लोकतांत्रिक राज व्यवस्था में जनता, जनांदोलन, विरोध, नागरिकता जैसे शब्द तेजी से अर्थ खो रहे हैं। राजनीतिक पार्टी, संगठन, समूह आदि शब्दावली लोकतांत्रिक परिभाषा से बाहर होकर दंड संहिता की परिभाषाओं में अधिक पैबस्त होते जा रहे हैं। क्या इसी स्थिति को हम ‘राजा’ की व्यवस्था कह रहे हैं जो अब ‘अहंकारी’ हो गया है?

निश्चित ही राजनीतिक शब्दावली का चुनाव और निर्माण एक खास राजनीतिक व्यवस्था की जरूरत के अनुसार ही होता है। उसकी व्याख्याएं नई शब्दावली को जन्म देती हैं और समय के साथ स्थापित होते हुए चलती हैं। किसी भी राजनीतिक व्यवस्था में बदलाव उसके राजनीतिक और आर्थिक हालातों में निहित होते हैं। इस बदलाव के निर्णय खुद राज्य की नीतिगत निर्णयों में निहित होते हैं और साथ-साथ राज्य के सामाजिक-राजनीति संबंधों में बदलाव लाने के लिए जनता के निर्णयों में होते हैं।

दूसरा पक्ष राज्य और उसका इन संबंधों के साथ टकराहटों में लिए गए निर्णयों से होता है। ये टकराहटें उन क्रांतियों की तरफ ले जाती हैं, जिनमें सिर्फ राज्य ही नहीं रानजीतिक शब्दावलियां भी बदल जाती हैं, लेकिन, टकराहटों के दौरान शब्दों का चुनाव करना बेहद सतर्कता की मांग करता है। मसलन, अमेरीकी साम्राज्यवाद को सोवियत रूस के टूट जाने के बाद राजनीतिक चिंतकों ने अजेय मानकर व्याख्याएं शुरू कर दीं, तब उसे ‘इंपायर’ नाम दे दिया गया जो हालात की दुरूहता से अधिक इस हालात के सामने सर झुका देने वाले चिंतन को अधिक पेश करता है। भारतीय संदर्भ में इस तरह के शब्दों का चुनाव खतरनाक है। खासकर, तब जब खुद राजनेता उन शब्दों में अपनी गरिमा और अपना अक्स देख रहे हों।

  • जयंत कुमार
    (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
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This post was last modified on February 21, 2021 3:13 pm

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