Sunday, May 22, 2022

चरमराती अर्थव्यवस्था भी मोदी सरकार की सेहत पर नहीं डाल पा रही है फर्क

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कीचड़ में कमल खिलने से कीचड़ जैसे कमल नहीं हो जाता है वैसे ही देश और राज्यों में कमल खिलने से सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक दशाएं खिल गई हों ऐसा पी चिदंबरम जी नहीं मानते हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री ने अभी हाल में एक लेख में कहा है कि हमें एनडीए सरकार की इस चालाकी की प्रशंसा करनी चाहिए, जिस तरह से उसने टैक्स वसूलने, कल्याणकारी मदद और अपने लिए वोट जुटाने के काम को आपस में जोड़ने का एक तरीका खोजा है। उनके इस मनन चिंतन और सूत्र वाक्यांश को समझने और विस्तार देने कि आवश्यकता है। लेकिन पहले सामाजिक-राजनैतिक दशा और दिशा को समझ लें। सत्तर साल का इतिहास कुछ विद्रूपताओं के बावजूद भी साथी हाथ बढ़ाना साथी रे कि भावना से भरपूर दिखाई पड़ता है।

किन्तु मोदी कार्यकाल के आठ साल का दौर  सामाजिक तनाव और मॉब लिंचिंग का एक अंतहीन सिलसिला है। जिसमें धार्मिक, राजनैतिक असहिष्णुता और उन्माद तथा तनाव में जीने कि मजबूरी है। लेकिन यही वह दौर भी है जिसमें मोदी और योगी दूसरे कार्यकाल की ताजपोशी भी करते दिखाई देते हैं और विश्लेषक समझ ही नहीं पाते कि ऐसा कैसे हुआ? वे समझ ही नहीं पाते कि फनकारों का वो कौन सा फन था जो जनता के सिर चढ़ कर बोलता दिखाई दे रहा है? इसी अबूझ पहेली को चिदंबरम सुलझाने में सफल होते दिखाई देते हैं क्योंकि खग ही जाने खग की भाषा। आइये इसको समझें।

मोदी 2014 में नव उदारवाद कि सीढ़ी पर चढ़ते दिखाई देते हैं और साथ में है उनके सपने गढ़ने, बेचने की कला, जो बाजारवादी अर्थव्यवस्था कि सबसे बेहतरीन और आवश्यक कला मानी जाती है। लेकिन बेचे गए सपनों को उनके साथी ही जुमला पारिभाषित करते हैं। सबका साथ सबका विकास, कुछ ही लोगों के विकास तक सिमट जाता है। खुद तीव्र विकास का सपना, सरकार द्वारा अपनाये गए विमुद्रीकरण और जीएसटी कार्यक्रम के पैरों तले रौंदे जाते दिखाई देता है। परिणाम कम होते विकास दर में दिखाई देता है। आइये देखें मोदी काल में विकास दर क्या थी? सन 2014-15, सन 2015-16 और सन 2016-17 में विकास दर क्रमश: 7.4, 8.2 और 8.3 प्रतिशत रही। इस वर्ष के पश्चात विकास दर तेजी से गिरी क्योंकि विमुद्रीकरण और जीएसटी कार्यक्रम अपनाये गए और सन 2017-18, सन 2018-19 और सन 2019-20 में यह गिर कर क्रमश: 7.0, 6.4 और 4.4 प्रतिशत मात्र रह गयी। सन 2020-21 के कोरोना काल में यह गिर कर -7.3 प्रतिशत रह गई।

कोविड के दौरान तो विकास दर दशकों में सबसे कम रही। लेकिन ध्यान देने की बात है कि विकास दर तो कोविड के पूर्व से ही गिर रही थी। कोविड न रहता तो भी विकास दर गिरती हुई दिखाई देती। वस्तुतः कोविड ने तो खस्ताहाल आर्थिक स्थिति को छुपाने का काम किया। सरकार को कोविड ने एक तरह से सहारा ही दिया है। यही तो चिदंबरम कहते हैं। लेकिन सन 2021-22 और सन 2022-23 में इसके क्रमश: 8.9 और 7.2 प्रतिशत रहने की संभावना है। इसी दौरान बेरोजगारी भी अपने चरमोत्कर्ष पर है। सीएमआईई का आंकड़ा कहता है कि सन 2018 में बेरोजगारी, पिछले 45 वर्षों में सबसे ज्यादा, अभूतपूर्व रही। यह दर सन 2019, सन 2020 में क्रमश: 5.27 प्रतिशत, 7.11 प्रतिशत, सन 2021(मई) में 12 प्रतिशत और सन 2022 (मार्च) में 7.6 प्रतिशत थी। इसी दौरान जनता की क्रय शक्ति और मांग घटी। गरीबी और कीमतें भी बढ़ीं किन्तु उसको पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। जैसे पेट छिपाने से नहीं छिपता है वैसे ही आर्थिक बदहाली भी नहीं छिपती। बढ़ती असमानता ने कोढ़ में खाज का काम किया है। ऐसे में मोदी सरकार क्या करती ?

2019 इलेक्शन के बाद मोदी सरकार ने अपना पैंतरा बदला है। चिदंबरम कहते हैं कि मोदी सरकार ने अब लोक कल्याणवादी सरकार का मुखौटा पहन लिया है जिससे कि वोटों की लहलहाती फसल तैयार की जा सके। उन्हें सफलता भी मिली है। वे कहते हैं कि कोरोना के नाम पर लोककल्याणवाद को मजबूत किया गया है अतिरिक्त कल्याणकारी मदद से। आइये इसे समझें ग्रामीण संसार का उदाहरण लेकर। लगभग सभी गांव पक्की सड़क और बिजली से जुड़ चुके हैं। पाइप से पानी देने का संकल्प भी ले लिया गया है। कहीं-कहीं हो भी गया है। इसी को तो विकास कहते हैं। साथ ही यदि आप गरीब, भूमिहीन या दलित किसान हैं तो आवास और बिजली की समस्या नहीं होगी। सरकार देगी वो भी मुफ्त। खाना बनाने के लिए सिलिंडर मिलना तय है।

भोजन बनाने के लिए राशन, तेल, नमक मिलेगा। स्वच्छता के लिए शौचालय बनवाइए, मदद के लिए  सरकार तो है ही। सुलभ शौचालय की योजना भी चल रही है। गावों में सफाई  कर्मी हैं। आप वृद्ध हैं तो पेंशन है। बीमार हैं तो आयुष्मान भारत की छत्र-छाया में हैं। बेरोजगार हैं तो मनरेगा का सहारा है। गरीब किसान हैं तो रुपये 6000 सालाना मिलेगा वो भी धन सीधे आपके खाते में आएगा (इस पर सरकार का दो वर्षों में खर्च रु 65000 करोड़ आएगा) । महिला सशक्तिकरण कि योजना तो है ही ।गरीब परिवार के बच्चों, विद्यार्थिओं को निःशुल्क पढ़ाई का वायदा भी है। अब बाकी देश को भी जोड़ कर देखें। यदि आप या आप के बच्चे ज्यादा भाग्यशाली हैं तो मोबाइल,लैपटॉप, साइकिल, स्कूटी मिलने में कठिनाई नहीं है। अम्मा साड़ी, अम्मा भोजन, मोदी स्कूटी, दर्जनों योजनाएं हैं। सरकारें कह रही हैं कि क्या नहीं है जो आपको नहीं मिल सकता है? 

केवल एक वोट का ही तो मामला है। जैसे वे कहती हैं कि एक हाथ से दीजिये और दूसरे हाथ से लीजिये। सरकार ने तो व्यवस्था बना ही दी है। चिदंबरम बताते हैं कि यही वो फन है जो मौजूदा सरकार ने अपना लिया है लोक कल्याण के नाम पर और जिसमें वह सफल भी रही है। इस तथ्य को और भी समझने कि आवश्यकता है। सरकार 80 करोड़ जनता को मुफ्त का राशन दे रही है। तो क्या देश कि साठ प्रतिशत जनसँख्या गरीब हो गई है? इस पर दो वर्षों में रु 2,68,349 करोड़ खर्च होगा। बेरोजगारी बढ़ी है किन्तु गावों में मजदूर नहीं मिल रहे हैं। ऐसा अनेक विशेषज्ञ बताते हैं। बेरोजगारी है किन्तु उसके खिलाफ आवाज नहीं है। ऐसा क्यों है? क्योंकि मुफ्त राशन, बिना काम किये मनरेगा का मुफ्त का पैसा और विभिन्न सहायतायें, बाटी जा रही हैं। तो पेट भरने पर मुँह चुप नहीं हो जायेगा क्या? वोट बैंक नहीं बनेगा, वोट नहीं मिलेगा क्या? जनता को चुप रखने का एक नया तरीका सरकार ने अपनाया  हैं । यही प्रश्न चिदंबरम उठा रहे हैं। उत्पादन क्रियाओं पर तो खर्च होता नहीं दिख रहा। अर्थव्यवस्था बदहाल है। उल्टे कल्याणकारी कार्यों और मुफ्त खोरी के राजनीतिक और चुनावी फायदे मिले हैं और जनता से यूपी चुनाव में नमक  का  कर्ज उतारने का आह्वान भी किया गया।

लेकिन सरकार की आर्थिक नीति के इस खेल में पैसा कहाँ से आ रहा है । आइये समझें। सरकार के राजस्व प्रत्यक्ष कर, जीएसटी (अप्रत्यक्ष कर) से प्राप्त आय एवं पेट्रोलियम पदार्थों पर लगे कर से प्राप्त होते हैं। गरीब-अमीर सभी अप्रत्यक्ष कर देते हैं। किन्तु व्यक्तिगत आयकर कि दर को सरकार ने उच्चतम 30 प्रतिशत पर बनाये रखा है और साथ ही इस कर पर 4 प्रतिशत का शिक्षा और स्वास्थ्य अधिभार भी बनाए रखा है। तो विशेष रूप से यही वर्ग कर की मार से कराह रहा है। ऊपर से कोरोना काल में सरकारी कर्मचारियों को मिलने वाला डीए भी बंद था। एक मध्यम वर्ग भी है जो कि अब के दौर में कर तो देता है किन्तु सुविधाओं से वंचित है। साथ ही सरकार कि दुधारू गाय-ईंधन पर लगने वाला टैक्स है। वो कामधेनु गाय कि तरह है। उससे लगातार आय होती है। मई 2014 में पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क रु 9.20 था और आज रु 26.90 है ।

डीज़ल पर यह इन्हीं समयावधियों में क्रमश: रु 3.46 था और अब रु 21.80 है। मई 2014 में पेट्रोल और डीज़ल कि कीमतें क्रमश: रु 71.41 और रु 55.49 थीं और आज पेट्रोल रु 110 एवं डीज़ल रु 97 से अधिक है। चिदंबरम बताते हैं कि पिछले तीन वर्षों (सन2019- सन2021) में कच्चे तेल की औसत क़ीमत लगभग 60 अमरीकी डॉलर प्रति बैरल रही है। फिर भी सरकार उपभोक्ताओं पर इतनी ऊंची क़ीमतें जबरन थोपे हुए है, जबकि सन 2013 के यूपीए काल में यह $106 थी। एलपीजी, पीएनजी और सीएनजी कि कीमतें सन 2014 में क्रमश: रु 410, रु 25.50 और रु 35.20 रही जबकि आज इनकी कीमतें क्रमश: रु 1000, रु 36.61 और रु 70 है ।

ख्याल करने कि बात है कि बढ़ी कीमतों का भुगतान किसानों, नौजवानों, ऑटो- टैक्सी चालकों, गृहिणियों द्वारा किया जाता है। हम सब ने पिछले आठ वर्षों में ईंधन पर लगभग रु2651919 करोड़ रुपये खर्च किया है। सन 2014 में इससे सरकार को रु 172065 करोड़ कि आमदनी हुई। जबकि सन 2020-21 में इससे रु 455069 करोड़ मिला था (इसके अतिरिक्त राज्य सरकारों को 2,17,650 करोड़ रुपये मिला) । सन 2021-22 में रु 416794 करोड़ मिलने कि संभावना है। सरकार कि बांछे खिली हुई हैं। सरकार खुश है कि कल्याणकारी कार्यों और मुफ्त खोरी पर आम जनता पर उसने जो खर्च किया उसका खर्च भी जनता से वसूल कर लिया।

ऊपर से वोट बैंक भी बढ़ा-बना, मिला भी ।जनता का एक बड़ा वर्ग भी खुश और सरकार भी खुश। वस्तुतः बिन बोले-कहे-लिखे एक दुरभिसंधि बनती दिखाई देती है और चिदंबरम इसी से चिंतित हैं। तो अर्थशास्त्री चिदंबरम कब खुश होते? जबकि कॉरपोरेट घरानों पर पैसा जुटाने के लिए टैक्स लगता। लेकिन वस्तुस्थिति तो यह है कि कॉरपोरेट टैक्स घटाए गए हैं। उन्हें भारी मात्रा में छूट पर प्रदान किया जा रहा है। ऑक्सफेम की रिपोर्ट को ताख पर रख दिया गया है जो बताती है कि देश में खरबपतियों की संख्या सन 2021 में 102 से बढ़कर 142 हो गई। उनकी संपत्ति 23,14,000 करोड़ रुपये से बढ़ कर 53,16,000 करोड़ रुपये हो गयी। तो क्या उन पर टैक्स नहीं बढ़ने चाहिए थे? लेकिन बजट में ऐसा तो नहीं हुआ। कल्याणकारी कार्यों के नाम पर मुफ्त खोरी करने-कराने का तरीका तो राज नेताओं का पुराना शग़ल है किन्तु सत्ताधीशों का और आम जनता के बीच के कुछ खास वर्गों से उसका गठजोड़ देश के लिए नया है और कल्याणकारी भी नहीं। राजनीतिज्ञ चिदंबरम इसी चिंता से दुबले हो रहे हैं ।

(लेखक विमल शंकर सिंह, डी.ए.वी.पी.जी. कॉलेज, वाराणसी के अर्थशास्त्र  विभाग में प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष रहे हैं।)

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