Saturday, January 22, 2022

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वीरांगनाओं के कारनामों से भरा पड़ा है स्वाधीनता संग्राम का इतिहास

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भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं ने पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर अपना पूरा योगदान दिया। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान विभिन्न क्रांतिकारी गतिविधियों में अनेक महिलाओं ने अपने प्राणों की किंचित परवाह किये बिना हिस्सा लिया। जिन महिलाओं ने कभी घर से बाहर कदम भी नहीं रखा था, उन्होंने भारत की आजादी के लिए अनेकों और भारतीय महिलाओं को नेतृत्व प्रदान किया। हजारों महिलाओं ने स्वतंत्रता के यज्ञ को अपनी आहुति  देकर सफल बनाया। सत्याग्रह के दौरान लगभग 15000 से भी ज्यादा महिलाएं जेल गईं। उन्होंने जेलखानों को आराधना गृह का नाम दिया। लाठियों और  गोलियों की परवाह न करते हुए अनगिनत महिलाओं ने इस देश की स्वाभिमानी नागरिक होने का फर्ज हँसते-हँसते अदा किया। ये महिलाएं आज नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा स्वरूप हैं, इन्होंने अपने अदम्य साहस से भारत को गुलामी की जंजीर से मुक्त कराने में अपना महत्वपूर्ण योग किया।

इन में से कुछ क्रान्तिकारी महिलाओं का जिक्र किया जाना आवश्यक है। मैडम भीकाजी कामा भारत की प्रथम क्रान्तिकारी महिला थीं जिन्होंने निष्कासित जीवन व्यतीत करते हुए विदेश में भारत की लड़ाई को जीवित रखा। 24 सितंबर 1861 को बंबई के एक पारसी परिवार में जन्म हुआ था। विदेश में रहते हुए ये श्यामा जी, लाला  हरदयाल, सावरकर, आदि के साथ सक्रिय रहीं। 1907 में जर्मनी में अंर्तराष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए इन्हें राष्ट्रीय ध्वज फहराने का गौरव प्राप्त हुआ। इंग्लैण्ड में भीकाजी कामा को अपराधी घोषित किया गया और वहां से निकल जाने का हुक्म दिया गया। वे इंग्लैण्ड से फ्रांस आ गईं, वहां से इन्होंने अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों को जारी रखा। 13 अगस्त 1936 को उनका निधन हो गया।

एक अक्तूबर 1847 को लंदन में जन्मी एनीबेसेन्ट एक आइरिश महिला थीं। भारतीय दर्शन एवं संस्कृति से प्रभावित होकर वे भारत आईं थी। उन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। 1917 में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की पहली महिला अध्यक्ष बनी। 1919 में होमरूल लीग की स्थापना की। कांग्रेस के अधिवेशनों में वे सदैव पूर्ण स्वराज की मांग उठाती रहीं। एनीबेसेन्ट गरम दल की प्रमुख नेता थीं। 1916 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना में इनका महत्वपूर्ण योगदान था। 86 वर्ष की आयु में 20 सितंबर1933 को मद्रास में उनका निधन हो गया।

कु. प्रीती लता एक सुप्रसिद्ध क्रान्तिकारी महिला थीं। प्रीती लता का जन्म 8 मई 1911 को चटगॉव में हुआ था, जो अब बंगला देश में है। चटगॉव शस्त्रागार काण्ड में इन्होंने भाग लिया था। वे इस काण्ड में गंभीर रूप से जख्मी हो गईं। अंग्रेज सिपाहियों ने उन्हें घेर लिया। वे अंग्रेजों के हाथ न लग पाएं इसलिए उन्होंने सायनाइड खाकर अपने को देश के लिए बलिदान कर दिया। महात्मा गाँधी की पत्नी, कस्तूरबा गाँधी का जन्म 1869 में पोरबंदर में हुआ था। स्वतंत्रता के कार्यक्रमों में वे सदैव गाँधी जी के साथ रहीं और अनेक बार जेल गईं अंतिम बार 9 अगस्त 1942 को उन्हें गाँधी जी के साथ आगा खाँ जेल में नजरबंद कर दिया गया था, वहीं बन्दी जीवन में ही 22 फरवरी 1944 को उनका निधन हो गया। दादा भाई नौरोजी की पोती कु. खुर्शीद बैन नौरोजी का जन्म 1894 में हुआ था। विदेश से शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद खुर्शीद बैन पर वहाँ का रंग नही चढ़ा। भारत की स्वतंत्रता के लिए लोगों को जागरूक करती रहीं और आजादी के आन्दोलन में 8 बार जेल गईं। सन् 1966 में उनकी मृत्यु हुई। सुप्रसिद्ध समाज सेविका कमला देवी चट्टोपाध्याय का जन्म बंगलौर में 3 अप्रैल 1903 को हुआ था। राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा स्वतंत्रता संग्राम के लिए चलाए गये सभी आन्दोलनों में उन्होंने हिस्सा लिया और अनेकों बार जेल भी गईं। आजादी के दौरान सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना में उनका प्रमुख योगदान रहा।

भारत की राष्ट्रीय नेता एवं ओजस्वी कविताओं के कारण भारत कोकिला के नाम से प्रख्यात सुप्रसिद्ध कवियत्री सरोजनी नायडू का जन्म 13 फरवरी 1879 को हैदराबाद में हुआ था। सरोजनी नायडू  को 1925 के कानपुर राष्ट्रीय अधिवेशन में कांग्रेस की अध्यक्ष चुना गया था। एतिहासिक दांडी यात्रा में गाँधी जी के साथ थीं। गाँधी इरविन पैक्ट के अर्न्तगत दूसरे गोलमेज सम्मेलन में गाँधी जी के साथ लंदन गईं थीं। सभी राष्ट्रीय आन्दोलन में उन्होंने हिस्सा लिया और अनेक बार जेल यात्राएं की। आगा खाँ जेल में नजर बंदी के दौरान ये भी गाँधी जी के साथ थीं। भारत की स्वतंत्रता के बाद सरोजनी नायडू को पहली महिला गवर्नर नियुक्त किया गया। उस समय एम.ए. तक शिक्षा प्राप्त करने वाली कु. कल्पना दत्त का जन्म चटगॉव में हुआ था। चटगॉव शस्त्रागार काण्ड में वे सूर्यसेन के नेतृत्व में  सक्रिय  रहीं उस समय पुलिस उन्हें गिरफ्तार नही सकी। तदनंतर 1933 में कड़े संघर्ष के बाद सूर्यसेन के साथ गिरफ्तार कर लिया गया। 12 फरवरी 1934 को आजीवन कारावास की सजा दी गई।

पंडित मोती लाल नेहरु की पुत्री विजय लक्ष्मी पंडित का जन्म 1900 में इलाहाबाद में हुआ था। सदैव स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रहते हुए नमक सत्याग्रह में हिस्सा लेने के साथ ही विदेशी कपड़ों की दुकानों पर धरने दिये। 1937 में जब प्रांतीय सरकारों की स्थापना हुई तब उत्तर प्रदेश के मंत्रिमंडल में पहली महिला मंत्री का कार्यभार संभाला। डॉ. सुशीला नैय्यर का लगभग समस्त परिवार ही स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ा हुआ था। बड़े भाई प्यारेलाल नैय्यर गाँधी जी के सचिव थे। सुशीला जी प्रायः सेवा ग्राम में रहती थीं। 1942 में नजरबंदी के दौरान आगा खाँ जेल में 21 महीने तक रहीं। उन्होंने सेवा ग्राम में कस्तूरबा हेल्थ सोसाइटी की स्थापना की जिसके माध्यम से आस-पास के गाँवों के लोगों के लिए उपचार की व्यवस्था की गई। सेवाग्राम में उन्होंने  गाँधी जी की स्मृति में ‘महात्मा गाँधी साइंस इंस्टीट्यूशन’ की स्थापना की। 3 जनवरी 2001 को सुशीला नैय्यर का निधन सेवाग्राम में हुआ।

राष्ट्रीय नेता आसफ अली की पत्नी अरुणा आसफ अली का जन्म 1906 में हुआ था। लाहौर और नैनीताल में शिक्षा प्राप्त अरुणा, नमक सत्याग्रह और असहयोग आन्दोलन  में प्रमुख रूप से सक्रिय रहीं। 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन में आपका योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है। 9 अगस्त 1942 को जब अनेक बड़े नेताओं को गिरफ्तार किया गया तो अरुणा ने भूमिगत रहकर राष्ट्रीय आन्दोलन को गतिशील बनाए रखा। तत्कालीन सरकार ने उनकी गिरफ्तारी के लिए 5000 नकद पुरस्कार की घोषित किया था, लेकिन वे अंत तक पुलिस के हाथ नहीं आईं इसलिए अरुणा आसफ अली को 1942 की नायिका कहा जाता है। 26 जनवरी 1946 को जब अंग्रेज सरकार ने अरुणा के वारंट को रद्द करने की घोषणा की तभी वे  सार्वजनिक रूप से सामने आईं।

सुप्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी राजकुमारी अमृत कौर गाँधी जी की निकट सहयोगिनी थीं। 2 फरवरी 1889 को कपूरथला में जन्मी राजकुमारी अमृत कौर ने ऐशो आराम का जीवन त्यागकर देश की स्वतंत्रता हेतु अनेकों बार जेल में रहना पसंद किया। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात वे प्रथम केन्द्रीय मंत्रिमंडल में स्वास्थ्य मंत्री बनी। 1883 में लाहौर में जन्मी लेडी अब्दुल कादिरी ने 1922 से खिलाफत आन्दोलन और सविनय अवज्ञा आंदोलन में प्रमुख रूप से हिस्सा लिया था। लेडी अब्दुल कादिरी का कार्यक्षेत्र उत्तर प्रदेश में लखनऊ रहा। अम्तु सलाम बेन गाँधी जी के सभी प्रमुख रचनात्मक कार्यो में निकट से जुड़ी रहीं। 1942 के आन्दोलन में रेहाना बहन के साथ सक्रिय रहीं। 1946 में वे नोआखली के सामप्रदायिक दंगों के शिकार लोगों की सहायता हेतु शान्ति यात्रा में गाँधी जी के साथ थीं। सुप्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी और समाज सेविका दुर्गा बाई देशमुख का जन्म 1909 में आन्ध्रप्रदेश में हुआ था। एल.एल.बी तक शिक्षा प्राप्त की थी। स्वदेशी आन्दोलन में इन्होंने अपने विवाह के समय के सभी विदेशी कपड़ों को जला दिया था। अपने कीमती आभूषणों को देश हित के लिए गाँधी जी को समर्पित कर दिया था। राष्ट्रीय कार्यक्रमों के आन्दोलन में ये तीन बार जेल गईं थीं। 9 मई 1981 को आपका निधन हैदराबाद में हुआ था।

क्रान्तिकारी गतिविधियों में अति सक्रिय दुर्गा भाभी का जन्म 7 अक्टूबर 1907 को लाहौर में हुआ था। इनके पति भगवती चरण बोहरा सुप्रसिद्ध क्रान्तिकारी थे। दुर्गा भाभी ने लगभग सभी क्रान्तिकारी गतिविधियों में अपना योगदान दिया। दुर्गा भाभी क्रान्तिकारियों के छिपने के लिए गुप्त व्यवस्था करती थीं। चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह, यशपाल आदि क्रान्तिकारियों की गतिविधियों से निकट से जुड़ी हुईं थीं। 24 अगस्त 1911 में बंगाल में जन्मी बीना दास ने बी.ए. तक की शिक्षा प्राप्त की थी। अध्ययन के दौरान ही वे क्रान्तिकारी गतिविधियों में सक्रिय हो गईं थीं। 6 फरवरी 1932 को कॉलेज के एक समारोह में बंगाल के गर्वनर स्टेनले जेक्सन पर गोली चला दी, लेकिन गवर्नर बच गये तब उन्हें पकड़ लिया गया और 9 वर्ष की कङी कैद की सजा दी गई। 1942 के आन्दोलन में भी सक्रिय रहीं किन्तु तब उन्हें अंग्रेज गिरफ्तार नहीं कर पाये। प्रसिद्ध उद्योगपति जमना लाल बजाज की पत्नी श्रीमती जानकी देवी बजाज ने अपने घर की सभी विदेशी वस्तुओं को जला दिया था।

सरकार विरोधी भाषणों के कारण उन्हें अंग्रेज सरकार ने कुछ समय तक जेल में रखा था। 1908 में अम्बाला में जन्मी सुचेता कृपलानी देशभक्त, आचार्य जे बी कृपलानी की पत्नी थीं। श्रीमती सुचेता कृपलानी भारत छोड़ो आन्दोलन में अरुणा आसफ अली के साथ भूमिगत रहकर आन्दोलन का संचालन करती रहीं। इन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से एम.ए. की परीक्षा पास की थी। आजादी के उपरान्त अनेक बार लोकसभा के लिए निर्वाचित हुईं।  अक्टूबर 1963 से 1967 तक सुचेता कृपलानी उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रहीं। वे स्वतंत्र भारत की प्रथम महिला मुख्यमंत्री थीं। आजादी के बाद देश में कई जगह साम्प्रदायिक दंगे भड़क उठे थे, सुचेता कृपलानी ने दंगा पीड़ित लोगों को राहत पहुँचाने का कार्य किया।

दिल्ली की सुप्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी तथा समाज सेविका सत्यवती का जन्म 1906 में दिल्ली में हुआ था। लगभग सभी आन्दोलनों में सक्रिय भागीदारी निभाते हुए, खराब स्वास्थ्य के बावजूद कई बार जेल भी गईं। उस समय टी.बी. जैसी गंभीर बीमारी के बावजूद उन्होंने अपने प्रयासों से दिल्ली में महिलाओं के मन में स्वतंत्रता के प्रति जागरुकता का शंखनाद किया।  सत्यवती जी की प्रेरणा से हजारों महिलाओं ने उनका अनुसरण करते हुए स्वतंत्रता आंदोलन में अपना योगदान दिया। 1911 में अहमदाबाद में जन्मी मृदुला साराभाई का समस्त परिवार स्वतंत्रता आन्दोलन में सक्रिय रहा। वे स्वतंत्रता के लिए अनेकों बार जेल गईं और जब भारत विभाजन में साम्प्रदायिक दंगे भड़के तो दंगा पीड़ित लोगों की सहायता में मृदुला अत्यंत सक्रिय रहीं।

लाडो रानी जुत्सी ने पंजाब में महिलाओं का जागरूक किया और महिलाओं को एकत्र कर शराब की दुकानें बंद कराने एवं विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया। 1930 में नमक सत्याग्रह के दौरान उन्हें एक वर्ष तक जेल में बंद रखा गया। 1932 में निषेधाज्ञा भंग करने के आरोप में पुनः 18 महीने जेल में रहीं। सरला बहन के नाम से विख्यात लंदन में 5 अप्रैल 1900 को जन्मी कु. कैथलिन 1938 में समाज सेवा के लिए भारत आईं। गाँधी जी से प्रभावित होकर उनके अनेक कार्यक्रमों से जुड़ी रहीं। वे 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन में विशेष रूप से सक्रिय रहीं। तदनंतर वे जीवन पर्यन्त अलमोड़ा में समाज सेवा का कार्य करती रहीं। इस क्षेत्र में रचनात्मक कार्यों को बढ़ावा देने हेतु सरला बहन ने उत्तराखंड में कौसानी आश्रम की स्थापना की। 40 वर्षों तक निरंतर देश सेवा के उपरान्त 8 जुलाई 1962 को उनका निधन हो गया।

जॉन ऑफ आर्क नाम से प्रख्यात रानी गाइनडिल्यू का जन्म 26 जनवरी 1915 को नागालैण्ड में हुआ था। वे एक सुप्रसिद्ध क्रान्तिकारी महिला थीं। रानी गाइनडिल्यू ने 17 वर्ष की अल्प आयु में ही अपने हजार अनुयाइयों के साथ अंग्रेजों के खिलाफ गोरिल्ला युद्ध छेड़ कर उन्हें पराजित किया। 17 अक्टूबर 1942 को इन्हें अंग्रेजों द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया तथा गंभीर प्रताड़ना दी गई। आजीवन कारावास का दंड मिला। जब प्रान्तीय शासन आरंभ हुआ तब अनेक स्वतंत्रता सेनानियों को छोड़ा गया किन्तु जवाहर लाल नेहरु के प्रयासों के बावजूद इन्हें रिहा नहीं किया गया। भारत की आजादी के उपरान्त ही उनको जेल से रिहाई मिली, तद्पश्चात वे जीवन भर लोकप्रिय नागा नेता के रूप में सामाजिक सुधार के कार्यक्रमों में सक्रिय रहीं। प्रसिद्ध क्रान्तिकारी महिला सुशीला दीदी का जन्म 5 मार्च 1905 को गुजरात में हुआ था। काकोरी कांड के केस में खर्च हो रहे रूपये हेतु इन्होंने अपने सारे जेवर दान कर दिये थे। अपने अध्ययन काल के दौरान ही ये चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह, भगवतीचरण वोहरा एवं दुर्गा भाभी के साथ क्रान्तिकारी गतिविधियों में सदैव सक्रिय रहीं थीं। दिल्ली में वायसराय लार्ड इरविन की ट्रेन उड़ाने की जो योजना बनाई गयी थी। उसमें इन्होंने क्रान्तिकारियों तक सभी सूचनाएं पहुँचाने का दायित्व निभाया था।

स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाली इन अमर बलिदानी महिलाओं को आज भुला ही दिया गया है। सम्भवतः आज आजादी के दिनों की महत्ता धूमिल पड़ चुकी है। अब तो सिर्फ तात्कालिकता की ही वाहवाही है और पैसे की ही महत्ता शेष है। ऐसी स्थिति में इन क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानियों का स्मरण न केवल प्रासंगिक है बल्कि देश की आज की परिस्थितियों में बहुत ही महत्वपूर्ण है।

(शैलेंद्र चौहान साहित्यकार हैं और आजकल जयपुर में रहते हैं।)

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