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Categories: बीच बहस

पार्टी और आंदोलन के बीच संपूर्ण क्रांति

संपूर्ण क्रांति का काम पार्टियां करेंगी या उसके लिए समर्पित युवाओं के संगठन और उनके कंधों पर खड़ा एक व्यापक आंदोलन? यह प्रश्न 5 जून 1974 को उस समय भी था जब जयप्रकाश नारायण ने बिहार के राज्यपाल को भ्रष्टाचार के विरुद्ध लाखों लोगों के हस्ताक्षर वाला ज्ञापन सौंपने के बाद पटना के गांधी मैदान में विशाल सभा में संपूर्ण क्रांति का आह्वान किया था। तभी उन्होंने क्रांति के लिए छात्र युवा संघर्ष वाहिनी का गठन भी किया था। यह सवाल आज भी है जब तमाम राजनीतिक दल और उनके नेता अपनी अंतरात्मा की आवाज को मारकर अन्याय के विरुद्ध बोलना बंद कर चुके हैं। वे शक्तिशाली और अन्यायी सरकार के तंत्र से आम आदमी और देश को बचाने की बजाय अपने परिवार और अपने सरकार को बचाने में लगे हैं।

जेपी अपनी संपूर्ण क्रांति के सिद्धांत और कार्यक्रम को बहुत विस्तार नहीं दे पाए थे लेकिन इतना तय है कि वह एक मार्क्सवादी आत्मा का गांधीवादी काया में प्रवेश था। 1922 से 1929 तक अपने अमेरिकी प्रवास के दिनों में जेपी मार्क्सवादी हो गए थे और अगर उनकी मां बीमार न हुई होतीं और उन्हें अचानक भारत न आना पड़ता तो वे सोवियत संघ जाने की तैयारी कर रहे थे। भारत में गांधी के संपर्क में आने के बाद भी समाजवाद और हिंसक क्रांति में उनका विश्वास लंबे समय तक कायम था। इसके नाते गांधी और उनका विवाद भी होता रहता था। लेकिन भारत में कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं के व्यवहार ने उन्हें बहुत निराश किया। वजह साफ थी कि कम्युनिस्ट नेता भारत की आजादी की लड़ाई को महत्व देने और उसके नेतृत्व से तालमेल रखने की बजाय सोवियत संघ के नेतृत्व के आदेशों पर काम करते थे।

कम्युनिस्टों से उनका भारी मोहभंग 1942 के आंदोलन में हुआ जब कम्युनिस्ट नेता भारत छोड़ो आंदोलन में अंग्रेज सरकार के साथ थे। उसके बाद जेपी के जीवन की उतार चढ़ाव भरी लंबी यात्रा है लेकिन इस प्रसंग का अर्थ इतना ही है कि जेपी ने अमेरिका में मार्क्सवाद के अध्ययन से जो हासिल किया था उसे सैद्धांतिक रूप से एकदम कभी खोया नहीं। वे अपने जीवन के आखिरी चरण में जब सर्वोदय और विनोबा जी का साथ छोड़कर संपूर्ण क्रांति का एलान करते हैं तो भी उनके मन में अहिंसक साधनों से एक समाजवादी क्रांति करने का स्वप्न है। जिसमें समता का आदर्श तो है ही लेकिन साथ ही स्वतंत्रता और भाईचारे को भी उतनी ही अहमियत है। वे वर्ग संघर्ष में आखिर तक विश्वास करते हैं। यही वजह है कि उनकी संपूर्ण क्रांति डॉ. राम मनोहर लोहिया की सप्तक्रांति जैसी है और उसमें विनोबा जैसा नैतिक चिंतन होने के साथ साथ गांधी जैसा एक्शन है।

जेपी ने जब युवाओं से पढ़ाई छोड़कर समाज परिवर्तन के लिए आगे आने की अपील की थी तो उसके पीछे माओ त्से तुंग की सांस्कृतिक क्रांति की प्रेरणा होने से इनकार नहीं किया जा सकता। उसके कुछ वर्ष पहले माओ त्से तुंग भी कम्युनिस्ट पार्टी के बुर्जुआ पतन से ऊब गए थे इसलिए उन्होंने युवाओं से आगे आने की अपील की थी। बिहार आंदोलन में उतरने से पहले जेपी विनोबा के साथ जब सर्वोदय आंदोलन में सक्रिय थे तो उनके भीतर पार्टी विहीन लोकतंत्र की अवधारणा भी घुमड़ रही थी। इसीलिए उन्होंने राजनीति की बजाय लोकनीति जैसा शब्द चलाया और नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए पीयूसीएल जैसे संगठन का निर्माण किया। पार्टियों से लोकतंत्र को पैदा हुए खतरों के प्रति विनोबा ही नहीं दादा धर्माधिकारी जैसे गांधीवादी भी आगाह करते हैं। विनोबा कहते थे कि राजनीति और धर्म का संगठित ढांचा मानवता के लिए घातक हो चुका है। इसलिए मनुष्य आखिर में उन्हें ठुकरा देगा।

उसके लिए धर्म का आध्यात्मिक स्वरूप जरूरी है इसलिए उसे रखेगा। इसी तरह मानवता के लिए विज्ञान जरूरी है इसलिए इंसान उसे बचाएगा। पार्टियों के बारे में टिप्पणी करते हुए दादा धर्माधिकारी कहते कि पार्टियां तो संगठित गिरोह हो चुकी हैं। वहां न तो किसी नेता की स्वतंत्र राय होती है और न ही वे व्यवस्था में किसी प्रकार के परिवर्तन करने का संकल्प रखती हैं। पार्टियों का यह पतन जेपी को बेचैन करता था और इसके चलते वे आंदोलन के समय समय पर लालकृष्ण आडवाणी और अटल बिहारी वाजपेयी की स्वार्थी वृत्तियों की आलोचना भी करते थे। हालांकि जेपी जो आरंभ में पार्टी विहीन लोकतंत्र की बात करते थे वे बाद में अमेरिका की तर्ज पर दो पार्टियों के विकास की बात करने लगे। इस बात का जिक्र मधु लिमए ने `बर्थ ऑफ नान कांग्रेसिज्म’ में किया है।

आज जेपी की संपूर्ण क्रांति को समझने के लिए उसका इतिहास जानना जरूरी है लेकिन उसकी सुई को उस समय के राजनीतिक दलों और नेताओं के नाम पर फंसा देने से कुछ हासिल नहीं होने वाला है। उस समय जेपी कांग्रेस और इंदिरा गांधी को लोकतंत्र और देश के लिए खतरा मानते हुए उनकी सत्ता बदलने के लिए गैर-कांग्रेसवाद की रणनीति पर चल रहे थे और साथ ही व्यवस्था परिवर्तन के लिए संपूर्ण क्रांति का आह्वान कर रहे थे। आज वह कांग्रेस खुद अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है।

जबकि उस समय जो संगठन जेपी के साथ था उसने जेपी के स्वतंत्रता, समता और भाईचारे के आदर्शों को तिलांजलि देकर सिर्फ जेपी की पूजा शुरू कर दी है। उस संगठन का काम महज इतिहास के नाम पर विष वमन करना है। आज जरूरत ऐसे हजारों लाखों युवाओं की है जो जेपी की संपूर्ण क्रांति के आदर्शों को आज के संदर्भ में समझ सकें और उसे प्राप्त करने के लिए साहसिक कदम बढ़ा सकें। यह काम पार्टियों से ज्यादा कोई आंदोलन ही कर सकता है क्योंकि पार्टियां तो निहित स्वार्थ के दलदल में उलझ चुकी हैं। जो पार्टी व्यवस्था परिवर्तन की बात सोचती हैं उनके पास शक्ति और संगठन नहीं है और न ही जोखिम उठाने वाले नेता और जिनके पास संगठन और शक्ति है वे चुनाव से आगे सोचती नहीं हैं। यह स्थितियां पार्टियों और परिवर्तन के बारे में नई बहस को आमंत्रित करती हैं।

(अरुण कुमार त्रिपाठी वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

This post was last modified on June 5, 2020 1:12 pm

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