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न्याय में सरकार का हस्तक्षेप है जस्टिस मुरलीधर का तबादला

दिल्ली हाईकोर्ट के जज जस्टिस मुरलीधर का 26 फरवरी की देर रात तबादला नोटिफाई कर दिया गया। उनका तबादला अप्रत्याशित नहीं था, पर उनके तबादले का नोटिफिकेशन अप्रत्याशित ज़रूर है। सुप्रीम कोर्ट के कोलेजियम, जो सुप्रीम कोर्ट के ही बनाये गए नियमों और कानून के अनुसार गठित वरिष्ठतम जजों की एक संस्था है जो हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति और तबादले आदि की संस्तुति करती है, की संस्तुति के आधार पर 12 फरवरी को भेजे गए उसके द्वारा जस्टिस मुरलीधर के तबादले की संस्तुति जो सरकार के माध्यम से राष्ट्रपति से की गयी थी को, 26 फरवरी की रात को सरकार ने नोटिफाई कर दिया। तबादलों की संस्तुति संबंधित जज की सहमति से की जाती है।

इन तबादलों का कोई नियम नहीं है बल्कि यह कॉलेजियम का साम्राज्य है जिसे सुप्रीम कोर्ट संविधान के अंगर्गत प्राप्त असीमित औऱ अपरिमित शक्तियों के अनुसार करती है। कॉलेजियम संस्था की पारदर्शिता को लेकर, सभी सरकारों ने समय समय पर अपनी आपत्ति दर्ज करायी है यहां तक कि वर्तमान सरकार ने अपने पूर्व कार्यकाल में नेशनल ज्यूडिशियल अपोइंटमेंट कमीशन का भी प्रस्ताव रखा था जिसे सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने खारिज कर के कॉलेजियम को ही बरकरार रखा। फिलहाल तो हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति और तबादलों के लिये यही सबसे शक्तिशाली संस्था है।

जस्टिस मुरलीधर की छवि एक नियम कानून के पाबन्द जज की है और उनके अचानक तबादले पर जब 12 फरवरी को निर्णय कॉलेजियम ने लिया तब भी उसकी आलोचना हुयी । सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन और हाईकोर्ट बार एसोसिएशन दोनों ने ही अपनी आपत्ति दर्ज कराई। लेकिन 26 फ़रवरी की रात को जब, अचानक उक्त तबादले की संस्तुति का नोटिफिकेशन जारी हुआ तो, यह अप्रत्याशित था और प्रथम दृष्टया यह नोटिफिकेशन सामान्य नहीं लगा।

दिल्ली में 23 फरवरी को दंगे की शुरुआत हो चुकी थी। हेट स्पीच जो दी जानी थी, दी जा चुकी थी। दंगों, हमलों और पुलिस की नाकामी की ख़बरें आने लगी थीं। 25/26 की रात तक स्थिति काफी भयंकर हो गयी थीं। उधर राष्ट्रपति भवन में अतिविशिष्ट अतिथि के सम्मान में भोज और वहां से कुछ किलोमीटर दूर दिल्ली के एक आम इलाके में हिंसा, आगजनी की खबरें आ रही थीं। रात में ही जस्टिस मुरलीधर ने दिल्ली हिंसा की सुनवाई की और 26 तारीख को फिर दिन में 2 बजे सुनवाई की और हेट स्पीच के वीडियो देखे। अदालत ने पुलिस से पूछा कि क्या उन्होंने ये वीडियो देखें हैं। पुलिस ने तब तक वीडियो नहीं देखे थे तो उन्होंने इससे इनकार किया। हैरानी की बात है कि उन वीडियो में कपिल मिश्र का वह वीडियो भी था जिसमें एक बड़े पुलिस अफसर खुद ही कपिल मिश्र का भाषण सुनते देखे जा रहे हैं। फिर  भी अगर पुलिस यह कह रही है कि उन्होंने वीडियो नहीं देखे तो अदालत ने इसे ही सच माना और 27 फरवरी को पुनः हेट स्पीच से जुड़े वीडियो को देख कर उस पर कार्रवाई करने का निर्देश दिया और सुनवाई पूरी हुयी।

अकसर यह सवाल उठता है कि अदालतें रात को क्यों सुनवाई करती हैं। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज जब चाहे, जहाँ चाहे जिस भी मामले पर चाहें संज्ञान ले सकते हैं। यह संविधान के अंगर्गत प्रदत्त उनके असाधारण और असीमित अधिकारों के अंतर्गत है। आज तक इस बात पर कि अदालतें रात में क्यों सुनवाई करती हैं किसी ने आपत्ति भी नहीं कि और न ही इस संबंध में इसे चुनौती देते हुए कोई याचिका ही दायर की गयी। यह जज के ऊपर है कि किन मामलों को वह कितनी शीघ्रता और किस समय सुनना चाहते हैं। इस मामले में भी जस्टिस मुरलीधर ने मामले की महत्ता को देखते हुए यह निर्णय लिया, और यह आपात सुनवाई 25 / 26 फ़रवरी की रात को अपने आवास पर की।

दिल्ली हिंसा की सुनवाई से सरकार असहज हुई या नहीं हुयी यह तो सरकार जाने, पर अपर सॉलिसिटर जनरल का जो रुख अदालत में रहा उससे उनकी असहजता ज़रूर दिखी। अब 26 फरवरी के जस्टिस मुरलीधर के निर्णय के बाद हेट स्पीच पर जो अनुराग ठाकुर, प्रवेश वर्मा और कपिल मिश्र द्वारा दिए गए थे के वीडियो को देखकर पुलिस को निर्णय लेना था और साथ ही 27 फरवरी को हाईकोर्ट में इसे बताना भी था। अदालत का जो रूख था उससे हो सकता है अदालत मुक़दमा दर्ज करने के लिये कह दे या कुछ और निर्णय 27 फरवरी को दे दे या कोई ऐसा आदेश दे दे जिससे दिल्ली पुलिस की किरकिरी हो जाय , यह एक चिंताजनक ऊहापोह सरकारी पक्ष के मन में था।

27 फरवरी को अदालत का दृश्य परिवर्तन होता है। 27 फरवरी को यह मामला जस्टिस मुरलीधर और तलवन्त सिंह की खंडपीठ के बजाय चीफ जस्टिस डीएन पटेल और जस्टिस सी हरिशंकर की पीठ ने सुना। कानूनी मामलों की वेबसाइट लाइव लॉ ने एक मुक़दमे में अलग अलग बेंच का उस मुक़दमे को लेकर क्या दृष्टिकोण रहा है पर एक बेहतरीन लेख लिखा है।

दिल्ली हिंसा के एक ही मामले में दो पीठ और उनके अलग अलग फैसलों को पढ़ा जाना चाहिए। 26 फरवरी को हुयी सुनवाई में जस्टिस मुरलीधर ने कहा ‌था कि

” मामले की तात्कालिकता को देखते हुए याचिका पर सुनवाई की जा रही है। हालात बहुत बुरे हैं।”

इसी दौरान जब सॉलिसिटर जनरल ने स्थगन की मांग की, तब जस्टिस मुरलीधर ने जवाब दिया,

“क्या दोषियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करना अत्यावश्यक मामला नहीं है? ऐसे वीडियो हैं, जिन्हें सैकड़ों लोग देख चुके हैं। क्या आपको अब भी लगता है कि यह एक अत्यावश्यक मामला नहीं है ?’

जब कोर्ट में मौजूद पुलिस अधिकारी और एसजी ने दावा किया कि उन्होंने कथित भड़काऊ भाषणों वाले वीडियो नहीं देखे हैं तो उन्हें दिखाने के लिए कोर्ट में ही वीडियो चलाने की व्यवस्था की गई।

एसजी ने बाद में यह कहते हुए पीठ को आदेश देने से रोकने की कोशिश की कि एफआईआर दर्ज करने के लिए ‘स्थिति अनुकूल नहीं है’। उन्होंने कहा,

“हम उचित समय पर एफआईआर दर्ज करेंगे। फिलहाल स्थिति अनुकूल नहीं है।”

एसजी की दलीलों को जस्टिस मुरलीधर ने स्वीकार नहीं किया और कहा,

“उचित समय क्या है, मिस्‍टर मेहता? शहर जल रहा है।”

पीठ ने उसके बाद कथित भड़काऊ भाषणों के मामले में एफआईआर दर्ज करने का निर्णय लेने के लिए दिल्ली पुलिस को एक दिन का समय दिया। जस्टिस मुरलीधर ने त्वरित कार्रवाई की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा था, “एफआईआर दर्ज करने में एक-एक दिन का विलंब महत्वपूर्ण है। जितनी देर आप करते हैं, उतनी ही अधिक समस्याएं पैदा होती हैं।”,

फिर 27 फरवरी को बेंच बदल गयी। इसी मामले पर 27 फरवरी को चीफ जस्टिस डीएन पटेल और जस्टिस सी हरिशंकर की पीठ ने सुनवाई की। इस मामले को चीफ जस्टिस पटेल की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष ही सूचीबद्ध किया गया था, जबकि वे उस दिन छुट्टी पर थे, जिसके चलते जस्टिस मुरलीधर की पीठ ने इस पर विचार किया था। जस्टिस मुरलीधर की बेंच ने जैसे तीव्रता दिखाई थी, इस नयी पीठ के सुनवाई के दौरान उतनी तेजी नहीं दिखाई पड़ी। इस पीठ को हेट स्पीच के बारे में भी पता नहीं था। सॉलिसिटर जनरल ने जब अपनी बात रखते हुए, उन ‘भाषणों’ का उल्लेख किया तो मुख्य न्यायाधीश पटेल ने पूछा- “कैसे भाषण?”

एसजी ने तब विस्तार से उन हेट स्पीच के बारे में बताया कि वह कथित घृणा फैलाने वाले भाषणों का जिक्र कर रहे हैं। उन्होंने एफआईआर दर्ज करने के आदेश पर पुलिस के फैसले से बेंच को अवगत कराते हुए कल की ही दलील को दोहराया कि ” एफआईआर दर्ज करने के लिए ‘स्थिति अनुकूल नहीं है ।”  एसजी की जिन दलीलों को कल जस्टिस मुरलीधर ने खारिज़ कर दिया था, इस नयी पीठ  ने उन्हीं दलीलों को स्वीकार कर लिया। एसजी ने कहा कि पुलिस ने सभी वीडियो देखे हैं और उचित कार्रवाई के लिए उसे अधिक समय की आवश्यकता है। फिलहाल स्थिति अनुकूल नहीं है। पीठ ने अपने आदेश में इस दलील को दर्ज किया और केंद्र सरकार को जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय दे दिया। मामले पर अगली सुनवाई 13 अप्रैल को होगी।

एक ही मामले पर एक बेंच 24 घंटे के भीतर एफआईआर चाहती थी, जबकि दूसरी बेंच ने सहजता से उसी मामले में चार सप्ताह से अधिक का समय दे दिया। याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कोलिन गोन्सलेव्स के और करीब की तारीख की गुहार लगाई, उन्होंने कहा कि लोग हर दिन मर रहे हैं, हालांकि बेंच ने उनकी अपील पर ध्यान नहीं दिया। उल्लेखनीय है कि पिछले साल दिसंबर में जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के स्टूडेंट्स के खिलाफ कथित पुलिस क्रूरताओं के मामले में कार्रवाई की मांग वाली एक याचिका इसी पीठ के समक्ष सूचीबद्ध की गई ‌‌थी, तब इन्होंने इसे 4 फरवरी तक के लिए स्‍थगित कर दिया था। 4 फरवरी को जब दुबार सुनवाई हुई तो पीठ ने मामला 29 अप्रैल तक के लिए स्थगित कर दिया।

अलग अलग पीठों का एक ही मुक़दमे में अलग अलग दृष्टिकोण और निर्णय हो सकता है। पर हेट स्पीच पर कोई कार्यवाही न करना, यहां तक की मुक़दमा तक दर्ज करने का आदेश न देना एक प्रकार से हेट स्पीच करने वालों को बढ़ावा ही देना है। अगर मुक़दमा दर्ज हो गया होता तो निश्चय ही उन बड़बोले लोगों की बयानबाजी पर लगाम भी लगती।

जस्टिस मुरलीधर के तबादले पर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के बार एसोसिएशन ने अपनी प्रतिकूल प्रतिक्रिया दी है और सरकार के इस कदम की निंदा की है। द कम्पैन फ़ॉर ज्यूडिशियल अकाउंटेबिलिटी एंड रिफॉर्म्स ( The Campaign for Judicial Accountability and Reforms ) ने जस्टिस मुरलीधर के तबादले की निंदा की है। एक बयान जारी कर उसने कहा है कि,

” इस तबादले का “जनहित” से कुछ भी लेना देना नहीं है, और यह तबादला एक  ईमानदार और साहसी न्यायिक अधिकारी को उसके संवैधानिक दायित्व के निर्वहन से रोकने के लिये किया गया जो उसे दंडित करने के समान है।

हम पूरी तरह से यह जानते हैं कि 12 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम द्वारा न्यायमूर्ति मुरलीधर के स्थानांतरण की सिफारिश की गई थी, लेकिन जिस तरीके से केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचना जारी की गई है, उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।  यह एक तथ्य है कि उनके स्थानांतरण की अधिसूचना शाम को जारी की गई थी, उन्होंने दिल्ली पुलिस को उसकी गलती पर टोकने का अपना कर्तव्य निभाया था और सत्ताधारी पार्टी द्वारा प्रायोजित दिल्ली दंगों में जानमाल के नुकसान के लिए केंद्र सरकार जवाबदेह थी, यही उनके स्थानांतरण के वास्तविक कारण को ही स्पष्ट कर देती है। न्यायमूर्ति मुरलीधर ने केंद्र सरकार के मौजूदा मंत्रियों, विधायकों और अन्य उच्च अधिकारियों के आचरण के बारे में कुछ मुकदमों की सुनवाई के दौरान, कई कड़े सवाल उठाए थे, जिससे लगता है कि वह सारी बातें उनके इस तबादले का कारण है।

इसके पहले हुए तबादलों पर न्यायाधीशों को उनके स्थानांतरित उच्च न्यायालयों में जाने के लिये  उचित समय दिया जाता था,  जबकि न्यायमूर्ति मुरलीधर का स्थानांतरण तत्काल प्रभाव से किया गया है। आदेश की यह प्रकृति इस तबादले के पीछे छिपे दंडात्मक भाव को  उजागर कर देती है। यदि यह तबादला वास्तव में न्यायाधीश की सहमति से किया गया था, तो इस आदेश को लागू करने के लिए उचित समय न देना संदेह को जन्म देता है।

मूल प्रस्ताव अंग्रेजी में है जो आप यहां पढ़ सकते हैं,

This transfer has nothing to do with “public interest” and everything to do with punishing an honest and courageous judicial officer for simply carrying out his constitutional duties.

We are fully cognizant that Justice Muralidhar’s transfer was recommended by the Supreme Court collegium on 12th February but the rushed manner in which the notification has been issued by the Union Government cannot be ignored. The fact that the notification for his transfer was issued on the evening he had done his duty to hold Delhi Police and the Union Government accountable for the loss of lives in the Delhi riots organized by the ruling party, tells us the true nature of his transfer. That Justice Muralidhar had raised tough questions about the conduct of sitting Ministers of the Union Government, MLAs and other high officials seems to have influenced this move.

Whereas previous judges have been given reasonable time to make the move to the transferred High Courts, that Justice Muralidhar’s transfer was to take place with immediate effect, only highlights the punitive nature of this move. If this was indeed a transfer with the consent of the judge, no element of consideration seems to have been given by the Union Government in ordering him to make the move”.

(विजय कुमार सिंह रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं।)

This post was last modified on February 28, 2020 6:20 pm

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