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Categories: बीच बहस

कश्मीर पर मध्यस्थता के अपने प्रस्ताव पर कायम हैं ट्रंप

नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ पीएम मोदी की हुई बैठक को लेकर भारतीय मीडिया केवल एक पक्ष को दिखा रहा है। और वह पीएम मोदी का बयान है। इसमें वह साफ-साफ कह रहे हैं कि कश्मीर मामले में किसी तीसरे पक्ष की जरूरत नहीं है और भारत तथा पाकिस्तान खुद अपनी समस्याओं को बातचीत के जरिये सुलझाने में सक्षम हैं।

जबकि इसी बैठक में ट्रंप का जो बयान है वह देखने में भले ही अभी भारत के पक्ष में लगता हो लेकिन उसमें भविष्य के कुछ संकेत भी छिपे हुए हैं। जिन पर गौर करना जरूरी है। ट्रंप ने कहा कि “पिछली रात हम लोगों ने कश्मीर को लेकर बात की। प्रधानमंत्री सच में महसूस करते हैं कि वह उनके नियंत्रण में है। वो पाकिस्तान से बात करेंगे और मैं इस बात को लेकर निश्चिंत हूं कि वे कुछ ऐसा करने में सक्षम होंगे जो बहुत बेहतर होगा….मेरा दोनों महानुभावों से बहुत अच्छा रिश्ता है और मैं यहां हूं। मैं सोचता हूं कि वे इसे (समस्या का हल) खुद कर सकते हैं।”

उसके बाद एक संवाददाता ने सवाल पूछा कि क्या अपने मध्यस्थ बनने के प्रस्ताव पर अभी वह कायम हैं। इसका जवाब देते हुए ट्रंप ने कहा कि “मैं यहां हूं”।

अब इस बयान का क्या मतलब निकाला जाए। पूरा बयान पढ़िए तो उसमें अमेरिका के दखल की न केवल पूरी गुंजाइश दिख रही है बल्कि वह उसके लिए पूरी तरह से तैयार भी है। और ऊपर का बयान बताता है कि अगर यह सब चीजें ठीक नहीं हुईं तो उसकी दखलंदाजी अवश्यंभावी है।

अब आइये बिंदुवार इन शर्तों पर एक नजर दौड़ा लेते हैं। राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि मोदी को भरोसा है कि वह कश्मीर की स्थिति को नियंत्रित कर लेंगे। अब इसका उत्तर तो कोई लेमैन भी दे सकता है। जो कश्मीर 70 सालों से नियंत्रित नहीं हो पाया और अब जबकि चीजें एक दूसरे छोर पर खड़ी हो गयी हैं तो सुलझने की जगह उसके और विस्फोटक होने की आशंका ज्यादा है। ऐसे में अगर बल का प्रयोग किया जाएगा तो मामला और गंभीर हो सकता है। फिर तो विदेशी ताकतों के लिए रास्ता अपने आप खुल जाएगा। जिसका कि अमेरिका इंतजार कर रहा है।

दूसरी बात ट्रंप ने पाकिस्तान के साथ भारत की बातचीत की बात कही है। क्या यह हाल-फिलहाल संभव होता दिख रहा है। अभी तक जो पाकिस्तान बातचीत के लिए अपनी तरफ से हाथ बढ़ाए हुए था उसने अब भारत के साथ रिश्तों पर हर तरह की पाबंदी लगानी शुरू कर दी है। जिसमें व्यापार से लेकर आवाजाही तक शामिल है। और वह इस पूरी कोशिश में जुट गया है कि मामले का कैसे अंतरराष्ट्रीयकरण कर दिया जाए। और मामले को यूएन तक ले जाकर एक हद तक उसने इसमें सफलता भी हासिल की है। ऊपर से भारत भी पाकिस्तान से बातचीत के लिए आतंकवाद को पूरी तरह से खत्म करने की जो शर्त लगाए है वह दोनों देशों के रिश्तों में आए उबाल को कम करने की जगह बढ़ाने ही वाला है। और जब यह दोनों चीजें नहीं हो पाएंगी तो फिर आखिर रास्ता क्या बचेगा? वही जो सभी लोग सोच रहे हैं और जिसका रोड मैप पहले ही तैयार हो चुका है। बिल्लियों की लड़ाई में बंदर फायदा ले जाएगा।

ट्रंप और मोदी के साथ प्रतिनिधिमंडल।

और वह बात इसी इंटरव्यू में ट्रप ने बता दी है कि फिर तो “मैं हूं ही”। अभी भारतीय जनमत के दबाव में भले ही मोदी और उनकी बीजेपी सरकार अमेरिका की मध्यस्थता के प्रस्ताव को खारिज कर रहे हों लेकिन सच यह है कि उनकी नीति उसके सामने समर्पण की है। जब बीजेपी भारत-अमेरिका-इजराइल धुरी की बात करती है तो उसमें यह बात शामिल होती है कि वह अमेरिका के साथ नाभिनाल के रिश्ते की पक्षधर है। और इस तरह से बीजेपी की जो अघोषित नीति है वह ट्रंप के अपने मंसूबों से मेल खाती है। बस अड़चन इसमें एक है वह यह कि अभी भारतीय जनमत उसके लिए तैयार नहीं है।

लेकिन एक दिन जब कश्मीर की स्थिति और ज्यादा गर्म होगी और पाकिस्तान से बातचीत तो क्या युद्ध की परिस्थितियां तैयार हो जाएंगी तब ट्रंप के लिए स्वाभाविक तौर पर मध्यस्थता का रास्ता तैयार हो जाएगा। ऐसा इसलिए भी होगा क्योंकि बीजेपी को कश्मीर को गरम रखना है जो उसकी घरेलू खुराक के लिए जरूरी है। और पाकिस्तान से यह गर्मी उसके समर्थकों और मतदाताओं को चार्ज रखने की पहली शर्त। लिहाजा बीजेपी के नेतृत्व में कश्मीर पर नियंत्रण और पाकिस्तान से बेहतर रिश्ता दिन में ख्वाब देखने से कम नहीं है।

दरअसल जिस 21वीं सदी को दुनिया में एशिया की सदी के तौर पर बनाने का संकल्प लिया गया  था। और इसमें चीन तथा भारत को अगुआ भूमिका निभानी थी। और यह सब कुछ एशियाई देशों के आपस में मिल जुलकर आगे बढ़ने से ही संभव होना था। उसमें मोदी की सरकार ने पलीता लगा दिया है। पश्चिमी देशों और खासकर अमेरिका से उसके रिश्ते इसमें अड़चन बन रहे हैं। और वह अमेरिका जो एशिया में एक देश की दूसरे देश से लड़ाई में अपना भविष्य देखता है उसके साथ क्या इस ख्वाब को पूरा कर पाना संभव है?

यह एक बड़ा सवाल है। अगर अमेरिका और यूरोप दुनिया की अगुआई कर रहे हैं तो उसके पीछे प्रमुख बात उनकी अपनी एकता है। जिसमें छोटी-मोटी बातें जरूर हुई हों लेकिन कभी कोई बड़ी दरार नहीं आयी। इसलिए भारत को एशिया के मीरजाफर बनने से बचना चाहिए। लेकिन आजादी की लड़ाई में जो शाश्वत मीरजाफर रहे हों भला उनसे इससे इतर उम्मीद भी क्या की जा सकती है। वैसे भी संघ को आकाओं की गोद में बैठने की आदत है। पहले ब्रिटेन था अब उसके लिए अमेरिका है।

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