दो घटनाओं से खुली ‘हाउडी यूएस यात्रा’ की पोल

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिका के लिए स्वदेश से रवाना हुए तो दो घटनाओं ने सबका ध्यान खींचा। एक घटना हाऊडी मोदी वाले स्थल टेक्सास के ह्यूस्टन से जुड़ी है जहां उस पगड़ीधारी सिख ट्रैफिक पुलिस अफसर की हत्या कर दी गयी जिन्होंने सिख समुदाय को पगड़ी पहनकर ड्यूटी करने देने की लड़ाई जीती थी। संदीप धालीवाल नस्लीय हिंसा का शिकार हो गये। दूसरी घटना कश्मीर में हुई, जहां अनुच्छेद 370 हटने के बाद पहली बार आतंकवादियों ने सुरक्षा बलों पर हमला बोला। 3 अलग-अलग घटनाओं में 6 आतंकवादी मारे गये।

ट्रम्प को मोदी का दुर्भाग्यपूर्ण चुनावी समर्थन

दोनों घटनाएं भारतीय प्रधानमंत्री के अमेरिकी दौरे से संबंध रखती हैं और इसलिए महत्वपूर्ण हैं। अमेरिका में प्रवासी भारतीयों को श्वेतवादी वर्चस्व की राजनीति का शिकार होना पड़ रहा है। रिपब्लिकन डोनाल्ड ट्रम्प की सियासत नफ़रत फैलाने की रही है। राष्ट्रवादी जुनून को उभारने में जुटे ट्रम्प अक्सर अपने विरोधियों को देश छोड़ने की सलाह देते रहते हैं। इस्लाम के खिलाफ बोलना भी उनकी श्वेत-अश्वेत सियासत की कड़ी है। दुर्भाग्य से हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने कथित मित्र डोनाल्ड ट्रम्प के लिए ‘अबकी बार ट्रम्प सरकार’ का नारा लगा आए हैं।

सरदार संदीप धालीवाल की बीच सड़क पर ड्यूटी के दौरान कार ड्राइवर के हाथों हत्या यह बताती है कि ट्रम्प की नफ़रत की सियासत और उन्हें भारतीय प्रधानमंत्री का मिला खुला समर्थन का अंजाम क्या होने वाला है। जो प्रवासी भारतीय ट्रंप की नफ़रत भरी सियासत का विरोध करते रहे थे और डेमोक्रैट का साथ दे रहे थे, उन्हें दुविधा में डालकर स्वदेश लौटे हैं पीएम मोदी। उनके पास अपने मूल के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बात मानने की नैतिकता और वहां की कठोर वास्तविकता को नकारने की मजबूरी पैदा हो गयी है।

असमंजस में प्रवासी भारतीय

दिक्कत तो तब भी होगी जब भारतीय मूल की हिन्दू अमेरिकी तुलसी गबार्ड डेमोक्रैट उम्मीदवार होंगी। तब प्रवासी भारतीय क्या करेंगे? क्या वे तुलीस गबार्ड का विरोध करेंगे? अगर मोदी की बात माननी है तो ऐसा करना ही पड़ेगा। एक हिन्दू, एक भारतीय मूल की महिला को अमेरिकी सियासत में इसलिए नुकसान उठाना होगा क्योंकि हिन्दूवादी दक्षिणपंथी राजनीति करने वाली पार्टी बीजेपी की सरकार के मुखिया और देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डोनाल्ड ट्रम्प की जीत का नारा लगा दिया है। प्रवासी भारतीयों के लिए अमेरिका में यह अप्रिय स्थिति है।

आत्मघाती है ‘इस्लामी आतंकवाद’ का जुमला

कश्मीर में ताजा आतंकी हमले का संबंध आतंकवाद से है। हालांकि पीएम मोदी ने यूएन में ‘इस्लामी आतंकवाद’ का जुमला टॉस नहीं किया, लेकिन जिस तरीके से यूएन में भाषण से पहले ह्यूस्टन में मोदी-ट्रंप ने इस्लामिक आतंकवाद से लड़ाई लड़ने का ऐलान किया, उससे यूएन में इमरान ख़ान को मौका मिल गया। इमरान ख़ान ने इस्लाम को बदनाम करने की भावुक अपील करते हुए मुसलमानों को आकर्षित करने की कोशिश की। इसके साथ ही कश्मीर में लोगों को इसी आधार पर भड़काने का भी मौका उन्होंने नहीं छोड़ा। एटमी युद्ध की धमकी तक उन्होंने दे डाली। आप कह सकते हैं कि सुरक्षा बलों पर आतंकियों का ताज़ा हमला इन्हीं परिस्थितियों का परिणाम है।

अमेरिका का संदिग्ध व्यवहार

आश्चर्य इस बात का है कि जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यूएन में अपना वक्तव्य देने वाले थे उससे पहले अमेरिका ने कश्मीर पर ऐसा बयान दिया, जो भारत पर दबाव डालने वाला और पाकिस्तान के सुर में सुर मिलाने वाला था। अमेरिका के विदेश विभाग के अधिकारी ने कहा कि जम्मू-कश्मीर में हालात सामान्य बनाने के लिए तेजी से प्रतिबंधों में छूट दी जानी चाहिए। वहीं यूएन में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने तो अपने बयान से दुनिया को चौंका दिया। उन्होंने कश्मीर में कर्फ्यू हटाने की भी मांग की और यह भी कहा कि कर्फ्यू हटते ही भारतीय फौज से कश्मीरी मुकाबले के लिए निकल पड़ेंगे। यह भड़काने वाला बयान था और भारत ने इसकी निन्दा की। मगर, इन उदाहरणों से यह जग जाहिर हो गया कि अमेरिका कश्मीर मामले में भारत और पाकिस्तान दोनों के साथ अपनी चाल अपने ढंग से चल रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कूटनीति के अनुरूप ही यूएन में पाकिस्तान, इमरान ख़ान या कश्मीर का जिक्र नहीं किया। उन्होंने केवल और केवल शांति की बात की। मगर, कश्मीरी नेताओं को नज़रबंद रखने और बड़ी तादाद में लोगों को जेल में रखने की स्थिति के बीच शांति की बात कईयों को हजम नहीं होगी। इमरान ख़ान को यह बात हजम नहीं होना स्वाभाविक था। मगर, जेहाद के नाम पर आतंकियों की फैक्ट्री चलाते रहने की बात कबूल कर इमरान ख़ान ने वास्तव में प्रतिक्रिया देने का हक भी खो दिया है।           

बुद्ध-गांधी-विवेकानन्द से रह गया है कितना प्यार?

यह सच है कि भारत ने दुनिया को कभी युद्ध नहीं दिया, सिर्फ बुद्ध दिया है। मगर, इसमें वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी का कोई योगदान नहीं है। इन्होंने तो भारत के इस स्वभाव को बदलने का नारा दिया है और हर सम्भव ऐसी कोशिश की है। चाहे गौतम बुद्ध हों या महात्मा गांधी या फिर स्वामी विवेकानन्द- क्या ये पाकिस्तान और बांग्लादेश की मिट्टी से भी जुड़े नहीं रहे? इसके बावजूद पाकिस्तान किस राह पर चल पड़ा, ये दुनिया जानती है। सम्भव है कि पाकिस्तान की प्रतिबद्धता इन महापुरुषों के लिए नहीं रहने की वजह से ऐसा हुआ हो, मगर क्या आज खुद भारतीय जमीन पर बुद्ध, गांधी और विवेकानन्द प्रासंगिक रह गये हैं? अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहते हैं कि हां, तो यह स्वागतयोग्य बात होगी मगर इस पर यकीन करना बहुत मुश्किल होगा।

(लेखक प्रेम कुमार वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं और आजकल आपको विभिन्न टीवी चैनलों के पैनलों में बैठा देखा जा सकता है।)

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