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Saturday, September 18, 2021

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हिंदुत्व की गिरफ्त में फंसे भारत से क्या उम्मीद करें अफगान ?

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अफगानिस्तान के लोग वास्तविक संकट से जूझ रहे हैं। अमेरिका और नाटो देशों ने उनके भविष्य को तालिबान के हाथों में सौंप कर उनके सपने नष्ट कर दिए हैं और उन्हें तब तक खबर नहीं होने दी जब तक सत्ता बदल नहीं गई। अफगान औरतें और नौजवान बदहवास हैं। लेकिन उन्होने आत्म-समर्पण नहीं किया है। वे लोग देश छोड़ कर निकल गए जो निकल सकते थे। बचे लोग भी विरोध में खड़े हो रहे हैं। अगर पंजशेर घाटी में अहमद मसूद और अमरूल्ला सालेह के नेतृत्व में हथियारबंद लड़ाई चल रही है तो हेरात और काबुल समेत देश के अन्य हिस्सों में औरतों का शांतिपूर्ण प्रदर्शन चल रहा है। लेकिन अफगानिस्तान को लेकर भारत में क्या चल रहा है ?

अफगानिस्तान की हालत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वहां ढाई लाख लोग मारे जा चुके हैं, दस लाख लोग विकलांग हो गए हैं, 50 लाख अफगानिस्तान में दूसरे गांव या शहर चले गए हैं, 35 लाख लोग देश से बाहर भाग गए हैं और दो करोड़ भूख तथा बीमारी से मरने को हैं।

भारतीय मीडिया में अफगानों के दर्द, उनकी बदहाली, अमेरिका की दगाबाजी और तालिबान के खिलाफ चल रहे संघर्ष के बदले इस्लामी आतंकवाद, लव जिहाद, कश्मीर और पाकिस्तान के किस्से सुनाए जा रहे हैं। इसके निशाना अल्पसंख्यक, कांग्रेस और प्रगतिशील लोग हैं। तरीका वही पुराना है किसी औवैसी, किसी रहमानी को बिठाना और भाजपा या संघ के किसी नेता या प्रवक्ता से भिड़ा देना। इस देशभक्ति के लिए आप को कुछ जुमले दोहराने हैं और एक समुदाय विशेष को गाली देना है। किसी त्याग या बहादुरी की जरूरत नहीं है।

लेकिन क्या इस नौटंकी से आप एक गंभीर राष्ट्र की छवि बना सकते हैं ? क्या हम अफगानिस्तान में अपनी विदेश नीति की हार की भरपाई टीवी चैनलों और सोशल मीडिया में हिदू-मुसलमान की बहस से कर सकते है ?

ऐसा नहीं है कि भारत की विदेश नीति सिर्फ अफगानिस्तान में फेल हुई है। कोई भी पड़ोसी देश हम पर भरोसा नहीं करता है। इसमें नेपाल, भूटान, श्रीलंका, बांग्लादेश जैसे नजदीक के पड़ोसी तो हैं ही, ईरान जैसे दूर के पड़ोसी भी शामिल हैं। अफगानिस्तान में तालिबान के आने के बाद तो हमारे दोनों दुश्मन-चीन तथा पाकिस्तान देश बड़ा खतरा पहुंचाने की स्थिति में आ गए हैं। रूस भी हमारे साथ नहीं है। अफगानिस्तान पर होने वाली किसी चर्चा में वह हमें शामिल होने की दावत नहीं देता। अमेरिका तथा नाटो देश तो इसकी जरूरत ही नहीं महसूस करते हैं। यहां तक दुनिया की किसी भी मानवीय त्रासदी के समय लोगों की मदद करने वाले स्वीडेन, डेनमार्क और नार्वे जैसे देशों लोग भी भारत के लिए कोई भूमिका नहीं देख रहे है। भारत में सिर्फ 15,000 अफगान हैं, उससे दुगुने,  31 हजार, लोगों को स्वीडेन ने जगह दे रखी है।

सवाल उठता है कि हमारे विशाल लोकतंत्र के विश्व-रंगमंच पर महत्वहीन हो जाने की स्थिति को समझने की कोशिश नहीं होनी चाहिए ?  क्या इस तरह निरर्थक हो कर हम सुरक्षित रह सकते हैं ?

अगर हम गौर से देखें तो हमें समझ आ जाएगा कि हिंदुत्व के फर्जी राष्ट्रवाद ने हमारी विदेश नीति का कैसा बुरा हाल किया है। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने जो नीति बनाई थी, उसकी जड़ें आजादी के आंदोलन की विचारधारा में थी। इसका आधार तैयार करने वालों में समाजवादी विचारक डॉ. राममनोहर लोहिया जैसे लोग एक समय कांग्रेस का विदेश विभाग संभाल रहे थे। यह नीति गांधी जी के असर में बनी थी और विश्व शांति जिसका पहला लक्ष्य था। आजादी, लोकतंत्र और समता इसके प्रमुख तत्व थे। भारत महाशक्तियों के आपसी टकराव में किसी का पक्ष लेने के बदले मानवता के साथ खड़े रहना चाहता था। गांधी जी ने फिलिस्तीनियों के अधिकार का समर्थन  किया था।

 आजादी के बाद भी इन बुनियादी उसूलों पर हम टिके रहे। यही वजह है कि एक गरीब मुल्क होने के बाद भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हमारी पूछ थी। भारत की इही नैतिक ताकत ने उसे गुट-निरपेक्ष देशों का नेता बना दिया था। हालत यह थी कि दुनिया में हर बड़ी घटना के समय हमारी आवाज को महत्व दिया जाता था। एक सेकुलर देश होने के कारण मध्य-पूर्व के मुस्लिम देशों से हमारे बेहतरीन संबंध रहे और पाकिस्तान के खिलाफ हमारे तीन युद्धों में धर्म के आधार पर कोई देश उसके साथ नहीं आया। भारत का विभाजन धर्म के आधार पर हुआ था, फिर भी बांग्लादेश के लोगों ने जब अपनी आजादी की लड़ाई लड़ी तो हमें ही अपना सच्चा दोस्त माना। लोकतंत्र और सेकुलरिजम की ताकत ऐसी थी कि पाकिस्तान के सैन्य शासन के खिलाफ लड़ने वाले हमसे प्रेरणा लेते थे। साझी विरासत का असर ऐसा है कि लाहौर के शादमान चौक का नाम बदल कर शहीद भगत सिंह चौक कर दिया गया क्योंकि कभी वहां वह जेल थी जिसमें शहीदे आजम को फांसी दी गई थी। साहित्य, संगीत और फिल्मों इस विरासत असर दिखाई देता है। भारत-पाक युद्ध का विरोध करने वालों की पाकिस्तान की बड़ी संख्या रही है।

भारत की नैतिक ताकत का असर था सिर्फ पाकिस्मान के मामले में ही नहीं दिखाई देता है। नेपाल, तिब्बत, बर्मा और अफगानिस्तान के लोकतंत्र समर्थक इस देश को अपना दूसरा घर मानते रहे हैं। दलाई लामा इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। हमें अपना समझने वालों की सूची में अफ्रीका, क्यूबा, वियतनाम और मध्य एशिया- न जाने कहां-कहां के लोग रहे हैं। लेकिन आज हम कहां आ गए हैं ? हिंदुत्व के फर्जी राष्ट्रवाद में पाकिस्तान और मुसलमान के लिए नफरत तथा ‘हम महान’ के नारों के अलावा क्या है ? एक समय था हम नेल्सन मंडेला, मार्शल टीटो और कर्नल नासिर के नाम पर सड़कों का नाम रख कर हम वसुधैव कुटुंबकम की भावना का परिचय देते थे। अब हमारे नेता इस फिराक में रहते हैं किसी सड़क, किसी संस्थान का नाम बदल कर राजनीतिक लाभ कमा लें।

विदेश नीति सिर्फ व्यापार तथा सैनिक जरूरतों से तय नहीं होती। लोगों की आकांक्षाओं तथा मानवीय मूल्यों का इसमें बहुत महत्व होता है। यही वजह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन की  इस रट को लोग सुनने को तैयार नहीं हैं कि अफगानिस्तान से वापसी का फैसला अमेरिकी हित में है और यही उनकी सबसे बड़ी प्राथमिकता है। उनकी आलोचना उनकी ही पार्टी के लोग कर रहे हैं कि उन्होंने निर्दोष अफगानों खासकर महिलाओं की किस्मत कट्टरपंथी तालिबान के हाथों में सौंप दी। अपनी बात कहने के लिए वह और उनका प्रशासन बार-बार मीडिया के सामने आ रहा है। लेकिन विरोध करने वालों को तालिबान समर्थक या गद्दार कहने की उनकी हिम्मत नहीं है।

अमेरिकी सरकार अपनी कारस्तानी को ढंकने और अपने समर्थक नाराज नागरिकों को मनाने के लिए अपना देश छोड़ने की चाहत रखने वाले हर अफगान के लिए दरवाजा खोल रखा है। उसने अफगानिस्तान से करीब सवा लाख लोगों को निकाला है। इसमें अमेरिकियों की संख्या 10 प्रतिशत भी नहीं होगी। यही हाल ब्रिटेन का है। वे लोग मुसलमान-ईसाई नहीं कर रहे हैं।

लोगों को काबुल से निकालने का काम शुरू भी नहीं हुआ था कि विदेश मंत्री जयशंकर का ट्वीट आया कि भारत हिंदुओं तथा सिखों के संपर्क में है। यही नहीं, उधर जयशंकर संयुक्त राष्ट्र संघ में कह रहे थे कि उनका देश आतंकवाद को किसी मजहब से नहीं जोड़ता है और इधर प्रधानमंत्री मोदी 20 अगस्त को सोमनाथ से जुड़ी परियोजनाओं का उद्घाटन कर रहे थे। सभी को पता है कि अफगानिस्तान के इतिहास का सोमनाथ से क्या संबंध है। मोदी  भारत का गौरव हिंदू आस्था में ढूंढ रहे थे। यह निजी तौर पर भले ही स्वीकार करने योग्य हो, अलग-अलग मजहबों वाले इस देश के प्रधान के लिए कैसे सही हो सकता है। वह भी ऐसे समय में जब दरवाजे के ठीक बाहर कट्टरपंथी आ गए हों। यही नहीं, ठीक आठ दिन बाद यानि 28 अगस्त को उन्होंने नई शक्ल पाए जलियांवाला बाग का उद्घाटन करते हुए अफगानिस्तान के हिंदू-सिखों को अपना बता दिया और कह डाला कि नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) ऐसे ही लोगों के लिए बनाया गया है।

जब दुनिया भर में पीड़ित अफगानों को शरण देने के लिए होड़ मची है, भारत की इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है। अफगानिस्तान के लोग भारत से मुहब्बत करते हैं और मनमोहन सिंह सरकार ने 2011 में सामरिक सहयोग की संधि की थी और वायदा किया था कि उनके छात्रों को मेडिकल, इंजीनियरिंग आदि की शिक्षा देंगे, उनकी मदद करेंगे। इसे मोदी सरकार ने ठन्डे  बस्ते में रख दिया। विकास में हिस्सेदारी का काम भी मनमोहन सिंह के समय से चल रहा है जिसे पूरा करने का निमंत्रण तालिबान भी हमें दे रहा है।

लेकिन हिंदुत्व की गिरफ्त में फंसा भारत अफगानों के भरोसे को बनाए रखने के लिए तैयार नहीं है। सत्ताधरी पार्टी को उत्तर प्रदेश चुनावों के लिए अफगानिस्तान के मुद्दे को हिंदू-मुसलमान में बदलना है। यही उन्होंने पश्चिम बंगाल के चुनावों में किया था और बांग्लादेश से अच्छी मित्रता का ख्याल किए बगैर उसे नीचा दिखाने वाले बयान गृह मंत्री अमित शाह ने दिए थे।

हिंदुत्व का फर्जी राष्ट्रवाद हमें वोट दिला सकता है, लेकिन विश्व रंगमंच पर कोई महत्वपूर्ण भूमिका नहीं। तिरंगे की शान अपने ही मुल्क के हिस्से में फहराने से नहीं बढ़ेगी। इसकी शान तो तभी बढ़ेगी जब दुनिया के हर मंच पर हमारी बात का वजन हो। टीवी बहसों में गाल बजाने के बदले भाजपा वाले अपने अपने अंदर झांके कि उन्होंने देश की हैसियत को कहां पहुंचा दिया है।

(अनिल सिन्हा वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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