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कोविड-19: लाखों विदेश से आए लोगों के बजाय 2100 तबलीगियों पर फ़ोकस कर आख़िर क्या कहना चाहती है सरकार?

अब तक निजामुद्दीन मरकज में शामिल तबलीगी जमात के 360 लोगों में कोविड-19 पोजिटिव होने की पुष्टि हो चुकी है। मीडिया और दक्षिणपंथी समुदाय के संगठन इसे कोरोना जेहाद कहकर देश भर में समुदाय विशेष के प्रति नफरत का माहौल तैयार करने में लगे हुए हैं।

लेकिन निजामुद्दीन मरकज मामले को किस तरह से देखा, समझा जाए। सांप्रदायिक मीडिया के बनाए नैरेटिव से समझने की कोशिश करेंगे तो आप भी कोरोना महामारी की अपनी बुनियादी समझ को ‘कोरोना-जेहाद’ में रिड्यूस करके कोरोना से लड़ने के असल मुद्दे से भटककर मुस्लिम समुदाय के प्रति नफरत और विद्वेष की उनकी राजनीति का हिस्सा बन जाएंगे।

मरकज में कोविड-19 की पुष्टि दरअसल कोविड-19 महामारी पर केंद्र सरकार के देर से कदम उठाने की गवाही है

निजामुद्दीन मरकज में मुख्य आयोजन 13-15 मार्च तक हुआ। 13 मार्च को निजामुद्दीन के मरकज में कार्यक्रम की शुरुआत हुई यानि वहां इकट्ठा होने वाले 2 दिन पहले ही आ गए होंगे। विशेषकर जो विदेश से आए होंगे। यानि ये विदेशी लोग अपने साथ कोविड-19 संक्रमण लेकर देश में 10-11 मार्च तक आ चुके थे। जबकि भारत सरकार 19 मार्च को WHO के अलार्म बजाने का इंतजार करती रही और उनके अलार्म बजाने के बाद ही जगी है। जबकि 10 मार्च को देश भर में होली का त्योहार मनाया गया। लोग इसमें ख़ूब गले मिले और हाथ मिलाया। होली पर भी कई लोग देश-विदेश से अपने घरों को लौटकर आए थे। हो सकता है उनमें भी कुछ लोग कोविड-19 संक्रमण लेकर आए हों।

13 मार्च को रवांडा में कोविड-19 का पहला केस दर्ज किया गया। लेकिन यह रोगी वहां का नागरिक नहीं था। संक्रमित रोगी भारत का रहने वाला है। ये व्यक्ति 8 मार्च को भारत के मुंबई से रवांडा गया था। ये व्यक्ति कोविड-19 का वाहक बनकर गया। पहुंचने पर इस शख्स को जांच के लिए भेजा गया, जिसमें वो COVID-19 पॉजिटिव पाया गया। हालांकि जब वो रवांडा पहुंचा था तो उसके अंदर कोरोना का कोई लक्षण नहीं पाया गया था। लेकिन 13 मार्च को वो खुद अस्पताल पहुंचा था, जहां पर वो COVID-19 पॉजिटिव पाया गया। इसका अर्थ ये हुआ कि 8 मार्च तक एक सीमित दायरे में ही सही पर देश में संक्रमण फैल चुका था।

30 जनवरी, 2020 को भारत में कोरोना का पहला केस आ गया था। चीन के वुहान शहर में अध्ययन करने वाले एक छात्र के जरिए सबसे पहले ये केरल में दर्ज़ किया गया था।

क्या मरकज में आयोजन गलत था

11 मार्च को विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) कोविड-19 को वैश्विक महामारी घोषित किया था। बावजूद इसके भारत में संसद के दोनों सदन 23 मार्च तक चलते रहे। पहली बार 19 मार्च को देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आधिकारिक तौर पर कुछ कोविड-19 के बार में और सोशल डिस्टेंसिंग के बारे में बोला। बावजूद इसके संसद के सदन 23 मार्च तक चलते रहे। सैकड़ों सांसद और संसद भवन के हजारों कर्मचारी और अधिकारी इकट्ठा होकर एक मिसाल के तौर पर देश के सामने सोशल-डिस्टेंसिंग के मापदंड स्थापित करते रहे।

16 मार्च तक सिद्धिविनायक मंदिर बंद नहीं था,16 मार्च तक उज्जैन का महाकालेश्वर मंदिर नहीं बंद था, 17 मार्च तक शिरडी का साईं बाबा मंदिर और सिंगणापुर का शनिदेव मंदिर नहीं बंद था, 18 मार्च तक वैष्णो देवी मंदिर नहीं बंद था, 20 मार्च तक काशी विश्वनाथ मंदिर भी नहीं बंद था। 

इसके अलावा 15 मार्च को ही दिल्ली में अखिल भारतीय हिंदू महासभा द्वारा कोरोना से बचाव के लिए गौमूत्र पार्टी का आयोजन किया गया था। 15 मार्च को ही लखनऊ में एक होली पार्टी में कनिका कपूर समेत उनके साथ भाजपा और कांग्रेस के कई नेता शामिल हुए थे। ऐसे में 13-15 मार्च तक निजामुद्दीन के मरकज में आयोजित हुए धार्मिक कार्यक्रम को किस आधार पर गलत ठहराया जाए।

क्या विदेश से लौटने वाले भारतीयों का कोविड-19 टेस्ट हुआ

आज सुबह 4 बजे पद्म श्री सम्मानित स्वर्ण मंदिर के पूर्व ‘हजूरी रागी’ की कोविड-19 से मौत हो गई। 62 वर्षीय पूर्व ‘हजूरी रागी’ हाल ही में विदेश से लौटे थे और बुधवार को वह कोरोना वायरस से संक्रमित पाए गए थे। उन्हें 30 मार्च को सांस लेने में दिक्कत और चक्कर आने की शिकायत के बाद यहां गुरु नानक देव अस्पताल में भर्ती कराया गया था। हजूरी रागी विदेश से आने के बाद निश्चित तौर पर कई गुरुद्वारे और आयोजनों में शामिल हुए होंगे। सवाल अब ये है कि क्या हजूरी रागी के सारे धार्मिक संपर्कियों को ट्रेस किया गया।

कनिका कपूर 9 मार्च को लंदन से मुंबई लौटीं। और 12-15 मार्च तक उन्होंने लखनऊ में कई पार्टियां अटेंड की। एक पार्टी में कांग्रेस और भाजपा के कई सांसद और विधायक मौजूद थे। उसमें भाजपा सांसद दुष्यंत सिंह भी मौजूद थे। स्पष्ट है सरकार की ओर से विदेश से लौटने वाले लोगों के कोविड-19 संक्रमण होने की आशंका को बहुत हल्के में लिया गया।

मरकज मामले ने लॉक डाउन के बाद प्रवासी मजदूरों के पलायन पर घिरी मोदी सरकार को निकाल लिया

निःसंदेह मरकज में बड़े पैमाने पर कोविड-19 पोजिटिव पाए जाने से ये मसला बेहद संवेदनशील और खतरनाक स्थिति में पहुँच गया है। जल्द से जल्द इसमें शामिल सभी लोगों और उनके संपर्क में आए लोगों को आइसोलेट और क्वारंटाइन करके उनका टेस्ट करवाया जाना चाहिए। बावजूद इसके इस मसले ने लॉक डाउन के दौरान प्रवासी मजदूरों के शहरों से पलायन करने के मसले पर घिरी मोदी सरकार को बाईपास प्रदान कर दिया।

पूरा मीडिया विमर्श प्रवासी मजदूरों के पलायन और उनके भूखे मरने से डायवर्ट होकर निजामुद्दीन मरकज में हुए धार्मिक आयोजन में जुटे लोगों तक सीमित हो गया है। 360 लोगों के कोविड-19 पोजिटिव पाए जाने के बाद इस मसले को लेकर सोशल मीडिया से लेकर भोंपू मीडिया तक इसके सांप्रदायीकरण की पूरी मुहिम चल पड़ी है।

कोविड-19 संक्रमण से निपटने के लिए स्वास्थ्यकर्मियों के पास पीपीई किट और अस्पतालों में पर्याप्त वेंटिलेटर नहीं हैं। सरकार इन पर पैसा खर्च करने के बजाय लाइट मशीन गन की खरीदारी करती है। लगातार कई डॉक्टरों के कोविड-19 संक्रमण होने की पुष्टि की खबरें आ रही हैं लेकिन मीडिया और सरकार को लोगों का ध्यान भटकाए रखने के लिए मरकज का मुद्दा मिल गया है।

मोहल्ला क्लीनिक के डॉक्टर के कोविड-19 पोजिटिव होने की पुष्टि के बाद उनके संपर्क में आए 900 लोगों को क्वारंटाइन करने के लिए ट्रेस करना पड़ा। डॉक्टर सऊदी अरब से आई एक कोविड-19 पोजीटिव महिला के संपर्क में आने के बाद संक्रमित हो गया था। इसका मतलब ये नहीं कि हम उस डॉक्टर को जान बूझकर 900 लोगों की जान खतरे में डालने का आरोप लगाकर उनकी जाति या धर्म के आधार पर उनकी पूरी जमात को ही गुनाहगार साबित करने के एजेंडे में जुट जाएं।

इसी तरह मरकज के लोगों को भी नहीं पता था कि उनके संपर्क में आने वाले लोग कोविड-19 पोजिटिव होंगे या उनके संपर्क में रहकर वो भी संक्रमित हो गए हैं। जबकि जिस दिन मरकज में धार्मिक आयोजन शुरु हुआ था उसी दिन यानि 13 मार्च को भारत सरकार के स्वास्थ्य विभाग ने अपने बयान में कहा था- “कोरोना वायरस से किसी प्रकार का आपात संकट नहीं है।”

(सुशील मानव जनचौक के विशेष संवाददाता हैं। और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

This post was last modified on April 2, 2020 5:45 pm

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