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रोहिणी आयोग की सिफारिशों पर कुंडली न मार ले सरकार!

इस समय देश में केंद्र सरकार की नौकरियों और शिक्षण संस्थाओं में अन्य पिछड़े वर्ग (ओबीसी) के लिए 27 फीसदी कोटा आरक्षित है, लेकिन ऐसी शिकायतें आने के बाद कि इसका लाभ अन्य पिछड़े वर्ग की लिस्ट में शामिल सभी जातियों को समान रूप से नहीं मिल रहा है और इसके बड़े हिस्से पर कुछ प्रभावशाली जातियों का कब्जा है; सबको इस व्यवस्था का पूरा हक दिलाने के लिए मोदी सरकार ने 2 अक्टूबर, 2017 को दिल्ली हाई कोर्ट की पूर्व चीफ जस्टिस (रिटायर्ड) जी रोहिणी की अगुवाई में चार सदस्यीय एक आयोग का गठन किया। इस आयोग को जिम्मेदारी दी गई कि वह देखे कि ओबीसी की लिस्ट में शामिल कौन सी जातियां अब तक इसका पूरा लाभ उठा पाने से वंचित रह गई हैं। अपने अध्ययन के बाद जस्टिस रोहिणी आयोग ने लिस्ट में शामिल जाति समूहों को चार उप-श्रेणियों में डालने का प्रस्ताव तैयार किया है।

जस्टिस रोहिणी आयोग करीब तीन साल तक 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण कोटे और उसमें शामिल जातियों को मिले लाभों पर तथ्य जुटाने के लिए माथापच्ची के बाद अब राजनीतिक तौर पर बहुत ही संवेदनशील मामले की अगली कड़ी को जोड़ने की तैयारी में है। अंग्रेजी अखबार इकोनोमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक आयोग अगले महीने से इस कोटे को चार उप-श्रेणियों में विभाजित करने के अपने मसौदे पर राज्यों के साथ चर्चा करने जा रहा है। जानकारी के मुताबिक आयोग ने सेंट्रल लिस्ट में शामिल कुल 2,633 ओबीसी जातियों को एक-दो-तीन और चार उप-श्रेणियों में डालने का प्रस्ताव बनाया है। इसके तहत आयोग ने इन चारों नई श्रेणियों को 27 फीसदी आरक्षण में क्रमश: 2 फीसदी, 6 फीसदी, 9 फीसदी और 10 फीसदी आरक्षण देने का प्रस्ताव तैयार किया है।

पहली उप-श्रेणी में 1,674 जाति समूह
अभी तक जो जानकारी उपलब्ध हुई है उसके मुताबिक पहली उप-श्रेणी में 1,674 जाति समूहों को रखा गया है। यह मुख्य तौर पर वो जातियां हैं, जिन तक अभी तक इस आरक्षण व्यवस्था का लाभ नहीं पहुंचा है। दूसरी उप-श्रेणी में 534 जाति समूहों को रखा गया है, जबकि तीसरी में 328 और चौथी में 97 जातियां शामिल हैं। आयोग के एक सदस्य ने नाम की गोपनीयता की शर्त पर बताया है कि हमारा काम करीब-करीब पूरा हो चुका है। अगले महीने से हम कई राज्यों में जाएंगे और उन्हें अपने प्रस्ताव के बारे में बताएंगे और किसी खास जाति को अगर शामिल करने की जरूरत है तो उनका भी सुझाव लेंगे। हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि लगभग 11 राज्यों ने पहले से ही अपने यहां उप-श्रेणियां बना रखी हैं और उनमें से हमें मिलान करने की जरूरत पड़ सकती है।

सिर्फ 10 पिछड़ी जातियों ने एक-चौथाई फायदा उठाया
आयोग के पास ओबीसी आरक्षण का जो आकलन उपलब्ध है, उससे पता चलता है कि पिछले पांच साल में सिर्फ 10 जाति समूहों को 27 फीसदी आरक्षण में से एक-चौथाई हिस्से का लाभ मिला है। इसी पैमाने पर दो-तिहाई फायदा सिर्फ 37 जाति समूहों को मिला है और तीन-चौथाई आरक्षण का लाभ महज 100 जाति समूहों ने ही उठाया है। यानी सेंट्रल लिस्ट की कुल 2,633 जातियों में से बाकी बची 2,486 जातियों को 27 फीसदी आरक्षण में से सिर्फ पांचवें हिस्से का ही मलाई मिला है, लेकिन आयोग का आकलन ये है कि इनमें से भी 1,000 से ज्यादा जातियां ऐसी हैं, जिनका 27 फीसदी आरक्षण में कोई प्रतिनिधित्व ही नहीं है।

आयोग को दिखी बड़ी असमानता
आयोग ने चौथी उप-श्रेणी की (97) जातियों के लिए 27 फीसदी आरक्षण में से जो 10 फीसदी कोटा फिक्स करने का प्रस्ताव बनाया है, यह प्रभावशाली पिछड़ी जातियां हैं, जिनकी आबादी भी अधिक है। यानी प्रस्तावित मसौदे में भी इनका ज्यादा शेयर बरकरार रखा गया है, लेकिन उप-श्रेणी बनाने से यह सुनिश्चित हो जाएगा कि बाकी अन्य पिछड़ी जातियां अब ओबीसी आरक्षण के लाभ से वंचित न रहने पाएं। मौजूदा ओबीसी आरक्षण में असमानता कितनी है, इसकी जानकारी कुछ तथ्यों से मिल सकती है। उदाहरण के लिए रोहिणी आयोग ने पाया है कि एक विशेष वर्ष में आईआईटी में हरियाणा और केरल के क्रमश: 581 और 595 उम्मीदवारों को ओबीसी आरक्षण का लाभ मिला, जबकि उनके मुकाबले बड़े राज्यों पंजाब और कर्नाटक में क्रमश: 71 और 127 उम्मीदवार ही उस साल ओबीसी कोटे से आईआईटी में नामांकन करवा पाए।

इस तरह के आयोग के गठन की व्यवस्था संविधान के आर्टिकल-340 में किया गया है। जस्टिस रोहिणी आयोग को पहले 27 मार्च, 2018 तक ही अपनी रिपोर्ट देनी थी, लेकिन हाल ही में इसकी मियाद बढ़ाकर 31 जुलाई कर दी गई है। जस्टिस (रिटायर्ड) जी रोहिणी की अध्यक्षता वाले इस आयोग में उनके अलवा सेंटर फॉर पॉलिसी स्टडीज, नई दिल्ली के डायरेक्टर डॉक्टर जेके बजाज, कोलकाता स्थित एंथ्रोपोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के डायरेक्टर (पदेन सदस्य) और भारत के रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त (पदेन सदस्य) को सदस्य बनाया गया है। जस्टिस रोहिणी खुद ओबीसी समाज से आती हैं।

जो कुछ भी होता दिख रहा है उसमें गन्दी राजनीति भी है। मुश्किल कानून की नहीं बल्कि राजनीति के मोर्चे पर है। बेहतर तो यही था कि ओबीसी महाश्रेणी के भीतर शामिल विभिन्न कोटि की जातियों को उनके हिस्से का आरक्षण 1990 में ही दे दिया जाता जब मंडल आयोग की सिफारिशों को अमलीजामा पहनाया गया था। दरअसल, मंडल आयोग की रिपोर्ट में एक नोट असहमति का भी था, जिसमें उपलब्ध आरक्षण को विभिन्न उपश्रेणियों में बांटने की सिफारिश की गई थी, लेकिन मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू कराने के लिए लामबंद प्रभुत्वतशाली किसान-समुदायों तब कोटे को उपश्रेणियों में बंटने नहीं दिया।  इसके बाद जब शिक्षा संस्थानों में ओबीसी आरक्षण की बात आयी तो भी ये कोटे को उपश्रेणियों में बांटने के कठिन सवाल पर चुप्पी साधी गई।

अगर बीजेपी ने मसले को उठाया है तो इसलिए कि उसे एक सच्चाई का शिद्दत से अहसास हो चला था। बीजेपी को लग रहा था उसके खीसे में ओबीसी की महाश्रेणी में शामिल भूस्वामित्वधारी जातियां नहीं आ पायी हैं और उसे अपने को मजबूत बनाये रखने के लिए ओबीसी के बड़े दायरे में शामिल अन्य पिछड़ी जातियों को अपने पाले में खींचे रखना होगा। यही वजह रही जो राहिणी आयोग बनाया गया। मीडिया में इस आशय की कई खबरें आयी हैं कि आयोग 27 फीसद के आरक्षण को विभिन्न उपश्रेणियों में बांटने के विचार से राजी है।

तो फिर अब के वक्त में बीजेपी के लिए क्या मुश्किल आ गई जो 27 फीसद आरक्षण को विभिन्न उप-श्रेणियों में बांटने की बात उसे आसानी से हजम नहीं हो रही है? दरअसल, बीजेपी के सामने मुश्किल ये है कि अब उसे लग रहा है, ओबीसी के बड़े दायरे में शामिल जो चंद बड़े किसान-समुदाय हैं, उनके बीच भी उसे अच्छा-खासा समर्थन हासिल है। ऐसे में, बीजेपी ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहती जो इन समुदायों की नाराजगी का सबब बने और ये समुदाय उससे दूर हो जाए। यों भी, जातियों को विभिन्न कोटियों में बांटकर देखने की राजनीति बड़ी जोखिम भरी होती है। इसी कारण पार्टी ने तय किया कि 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले 27 प्रतिशत आरक्षण को उप-श्रेणियों में बांटने के खेल खेलना ठीक नहीं।

हमें उस घड़ी का इंतजार ही करना होगा जब सरकार को लगे कि रोहिणी आयोग के रिपोर्ट के निष्कर्षों को सार्वजनिक करने का यही माकूल मौका है। ऐसा वक्त 2022 में भी आ सकता है और 2038 में भी। या फिर, ये भी हो सकता है कि पार्टी देश की जनता का ध्यान किसी खास मुश्किल से भटकाने के लिए रोहिणी आयोग की रिपोर्ट की बातों को अपने चुने हुए मौके पर जारी करे।

जो कोई भी दूरगामी महत्व की सुविचारित सामाजिक नीति का पक्षधर है, उसे मांग करनी चाहिए कि ओबीसी के बड़े दायरे में शामिल विभिन्न उपश्रेणियों के बीच 27 प्रतिशत के आरक्षण को बांटने के बाबत जो रोहिणी आयोग बनाया गया है, उसकी सिफारिशों को सरकार महामारी के उतार के तुंरत बाद जल्दी से जल्दी जारी करे। बहस का असल मुद्दा ये नहीं बनना चाहिए कि ओबीसी आरक्षण के भीतर उपश्रेणियों के लिए कोटे का बंटवारा किया जाये या नहीं। गंभीर मसला है उपश्रेणियों की ठीक-ठीक सूची तैयार करना और बगैर हकमारी करते हुए हर सूची के लिए कोटे में से हिस्सा निकालना। अदालत ने बारंबार कहा है कि ऐसा वर्गीकरण मनमाने ढंग से नहीं किया जा सकता। सूची को विश्वसनीय तथ्यों के आलोक में ही बनाया जाना चाहिए और आयोग इस काम में जुटा जान पड़ता है।

  • राजीव रंजन
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This post was last modified on March 2, 2021 3:49 pm

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